अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

माइक मेडम और मैनेजमेंट –
प्रदेश के एक वीआईपी जिले में ऊपर से तो सब ऑल इज़ वेल है, लेकिन भीतरखाने का हाल जैसे एक ही म्यान में तीन तलवारें रख दी गई हों। एक वर्दी वाली, एक कलेक्टरी वाली और एक अदृश्य सलाहकार वाली। जिले की कप्तान मैडम इन दिनों अपने अलग ही स्वैग में हैं। बताया जाता है कि जिले में उनकी नहीं, उनका नेटवर्क चलता है। कौन पत्रकार राजधानी जाएगा, कौन सी खबर किस कॉलम में छपेगी, किसे हीरो बनाना है और किसे खलनायक इसकी पटकथा यहीं तैयार होती है। उधर रेंज वाले बड़े साहेब समझ गए हैं कि मामला कानून व्यवस्था का नहीं, इमेज चमकाने का है। एक और दिलचस्प किस्सा कलेक्ट्री दरबार का है जहाँ दो लोग एक ही मंच पर खड़े हैं लेकिन उन्हें भी माइक अलग-अलग चाहिए। बीते दिनों यहाँ सुशासन के मंच में चाकूबाजी हुई। यहाँ से सारा खेल ही पलट गया।पहले लगा पुरानी रंजिश है, फिर पता चला कि निशाने में प्रशासन वाला दफ्तर है। इसके बाद बयान बदले, फिर नए बयान आए, फिर प्रेस वार्ता हुई और जनता को लगा कि घटना कम, पटकथा ज्यादा चल रही है। सवाल है कि चाकू पहले चला था या नैरेटिव? कहते हैं घटना के बाद कुछ खास लोग इतने सक्रिय थे जैसे उन्हें पहले से पता हो कि कैमरे किस एंगल से लगेंगे और बयान किस लाइन में जाना है। राजधानी के गलियारों में इस केस की राजनीतिक एडिटिंग बहुत पहले शुरू हो चुकी थी। और फिर आता है आनंदम वाला शेखु कनेक्शन राजधानी के उस शांत बंगले में इन दिनों कई बेचैन चेहरे देखे जाने की चर्चा है। जिले से गाड़ी निकलती है, शाम तक रणनीति बनती है और अगले दिन किसी कॉलम में नई लीक दिखाई देती है। वहाँ बैठे पुराने खिलाड़ी अब सीधे मैदान में नहीं उतरते बस मुस्कुरा कर कहते हैं खेलो… अभी बहुत खेल बाकी है! इधर जिले में हाल ही में 150 एकड़ अतिक्रमण हटाने की बड़ी कार्रवाई ने भी नया सियासी धुआँ छोड़ दिया है। शुरुआत में कप्तान मैडम ने दावा किया कि सिर्फ 50 एकड़ ही खाली हुआ है, लेकिन बाद में आंकड़ा तीन गुना निकल आया। अब सवाल यह नहीं कि ज़मीन कितनी खाली हुई… सवाल यह है कि जानकारी छोटी क्यों कर दी गई? क्या यह प्रशासनिक भ्रम था, मैदानी गड़बड़ी थी या फिर किसी को श्रेय सीमित रखने की कोशिश? बहरहाल, कॉलम लिखे जाने तक खबर यह भी है कि प्रदेश के खुफिया चीफ खुद ग्राउंड ज़ीरो में उतरने वाले हैं आधिकारिक तौर पर सुलह और समन्वय के लिए। यानी अब मामला फाइलों से निकलकर अहंकार प्रबंधन तक पहुँच चुका है। उधर अधीनस्थ अफसरों की हालत रामायण के उन सैनिकों जैसी बताई जा रही है जिन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि युद्ध लंका से है या अपने ही शिविर से। अब पूरा जिला देख रहा है यह लड़ाई अपराध रोकने की है या फिर कुर्सियों के बीच अदृश्य वर्चस्व की? फिलहाल सब शांत है। इतना शांत… कि हर प्रेस नोट के पीछे लोग लेखक खोज रहे हैं।

