10 दिन बाद भी कार्रवाई नहीं! अब किसके इशारे पर रुकी क्रिस्टीना एस. लाल की फाइल? चार महीने बाद सेवानिवृत्ति की चर्चा, क्या रिटायरमेंट तक फाइल रोकने की तैयारी? 2015 के आदेश का हश्र दोहराने की आशंका

10 दिन बाद भी कार्रवाई नहीं! अब किसके इशारे पर रुकी क्रिस्टीना एस. लाल की फाइल? चार महीने बाद सेवानिवृत्ति की चर्चा, क्या रिटायरमेंट तक फाइल रोकने की तैयारी? 2015 के आदेश का हश्र दोहराने की आशंका
रायपुर – महिला एवं बाल विकास विभाग की संयुक्त संचालक क्रिस्टीना एस. लाल के अनुसूचित जनजाति (गोंड) जाति प्रमाण-पत्र को उच्च स्तरीय प्रमाणीकरण छानबीन समिति द्वारा दूसरी बार अमान्य घोषित किए जाने के बावजूद विभागीय कार्रवाई आगे बढ़ती दिखाई नहीं दे रही है। समिति ने 21 जुलाई 2026 को विस्तृत आदेश जारी किया था। आज 31 जुलाई तक दस दिन बीत चुके हैं, लेकिन आदेश के अनुपालन में क्या कार्रवाई की गई, इसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
अब मामला केवल जाति प्रमाण-पत्र की वैधता का नहीं, बल्कि शासन के आदेश के क्रियान्वयन और विभागीय जवाबदेही का भी बनता जा रहा है। विभागीय हलकों में यह चर्चा है कि प्रकरण से संबंधित फाइल संचालनालय स्तर पर आगे नहीं बढ़ पा रही है। आरोप यहां तक लगाए जा रहे हैं कि फाइल को संचालक एवं इनके ईर्द गिर्द के लोग जानबूझकर रोके बैठे है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि फाइल क्यो और किस कारण से रोकी गई है।
चार महीने बाद सेवानिवृत्ति, इसलिए और गंभीर हुआ सवाल –
मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आ रहा है। बताया जा रहा है कि क्रिस्टीना एस. लाल लगभग चार महीने बाद सेवानिवृत्त होने वाली हैं। इसी वजह से कार्रवाई में हो रही देरी को लेकर विभाग के भीतर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। यदि फाइल कुछ महीने और लंबित रहती है तो संबंधित अधिकारी को नए आदेश के खिलाफ न्यायालय जाने और वहां से अंतरिम राहत मांगने का पर्याप्त अवसर मिल सकता है। यह आशंका सही है या नहीं, इसका जवाब विभाग को देना चाहिए, लेकिन 21 जुलाई के आदेश के बाद फाइल की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक न होना संदेह को जरूर बढ़ाता है। सवाल यह भी है कि क्या विभाग सेवानिवृत्ति से पहले इस प्रकरण पर निर्णय लेगा या फाइल एक बार फिर समय के भरोसे छोड़ दी जाएगी?
दस साल पहले भी हुआ था यही आदेश, लेकिन सेवा चलती रही –
इस प्रकरण का इतिहास ही मौजूदा देरी को अधिक गंभीर बनाता है। वर्ष 2015 में भी उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने जांच के बाद क्रिस्टीना एस. लाल का अनुसूचित जनजाति जाति प्रमाण-पत्र निरस्त किया था। मामला न्यायालय पहुंचा और अंतरिम राहत के कारण वे सेवा में बनी रहीं। न्यायालय के निर्देश के बाद प्रकरण पर पुनर्विचार हुआ। करीब एक दशक बाद पुनर्गठित समिति ने दस्तावेजों, विजिलेंस जांच, राजस्व अभिलेखों, ग्राम स्तर की जांच और पक्षकारों की सुनवाई के बाद एक बार फिर वही निष्कर्ष दर्ज किया।
21 जुलाई 2026 के आदेश में समिति ने 17 जून 2015 के अपने पूर्व निर्णय को पुनः मान्य कर दिया। यानी जिस मामले पर दस साल पहले निर्णय हो चुका था, पुनर्विचार के बाद भी परिणाम नहीं बदला। अब यदि दूसरे आदेश के बाद भी कार्रवाई लंबित रहती है तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है क्या 2015 की कहानी 2026 में फिर दोहराई जा रही है?
