सिर्फ सवाल पूछने का नहीं, व्यवस्था से जवाब लेने का अधिकार है RTI, राजधानी में लोगों ने सीखा RTI का असली इस्तेमाल

सिर्फ सवाल पूछने का नहीं, व्यवस्था से जवाब लेने का अधिकार है RTI, राजधानी में लोगों ने सीखा RTI का असली इस्तेमाल
रायपुर : – सरकार के पास आपके सवाल का जवाब मौजूद है तो उसे हासिल करने के लिए किसी अधिकारी की मेहरबानी जरूरी नहीं। एक सामान्य नागरिक भी सूचना का अधिकार कानून के जरिए सरकारी फाइलों के दरवाजे खोल सकता है। बस उसे यह पता होना चाहिए कि सवाल कैसे पूछा जाए, किससे पूछा जाए और जवाब न मिले तो अगला दरवाजा कौन-सा खटखटाया जाए। शनिवार को रायपुर के विमतारा हॉल में कुछ ऐसा ही नजारा था। यहां लोग किसी राजनीतिक सभा या सरकारी कार्यक्रम के लिए नहीं, बल्कि सरकार से सूचना मांगने का तरीका सीखने जुटे थे। कोई पत्रकार था, कोई अधिवक्ता, कोई सामाजिक कार्यकर्ता तो बड़ी संख्या में नई पीढ़ी के युवा भी। V-KAN Shine Foundation की निःशुल्क कार्यशाला में RTI की धाराओं से ज्यादा उसके व्यावहारिक इस्तेमाल पर बात हुई।

मसलन, किसी सड़क पर करोड़ों रुपये खर्च हुए हैं तो उसका टेंडर किसे मिला? भुगतान कितना हुआ? काम किस मापदंड पर पूरा माना गया? किसी सरकारी जमीन या संपत्ति से विभाग को कितना राजस्व मिलना था? किसी फाइल पर निर्णय लेने वाले अधिकारी कौन थे? ऐसे सवालों के जवाब सरकारी रिकॉर्ड में हैं तो नागरिक उन्हें RTI के माध्यम से मांग सकता है।

RTI लिखना आसान, सही सवाल लिखना असली कला –
कार्यशाला में सबसे महत्वपूर्ण बात यही निकलकर आई कि केवल आवेदन लगा देना RTI का प्रभावी इस्तेमाल नहीं है। आवेदन में सवाल किस तरह रखा गया है, सूचना किस कार्यालय के पास है और मांगी गई जानकारी कानून के दायरे में किस रूप में उपलब्ध है इन बातों को समझना जरूरी है। पूर्व राज्य सूचना आयुक्त एवं वरिष्ठ पत्रकार धनवेन्द्र जायसवाल ने आवेदन से लेकर प्रथम और द्वितीय अपील तक की प्रक्रिया को व्यावहारिक तरीके से समझाया। उन्होंने उन सामान्य आपत्तियों की भी चर्चा की जिनका सामना सूचना मांगने वाले लोगों को अक्सर करना पड़ता है। उन्होंने एक दिलचस्प अधिकार की तरफ भी ध्यान दिलाया RTI केवल कागज की कॉपी मांगने तक सीमित नहीं है। कानून के दायरे में रिकॉर्ड और कार्यों का निरीक्षण तथा आवश्यकतानुसार सामग्री के प्रमाणित नमूने लेने का भी प्रावधान है। यानी सरकारी काम की पड़ताल केवल फाइल देखकर खत्म नहीं होती।

आवेदन गलत दफ्तर पहुंच गया तो भी कहानी खत्म नहीं –
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के जन सूचना अधिकारी सीमांत तिवारी ने RTI की धारा 6(3), धारा 8, धारा 18 और 19 को उदाहरणों के साथ समझाया। उन्होंने बताया कि किस परिस्थिति में सूचना दूसरे कार्यालय को हस्तांतरित होती है, किन परिस्थितियों में सूचना देने से छूट हो सकती है और जवाब नहीं मिलने या असंतोषजनक जवाब मिलने पर आगे क्या किया जा सकता है। छत्तीसगढ़ शासन की अधिसूचनाओं के साथ उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसलों की भी चर्चा हुई। इसका सीधा मतलब था RTI सिर्फ आवेदन लगाने का नाम नहीं, आवेदन से जवाब और जरूरत पड़ने पर अपील तक की पूरी प्रक्रिया है।

‘We the People’ सिर्फ संविधान की शुरुआती लाइन नहीं –
वरिष्ठ अधिवक्ता शरद प्रकाश यादव ने कार्यशाला में RTI की चर्चा को कानून की धाराओं से निकालकर संविधान तक पहुंचाया। उन्होंने कहा कि संविधान का मूल भाव “We the People” है। लोकतंत्र में राज्य का वास्तविक स्वामी नागरिक है, इसलिए सरकार क्या कर रही है और सार्वजनिक धन कहां खर्च हो रहा है, यह जानना उसका अधिकार है। उनके मुताबिक सूचना तक पहुंच अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से भी जुड़ी है। तथ्य ही उपलब्ध नहीं होंगे तो नागरिक किसी सरकारी निर्णय पर अपनी स्वतंत्र और सूचित राय कैसे बनाएगा?

