अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

पांचवीं मंजिल का सुरक्षा कवच!
सत्ता गलियारों में इन दिनों एक आदेश की खूब चर्चा है। आदेश 29 मई को जारी हुआ, लेकिन सार्वजनिक 3 जून को किया गया। सवाल यह है कि आखिर चार दिन तक यह फाइल दबाकर क्यों रखी गई और अचानक कार्य विभाजन की जरूरत क्यों पड़ गई? इसका गणित समझाने वाले बताते हैं कि सुशासन तिहार के दौरान कहीं शिकायतें, कहीं अव्यवस्थाएं थी और फिर बेमेतरा की चर्चित घटना ने यह एहसास करा दिया कि हर छोटे-बड़े विवाद का ठीकरा सीधे पांचवीं मंजिल पर फूट रहा है। ऐसे में जोखिम बढ़ रहा था और जवाबदेही का दायरा एक ही जगह सिमटता जा रहा था। इसलिए निकला नया फार्मूला। पांचों संभाग अलग-अलग अधिकारियों में बांट दिए गए, विभागों का भी विभाजन कर दिया गया। ऊपर से तो यह प्रशासनिक व्यवस्था और बेहतर मॉनिटरिंग का मॉडल दिखाई देता है, लेकिन भीतरखाने इसे ठीकरा बचाओ अभियान कहा जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि दुर्ग संभाग में 2009 बैच के कमिश्नर मौजूद हैं, लेकिन मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी 2015 बैच के एक अधिकारी को सौंप दी गई है। मंत्रालय में इसे लेकर भी खूब कानाफूसी है कि आखिर यह प्रशासनिक नवाचार है या जवाबदेही का नया प्रयोग। हालांकि जानकारों का कहना है कि विभागों का विभाजन भले कर दिया गया हो, लेकिन बिना पांचवीं मंजिल की सहमति के आज भी कोई महत्वपूर्ण फैसला आगे बढ़ना मुश्किल है। यानी डोर वहीं है, सिर्फ पतंगें बढ़ा दी गई हैं। एक वरिष्ठ अफसर की टिप्पणी इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा में है कि यह कार्य विभाजन नहीं, जोखिम विभाजन है। विभाग बंटे हैं, अधिकार नहीं। ताकि कल को कोई बवाल हो तो गाज एक ही मुंडी पर न गिरे। शासन में जिम्मेदारी बांटना आसान है, लेकिन ठीकरा किसके सिर फूटेगा, इसकी तैयारी पहले करनी पड़ती है।

बारह की चिट्ठी और पैंतीस की चिंता!
सत्ता पक्ष से ज्यादा हलचल इन दिनों विपक्ष के आंगन से आ रही है। अंदरखाने की खबर है कि 35 विधायकों वाली पार्टी के एक दर्जन विधायकों ने दिल्ली दरबार को चिट्ठी लिखकर नेता प्रतिपक्ष बदलने की मांग कर दी है। इस मांग ने विपक्ष में हलचले बढ़ा दी है। दरअसल नेता प्रतिपक्ष कोई साधारण पद नहीं होता। मौजूदा नेता प्रतिपक्ष को दिसंबर 2023 में विधायक दल की सहमति से जिम्मेदारी मिली थी और वे आज भी विधानसभा में विपक्ष का नेतृत्व कर रहे हैं। लेकिन अगर वाकई 35 में से 12 विधायक असंतोष का झंडा उठाकर दिल्ली तक पहुंच गए हैं, तो मामला केवल एक पद का नहीं, बल्कि विपक्ष की दिशा और दशा दोनों का माना जा रहा है। सत्ता पक्ष के लोग मजे ले रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार को घेरने से पहले विपक्ष अपने ही घर की बैठक में उलझा हुआ है। उधर कांग्रेस के भीतर भी सवाल घूम रहा है कि आखिर यह नाराजगी नेतृत्व से है, रणनीति से है या फिर भविष्य की राजनीति से? दिल्ली में बैठे नेताओं के लिए भी यह आसान गणित नहीं है। क्योंकि नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी सिर्फ सदन में विपक्ष की आवाज नहीं, बल्कि पूरे संगठन के शक्ति संतुलन का प्रतीक भी होती है। एक पुराने राजनीतिक खिलाड़ी की टिप्पणी सबसे ज्यादा चर्चा में है कि 35 की टोली में अगर 12 लोग अलग सुर गाने लगें, तो खतरा सरकार को नहीं, ऑर्केस्ट्रा के संचालक को होता है। विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती सत्ता नहीं होती, कभी-कभी विपक्ष खुद विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है।

