अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

बुलडोजर नकटी में चला, कभी वीआईपी रोड पर भी चलाइए…
नकटी गांव के लोगों के घर बुलडोजर से जमींदोज कर दिए गए। दलील दी गई कि चारागाह की जमीन पर अवैध कब्जा था, लेकिन सवाल यह है कि क्या कानून का रास्ता सिर्फ गरीबों की बस्ती तक ही जाता है? एक बार रायपुर एयरपोर्ट से लेकर वीआईपी रोड तक की जमीनों का भी सच खंगाल कर देखिए। मठों की जमीन, तालाबों की जमीन, सरकारी भूमि और नजूल की जमीन पर किस-किस का कब्जा है, इसकी निष्पक्ष जांच हो जाए तो कई चौंकाने वाली कहानियां बाहर आएगी। कहीं तालाब पाटकर आलीशान होटल, क्लब, बार खड़े हैं, कहीं विशाल फार्महाउस बन गए हैं और कहीं सरकारी जमीनें निजी साम्राज्य में बदल चुकी हैं। इनमें आईएएस आईपीएस आईएफएस से लेकर नेताओं तक का कब्जा है। राज्य गठन के बाद से अवैध निर्माण की यह परंपरा बढ़ती रही, लेकिन कार्रवाई की आंधी कभी इन इलाकों तक नहीं पहुंची। बुलडोजर की आवाज हमेशा वहीं सुनाई दी, जहां विरोध करने की ताकत सबसे कम थी। याद कीजिए, नए रायपुर की जमीनें किस तरह बड़े-बड़े प्रोजेक्टों और निजी कंपनियों को दी गईं। कई बिल्डरों और बड़े संस्थानों को सरकारी जमीनें बेहद रियायती दरों पर मिलीं। तब नियम-कानून की किताबें शायद किसी अलमारी में बंद थीं। आज वही नियम-कानून गरीबों की झोपड़ियों के सामने पूरी ताकत के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं।कानून का सम्मान तभी होता है जब उसकी नजर सब पर बराबर हो। अगर चारागाह की जमीन बचानी है तो हर चारागाह बचाइए। अगर तालाबों को अतिक्रमण से मुक्त कराना है तो हर तालाब कराइए। अगर सरकारी जमीन वापस लेनी है तो फिर यह मत देखिए कि कब्जा करने वाला गरीब है या प्रभावशाली। सरकार यदि सचमुच यह संदेश देना चाहती है कि कानून सबके लिए बराबर है, तो एक बार वीआईपी रोड, एयरपोर्ट के आसपास और नए रायपुर के संवेदनशील इलाकों की भी निष्पक्ष जांच करा दीजिए। उस दिन लोगों का भरोसा बुलडोजर पर नहीं, कानून पर बढ़ेगा।

नकटा के नाक कटे अढ़ाई बित्ता रोज बाढे –
नकटी गांव में हुए अतिक्रमण ने सरकार को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। सत्ता के भीतर से ही अलग-अलग सुर सुनाई दिए। किसी ने कार्रवाई को गलत बताया और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की, किसी ने इसे नियमसम्मत ठहराया। कुछ ने इसे दो नेताओं की आपसी रंजिश का नतीजा बताया, तो कुछ ने उजड़े परिवारों को ईडब्ल्यूएस आवास मिलने को सरकार की उपलब्धि के रूप में पेश करने की कोशिश की। लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल अब भी अनुत्तरित है कि आखिर मूसलाधार बारिश के बीच ग्रामीणों को बेघर करने की इतनी जल्दबाज़ी क्यों थी? क्या कुछ दिन इंतज़ार नहीं किया जा सकता था? सत्ता और प्रशासन के गलियारों में यह चर्चा भी है कि इस पूरी कवायद के पीछे एक आईएएस मंत्री और वही चेहरा सक्रिय बताया जा रहा है, जिस पर कभी एक बड़ी परीक्षा में युवाओं के भविष्य को दांव पर लगाने की छाया रही थी। यह भी कहा जा रहा है कि इस जमीन को भविष्य में कॉरपोरेट परियोजना के लिए तैयार करने की मंशा से पूरा घटनाक्रम सुनियोजित तरीके से आगे बढ़ाया गया। साहब की हाइट कम है लेकिन नाक बहुत लंबी है। नकटी गांव की कार्रवाई ने सरकार की छवि को गहरी चोट पहुंचाई। सरकार की नाक कटी या नहीं, यह जनता तय करेगी, लेकिन पांचवी मंजिल वाले साहब की नाक जरूर पहले से और लंबी होती दिखाई दे रही है। यह सब घटना देखकर कहावत याद आती है नकटा के नाक कटे अढ़ाई बित्ता रोज बाढ़े।

