अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

राजधानी की कमाई, यूपी की दवाई!
सत्ता के गलियारों में इन दिनों एक साहब खासा चर्चाओं में है। सरकारी कुर्सी भले राजधानी की ऊँची मंजिल पर सजी हो, लेकिन लाभांश की बेल नोएडा से लेकर लखनऊ तक लहलहा रही है। कहते हैं कि फाइलें मंत्रालय में चलती हैं, मगर असली हिसाब-किताब पारिवारिक नेटवर्क के जरिए दूसरे प्रदेश में लिखा जाता है। पुत्र नोएडा में, भाई लखनऊ में और साहब राजधानी में ऐसा त्रिकोण कि भूगोल के शिक्षक भी चकरा जाएँ। वैसे इन साहब का अतीत भी कम दिलचस्प नहीं है। एक मेडिकल प्रवेश परीक्षा में कथित गड़बड़ी का मामला आज भी उच्चस्तरीय जांच की प्रतीक्षा कर रहा है। उस परीक्षा में न जाने कितने छात्रों का डॉक्टर बनने का सपना अधर में लटक गया था। लेकिन कहते हैं कि समय सबसे बड़ा शिक्षक होता है। दो साल बाद शायद साहब को भी बोध हुआ कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ तो हुई थी। अब अपराधबोध मिटाने का अनोखा तरीका भी सुनिए, साहब को समाधान खोजते-खोजते विचार आया कि जब इतने बच्चों को डॉक्टर बनने से वंचित कर दिया, तो क्यों न खुद ही एक भव्य मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल खोल दिया जाए! आखिर छात्र डॉक्टर नहीं बन पाए तो क्या हुआ, अस्पताल तो बन ही सकता है। इससे मन का बोझ भी हल्का होगा और कारोबार का भविष्य भी उज्ज्वल हो जाएगा। शायद यह देश का पहला ऐसा प्रायश्चित मॉडल होगा, जहाँ गलती शिक्षा में और समाधान स्वास्थ्य सेवा में खोज निकाला गया। इधर राजधानी में सरकारी फाइलों का पसीना बहता रहा और उधर उत्तरप्रदेश में अस्पताल की दीवारें खड़ी होती रही। अब इन चर्चाओं में कितनी सच्चाई है और कितना नमक-मिर्च, यह तो जांच ही बताएगी। लेकिन तंज उड़ाने वालों ने नया नारा गढ़ दिया है राजधानी की कुर्सी पर सेवा, और दूसरे प्रदेश में मेवा!

कीर्तन जारी है, तिजोरी भी! 
पिछले अंक में हमने जिन कीर्तन बाबू का जिक्र किया था, उनके कीर्तन ने जबरजस्त हल्ला मचा रखा है। अब चर्चा सुर और ताल से ज्यादा तिजोरी की हो रही है। बताते है कि कीर्तन साहब की तिजोरी इतनी समृद्ध हो चुकी है कि किसी धार्मिक स्थल की दानपेटी भी उसके सामने पनाह मांग ले। अब संयोग देखिए कि यही कीर्तन बाबू आगामी सत्र में प्रमोशन की सीढ़ी चढ़ने की कतार में है। अगर प्रमोशन से पहले इनके सेवा रिकॉर्ड का हिसाब-किताब खुल गया तो प्रमोशन तो दूर सरकार के पैरों तले जमीन खिसक जाएगी। आखिर ऐसा कौन-सा अद्भुत कीर्तन है जिसने करीब चौदह साल की नौकरी में साहब को तीन जिलों से आगे जाने ही नहीं दिया? सरकारें बदलीं, नीतियां बदलीं, अफसर बदले, लेकिन इनकी पोस्टिंग का राग कभी बेसुरा नहीं हुआ। आईपीएल टिकट ब्लैक से लेकर राजधानी में करोड़ों की संपत्तियाँ, मुद्रा मीनार में पत्नी के नाम भव्य कार्यालय और कोरबा से नया रायपुर तक फैला अकूत निवेश इन सबने मिलकर एक बड़ा साम्राज्य खड़ा कर दिया है। पहले कांग्रेस मंत्रियों के संरक्षण का छाता आज तिरपाल बन चुका है। आजकल तो यह साहब स्पीकर हाउस से कीर्तन सुना रहे है। जब श्रोता प्रभावशाली हों तो गायक को सुर बिगड़ने का डर भी कम ही रहता है। लेकिन चाहे जिसका वरदहस्त हो लेकिन प्रमोशन के पहले ही सारा खांका ऊपर पहुँच चुका है। बहरहाल कीर्तन जारी है, तिजोरी भी सुरक्षित है और प्रमोशन की सीढ़ी भी सामने खड़ी है। अब देखना सिर्फ इतना है कि ऊपर बैठे लोग कीर्तन की मधुर धुन सुनते हैं या फिर उसके पीछे छिपी ताल भी पहचानते हैं।