कांग्रेस का सरप्राइज कार्ड!
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर इन दिनों चर्चा नेताओं से ज्यादा नामों की हो रही है। कोई बाबा साहब का नाम आगे बढ़ा रहा है, कोई युवा चेहरे की पैरवी कर रहा है, तो कोई संगठन और विधानसभा के बीच संतुलन खोज रहा है। चर्चा में टीएस सिंहदेव हैं, उमेश पटेल देवेंद्र यादव हैं और भी कई चेहरे हैं जिनके समर्थक अपने-अपने हिसाब से दिल्ली तक संदेश पहुंचा रहे हैं। लेकिन राजनीति में अक्सर वही होता है जिसकी चर्चा सबसे कम होती है। सूत्र बताते हैं कि तमाम चर्चित नामों के बीच एक ऐसा नाम भी है जो न टीवी डिबेट में है, न समर्थकों की होर्डिंग में और न ही राजनीतिक भविष्यवक्ताओं की सूची में। यह चेहरा बस्तर से आता है, आदिवासी समाज से आता है, संगठन का अनुभव रखता है और सबसे बड़ी बात यह कि लगभग हर गुट के साथ काम करने का रिकॉर्ड भी रखता है। नाम है मोहन मरकाम। एक समय प्रदेश संगठन की कमान संभाल चुके मरकाम न तो विवादों के केंद्र में रहे, न किसी बड़े गुट के घोषित चेहरे बने। यही कारण है कि जब कांग्रेस के भीतर संतुलन, सामाजिक समीकरण और गुटीय टकराव से बचने की चर्चा होती है तो उनका नाम अचानक फाइल के अंदर से बाहर निकल आता है।कांग्रेस की मौजूदा स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। विधानसभा गई, लोकसभा गई, संगठन सवालों में है और नेताओं के बीच खींचतान की खबरें लगातार बाहर आ रही हैं। ऐसे में हाईकमान को ऐसा चेहरा चाहिए जो किसी एक खेमे की जीत और दूसरे की हार न लगे। राजनीति के पुराने खिलाड़ी कहते हैं कि जब पार्टी बहुत ज्यादा विकल्पों में उलझ जाती है, तब दिल्ली अक्सर तीसरा रास्ता चुनती है। इसलिए राजधानी में अब चर्चा यह नहीं है कि कौन दौड़ में आगे है। चर्चा यह है कि कहीं दौड़ जीतने वाला वह तो नहीं, जिसका नाम अभी तक दौड़ में शामिल ही नहीं माना जा रहा। कांग्रेस में इन दिनों जो सबसे ज्यादा चर्चा में है, उसकी संभावना कम बताई जा रही है… और जिसका नाम चर्चा में नहीं है, उसकी संभावना सबसे ज्यादा है।