चिंतन 3.0 या चिंताओं का शिविर…
सूबे में कानून-व्यवस्था सवालों के घेरे में है।कहीं दिनदहाड़े वारदात, कहीं नशे का फैलता जाल, तो कहीं बरसात के बीच गरीबों के आशियाने उजाड़े जा रहे हैं। मंत्री एक ही मुद्दे पर अलग-अलग बयान दे रहे हैं, लेकिन फैसलों की असली पटकथा कहीं और लिखी जाती दिख रही है। ऐसे माहौल में चिंतन शिविर 3.0 शुरू हुआ है। ढाई साल पहले जिस बदलाव के साथ सरकार आई थी, उससे व्यवस्था में स्थिरता और सुशासन की उम्मीद थी। लेकिन आज जनता के बीच चर्चा कानून-व्यवस्था से ज्यादा व्यवस्था किसके हाथ में है, इस बात की है। सरकार में मंत्रियों से ज्यादा वजन अफसरों का हो गया है। फैसले कौन ले रहा है, जवाबदेह कौन है और आख़िर सरकार चला कौन रहा है? कई मंत्री अपने ही विभागों में मेहमान जैसे दिखाई देते हैं, जबकि फाइलों की दिशा पांचवीं मंजिल से तय होती नजर आती है। मंत्री बयान देते हैं, अफसर निर्णय लेते हैं और जनता नतीजे भुगतती है। दो दिन के इस शिविर में विकास, सुशासन और विजन पर लंबी-लंबी प्रस्तुतियां होंगी। लेकिन अगर कानून-व्यवस्था, बेलगाम नौकरशाही, जवाबदेही और जनता के टूटते भरोसे पर खुलकर आत्ममंथन नहीं हुआ, तो यह चिंतन शिविर 3.0 नहीं, बल्कि सब ठीक है का वार्षिक प्रमाणपत्र बनकर रह जाएगा। आख़िर यह चिंतन सरकार का है या अफसरशाही का? क्योंकि आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि लोकतंत्र में सत्ता का केंद्र मंत्रालय है या पांचवीं मंजिल।

चाय-समोसा, करोड़ों की पोस्टिंग और कीर्तन –
नमक का कर्ज तो आपने बहुत सुना होगा, लेकिन इन दिनों चाय-समोसे का कर्ज खूब चर्चा में है। कहते हैं, एक कप चाय और दो समोसों का हिसाब इतना भारी पड़ा कि उसका ब्याज आज तक बड़ी-बड़ी पोस्टिंग के रूप में चुकाया जा रहा है। बात तत्कालीन सरकार के दौर की है। तब एक अमन हुआ करते थे। रमन सरकार के समय उनकी ऐसी तूती बोलती थी कि बड़े-बड़े अफसर यहाँ तक सत्ता भी उनके इशारे पर चलती थी। लेकिन सत्ता बदली तो अमन का भी अमन छिन गया। जांच एजेंसियां सक्रिय हुईं और साहब को सपत्नीक पूछताछ के लिए बुलाया जाने लगा। उसी दौर में एसीबी में एक कीर्तन थे। कहते हैं, उन्होंने वक्त की नजाकत को समझा। पूछताछ के लिए बुलाया जरूर, लेकिन माहौल ऐसा बनाया कि चाय-समोसे के साथ पूरा मेहमाननवाज़ी वाला सत्कार हुआ। इस चाय-समोसे का ऐसा कर्ज चढ़ा, जिसे उतारने में बरसों लग गए। जाते जाते अमन साहब ने कहा था कि मौका मिला तो तुम्हारा कीर्तन पूरा प्रदेश सुनेगा। और फिर सत्ता बदली। कीर्तन की ऐसी गूंज उठी कि राजधानी से लेकर जिलों तक हर जगह वही सुर सुनाई देने लगे। सारे नियम-कायदों को किनारे रखकर चाय-समोसे का कर्ज उतारने का दौर शुरू हुआ और ऐसी-ऐसी पोस्टिंग हुई कि कीर्तन और स्पीकर दोनों एक साथ बजने लगे। उसी दौर में मुद्रा मीनार में करोड़ों रुपये का आलीशान ऑफिस बना। जिस शख्स को इंटीरियर डिजाइनर बताया गया, उसे इंटीरियर का ‘I’ भी नहीं आता था लेकिन जब बालम पुलिस विभाग में हो तो कुछ भी पॉसिबल है। इसी दौरान नया रायपुर में भी करोड़ो का निवेश हुआ, और जब कोई बात उठी तो बताया गया कि सर पर अमन का हाथ है। चाय-समोसा भले कुछ सौ रुपये का रहा हो, लेकिन उसका कर्ज करोड़ों की पोस्टिंग और मेहरबानियों में चुकाया जा रहा है।