मीडिया की आड़ और सीमा पार का खेल? 
कभी 176 करोड़ की टैक्स चोरी की चर्चाओं में घिरा एक कारोबारी आज कैमरे की चमक और मीडिया की ताकत के साथ नए साम्राज्य का चेहरा बन चुका है। लेकिन राजधानी के गलियारों में अब चर्चा सिर्फ पुराने टैक्स मामले की नहीं, बल्कि उस नेटवर्क की है जो ओडिशा से लेकर रायपुर तक फैला हुआ है। बाजार और कारोबारी हलकों में चर्चा है कि ओडिशा में गुटखा, जर्दा और तंबाकू उत्पादों पर जैसे ही शख़्ति बढ़ी वैसे ही इस कारोबारी नेटवर्क का कारोबार भुवनेश्वर, कटक, बलांगीर जैसे हर बड़े शहर में खुलेआम चल पड़ा। मगर असली कहानी माल की नहीं, बल्कि उस कच्चे पैसे की है जो हर सप्ताह सीमावर्ती बसना-सरायपाली बागबाहरा से होते महासमुन्द और फिर राजधानी तक पहुँचता है। इतना ही नही जिन गाड़ियों के यह कच्चे का पैसा आता है उस गाड़ी के पीछे बड़े बड़े अक्षरों में MEDIA लिखा होता है और मीडिया आईकार्ड भी साथ होता है। मीडिया की पहचान होने के कारण इन गाड़ियों की सामान्य जांच भी नहीं होती और यही आड़ पूरे नेटवर्क के लिए सुरक्षा कवच का काम करती है। ऐसे में सवाल सिर्फ कारोबार का नहीं, बल्कि उस भरोसे का भी है। जिसका इस्तेमाल ढाल की तरह किया जा रहा है। एक तरफ न्यूज़ स्टूडियो की रोशनी, दूसरी तरफ धार्मिक आयोजनों में भव्यता और विश्वास और तीसरी तरफ सीमा पार से आने वाले कथित नकदी नेटवर्क की चर्चाएँ इन सबने मिलकर राजधानी में नई बहस छेड़ दी है कि आखिर मीडिया का मकसद खबर दिखाना है या खबरों से परे अपना प्रभाव बढ़ाना। क्या कैमरे की चमक ने पुरानी फाइलों की धूल ढक दी है, या फिर कुछ रास्ते ऐसे भी हैं जहाँ मीडिया का लोगो लगते ही बैरियर अपने आप उठ जाते हैं?

बिहार कनेक्शन का जंगल राज!
वन महकमे में इन दिनों पेड़ों से ज्यादा चर्चा एक ऐसे युवा आईएफएस साहब की है, जिनका दावा है कि उनका सीधा कनेक्शन सत्ता के शीर्ष तक है। इसकी वजह भी बड़ी दिलचस्प बताई जाती है कि सत्ता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बिहार से आते हैं और साहब भी मूलतः बिहार के ही हैं। बस फिर क्या, यही बिहार कनेक्शन साहब का सबसे बड़ा परिचय बन गया है। साहब अक्सर इसी नजदीकी का हवाला देकर अपना रुतबा दिखाते हैं। हालांकि जिन बड़े नेता का नाम लिया जाता है, उनका साहब से दूर-दूर तक कोई प्रत्यक्ष वास्ता नहीं है। लेकिन जंगल में दहाड़ असली शेर की हो या रिकॉर्डेड आवाज की, डर तो दोनों से लगता ही है। कटघोरा में लगभग तीन साल से जमे साहब पर इसी दौरान कई गंभीर आरोप भी लगे। कभी जंगली सुअर शिकार मामले में शिकारियों को बचाने के नाम पर बड़ा लेनदेन तो कभी पाँच हाथियों की मौत और हाथियों के अंगों की तस्करी से जुड़े मामलों को दबाने के गंभीर आरोप। लेकिन इतने विवादों के बावजूद साहब की कुर्सी टस से मस नहीं हुई। अब जंगल में पेड़ कटें या हाथी मरें या जंगली सुअर की तस्करी हो, अगर कनेक्शन मजबूत हो तो पोस्टिंग की जड़ें और गहरी हो जाती हैं। पिछली सरकार में भी साहब किसी दूसरे बड़े नेता का नाम लेकर मलाईदार पदों पर बने रहे और अब नई सरकार में नया परिचय पत्र लेकर फिर वही मलाई छान रहे हैं। ऐसे में वन्यजीवों से ज्यादा संरक्षण अगर कुर्सियों को मिलने लगे, तो फिर जंगल में सबसे सुरक्षित प्रजाति अधिकारी ही रह जाते हैं।

