अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)
किसकी चली, किसकी नहीं…
बहुप्रतीक्षित आईपीएस सूची में जिस धमाके की उम्मीद थी, वह नहीं दिखा। सूची में कुछ चौंकाने वाले फैसले जरूर हुए, मगर बड़े जिलों की तस्वीर जस की तस रही। असली चर्चा उन नामों की है, जिन पर कार्रवाई हुई और उन पर भी, जिन्हें कोई छू तक नहीं पाया। सबसे ज्यादा हैरानी गृहमंत्री के गृह जिले कबीरधाम को लेकर हुई। एसपी धर्मेंद्र छवई को हटाकर 8वीं वाहिनी भेज दिया गया। इस फैसले से पहले गृहमंत्री से राय तक नहीं ली गई। उधर कप्तान साहब भी पूरे भरोसे में थे कि उन्हें कोई हिला नहीं पाएगा, लेकिन एक आदेश आया और सारी चर्चाओं पर विराम लग गया। राजेश कुकरेजा को जिले की कमान मिलने की उम्मीद थी, लेकिन वे पुलिस मुख्यालय पहुंच गए। वहीं राजनांदगांव रेंज के आईजी बालाजी राव को भी मुख्यालय बुला लिया गया। चर्चा है कि कप्तान और आईजी की नहीं बनी, आखिरकार इस लड़ाई में कप्तान भारी पड़ गई। हर सरकार में मनचाही पोस्टिंग पाने वाले प्रशांत ठाकुर भी इस बार मुख्यालय भेज दिए गए। वहीं कई जिलों में मौका मिलने के बाद भी खास छाप नहीं छोड़ पाए सूरज सिंह परिहार को फिर 4वीं वाहिनी, माना भेज दिया गया। लंबे समय से नियमित एसपी का इंतजार कर रहे सारंगढ़-बिलाईगढ़ को आखिरकार सुनील शर्मा मिल गए। दूसरी ओर लो-प्रोफाइल रहकर हर बार जिला पाने वाले योगेश पटेल की किस्मत फिर चमकी और उन्हें एक बार फिर जिले की कमान मिल गई। रायपुर कमिश्नरेट के डीसीपी उमेश प्रसाद गुप्ता और मयंक गुर्जर को भी अब फील्ड की जिम्मेदारी मिली है। उमेश को बीजापुर और मयंक को सुकमा भेजा गया है। लेकिन पूरी कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जिस सूची का सबसे ज्यादा इंतजार था, बिलासपुर, कोरबा, जांजगीर, जगदलपुर और दुर्ग जैसे बड़े जिले आज भी उन्हीं डीआईजी स्तर के अधिकारियों के पास हैं, जो सरकार बनने के समय से जमे हुए हैं। रजनेश सिंह (बिलासपुर), सिद्धार्थ तिवारी (कोरबा), विजय पांडेय (जांजगीर), शलभ सिन्हा (जगदलपुर) और विजय अग्रवाल (दुर्ग) पर सबकी नजर थी, लेकिन इस सूची में उन्हें छुआ तक नहीं गया। यानी पहली सूची ने कुछ मोहरे जरूर बदले हैं, लेकिन असली बाजी अभी बाकी है। पुलिस महकमे में अब अगला सवाल यही है अगली सूची में आखिर किसकी चलेगी और किसकी नहीं?
छह महीने और…!
डीआईजी रैंक के जिन अधिकारियों की तबादला सूची कभी भी जारी हो सकती थी, उनकी ओर से फिलहाल छह महीने और देने की गुजारिश की गई है। दिलचस्प यह है कि इनमें कई अधिकारी पहले ही करीब ढाई साल से एक ही जगह जमे हुए हैं। अब जो काम ढाई साल में पूरा नहीं हो पाया, वह आखिर छह महीने में कैसे पूरा हो जाएगा? अंदरखाने तो यही चर्चा है कि यह अतिरिक्त समय इसलिए जरूरी बताया जा रहा है ताकि बचे हुए हिसाब-किताब और लंबित वसूली जैसे काम भी निपटा लिए जाएं। इसलिए इस बार डीआईजी रैंक के अधिकारियों की बात को तवज्जो मिलने की चर्चा तेज है। अब देखना यह है कि तबादला सूची पहले आती है या छह महीने की यह मोहलत मंजूर होती है।
छापा पड़ा… फिर फाइल से नाम गायब?