अतिरिक्त प्रभार का स्थायी राज…
छत्तीसगढ़ में योग्य अधिकारियों का टोटा पड़ गया है। तभी तो हजारों करोड़ रुपये की ग्रामीण सड़क योजनाओं वाला पूरा विभाग कुछ चुनिंदा अफसरों के भरोसे चल रहा है। नई नियुक्ति करने के बजाय एक ही अधिकारी के कंधों पर एक के बाद एक कुर्सियां लाद दी गई हैं। लगता है कि शासन ने नया प्रशासनिक फॉर्मूला बना लिया है अधिकारी कम, अतिरिक्त प्रभार ज्यादा। एक तरफ आईएएस भीम सिंह हैं। 1अगस्त 2023 से छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण (CGRRDA) के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे हैं। इस बीच उनका मूल विभाग बदलकर छत्तीसगढ़ शासन में सचिव, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग हो गया, जिम्मेदारियां बढ़ती रहीं, लेकिन CEO का अतिरिक्त प्रभार नहीं बदला। और सुनिए खुद अतिरिक्त प्रभार वाले CEO साहब दूसरे अधिकारियों को भी अतिरिक्त प्रभार बांटे जा रहे हैं। दूसरी तरफ के.के. कटारे हैं। शासन ने उन्हें प्रमुख अभियंता, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना एवं ग्रामीण अभियांत्रिकी सेवा (RES) का दायित्व सौंपा। इसके साथ ही PMGSY-निर्माण, संधारण, MMGSY, RCTRC, RRNMU, सेतु, स्थापना और टेंडर सेल जैसी महत्वपूर्ण शाखाओं का प्रभार भी उनके कंधों पर डाल दिया। कटारे के जाति प्रमाणपत्र को उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने फर्जी माना है। क्या हजारों करोड़ रुपये की ग्रामीण सड़क योजनाओं वाला पूरा विभाग दो अधिकारियों के भरोसे चल रहा है? प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, निर्माण, संधारण, गुणवत्ता नियंत्रण, सेतु, स्थापना और टेंडर जैसे अहम कामों की जिम्मेदारी अगर कुछ गिने-चुने अधिकारियों के पास सिमट जाए, तो जवाबदेही तय कैसे होगी? गड़बड़ी होने पर जिम्मेदार कौन होगा मूल पद वाला अधिकारी या अतिरिक्त प्रभार वाला? लगता है शासन ने नया प्रशासनिक मॉडल बना लिया है जब भी कोई कुर्सी खाली हो, नई नियुक्ति मत कीजिए, एक और अतिरिक्त प्रभार दे दीजिए। अगर CGRRDA जैसी महत्वपूर्ण संस्था लगभग तीन साल तक नियमित CEO के बिना चल सकती है और इतने बड़े इंजीनियरिंग ढांचे को भी अतिरिक्त प्रभार के सहारे संचालित किया जा सकता है, तो फिर नियमित नियुक्तियों का औचित्य क्या रह जाता है? क्या नियमित पद अब सिर्फ सेवा पुस्तिका की शोभा बढ़ाने के लिए हैं? विभाग में अतिरिक्त प्रभार अब अस्थायी व्यवस्था नहीं, बल्कि स्थायी शासन व्यवस्था बन चुका है। आखिर एक ही अफसर जब कई कुर्सियों पर बैठा हो, तो सबसे पहले न्याय किस कुर्सी के साथ करेगा?