मुद्रा मीनार और स्टारबक्स का कोना –
सत्ता के गलियारों में एक साहब हैं। पहले मंत्री थे, अब विधायक हैं। सदन में खड़े हो जाएं तो विपक्ष क्या अपनी पार्टी वाले भी पानी मांग लेते है। सरकार को घेरना उनका पुराना शौक है और सुर्खियों में रहना उनकी पुरानी आदत।
लेकिन इन दिनों साहब कुछ बदले-बदले नजर आ रहे हैं। बताया जाता है कि एक जांच एजेंसी ने जब से इनके भाई के यहाँ दस्तक दी है तब से यह बेहद चिंतित बताये जाते है। साहब इन दिनों मुद्रा मीनार के एक चर्चित कॉफी कैफे के कोने वाली सीट पर दिखाई देते हैं। पहले जहाँ राजनीतिक रणनीति बनती थी, अब बताया जाता है कि कानूनी रणनीति ज्यादा बन रही है और इस कॉफी हाउस दुकान के मालिक भी यही है। यहाँ तक तो ठीक था लेकिन आगे बढिये इसी वीआईपी रोड में तो एक आलीशान होटल नजर आता है जिसकी एंट्री गेट देखकर आम आदमी घुसने की हिम्मत न कर पाए। बताते है कि इस आलीशान होटल में भी इनके एक करीबी का पैसा लगा हुआ है अब यह उस करीबी का है या विधायक जी का यह तो वही ज्यादा जानते होंगे। इसमे जांच बढ़ी तो एक जांच वाले साहब भी जद में आ जायेंगे और एक मंत्री जी भी। साहब की नजर मंत्री की कुर्सी पर थी जिसके वह करीब होते लेकिन अब दूरी बहुत ज्यादा बढ़ गई है। कुछ महीने पहले तक समर्थक मंत्री पद के समीकरण जोड़ रहे थे, लेकिन अब वही लोग नए गणित में व्यस्त बताए जाते हैं। राजनीति बड़ी निर्दयी चीज होती है। जब तक हवा साथ होती है, लोग आपको भविष्य का मंत्री बताते हैं। हवा का रुख बदले नहीं कि वही लोग सलाह देने लगते हैं कि अभी शांत रहिए, समय ठीक नहीं है। साहब फिलहाल मंत्री बनने की नहीं, मुसीबतों से दूरी बनाने की राजनीति कर रहे हैं। और राजनीति में जब कोई नेता सपनों की जगह सावधानी बरतने लगे, तो समझ लीजिए कि मौसम बदल चुका है। कुर्सी का सपना टूटने से ज्यादा दर्द तब होता है, जब आदमी कुर्सी की दौड़ छोड़कर फाइलों की दिशा देखने लगे।

अमन का अमन चैन!
सत्ता और नौकरशाही के गलियारों में एक दौर ऐसा भी था जब एक अमन हुआ करते थे।प्रभाव ऐसा बताया जाता था कि मंत्री भी खुद को मंत्री कम और दर्शक ज्यादा महसूस करते थे। फिर वक्त बदला। चुनाव हुए। जनता ने भी अपना हिसाब-किताब किया और पूर्ण बहुमत वाली सत्ता देखते-देखते 15 सीटों पर सिमट गई। राजनीतिक गलियारों में आज भी कुछ पुराने खिलाड़ी मुस्कुराकर कहते हैं कि हार के कई कारण थे, लेकिन अमन-चैन मॉडल इसका सबसे बड़ा कारण था। आज साहब सरकारी सेवा में नहीं हैं, लेकिन चर्चा है कि प्रभाव अभी भी कम नहीं हुआ है। बताते हैं कि बड़े औद्योगिक इलाकों से लेकर राजधानी तक उनकी मौजूदगी की फुसफुसाहट सुनाई देती रहती है। मजे की बात यह है कि उनके आने-जाने की खबर किसी को नहीं होती। न काफिला, न प्रोटोकॉल, न कोई औपचारिकता। लेकिन उनके जाने के बाद चर्चा का बाजार जरूर गर्म हो जाता है। हाल ही में शक्ति जिले में एक बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान में हुई घटना में एफआईआर ने कॉरपोरेट विवाद खड़ा कर दिया। बताते है कि इस एफआईआर में यही अदृश्य शक्ति खड़ी थी। औद्योगिक घराने ने इन्हें छत्तीसगढ़ में अपनी औद्योगिक पैठ मजबूत करने और समन्वय बढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी है। लेकिन यह साहब मालिक की लाइन बड़ी करने से ज्यादा अपनी लाइन बड़ी करना चाहते है। इनके हाथ में आया कोई भी काम सहज और सरल तरीके से पूरा हो जाए, ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं। वही पुरानी नौकरशाही, वही दादागिरी और वही खुद को मालिक समझने का नशा। नतीजा यह होता है कि जहां संवाद होना चाहिए, वहां विवाद खड़े हो जाते हैं और जहां सहमति बननी चाहिए, वहां विरोध पैदा हो जाता है। शायद इस औद्योगिक घराने को भी कभी यह आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर हर बार विरोध की आग क्यों भड़कती है। क्योंकि समझदार प्रतिनिधि वह होता है जो अपने मालिक की लाइन बड़ी करे, अपनी नहीं। सत्ता और नौकरशाही का इतिहास कहता है। यहां कुर्सियां बदलती हैं, सरकारें बदलती हैं, प्रभाव बदलता है और समय सबसे बड़ा संपादक साबित होता है। महत्वाकांक्षा अच्छी चीज है, लेकिन जब आदमी खुद को व्यवस्था से बड़ा समझने लगे, तब कहानी बदलना शुरू हो जाती है।