महादेव ऐप मामले में सीबीआई की नई चार्जशीट जितने जवाब लेकर आई, उससे कहीं ज्यादा सवाल छोड़ गई। मार्च 2025 में सीबीआई ने छत्तीसगढ़ समेत 60 ठिकानों पर एक साथ दबिश दी थी। जांच में अवैध सट्टा नेटवर्क को निर्बाध चलाने के लिए कुछ लोक सेवकों को हर महीने बाकायदा प्रोटेक्शन मनी मिलती थी। इसी कार्रवाई के दौरान आईपीएस आरिफ शेख, आनंद छाबड़ा, अभिषेक पल्लव, पूर्व एएसपी संजय ध्रुव और पुलिस अधिकारी अभिषेक माहेश्वरी सहित कई अधिकारियों के ठिकानों पर भी तलाशी हुई थी। उस समय माना गया था कि जांच अब सिस्टम की सबसे ऊंची परत तक पहुंच चुकी है। इनमें डॉ. आनंद छाबड़ा के लिए ₹20 लाख प्रतिमाह, शेख आरिफ हुसैन, प्रशांत अग्रवाल, और अभिषेक पल्लव के लिए ₹10-10 लाख प्रतिमाह, संजय ध्रुव के लिए ₹5 लाख तथा अभिषेक माहेश्वरी के लिए ₹35 लाख प्रतिमाह का जिक्र किया गया था। इन्हीं आरोपों और दस्तावेज़ों के आधार पर सीबीआई ने दबिश भी दी थी।लेकिन अब जब सीबीआई की नई चार्जशीट सामने आई, तो जिन अधिकारियों के यहां दबिश दी गई, उनका उल्लेख चार्जशीट में गायब है। क्या जांच में उनके खिलाफ अभियोजन योग्य साक्ष्य नहीं मिले? क्या जांच का यह हिस्सा अभी खुला हुआ है और आगे पूरक चार्जशीट आएगी? या फिर शुरुआती जांच में जिन बिंदुओं के आधार पर कार्रवाई हुई थी, वे आगे साक्ष्यों की कसौटी पर टिक नहीं पाए? महादेव ऐप मामला अब केवल ऑनलाइन सट्टे का नहीं, बल्कि जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता की भी परीक्षा बन चुका है। छापे की कार्रवाई जितनी महत्वपूर्ण होती है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसका तार्किक निष्कर्ष होता है। जिन दरवाजों पर सीबीआई पहुंची थी, उन फाइलों का आखिर अंजाम क्या हुआ। क्योंकि छापे की गूंज पूरे प्रदेश ने सुनी थी, अब चार्जशीट की खामोशी भी उतनी ही तेज़ सुनाई दे रही है।
AI से सड़क ही नहीं, विभाग भी चेक कराइए…
विजय शर्मा ने कहा है कि अब ग्रामीण सड़कों की गुणवत्ता पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) नजर रखेगी। सड़क कितनी मजबूत बनी, कहां गड़बड़ी हुई और किस ठेकेदार ने गुणवत्ता से समझौता किया, इसका पता तकनीक लगा लेगी। लेकिन मंत्रीजी, AI की सबसे ज्यादा जरूरत तो आपके अपने विभाग में है। एक बार उसे ग्रामीण सड़क विभाग की फाइलों पर भी दौड़ा दीजिए। शायद AI यह भी बता दे कि अगस्त 2023 से आईएएस भीम सिंह (CGRRDA) के CEO का अतिरिक्त प्रभार आखिर कैसे संभाल रहे हैं? यही नही इनका मूल विभाग बदलकर पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के सचिव भी बना दिया गया, और CEO का अतिरिक्त प्रभार जस का तस बना रहा। यही नही खुद अतिरिक्त प्रभार वाले CEO साहब दूसरे अधिकारियों को भी अतिरिक्त प्रभार बांट रहे हैं। दूसरी ओर के.के. कटारे के पास प्रमुख अभियंता के साथ PMGSY, निर्माण, संधारण, MMGSY, RCTRC, RRNMU, सेतु, स्थापना और टेंडर सेल जैसी कई अहम शाखाओं का जिम्मा है। जबकि उनके जाति प्रमाणपत्र को उच्च स्तरीय छानबीन समिति फर्जी घोषित कर चुकी है, बावजूद इसके इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां उन्हीं के पास हैं। अब AI से यह भी पूछ लीजिए कि एक अधिकारी आखिर कितनी कुर्सियां संभाल सकता है? वर्षों से खाली पद क्यों नहीं भरे जा रहे? हजारों करोड़ रुपये की योजनाओं में जवाबदेही आखिर तय किसकी होगी? मंत्रीजी, AI से सिर्फ सड़क की दरारें मत खोजिए। एक बार यह भी पता कराइए कि विभाग में वर्षों से जमी अतिरिक्त प्रभार वाली व्यवस्था आखिर चल कैसे रही है। हो सकता है AI बता दे कि सबसे ज्यादा रिपेयरिंग सड़कों की नहीं, व्यवस्था की जरूरत है।
रिटायरमेंट एक्सप्रेस…