सोने की चमक या काले कारोबार की दमक…
बिलासपुर संभाग के उत्तर-पूर्व का एक जिला जो चोरी के सोने-चांदी को गलाने और खपाने का बड़ा ठिकाना बन चुका है। यह कोई नई कहानी भी नहीं है। पहले भी चोरी के सोने के मामलों में दूसरे जिलों की पुलिस यहां पहुंचकर कई सराफा कारोबारियों पर कार्रवाई कर चुकी है। कई बार तो मामला विवाद उसके बाद गोलीकांड तक भी पहुँच गया। बाउजूद इसके इस अवैध कारोबार पर पूरी तरह लगाम नहीं लग सकी। आलम यह है कि कुछ सराफा कारोबारियों की दुकानों पर ग्राहक भले सीढी न चढे लेकिन हर साल करोड़ों रुपये की जमीन और संपत्तियां उनके नाम जुड़ती चली जाती हैं। आखिर इतनी पूंजी का स्रोत क्या है? चोरी के सोने का खेल केवल एक कड़ी है। इसके साथ बिना बिल (कच्चे) का कारोबार, जीएसटी चोरी, आयकर में गड़बड़ी, बेहिसाबी नकद लेन-देन और बेनामी निवेश जैसे मामले बढ़े है। यदि जीएसटी, आयकर विभाग, आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा और पुलिस संयुक्त रूप से गहराई से जांच करें, तो कई चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं। सराफा बाजार की चमक आखिर सिर्फ शो-रूम तक सीमित है या उसके पीछे काले कारोबार की भी चमक छिपी है? अब देखना यह है कि जांच एजेंसियों की नजर केवल गहनों तक पहुंचती है या उन खातों तक भी, जहां असली कहानी लिखी हुई है।

रीलबाज विधायक…
सूबे की स्टील सिटी के एक विधायक साहब रीलों में कुछ ज्यादा ही व्यस्त हैं। साहब को रील बनाने का ऐसा शौक है कि जन्मदिन हो या बरसी, तेरहवीं हो या उद्घाटन हर मौके को कैमरे के सामने एक इवेंट बना देते हैं। इन दिनों साहब औद्योगिक क्षेत्र में चोरी की घटनाओं को लेकर खासे सक्रिय नजर आ रहे हैं। लेकिन गलियारों में चर्चा कुछ और ही है। कहते हैं कि साहब का खुद का सेटिंग नहीं बैठ रहा था, इसलिए यह नया शिगूफा छोड़ दिया गया। लोग तो यहां तक चुटकी लेते हैं कि 24 घंटे में आधा समय जनता के बीच नहीं, बल्कि रील की शूटिंग, एडिटिंग और अपलोडिंग में निकल जाता है। ऐसे में विकास कब होता है और राजनीति कब, इसका हिसाब शायद साहब के कैमरे के पास ही होगा। बताते हैं कि महादेव ऐप की कृपा से साहब पर करोड़ों का चढ़ावा बरसता है। इसी बरसात से कुछ दिखावटी रीलबाजी के लिए समाजसेवा करते है और उसके बाद चंदा भी मांगने लगते है। आत्ममुग्ध ऐसा की इनको लगने लगा है कि यहिच स्वयं भगवान है। इन दिनों तो राजधानी में इनका आलीशान मीडिया हाउस भी खुल गया है। ढाई साल की विधायकी में इनका जलवा जलाल देखते ही बनता है। साहब को हीरो बनने का बड़ा शौक है यही कारण है कि कभी पार्कों में प्रेमी जोड़ों की तलाशते है, तो कभी ओयो बन्द कराने निकल पड़ते है। जनता के मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और कैमरे के सामने नया दृश्य तैयार हो जाता है। और हां, राजधानी से लेकर दुबई तक साहब के कनेक्शन को लेकर भी खासा चर्चा है। फिलहाल स्टील सिटी में स्टील से ज्यादा मजबूत अगर कुछ दिख रहा है, तो वह साहब की रीलबाजी ही है।

यक्ष प्रश्न –
1 – मंत्रिमंडल में क्या सिल्वानिया की तरह पूरे बल्ब बदल दिए जाएंगे… ट्यूबलाइट सहित?

2 – संगठन की फटकार के बाद क्या पाँचवीं मंज़िल से माननीयों के फोन अब चालू हो गए हैं सरकार, कोई काम हो तो फ़रमाइए…?

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