करंट का खेल, कुर्सी का मेल! 
ऊर्जा विभाग में इन दिनों बिजली से ज्यादा करंट मुख्य विद्युत निरीक्षक की कुर्सी में दौड़ रहा है। 30 जून को एस.के. नेताम के सेवानिवृत्त होते ही यह कुर्सी खाली होने वाली है, लेकिन असली चर्चा कुर्सी से ज्यादा उसके इर्द-गिर्द घूम रहे पुराने चेहरों की है। विभागीय गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा मनोज कोशले को लेकर है। कहते हैं कि भुपेश सरकार के दौर में साहब डिप्टी सेक्रेटरी रहते हुए भी सीधे मुख्य विद्युत निरीक्षक की कुर्सी तक पहुँच गए थे। उस समय भी विभाग के भीतर उनकी पात्रता और योग्यता को लेकर सवाल उठे थे, लेकिन सत्ता की बिजली इतनी तेज थी कि सारे फ्यूज अपने-आप उड़ गए। अब एक बार फिर कानाफूसी है कि साहब की नजर उसी कुर्सी पर है। भुपेश बघेल के चहेते और छोटे कद वाले साहब की पुरानी यारी कोशले साहब के लिए आखिरी समय में करंट दौड़ा सकता है। दिलचस्प यह भी है कि भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में संविदा और तदर्थ व्यवस्थाओं को खत्म करने का वादा किया था। ऐसे में सवाल यह है कि क्या इस बार नियमों और पात्रता को प्राथमिकता मिलेगी या फिर पुराने समीकरण फिर से नई ऊर्जा के साथ सक्रिय हो जाएंगे? ऊर्जा विभाग के बाबू मुस्कुराकर कहते हैं कि यहाँ ट्रांसफॉर्मर कम, ट्रांसफर और संपर्क ज्यादा काम आते हैं। अब 1 जुलाई का इंतजार है। देखना यह है कि कुर्सी पर योग्यता बैठेगी, नियम बैठेंगे या फिर पुराना करंट एक बार फिर पूरे सिस्टम को झटका दे जाएगा।

