अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)
रात की बैठक
बीते दिनों अचानक सत्ता के गलियारों में हलचल मच गई। आनन-फानन में मंत्रियों को संदेश भेजा गया कि वे जहां हैं, जिस स्थिति में हैं, रात 8 बजे तक हाउस पहुंच जाएं। आदेश इतना तत्काल था कि किसी को तैयारी का मौका तक नहीं मिला। रात 8 बजे शुरू हुई यह बैठक रात करीब 2 बजे तक चली। खास बात यह रही कि इस कोर बैठक में संगठन और संघ से जुड़े वरिष्ठ पदाधिकारी भी मौजूद रहे।आखिर ऐसी क्या नौबत आ गई कि आधी रात तक मंथन करना पड़ा? बैठक का सबसे बड़ा मुद्दा सरकार और संगठन के बीच बढ़ती दूरी और अफसरशाही का बढ़ता प्रभाव था। कई वरिष्ठ लोगों ने साफ शब्दों में नाराजगी जताई कि एक खास अधिकारी के इर्द-गिर्द पूरा सत्ता तंत्र घूमता दिखाई दे रहा है। यहां तक कहा गया कि राजनीतिक प्राथमिकताओं पर भी नौकरशाही का असर जरूरत से ज्यादा बढ़ चुका है। निशाने पर थे पांचवीं मंजिल वाले चर्चित साहब, जो खुलेआम अपने प्रभाव का प्रदर्शन करते थे और कहते थे संघ ईज माई फुट। कहा गया कि प्रदेश को चुनिंदा सलाहकारों और अधिकारी चला रहे है। यही कारण था कि संगठन ने समय रहते इस दूरी को महसूस किया और स्पष्ट संकेत दिया कि सरकार का संचालन लोकतांत्रिक जवाबदेही के साथ होना चाहिए, न कि अफसरशाही के प्रभाव में। कहा गया कि संगठन और कार्यकर्ताओं ने कठिन संघर्ष के बाद पार्टी को 15 सीटों से 54 सीटों तक पहुंचाया, उन्हें हाशिए पर नहीं डाला जा सकता। यदि कार्यकर्ता और संगठन खुद को उपेक्षित महसूस करेंगे तो इसका असर सरकार की छवि और जनविश्वास दोनों पर पड़ेगा। आधी रात की बैठक का असर पांचवीं मंजिल वाले साहब के बढ़ते कद पर पड़ा। जो साहब कल तक संघ इज़ माई फुट जैसी बातें करते थे, वे अब सुर बदलकर संघ इज़ माई हेड, संघ इज़ माई हैंड। कहते फिर रहे है। एक संदेश और था कि आने वाले 30 महीने चुनावी लिहाज से बेहद निर्णायक हैं। ऐसे में अब अफसरशाही नहीं, बल्कि संगठन और कार्यकर्ताओं की ताकत पर भरोसा करना होगा। संकेत स्पष्ट था अब पवन का झोंका आंधी बनने वाला है और जीत के शिल्पियों की कद्र करनी ही पड़ेगी।
किसका पत्ता साफ, किसको मिली खरी-खोटी?
आधी रात तक चली बैठक में सिर्फ सत्ता और संगठन के रिश्तों पर ही मंथन नहीं हुआ, बल्कि कई मंत्रियों के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड भी खुलकर सामने आया। इशारों-इशारों में यह संदेश भी दे दिया गया कि आगामी फेरबदल में कुछ मंत्रियों का पत्ता साफ हो सकता है। दरअसल, ढाई वर्षों में कई मंत्रियों के प्रदर्शन को लेकर संगठन के भीतर गहरी नाराजगी है। कहा गया कि जिस मेहनत और समर्पण से संगठन ने 15 सीटों से 54 सीटों तक का सफर तय कराया, आज उसी संगठन की अनदेखी हो रही है और कई मंत्री कार्यकर्ताओं के बजाय अफसरों और सलाहकारों के भरोसे सरकार चलाने में ज्यादा विश्वास दिखा रहे हैं। इस समीक्षा बैठक की तैयारी पिछले एक महीने से चल रही थी। जिलाध्यक्षों से विस्तृत रिपोर्ट मंगाई गई थी और उसी के आधार पर मंत्रियों के कामकाज की समीक्षा की गई। चर्चा है कि स्वास्थ्य विभाग संभाल रहे मंत्री को सबसे तीखी फटकार का सामना करना पड़ा। कहा गया कि स्वास्थ्य विभाग लापरवाही और विवादों का केंद्र बन चुका है। विभाग से जुड़ी 40 प्रतिशत वाली चर्चाओं पर भी गंभीर नाराजगी जताई गई। वहीं सरगुजा अंचल से जुड़े एक कृषि प्रधान मंत्री का जनता को पैर दिखाना भारी पड़ा। काम भी थर्ड क्लास बताया गया और कहा गया कि इतनी वरिष्ठता के बावजूद प्रदर्शन निराशाजनक है। राजस्व से लेकर उद्योग और आबकारी जैसे विभागों के कामकाज पर भी असंतोष जताया गया। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि जनप्रतिनिधि जनता और कार्यकर्ताओं से दूरी बनाकर केवल अफसरशाही के भरोसे सरकार चलाएंगे तो इसका राजनीतिक नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। सत्ता में करीब पांच मंत्री ऐसे हैं जिनकी कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठे हैं जुलाई फर्स्ट वीक में इसका असर देखने को मिल सकता है। इन सबके बीच एक सवाल बार-बार गूंजता रहा कि जब सरकार में भी देव हैं, संगठन में भी देव हैं और पुलिस-प्रशासन भी देव है, तो फिर प्रदेश में राक्षसराज जैसी चर्चा पैदा होने की नौबत क्यों आ रही है?
