सिकासार-कोडार के ₹2524 करोड़ के टेंडर पर खींचतान, बड़ी कंपनी L-1 तो फिर किसे खटक रही अनुभव की शर्त?
दिलीप बिल्डकॉन सबसे कम बोली लगाकर L-1, तकनीकी शर्तों को लेकर हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला ‘मोदी की गारंटी’ में शामिल है कोडार-सिकासार इंटरलिंकिंग परियोजना, समोदा में निर्माण के बाद मरम्मत पर करोड़ों फूंक चुका विभाग अब बड़ी परियोजना में चाहता है अनुभवी एजेंसी, पर्दे के पीछे राजधानी की ‘दलाल लॉबी’ सक्रिय

सिकासार-कोडार के ₹2524 करोड़ के टेंडर पर खींचतान, बड़ी कंपनी L-1 तो फिर किसे खटक रही अनुभव की शर्त?
दिलीप बिल्डकॉन सबसे कम बोली लगाकर L-1, तकनीकी शर्तों को लेकर हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला ‘मोदी की गारंटी’ में शामिल है कोडार-सिकासार इंटरलिंकिंग परियोजना, समोदा में निर्माण के बाद मरम्मत पर करोड़ों फूंक चुका विभाग अब बड़ी परियोजना में चाहता है अनुभवी एजेंसी, पर्दे के पीछे राजधानी की ‘दलाल लॉबी’ सक्रिय
रायपुर :- छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग की महत्वाकांक्षी सिकासार-कोडार लिंक परियोजना का करीब ढाई हजार करोड़ रुपये का टेंडर अब तकनीकी और वित्तीय पात्रता की खींचतान में हाईकोर्ट तक पहुंच गया है। इस बीच देश की बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों में शामिल दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड ₹2524.32 करोड़ की बोली के साथ L-1 घोषित हो चुकी है। अब सवाल यही है कि हजारों करोड़ की ऐसी परियोजना में विभाग द्वारा अनुभव और वित्तीय क्षमता की मजबूत शर्त रखना आखिर किसे खटक रहा है?विभागीय सूत्रों का दावा है कि पूरे घटनाक्रम के पीछे राजधानी की एक कथित ‘दलाल लॉबी’ सक्रिय है और बड़ी परियोजनाओं में अपने नजदीकी लोगों अथवा एजेंसियों के लिए रास्ता बनाने की कोशिश की जा रही है। दूसरी तरफ पात्रता की शर्त को अदालत में चुनौती देने वाली कंपनी के पास विभाग द्वारा अपेक्षित स्तर और प्रकृति के अनुभव को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। मामला इसलिए और महत्वपूर्ण है क्योंकि कोडार-सिकासार बांध इंटरलिंकिंग परियोजना ‘मोदी की गारंटी योजना’ में शामिल है। ऐसे में सवाल केवल एक टेंडर का नहीं, बल्कि उस परियोजना की गुणवत्ता और पारदर्शिता का भी है जिसे किसानों और सिंचाई विस्तार से जोड़कर जनता के सामने रखा गया है।
₹2549 करोड़ की परियोजना, ₹2524 करोड़ में DBL सबसे कम –
सिकासार से कोडार जलाशय को पाइपलाइन से जोड़ने वाली इस परियोजना की अनुमानित निविदा लागत करीब ₹2549.86 करोड़ रखी गई है। काम केवल पाइपलाइन निर्माण का नहीं है। testing, commissioning और उसके बाद पांच वर्षों तक संचालन एवं रखरखाव की जिम्मेदारी भी ठेकेदार की होगी। निर्माण के लिए 30 महीने का समय निर्धारित है। 28 जुलाई 2026 को दिलीप बिल्डकॉन ने शेयर बाजार को दी सूचना में बताया कि कंपनी ₹2524.32 करोड़, GST अतिरिक्त, की बोली के साथ परियोजना में L-1 bidder घोषित हुई है। यानी अनुमानित लागत से करीब ₹25 करोड़ नीचे सबसे कम बोली सामने आई।दिलीप बिल्डकॉन बड़े सड़क, सिंचाई और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर काम करती रही है। विभाग का तर्क भी यही बताया जा रहा है कि इतनी बड़ी परियोजना ऐसे हाथों में जानी चाहिए जिनके पास बड़े काम का अनुभव, तकनीकी क्षमता और वित्तीय ताकत हो।
‘मोदी की गारंटी योजना’ में शामिल परियोजना –
विधानसभा चुनाव के दौरान सामने आई ‘मोदी की गारंटी योजना’ में किसानों और सिंचाई से जुड़े वादों के बीच कोडार-सिकासार बांध इंटरलिंकिंग परियोजना का उल्लेख किया गया था। इसे गरियाबंद और महासमुंद जिलों में सिंचाई विस्तार से जोड़ा गया। यानी यह जल संसाधन विभाग की सामान्य परियोजना भर नहीं है। करीब ₹2500 करोड़ के टेंडर तक पहुंची इस परियोजना में निर्माण एजेंसी का अनुभव और पूरी निविदा प्रक्रिया की पारदर्शिता इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाती है।