रूही गई… अब विभाग में सर्जरी शुरू !
महिला एवं बाल विकास विभाग में पिछले कुछ दिनों से जो हलचल अंदरखाने चल रही थी, अब वह खुलकर फाइलों से बाहर आने लगी है। बीते सप्ताह अफसर-ए-आला कॉलम में हमने विभाग की उस रूही व्यवस्था पर सवाल उठाए थे, जिसे लेकर मंत्री से ज्यादा नाराजगी खुद विभागीय कार्यकर्ताओं और मैदानी अमले में थी। साड़ी घोटाले से लेकर फीडबैक सिस्टम की नाकामी तक… लगातार यह शिकायत उठ रही थी कि मंत्री तक सही जानकारी पहुंच ही नहीं रही। विभाग की छवि खराब हो रही थी और कुछ चेहरे फिल्टर बनकर पूरे सिस्टम को कंट्रोल कर रहे थे। फिर अचानक मंत्रालय से आदेश निकला…और मंत्री की विशेष सहायक रही रूही को तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया।
मंत्रालय के गलियारों में इसे सिर्फ एक तबादला नहीं, बल्कि कड़ा संदेश माना जा रहा है।क्योंकि चर्चा यही रही कि मंत्री ने साफ कर दिया अब विभाग दरबारी फीडबैक नहीं,जमीन की रिपोर्ट पर चलेगा। दिलचस्प यह भी है कि कुछ दिन पहले हमने सचिव स्तर पर चल रही खींचतान और विभागीय असंतोष पर भी खबर प्रकाशित की थी। उसके बाद सचिव स्तर पर बदलाव हुआ और अब OSD की छुट्टी ने साफ संकेत दे दिया है कि महिला एवं बाल विकास विभाग में बड़ी प्रशासनिक सर्जरी जारी है। इसी कड़ी में परियोजना अधिकारियों और मैदानी अफसरों की लंबी तबादला सूची भी जारी हुई। मंत्रालय में चर्चा है कि यह सिर्फ ट्रांसफर नहीं, बल्कि विभाग की इमेज क्लीनिंग ड्राइव है। संदेश साफ है अब फाइलों से ज्यादा फीडबैक मायने रखेगा और मैडम तक कौन पहुंचता है से ज्यादा जरूरी होगा कि जमीन पर क्या चल रहा है। फिलहाल विभाग में अफसरों के चेहरे बदले जा रहे हैं अब देखना यह है कि सिर्फ कुर्सियां बदलती हैं, या सच में सिस्टम भी बदलता है।

मुद्रा मीनार में कीर्तन –
ऊपर लिखे कॉलम में जिस वीआईपी जिले का जिक्र है वहाँ एक साहब और है जिनकी चर्चा सुर्खियों में रहती है, इनके कीर्तन सत्ता के गलियारों से लेकर अफसरशाही की महफिलों तक खासा मशहूर बताए जाते हैं। साहब राज्य पुलिस सेवा के अफसर हैं, लेकिन 12 साल की नौकरी में उन्होंने ज्यादातर वक्त राजधानी, कोरबा और राजनांदगांव जैसे मलाईदार जिलों में ही बिताया। सिस्टम में लोग मजाक में कहते हैं साहेब जहाँ जाते हैं, पोस्टिंग नहीं संरक्षण साथ जाता है। तत्कालीन सरकार में कोरबा के एक बड़े नेता का वरदहस्त ऐसा रहा कि साहेब कभी सूखे जिले में दिखाई ही नहीं दिए। सरकार बदली तो लोगों को लगा अब साहब का भूगोल बदलेगा लेकिन सत्ता बदलते ही साहब ने सुर भी बदल लिए और अब स्पीकर की आवाज वाले गृह जिले में आराम से पदस्थ हैं। दिलचस्प बात यह है कि हाल ही में जब देश के प्रधानमंत्री ने लोगों से विदेश यात्राएं टालने की अपील की, उसी दौरान साहेब को विदेशी हवा खाने की ऐसी चुल्ल चढ़ी कि मियां-बीवी और बच्चों समेत विदेश रवाना हो गए। मुख्यालय में इस पर खूब चुटकी ली गई कि देश संकट में था और साहेब ट्रांजिट में थे। लेकिन असली चर्चा विदेश यात्रा की नहीं बल्कि राजधानी की चर्चित मुद्रा मीनार है। वही मुद्रा मीनार जहाँ बड़े कॉरपोरेट, रसूखदार कारोबारी और कुछ चर्चित प्रशासनिक चेहरों के निवेश की कहानियां वर्षों से फुसफुसाहट में चलती रही हैं। उसी इमारत में साहेब ने पत्नी के नाम पर एक आलीशान ऑफिस खोल रखा है, जहाँ इंटीरियर का बड़ा कारोबार बताया जाता है। अब सवाल यह है कि राज्य पुलिस सेवा की नौकरी में इतने कम समय में राजधानी का हाई-प्रोफाइल ऑफिस, करोड़ों का नया रायपुर वाला बंगला और जमीनों का फैलता साम्राज्य आखिर किस कीर्तन का प्रसाद है? अफसरशाही के गलियारों में लोग दबी जुबान में कहते हैं कि अगर साहेब की जमीनों, बेनामी निवेश और रिश्तेदारों के नाम चल रही फर्मों की निष्पक्ष जांच हो जाए तो सिर्फ फाइलें नहीं, कई लोगों की नींद भी हिल जाएगी। फिलहाल साहेब शांत हैं कीर्तन जारी है और हर सत्ता में सुर मिलाने की कला भी।