राख फिर उड़ने लगी…
सीमेंट की उड़ती राख से जनता का भले ही हाजमा खराब हो जाए, लेकिन भट्ठियों से निकलने वाली लक्ष्मी की रफ्तार थमनी नहीं चाहिए। याद कीजिए, पिछले कॉलम में हमने सीमेंट रिश्ते और दरार की कहानी बताई थी सीमेंट की कमाई के आंकड़ों में नई जोड़-घटाव की लाइन खिंच गई थी और उसी ने घर की चौखट तक दरार पहुँचा दी थी। इन आकड़ो की वजह से महीनो तक रिश्ते में दरार पड़ी रही। लेकिन राजनीति और नौकरशाही का पुराना नियम है न तो नदियाँ हमेशा रूठती हैं और न ही नोटों का प्रवाह ज्यादा दिन रुकता है। अब चर्चा है कि पारिवारिक कलह पर विराम लग चुका है। समझौते का नया फार्मूला तैयार हो गया है। कहते हैं कि बगुला भगत का अलग से कट निर्धारित कर दिया गया है, ताकि आगे किसी तरह का भ्रम न रहे। साहब को भी समझा दिया गया है कि अब सब कुछ नियम, प्रक्रिया और सिस्टेमेटिक तरीके से चलेगा। घर में संदेश साफ है कि पहले जितना नहीं, लेकिन नियमित हिस्सा आता रहना चाहिए। नतीजा यह कि भट्ठियां फिर पहले की तरह धुआं उगल रही हैं, गलियारों में फिर वही पुराने चेहरे दिखाई देने लगे हैं और दरबारों में फिर से रौनक लौट आई है। उधर हाउस संतुष्ट बताया जा रहा है, इधर मैडम भी प्रसन्न हैं और पूरा तंत्र पुराने ट्रैक पर लौटता दिख रहा है। कहते हैं सीमेंट का असली काम ईंटों को जोड़ना होता है, लेकिन जब जोड़-घटाव रिश्तों और रसूख का होने लगे तो सबसे मजबूत ढांचा भी भीतर से खोखला होने लगता है। फिलहाल तो खबर यही है कि राख फिर उड़ रही है… और लक्ष्मी का प्रवाह भी।
क्यों लटकी लिस्ट?
पुलिस महकमे में पिछले कई महीनों से आईपीएस तबादला सूची को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है। सत्ता और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि हाउस के भीतर बैठे एक प्रभावशाली चेहरे, जिसे व्यंग्य में “बगुला भगत” कहा जाता है, का पुलिस महकमे पर असाधारण प्रभाव है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि जिलों के पुलिस कप्तानों की पदस्थापना संबंधी कई फाइलें गृह मंत्री तक पहुंचती ही नहीं और कई अहम फैसले दूसरे स्तर पर ही तय हो जाते हैं। कोंडागांव और सक्ती जैसे जिलों में एसपी की नियुक्तियों को लेकर भी सवाल उठे हैं। यदि गृह मंत्री की भूमिका केवल औपचारिक होकर रह जाए तो कानून-व्यवस्था पर उनकी प्रभावी पकड़ कैसे बनेगी? बताया जाता है कि एक युवा मंत्री और “बगुला साहब” के बीच करीबी तालमेल की चर्चा लंबे समय से है और उसका असर पुलिस महकमे तक दिखाई देता है। आलम यह है कि गृह विभाग अपने स्तर पर एक टीआई का तबादला तक नहीं करा सकता। इसी मुद्दे को लेकर दो मंत्रियों के बीच तीखी बहस हुई और अफसरशाही के बढ़ते दखल पर सवाल उठाए गए। माना जा रहा है कि यही वजह है कि बहुप्रतीक्षित आईपीएस तबादला सूची फिलहाल ठंडे बस्ते में पड़ी है जब तक अंदरूनी खींचतान शांत नहीं होती, तब तक सूची जारी होने की संभावना कम है। बताया जाता है कि आधी रात चली हाई-कोर बैठक में भी यह विषय प्रमुख चर्चा का केंद्र रहा।
सरेंडर की स्क्रिप्ट किसने लिखी?