पात्रता का विवाद पहुंचा हाईकोर्ट –
M/s Offshore Infrastructures Limited ने टेंडर की वित्तीय पात्रता से जुड़ी शर्त को हाईकोर्ट में चुनौती दी। कंपनी की मुख्य आपत्ति उस condition पर थी जिसमें bidder के औसत annual turnover को परियोजना की estimated cost से जोड़ते हुए पात्रता निर्धारित की गई थी। याचिका में इस शर्त को मनमाना और अनुपातहीन बताते हुए दावा किया गया कि इससे प्रतिस्पर्धा सीमित हो रही है। 1 जुलाई की pre-bid proceedings में उठाई गई आपत्तियां स्वीकार नहीं किए जाने का मुद्दा भी अदालत के सामने रखा गया। हाईकोर्ट के 29 जुलाई 2026 के आदेश के अनुसार Offshore ने 23 जुलाई को याचिका दायर की। इसके बाद कंपनी technical evaluation में disqualify हो गई और विभाग ने financial bid खोल दी। बदली परिस्थितियों में याचिकाकर्ता ने पहली याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, ताकि technical disqualification और financial bid खोले जाने को नए सिरे से चुनौती दी जा सके। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने याचिका withdrawn मानते हुए ऐसी चुनौती देने की liberty दे दी। इसलिए टेंडर की कानूनी लड़ाई अभी पूरी तरह समाप्त मान लेना जल्दबाजी होगी।
आखिर अनुभव की शर्त पर इतना घमासान क्यों?
जल संसाधन विभाग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि विभाग इस बार इतनी बड़ी परियोजना में ऐसी एजेंसी को काम देने का जोखिम नहीं लेना चाहता जिसके पास समान स्तर के विशाल प्रोजेक्ट का पर्याप्त अनुभव न हो। सवाल यह भी है कि पात्रता को चुनौती देने वाली कंपनी के पास क्या वास्तव में उस स्तर और प्रकृति की परियोजनाओं का अनुभव है जिसकी अपेक्षा ₹2500 करोड़ से अधिक के इस काम के लिए की गई है? यदि पर्याप्त अनुभव और वित्तीय क्षमता है तो संबंधित दस्तावेज सामने आने चाहिए। और यदि निर्धारित स्तर का अनुभव नहीं है तो फिर अनुभव की शर्त पर इतना घमासान क्यों? विभाग के सामने पुराने निर्माण कार्यों के अनुभव भी हैं, जहां निर्माण के कुछ वर्षों बाद ही सरकारी खजाने से मरम्मत पर लगातार रकम खर्च करनी पड़ी। इसकी एक बड़ी मिसाल समोदा बैराज के दस्तावेजों में दिखाई देती है।
समोदा में निर्माण के बाद मरम्मत पर करोड़ों –
रायपुर जिले के आरंग क्षेत्र में महानदी पर बने समोदा बैराज के निर्माण पर लगभग ₹125 करोड़ खर्च होने की बात सामने आती है। निर्माण के बाद अलग-अलग हिस्सों में समस्याएं सामने आईं और फिर मरम्मत एवं अतिरिक्त कार्यों के लिए लगातार प्रशासकीय स्वीकृतियां जारी हुईं। सरकारी दस्तावेजों में 2021 में करीब ₹26.39 लाख, 2022 में ₹1.73 करोड़, 2023 में ₹1.87 करोड़, फरवरी 2024 में ₹7.08 करोड़, अगस्त 2024 में ₹2.89 करोड़ और बाद में करीब ₹4.60 करोड़ के अलग-अलग कार्यों की प्रशासकीय स्वीकृतियां दिखाई देती हैं। अन्य संबंधित कार्यों को मिलाकर करीब ₹30 करोड़ खर्च किए जाने की बात सामने आती है। समोदा को लेकर सरकार के पास शिकायत भी पहुंच रही है। आरोप है कि मूल निर्माण की गुणवत्ता और निर्माण एजेंसी की जिम्मेदारी तय करने के बजाय अलग-अलग वर्षों में प्रशासकीय स्वीकृतियां जारी कर मरम्मत के नए काम मंजूर होते गए। शिकायत में तत्कालीन मुख्य अभियंता महानदी परियोजना संजय कुमार भागवत की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच की मांग भी की गई है। सवाल यह है कि यदि मूल निर्माण में खामी थी तो उसकी जिम्मेदारी किसकी थी और मरम्मत का भार सरकारी खजाने पर क्यों आया? यही पुराना अनुभव सिकासार-कोडार जैसी ₹2500 करोड़ से बड़ी परियोजना में अनुभवी और तकनीकी रूप से सक्षम एजेंसी चुनने की जरूरत को महत्वपूर्ण बनाता है।
फिर पर्दे के पीछे किसका खेल?