हरी पत्ती किसके नाम?
31 मई को वर्तमान PCCF और HoFF वी. श्रीनिवास राव की सेवानिवृत्ति के साथ ही अरण्य भवन में हरियाली का गणित तेज हो गया है। बाहर से माहौल शांत है, लेकिन भीतरखाने PCCF की कुर्सी को लेकर हलचल बढ़ चुकी है। इस बार सिर्फ वरिष्ठता नहीं, सिस्टम की उपयोगिता और लंबा विज़न भी बड़ा फै्टर माना जा रहा है। इसी वजह से 1994 बैच के अरुण कुमार पांडे का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है। Wildlife, Biodiversity, Development & Planning जैसे अहम प्रभार संभाल चुके अरुण पांडे को विभाग में सिस्टम फ्रेंडली और दिल्ली-नेविगेट करने वाला अफसर माना जाता है। जंगल सफारी, NBWL क्लीयरेंस, इको-टूरिज्म और टाइगर प्रोजेक्ट्स में उनकी सक्रिय भूमिका लगातार रही है। सबसे बड़ा फैक्टर उनका लंबा बचा कार्यकाल भी माना जा रहा है, जिससे सरकार को स्थायित्व वाला विकल्प दिखाई देता है। तमनार, हसदेव, CAMPA और जंगल डायवर्जन जैसे संवेदनशील मुद्दों के दौर में PCCF की कुर्सी अब सिर्फ वन विभाग की पोस्ट नहीं रही यह सत्ता और सिस्टम का ग्रीन पावर सेंटर बन चुकी है। अरण्य भवन में तंज चल रहा है अब जंगल बचाने से ज्यादा जरूरी सही छांव में खड़ा होना हो गया है।

CHiPS चिप में सिस्टम या सिस्टम में चिप?
छत्तीसगढ़ बनने के बाद अगर किसी विभाग ने डिजिटल इंडिया के नाम पर सबसे ज्यादा तार बिछाए, तो वह CHiPS था। लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि तार ज्यादा बिछे या खेल? ताजा दस्तावेज़ में सरकारी नेटवर्क और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सिस्टम के नाम पर करीब ₹46 करोड़ का खर्च दिखाई देता है। और आंकड़े ऐसे हैं कि पढ़कर आम आदमी का WiFi नहीं दिमाग हैंग हो जाए। पुराने Hardware और Software के सिर्फ AMC पर ₹9.51 करोड़। एक Project Manager पर ₹1.80 करोड़ सालाना। Video Conferencing Expert ₹72 लाख। Network/Security Expert ₹90 लाख।
अब जनता पूछ रही है साहेब नेटवर्क संभाल रहे थे या NASA लॉन्च कर रहे थे? 116 BHQ इंजीनियरों पर ₹17 करोड़ से ज्यादा का खर्च दिखाया गया है और 33 जिलो की इंजीनियर अलग। डीजल, बिजली, UPS, Cisco, Juniper, VC Solution सब जोड़िए तो ऐसा लगता है जैसे छत्तीसगढ़ नहीं, पूरा सिलिकॉन वैली चल रही हो। लेकिन जमीन पर हाल क्या है? कई जिलों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग मीटिंग आज भी हैलो… आवाज आ रही है? से शुरू होती है और नेटवर्क चला गया पर खत्म। सिस्टम जानने वाले कहते हैं कि असली खेल मशीन में नहीं AMC और मैनपावर में होता है। यानी एक बार सिस्टम लगा दो फिर सालों तक मेंटेनेंस के नाम पर मलाई चलती रहती है। CHiPS को कभी डिजिटल रीढ़ कहा गया था। लेकिन अब सत्ता के गलियारों में लोग इसे सरकारी सर्विस सेंटर कम सॉफ्टवेयर वाला खजाना ज्यादा कहने लगे हैं। तंज तो यह भी है यहाँ Server कम Service Charge ज्यादा चलता है। अब जरूरत सिर्फ ऑडिट की नहीं बल्कि यह देखने की है कि करोड़ों की यह डिजिटल क्रांति आखिर जनता तक पहुँची भी या सिर्फ फाइलों और बिलों तक सीमित रह गई।