सूरज नाम, ठकुरैती काम!
राजधानी से सटे एक जिले के कप्तान साहब इन दिनों पुलिसिंग से ज्यादा अपनी ठकुरैती के लिए चर्चा में हैं। नाम में भले सूरज हो, लेकिन इनके जिले में रोशनी से ज्यादा रौब दिखाई देता है। हालात ऐसे हैं कि न कनिष्ठ अधिकारी खुश हैं, न कर्मचारी, न नेता और न ही आम जनता। बीते महीने अपने ही स्टेनो को सस्पेंड कर साहब ने बता दिया कि गलती चाहे किसी की हो, कार्रवाई नीचे वालों पर ही होगी। छोटी छोटी बातों पर शो-कॉज नोटिस, एसीआर का डर और अनुशासन का डंडा इनके पसंदीदा हथियार बताए जाते हैं। हाल ही में सोशल मीडिया में वायरल एक वीडियो जिसमे रात एक बजे एक दंपत्ति को रोककर उनसे अभद्रता और मारपीट की गई। वीडियो वायरल होने के बाद सवाल उठता है कि अपराधियों के बजाय आम लोगों से सख्ती दिखाना क्या यही असली ठकुरैति है? ऊपर से साहब जितनी ठकुरैती दिखाते हैं, जिले में उतनी ही चर्चा इस बात की भी है कि असली खेल अंडर द टेबल खेला जाता है। किसी घटना पर सवाल उठे तो जिम्मेदारी भी अक्सर अधीनस्थों की ही निकलती है। कहते हैं साहब नियम-कानून के बड़े पैरोकार हैं, लेकिन पत्रकारों को दो घंटे इंतजार करवाने में कोई नियम आड़े नहीं आता। नेताओं ने भी कई बार शिकायत ऊपर तक पहुंचाई, मगर साहब का आत्मविश्वास ऐसा कि यहां से हटे तो अगला जिला न्यायधानी के बगल वाला तैयार है। जिले में यह चर्चा भी कम नहीं कि साहब जहां जाते हैं, अपनी पत्नी का जुगाड़ भी सेट कर देते हैं। मौजूदा जिले में भी मेडम जिला अस्पताल में चिकित्सक हैं। उनकी नियुक्ति और वेतन को लेकर कानाफूसी का बाजार गर्म रहता है। साहब का यह तीसरा जिला है और संयोग देखिए, हर जगह कहानी लगभग एक जैसी सुनाई देती है कि अधिकारी नाराज, कर्मचारी परेशान, नेता असंतुष्ट और जनता बेहाल। मगर साहब इसे अपनी सख्ती की उपलब्धि मानते हैं। जिले के लोग बस इतना कहते हैं, असली ठकुरैती नोटिस बांटने में नहीं, अपराध रोकने में दिखती है। बाकी मूंछों पर ताव तो कोई भी दे सकता है। साहब को लगता है पूरा जिला लाइन पर नहीं है, जिले को लगता है समस्या लाइन में नहीं, लाइन लगाने वाले में है।

यक्ष प्रश्न –

1 – हाउस में पदस्थ कौन दिनकर है जिनका 80 एकड़ में रिसोर्ट का काम तेजी से जारी है वो भी पड़ोसी राज्य में?

2 – हाउस में पदस्थ वह कौन से ब्यूरोक्रेट हैं, जो नोएडा में पुत्र के माध्यम से और लखनऊ में भाई के माध्यम से लाभांश प्राप्त करने का नेटवर्क संचालित करते है?

3 – श्रीनिवासन राव का झोला खाली रहेगा या भरा जाएगा ?

 

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