सरकारी नौकरी में आम कर्मचारी रिटायर होने के बाद पेंशन, पीपीओ और ग्रेच्युटी के लिए महीनों दफ्तरों के चक्कर काटता है। लेकिन कुछ अफसर ऐसे भी होते हैं, जिनकी कुर्सी से मोहब्बत इतनी गहरी होती है कि रिटायरमेंट की स्याही सूखने से पहले ही दूसरी कुर्सी तैयार मिल जाती है। 30 जून को पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के पूर्व प्रमुख अभियंता हरिओम शर्मा सेवानिवृत्त हुए और 8 जुलाई को एनआरडीए में मुख्य अभियंता की संविदा नियुक्ति का आदेश भी जारी हो गया। यानी आठ दिन का ऐसा प्रशासनिक रिकॉर्ड, जिस पर कई रिटायर्ड अफसर शायद शोध करना चाहें। दिलचस्प यह है कि जिनके सेवाकाल को लेकर तदर्थ नियुक्ति, एसीबी-ईओडब्ल्यू प्रकरण, अभियोजन स्वीकृति और जीएडी के दिशा-निर्देश वर्षों से चर्चा में रहे, उन्हीं को इतनी जल्दी नई जिम्मेदारी भी मिल गई।जबकिं भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में संविदा व्यवस्था खत्म करने का वादा किया था, लेकिन यहां तो सेवानिवृत्ति के महज आठ दिन बाद ही संविदा नियुक्ति का आदेश जारी हो गया। आखिर यह घोषणा पत्र की भावना के अनुरूप है या उसके उलट? हरिओम शर्मा खुद को संघ और संगठन का करीबी बताते रहे हैं। अगर ऐसा है, तो सवाल यह भी है कि पूरे सेवाकाल में उन्होंने संगठन के लिए ऐसा कौन-सा काम किया, जिससे इस निकटता का दावा बनता है? या फिर फायदा अपना और नाम संगठन का? यदि ऐसा नहीं है, तो संगठन के नाम का इस तरह इस्तेमाल कर प्रभाव बनाने की चर्चाओं पर भी विराम लगना चाहिए। आवास एवं पर्यावरण मंत्री ओ.पी. चौधरी बताये कि इस संविदा नियुक्ति में ऐसी कौन-सी प्रशासनिक अनिवार्यता थी कि विभाग आठ दिन भी इंतजार नहीं कर सका? क्या पूरे प्रदेश में मुख्य अभियंता के लिए कोई दूसरा विकल्प नहीं था, या फिर अनुभव का ऐसा अकाल पड़ गया कि सेवानिवृत्त होते ही उसी अधिकारी को वापस बुलाना पड़ा? या फिर कुछ कुर्सियां रिटायर ही नहीं होतीं?
38 करोड़ का हरदीडीह भ्रष्टाचार की भेंट –
महानदी पर 38 करोड़ रुपये की लागत से बना हरदीडीह एनीकट अपनी निर्धारित आयु से बहुत पहले ही धराशायी हो गया। एनीकट का लगभग 180 मीटर हिस्सा बह गया और शेष संरचना भी खतरे में है। सवाल सिर्फ एनीकट के टूटने का नहीं, बल्कि उन अधिकारियों का है, जिन्होंने निर्माण से लेकर रखरखाव तक इसे संतोषजनक मानकर फाइलें आगे बढ़ाईं। निर्माण के दौरान डायफ्राम वॉल की गहराई, ड्राइंग-डिजाइन, (Measurement Book) और गुणवत्ता परीक्षण में गंभीर भ्रष्टाचार हुआ और घटिया निम्न स्तर का निर्माण कार्य हुआ। यही नही माप में बड़े पैमाने पर एडजस्टमेंट किए गए। निर्माण अवधि में जल संसाधन विभाग की जिम्मेदारी तत्कालीन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के पास थी। परियोजना से जुड़े अधिकारियों में तत्कालीन कार्यपालन अभियंता सुरेश पांडेय, मुख्य अभियंता संजय भागवत, एसडीओ गोपाल मेमन सहित अन्य तकनीकी अधिकारी शामिल थे। आज सुरेश पांडेय मुख्य अभियंता के पद पर हैं, जबकि संजय भागवत सेवानिवृत्ति के बाद भी विभाग में संविदा की मलाई छान रहे है। मामला यहीं नहीं रुकता मई 2026 में जांच समिति गठित हुई। जो जांच समिति बनी उसे कभी मौके तक पहुँचने ही नही दिया गया। हरदीडीह में सिर्फ एनीकट नहीं टूटा, सरकारी निर्माण की विश्वसनीयता भी दरक गई। करोड़ों रुपये बह गए, लेकिन जिम्मेदारी आज भी फाइलों में अटकी हुई है। आखिर ड्राइंग किसने मंजूर की, माप किसने प्रमाणित किया, गुणवत्ता किसने पास की, भुगतान किसने स्वीकृत किया और वर्षों तक मेंटेनेंस के नाम पर खर्च हुए पैसे का हिसाब कौन देगा? आखिर सिस्टम में बहता क्या है पानी या पूरी जवाबदेही?
यक्ष प्रश्न –
1 – INT, बगुला, या गृह मंत्री IPS लिस्ट के आखिर किसकी चली?
2 – मुख्यमंत्री ने अपने बयान में यह बोला कि प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री किरण देव क्या कुछ संकेत दिया जा रहा है?