रामकथा या रिमोट कंट्रोल?
कभी EOW-ACB की फाइलों, आय से अधिक संपत्ति और निविदा घोटालों की चर्चाओं में घिरे रहे एक पूर्व अफसर आजकल रामकथा के मंचों पर सबसे आगे दिखाई दे रहे हैं। शिवरीनारायण के भव्य आयोजन में संत, सत्ता और सिस्टम एक साथ मंच पर दिखे, लेकिन पीछे पुरानी फाइलों की परछाई अब भी घूमती बताई जा रही है। कल तक जिनके नाम के साथ चार्जशीट और आर्थिक अपराधों की चर्चा थी, आज वही आध्यात्म की नई चादर ओढ़े घूम रहे हैं। आश्रम, कथा, इंटरव्यू और VIP मंचों के जरिए नई छवि गढ़ी जा रही है। मगर गलियारों में चर्चा कथा से ज्यादा कनेक्शन की है। अंदरखाने अब भी वही पुरानी महत्वाकांक्षा जिंदा बताई जाती है सिस्टम में वापसी की। दिलचस्प यह भी है कि मंचों पर विराजमान एक चर्चित जगत गुरु अक्सर ब्राह्मणों पर तंज कसते और विद्यार्थियों से फीस लेने को गौमांस खाने जैसा पाप बताते रहे हैं। लेकिन अब वही गुरु उन कथाओं में सबसे आगे दिखाई देते हैं जहाँ कभी भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराधों की फाइलें गूंजती थीं। सत्ता के गलियारों में तंज चल रहा है जहाँ कथा कम और खेल बड़ा हो, वहाँ महाराज जरूर पहुँचते हैं। अब इस पूरी कथा में नया मोड़ भी जुड़ गया है। चर्चा है कि एक प्रभावशाली संस्था के मुखिया ने इस नव-रामभक्त से साफ कहा है कि अपने इंटरव्यू में हमारे विभाग के बड़े अधिकारियो का नाम लिया करो दो-चार बार महिमा गाओ… फिर देखेंगे चार्जशीट का क्या करना है, पेश करनी है या फाइल को थोड़ा विराम देना है। बस तभी से रामभक्ति के साथ नाम-जप भी शुरू हो गया है। हाल यह बताया जा रहा है कि हाथ में माला है, जुबान पर राम है और बीच-बीच में वही पुरानी गाली वाली भाषा भी चालू है। अब लोग समझ नहीं पा रहे यह भक्ति है, ब्रांडिंग है या बेल मैनेजमेंट का नया अध्याय? फिलहाल कथा जारी है…बस श्रोताओं को अब राम से ज्यादा रिमोट खोजने में दिलचस्पी है।

यक्ष प्रश्न –

1 – चर्चित बाबा को रामकथा के लिए दक्षिणा कितना तय हुआ? और कथा वाचन में कितनी राशि कटौती हुई? आप बताइए यह कथा थी या कमीशन प्रबंधन?

2 – VIP जिले में चल रहे अदृश्य वर्चस्व संघर्ष में आखिर किसकी बलि चढ़ेगी आईजी, कप्तान, कलेक्टर या फिर एसडीएम?

3 – विभाग की एक रूही तो रुखसत हो गई।लेकिन एक अभय को कब तक अभयदान मिलता रहेगा? और क्या सच में विभाग की प्रशासनिक प्रमुख को यही लेकर आए हैं! यह दावा है, दबदबा है या सिर्फ दरबारी आत्मविश्वास?

 

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