551 आवेदन और RTI का दूसरा चेहरा –
कार्यशाला में RTI का एक ऐसा पहलू भी सामने आया जिसकी चर्चा अपेक्षाकृत कम होती है। आरटीआई एक्टिविस्ट अभिषेक प्रताप सिंह ने रायपुर नगर निगम का उदाहरण रखते हुए बताया कि कुणाल शुक्ला द्वारा निगम में लगाए गए 551 RTI आवेदनों से ऐसी जानकारियां सामने आईं जिनसे विभाग के राजस्व और परिसंपत्तियों के बेहतर प्रबंधन में मदद मिली। यानी RTI का अर्थ केवल किसी अधिकारी को कटघरे में खड़ा करना या भ्रष्टाचार खोजना नहीं है। सरकारी संपत्ति कहां है, उससे कितना राजस्व आना चाहिए, विभाग को कहां नुकसान हो रहा है इन सवालों से व्यवस्था को अपना रिकॉर्ड खंगालना पड़ता है और कई बार उसी प्रक्रिया से सुधार का रास्ता निकलता है।

पत्रकार के लिए RTI यानी आरोप से दस्तावेज तक का सफर –
कार्यशाला में पत्रकारों की मौजूदगी के बीच RTI की पत्रकारिता में उपयोगिता पर भी बात हुई। किसी निर्माण कार्य, सरकारी खरीदी, टेंडर, नियुक्ति, भुगतान या योजना पर सवाल उठाना एक बात है, लेकिन उसी सवाल के पीछे सरकारी फाइल, आदेश, नोटशीट या भुगतान का रिकॉर्ड होना दूसरी बात। यही RTI पत्रकारिता को “सूत्रों के मुताबिक” से “दस्तावेजों के मुताबिक” तक पहुंचाने का माध्यम बन सकती है। वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सोनी ने लोकतंत्र में RTI की प्रभावशीलता बनाए रखने की जरूरत बताई। वरिष्ठ पत्रकार पी.सी. रथ ने सूचना के अधिकार आंदोलन के शुरुआती दौर के अनुभव साझा करते हुए इसे पारदर्शी लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र मीडिया जितना महत्वपूर्ण बताया।

अब जेन-Z के हाथ में भी RTI
आयोजकों कुणाल शुक्ला और अभिषेक प्रताप सिंह के मुताबिक कार्यशाला का मकसद लोगों को केवल कानून बताना नहीं, बल्कि उसका इस्तेमाल करना सिखाना था। आयोजन में प्रदेशभर से आए नागरिकों और पत्रकारों के साथ जेन-Z युवाओं की भागीदारी इसी लिहाज से खास रही। सोशल मीडिया के दौर में सरकार से सवाल पूछना आसान हुआ है, लेकिन सवाल को सरकारी दस्तावेज तक पहुंचाना अब भी अलग कौशल है। RTI यही रास्ता उपलब्ध कराता है पोस्ट और प्रतिक्रिया से आगे बढ़कर रिकॉर्ड तक पहुंचने का।

दो पत्रकारों को ‘जर्नलिस्ट ऑफ द ईयर’ सम्मान
कार्यक्रम में V-KAN Shine Foundation ने अंकिता शर्मा और नितेश गर्ग को “जर्नलिस्ट ऑफ द ईयर अवार्ड” से सम्मानित किया। फाउंडेशन की डायरेक्टर प्रीति उपाध्याय शुक्ला के मुताबिक दोनों का चयन ज्यूरी ने सर्वसम्मति से किया। कार्यक्रम का संचालन स्वाति पांडे ने किया और उचित शर्मा ने आभार व्यक्त किया। सामाजिक संगठनों, अधिवक्ताओं, पत्रकारों और RTI कार्यकर्ताओं की भी कार्यक्रम में भागीदारी रही।

रायपुर की इस कार्यशाला से निकली बात शायद RTI को समझने का सबसे आसान तरीका भी है सरकारी दफ्तर की बंद फाइल आम आदमी के लिए हमेशा बंद नहीं होती। सही सवाल, सही प्रक्रिया और थोड़ी कानूनी समझ हो तो उस फाइल को खोलने की चाबी नागरिक के हाथ में भी है।