कोरिया के बहुचर्चित लल्ला सिंह हत्याकांड में अब कहानी हत्या से आगे निकल चुकी है। चर्चा इस बात की नहीं कि आरोपी कौन हैं, चर्चा इस बात की है कि आखिर वे पुलिस तक पहुंचे कैसे? पुलिस का दावा है कि लगातार दबिश और बढ़ते दबाव के कारण मुख्य आरोपी समेत चार लोग मनेन्द्रगढ़ थाने पहुंचकर आत्मसमर्पण कर गए। लेकिन कहानी का क्लाइमेक्स कुछ और ही है। अगर पुलिस की पकड़ इतनी मजबूत थी तो फिर गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई? और अगर आरोपी खुद ही आने वाले थे तो कई दिनों तक तलाश का पूरा नाटक किसके लिए चलता रहा? चर्चा तो यहां तक है कि कहानी का आखिरी पन्ना पहले ही लिखा जा चुका था, बस सही समय पर किरदारों की एंट्री बाकी थी। मनेन्द्रगढ़ थाने तक पहुंचने वाले इस रास्ते ने कानून-व्यवस्था से ज्यादा सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या आरोपी खुद आए या किसी ने उन्हें सही समय पर सही जगह पहुंचा दिया? अगर यह पुलिस की रणनीति थी तो वह भी सामने आनी चाहिए और अगर इसके पीछे कोई अदृश्य हाथ था तो उसका चेहरा भी बेनकाब होना चाहिए। इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा रहस्य हत्या नहीं, बल्कि सरेंडर की स्क्रिप्ट है। आखिर लेखक कौन था, निर्देशक कौन था और पर्दा गिरने से पहले तालियां किसके लिए बज रही थीं यही सवाल अब जनता पूछ रही है।
जंगल हमारा, कोयला हमारा… फिर बिजली इतनी महंगी क्यों?
छत्तीसगढ़ को देश का ऊर्जा राज्य कहा जाता है। जंगल यहां के, खदानें यहां की, कोयला यहां का और हजारों मेगावाट बिजली उत्पादन भी यहीं होता है। इसी छत्तीसगढ़ से राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों को बिजली मिलती है। सवाल यह है कि जब संसाधनों का सबसे बड़ा बोझ छत्तीसगढ़ उठाता है तो सबसे ज्यादा राहत भी यहीं के लोगों को क्यों नहीं मिलती? 1 जुलाई 2026 से राज्य में बिजली की दरें औसतन 6.23 प्रतिशत बढ़ा दी गई हैं। तर्क दिया गया कि वितरण कंपनी को 1662 करोड़ रुपये का राजस्व घाटा हुआ है। इसकी भरपाई के लिए घरेलू उपभोक्ताओं पर 30 से 50 पैसे प्रति यूनिट, गैर-घरेलू उपभोक्ताओं पर 20 से 40 पैसे प्रति यूनिट और कृषि पंपों पर 40 पैसे प्रति यूनिट तक की बढ़ोतरी कर दी गई। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब प्रदेश के पास कोयला भी है, उत्पादन भी है और बिजली बेचकर राजस्व भी कमाया जाता है, तो फिर ‘बिजली बिल हाफ’ जैसी योजना क्यों बंद कर दी गई? क्या इस फैसले से पहले नियामक आयोग ने गांव-गांव के उपभोक्ताओं, किसानों, छोटे व्यापारियों और आम जनता की राय को वास्तव में सुना? आखिर यह फैसला जनता के हित में लिया गया या केवल बैलेंस शीट के हिसाब से? अंदरखाने सत्ता के गलियारों में यह चर्चा भी तैर रही है कि पूरा खेल केवल प्रतिशत का नहीं, बल्कि बड़े आर्थिक हितों का है। जनता को 30 और 50 पैसे की बढ़ोतरी बताकर समझाया जा रहा है कि बोझ मामूली है, जबकि करोड़ों यूनिट की खपत में यही बढ़ोतरी सैकड़ों करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार बन जाती है। चर्चा तो यहां तक है कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे करीब 500 करोड़ रुपये की डील की फुसफुसाहट भी सत्ता के गलियारों में सुनाई दे रही है। सच क्या है, इसकी पड़ताल एजेंसियां करेंगी, लेकिन सवाल जनता का है कि जब जंगल हमारा, कोयला हमारा और बिजली भी हमारी धरती से पैदा हो रही है, तो आखिर सबसे महंगी कीमत भी छत्तीसगढ़ की जनता ही क्यों चुकाए?
यक्ष प्रश्न –
1 – पुलिस कप्तानों की कुर्सियों के लिए 7 करोड़ और 3 करोड़ रुपये की बोली किस जिले की लगी है?
2 – क्या आगामी दो साल वास्तव में सुशासन के होंगे या फिर अफसरशाही और अंदरूनी खींचतान ही सरकार पर भारी पड़ेगी?