आदेश स्पष्ट, फिर फाइल क्यों अटकी?
छानबीन समिति के आदेश में उपलब्ध दस्तावेजों और जांच के आधार पर अनुसूचित जनजाति (गोंड) जाति प्रमाण-पत्र को वैध नहीं माना गया है। साथ ही पूर्व आदेश को पुनः मान्य करते हुए अधिनियम के तहत आगे की कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए सामान्य प्रशासन विभाग को अधिकृत किए जाने का उल्लेख है। आदेश की प्रतियां संबंधित विभागों और अधिकारियों को भेजे जाने का भी उल्लेख है। ऐसे में सवाल बेहद सीधे हैं 21 जुलाई से 31 जुलाई के बीच फाइल पर क्या कार्रवाई हुई? फाइल इस समय किस अधिकारी के पास है? क्या महिला एवं बाल विकास संचालनालय ने शासन को कोई प्रस्ताव भेजा है? यदि नहीं, तो प्रस्ताव रोकने का कारण क्या है? क्या संबंधित अधिकारी की निकट भविष्य में संभावित सेवानिवृत्ति को देखते हुए समयबद्ध निर्णय लिया जाएगा?
इन सवालों का जवाब अब महिला एवं बाल विकास विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग दोनों से अपेक्षित है। आदिवासी मुख्यमंत्री के प्रदेश में आदिवासी अधिकारों से जुड़ा सवाल मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल प्रदेश है और राज्य के मुख्यमंत्री स्वयं अनुसूचित जनजाति वर्ग से आते हैं। सरकार लगातार आदिवासियों के अधिकार, प्रतिनिधित्व और संवैधानिक संरक्षण की बात करती रही है। ऐसे में यदि अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित लाभ से जुड़ा कोई प्रमाण-पत्र सक्षम समिति द्वारा दो बार अमान्य पाया जाता है, तो उस पर होने वाली वैधानिक कार्रवाई में अनावश्यक देरी केवल एक कर्मचारी का विभागीय मामला नहीं रह जाती। यह सवाल उस व्यवस्था से भी जुड़ता है, जिसका उद्देश्य वास्तविक अनुसूचित जनजाति वर्ग के अधिकारों की रक्षा करना है।
यदि किसी अपात्र व्यक्ति ने आरक्षित वर्ग का लाभ लिया है तो उसका अंतिम निर्धारण और उसके परिणाम कानून के मुताबिक होने चाहिए। और यदि संबंधित अधिकारी को समिति के आदेश के खिलाफ न्यायालय जाने का अधिकार है, तो वह अधिकार भी अपनी जगह है। लेकिन जब तक किसी सक्षम न्यायालय से नए आदेश पर रोक नहीं है, तब तक विभाग अपनी वैधानिक जिम्मेदारी से कैसे और कितने समय तक पीछे रह सकता है यह सवाल बना हुआ है।
क्या रिटायरमेंट तक खिंचेगी फाइल?
अब इस पूरे मामले में निगाह अगले कुछ दिनों की विभागीय गतिविधियों पर है। यदि संचालनालय स्तर पर फाइल वास्तव में लंबित है तो विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि वह किस स्तर पर और किस कारण लंबित है। यदि कार्रवाई प्रक्रियाधीन है तो उसकी स्थिति भी सामने आनी चाहिए। क्योंकि मामला सामान्य नहीं है 2015 में प्रमाण-पत्र अमान्य हुआ, मामला न्यायालय गया, पुनर्विचार हुआ और 2026 में दूसरी बार भी समिति ने पुराने निष्कर्ष को कायम रखा। इसके बाद भी यदि निर्णय महीनों तक लंबित रहता है और इस बीच संबंधित अधिकारी सेवानिवृत्ति के करीब पहुंच जाती हैं, तो विभाग के सामने एक और बड़ा सवाल खड़ा होगा क्या कानून अपना काम करेगा, या चार महीने का समय एक बार फिर दस साल पुराने आदेश की तरह फाइलों में गुजर जाएगा?
फिलहाल 21 जुलाई के आदेश के दस दिन बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल जाति प्रमाण-पत्र पर नहीं, बल्कि उस आदेश को लागू करने वाली व्यवस्था पर है फाइल आखिर रुकी कहां है और उसे आगे बढ़ने से रोक कौन रहा है?