ड्रोलिया बंधुओं का राज? 
शिक्षा विभाग इन दिनों किताबों से कम और करोड़ों के टेंडरों से ज्यादा चर्चा में है। मंत्रालय के किताबो से ज्यादा चर्चा इस बात की है कि आखिर विभाग की असली कमान किसके हाथ में है? मंत्री के, अफसरों के या फिर उन कारोबारियों के जिनकी पकड़ वर्षों से सप्लाई व्यवस्था चल रही है। केंद्र में है ड्रोलिया बंधु और आगरा से जुड़ा एक कारोबारी जो समग्र शिक्षा की करोड़ों की खरीदी पर आज भी मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं। सत्ता बदल गई, सरकार बदल गई, लेकिन न खेल बदला न खिलाड़ी बदले। आखिर ऐसा कौन-सा सुरक्षा कवच है जो हर बदलाव के बाद भी इस नेटवर्क को अछूता रखता है? विभागीय हलकों में 25 से 40 प्रतिशत तक कमीशन की चर्चाएं कोई नई बात नहीं हैं। कुछ सप्लायर तो यहां तक दावा करते हैं कि बिना ‘सेटिंग’ बड़े काम मिलना मुश्किल है। कई जिलों में सप्लाई और भुगतान को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं, लेकिन फाइलें आगे बढ़ती रहीं और जवाब पीछे छूटते गए। मंत्री द्वारा अपनी पसंद के अधिकारी को ओएसडी बनाने का प्रस्ताव भी लंबित है। यदि अपने ही विभाग में मंत्री अपनी टीम नहीं बना पा रहे, तो फैसले आखिर ले कौन रहा है? इधर समग्र शिक्षा की जिम्मेदारी संभाल रहीं आईएएस किरण कौशल के पुराने डीएमएफ फंड से जुड़े मामलों पर भी फिर सवाल उठने लगे हैं। दूसरे मामलों में कार्रवाई दिखी, लेकिन यहां अब तक सन्नाटा है। करोड़ों रुपये का शिक्षा बजट बच्चों की पढ़ाई पर खर्च हो रहा है या फिर टेंडर, कमीशन और सप्लाई के अदृश्य नेटवर्क में कहीं गुम हो रहा है? अगर सब कुछ साफ-सुथरा है तो सरकार को उच्चस्तरीय जांच से परहेज क्यों होना चाहिए? और अगर धुआं उठ रहा है, तो आग कहां है यह पता लगाना भी जरूरी है।

मेफेयर पर कौन मेहरबान? 
नया रायपुर को आधुनिक और सुनियोजित शहर के रूप में बसाने का सपना दिखाया गया था। कहा गया था कि यहाँ की झीलें, हरियाली और सार्वजनिक संसाधन आम जनता की धरोहर होंगे। लेकिन क्या इन धरोहरों का फायदा जनता को मिल रहा है या चुनिंदा लोगों को? मेंफेयर जिसे पीपीपी मॉडल के तहत एक रुपये की दर में ज़मीन आवंटित की गई, तब के कलेक्टर साहब आज मंत्री है। फिर झील को अतिक्रमण कर एक बड़ा हिस्सा निजी उपयोग में आने लगा। जिस जलाशय में कभी आम नागरिकों की आवाजाही होती थीं, वहाँ अब आम नागरिकों का प्रवेश भी वर्जित हो गया है। विडंबना देखिये कि उसी झील में अब बोटिंग और वाटर स्पोर्ट्स चलाया जा रहा है। लेकिन आम आदमी परिसर से बाहर खड़ा निहारता है। कानूनी दृष्टि से भी यह मुद्दा महत्वपूर्ण है। चूंकि उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न मामलों में यह सिद्धांत दोहराया है कि तालाब, झील, जलाशय और अन्य प्राकृतिक संसाधन सार्वजनिक संपत्ति हैं और राज्य उनका ट्रस्टी है, मालिक नहीं। ऐसे संसाधनों का संरक्षण और आम नागरिकों के हित में उपयोग सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। मसला एक होटल का नहीं है। आखिर पीपीपी मॉडल की आड़ में दी गई जमीन की शर्तें क्या थीं? कितनी झील जलाशय की जमीन पर अतिक्रमण हुआ यह सार्वजनिक हो। नया रायपुर की चमकदार इमारतों के बीच यह बहस लगातार गहरी होती जा रही है कि कहीं विकास के नाम पर जनता की साझी विरासत धीरे-धीरे निजी परिसरों में तो तब्दील नही हो रही है। जबकिं लोकतंत्र में झीलें, जंगल और तालाब किसी एक संस्था या वर्ग की नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा पूंजी मानी जाती हैं।

यक्ष प्रश्न –
1 – किस विभाग के जंबो तबादला प्रस्ताव को मुख्यमंत्री निवास ने यह कहते हुए वापस भेज दिया कि सूची सीमित कीजिए और जवाब में मंत्रीजी ने मुस्कुराते हुए कहा कि काम क्या सीमित और क्या असीमित?

2 – छत्तीसगढ़ का वह कौन-सा आश्रम है, जहाँ पहुँचते ही एक के बाद एक कथावाचकों पर पीठाधीश को बदनाम करने के आरोप लगने लगते हैं? क्या मामला सिर्फ विवादों का है या फिर आश्रम का वास्तु ही कुछ ऐसा है कि आते ही रिश्तों में ग्रहण लग जाता है?

 

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