यहीं कहानी में ठेकेदारी की राजनीति प्रवेश करती है। जल संसाधन विभाग के सूत्रों का दावा है कि सिकासार-कोडार की eligibility conditions को लेकर चल रही खींचतान के पीछे राजधानी की एक कथित ‘दलाल लॉबी’ सक्रिय है। आरोप है कि बड़े और अनुभवी contractors के लिए रखी गई शर्तों को कमजोर करवाकर अपने नजदीकी लोगों अथवा एजेंसियों के लिए बड़ी परियोजनाओं का रास्ता खोलने की कोशिश हो रही है। ऐसे में किसी बाहरी व्यक्ति अथवा लॉबी द्वारा ₹2500 करोड़ के tender की conditions या प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश हुई है तो यह गंभीर मामला है। और यदि ऐसा नहीं है तो सरकार पूरी तस्वीर दस्तावेजों के जरिए साफ कर सकती है। टेंडर में शामिल कंपनियों का समान प्रकृति की परियोजनाओं का अनुभव, annual turnover, technical eligibility और qualification-disqualification का आधार सार्वजनिक कर दिया जाए। इससे साफ हो जाएगा कि कौन एजेंसी किस तकनीकी कसौटी पर खरी उतरी और कौन नहीं।
‘मोदी की गारंटी योजना’ की परियोजना में सवाल और बड़ा –
जिस कोडार-सिकासार बांध इंटरलिंकिंग परियोजना को ‘मोदी की गारंटी योजना’ में जगह दी गई, उसी के टेंडर में यदि राजधानी की कथित दलाल लॉबी के सक्रिय होने की चर्चा विभाग के भीतर है तो सरकार को इसे सामान्य कानाफूसी मानकर नहीं छोड़ना चाहिए। यह परियोजना किसानों और सिंचाई से जुड़ी है। इसलिए यहां किसी कंपनी या लॉबी का हित नहीं, बल्कि परियोजना की गुणवत्ता और भविष्य सबसे ऊपर होना चाहिए। अगर अनुभव की मजबूत शर्त से केवल वही कंपनियां मैदान में रहती हैं जिनके पास इतने बड़े काम की वास्तविक क्षमता है तो उस शर्त को कमजोर करने की जरूरत क्यों पड़े? और यदि किसी दूसरी कंपनी के पास भी वही अनुभव और क्षमता है तो उसके दस्तावेज सामने आने में समस्या क्या है?
मुख्यमंत्री का विभाग, इसलिए निगाह सीधे ऊपर –
मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि जल संसाधन विभाग मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के पास है। एक तरफ eligibility condition अदालत तक चुनौती पा चुकी है, दूसरी तरफ राजधानी की कथित दलाल लॉबी के हस्तक्षेप के आरोप तैर रहे हैं और इन सबके बीच दिलीप बिल्डकॉन ₹2524.32 करोड़ की बोली के साथ L-1 बन चुकी है। ऐसे में सरकार के सामने चुनौती केवल सिकासार से कोडार तक पानी पहुंचाने की नहीं है। चुनौती यह भी है कि इतने बड़े टेंडर पर किसी बाहरी दबाव, दलाल लॉबी या पसंद-नापसंद की छाया न पड़े और जिस कंपनी को अंततः काम मिले, उसकी कसौटी सिर्फ अनुभव, क्षमता, कीमत और गुणवत्ता हो। क्योंकि समोदा की फाइलें सरकार को पहले ही एक सबक दे रही हैं कि निर्माण के समय अनुभव और गुणवत्ता से समझौता हुआ तो बाद में बैराज से ज्यादा तेजी से मरम्मत की फाइलें बहती हैं।
सिकासार-कोडार में दांव अब ₹125 करोड़ का नहीं, ₹2524 करोड़ से ज्यादा का है। और जब परियोजना ‘मोदी की गारंटी’ से भी जुड़ी हो तो जवाबदेही भी उसी अनुपात में बड़ी हो जाती है। इसलिए इस बार सवाल केवल यह नहीं कि टेंडर किसे मिला। असली सवाल है कि इतनी बड़ी परियोजना अनुभवी हाथों में रहेगी या राजधानी की कथित ‘दलाल लॉबी’ पात्रता की दीवार में रास्ता बनाकर फिर कोई नया ‘समोदा’ खड़ा कर देगी?










