अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

हार, प्यार और मुर्गा हलाल!
प्यार हुआ, इकरार हुआ और अब मुर्गा भी हलाल हो गया! कहानी यहीं खत्म हो जाती तो बात और थी, लेकिन इस कहानी में अगला अध्याय थोड़ा चमकीला है गले में करीब दो करोड़ के हीरे के हार भी आ गया। कहते हैं कि आईपीएस अफसर की खूबसूरती उसकी वर्दी बढ़ाती है। वर्दी का अपना रुतबा होता है, सितारों की अपनी चमक। मगर इन दिनों वर्दी के सितारों से ज्यादा चमक किसी हीरे के हार की है। अब हार आया कहां से, किसने दिया और क्यों दिया ये सवाल पूछना ठीक नहीं है।मैडम कप्तान के बारे में बताया जाता है कि वे शुद्ध शाकाहारी और संस्कारों की धनी हैं। लेकिन प्रेम और मेहमाननवाजी में आदमी माफ कीजिएगा, अफसर कभी-कभी अपने सिद्धांतों से भी आगे निकल जाता है। चर्चा है कि एक खास ‘कांता’ के लिए मैडम बाकायदा चिकन ऑर्डर करवाकर मंगवाती थीं। अब चिकन की बात निकल ही गई है तो कहानी के असली ‘मुर्गे’ को कैसे भूल सकते हैं। इसी चिकन-मुर्गी वाले एक बड़े बहादुर भी हैं। बहादुरी ऐसी कि साहब ने दिल ही नहीं खोला, तिजोरी का मुंह भी खोल दिया। और वहीं से कहानी में एंट्री होती है उस चमचमाते हीरे के हार की, जिसकी कीमत गलियारों में करीब दो करोड़ रुपये बताई जा रही है। अब इसे मोहब्बत कहें, मेहरबानी कहें या बहादुर की बहादुरी का सर्वोच्च सम्मान यह फैसला पाठक खुद करें। हम तो बस इतना जानते हैं कि सरकारी सेवा में अब तक पदक बहादुरी पर मिलते थे, लेकिन यहां चर्चा हार की है। और हार भी ऐसा कि जिसकी चमक में वर्दी के सितारे तक थोड़े फीके नजर आने लगें! इस कहानी में हर किरदार अपने संस्कारों की धानी में मौजूद है कोई शाकाहारी है, कोई चिकन का शौकीन, कोई बहादुर है और कोई हीरों का पारखी। बाकी सच क्या है, यह तो वही जानें जिनके बीच यह हार, प्यार और मुर्गे की कहानी घूम रही है। फिलहाल एक पुराना गीत याद आता है प्यार हुआ… इकरार हुआ…मुर्गा हुआ हलाल…और मोहब्बत की निशानी में चमक उठा हीरों का हार!

प्रेम और शेख चिल्ली का खेल!
कोरबा के दीपका थाने में एक प्रेम लंबे समय से टिका हुआ है। प्रेम यानी उप निरीक्षक साहू। पुलिस गलियारों की मानें तो इस प्रेम को दीपका तक पहुंचाने और बनाए रखने में अपने शेख चिल्ली साहब का वरदहस्त है। अब दीपका कोई मामूली थाना तो है नहीं। कोयले की धरती है, इसलिए यहां अर्थ के भी कई अर्थ निकाले जाते हैं। थाने के भीतर से कानाफूसी है कि प्रेम आज भी शेख चिल्ली साहब का खूब ख्याल रखता है। शायद इसीलिए सवाल भी उठता है कि आखिर इतने लंबे समय से दीपका में यह प्रेम टिका कैसे हुआ है? साहब का पुराना रिकॉर्ड भी कम दिलचस्प नहीं बताया जाता। एक कस्टोडियल डेथ प्रकरण से लेकर विभागीय बड़ी सजा और अटके प्रमोशन तक की कहानी पुलिस महकमे में सुनाई जाती है। ACB/EOW के दिनों का किस्सा तो और भी दिलचस्प है। एक सीनियर आईपीएस अफसर के खिलाफ हुई कार्रवाई में इनकी भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं और गोल्ड प्लांट की कहानी भी पुलिस गलियारों में आज तक तैरती है। अब आरोपों में कितना सोना है और कहानी में कितना खोट, यह जांचने वाले जानें। हम तो बस इतना पूछ रहे हैं कि दीपका में इतने लंबे समय से प्रेम आखिर किस नियम से चल रहा है? कहीं इसके पीछे शेख चिल्ली साहब का कोई खास अर्थशास्त्र तो नहीं!

कोरबा में ‘चौकड़ी’ की चर्चा, कप्तान की लंबी पारी!
इसी कोरबा जिले की पुलिस में इन दिनों एक चौकड़ी खूब चर्चा में है। बालको से कुसमुंडा, दीपका से यातायात तक इस चौकड़ी का जलवा बताया जाता है। कोई तिवारी है, कोई पाण्डेय, कोई शेख का प्रेम है तो कोई यातायात का राठौर! कहने वाले कहते हैं कि चारों ने ऐसी चौकड़ी जमाई है कि कप्तान साहब के कुछ खास काम इन्हीं खास लोगों के भरोसे चलते हैं। कहा जाता है कि इसी चौकड़ी के रास्ते अर्थ का प्रवाह ऊपर तक बना रहता है। दूसरी तरफ तस्वीर उल्टी है। कोई निलंबित, कोई बर्खास्त तो किसी पर विभागीय कार्रवाई का डंडा। कप्तान साहब का अनुशासन ऐसा कि मातहत फूंक-फूंककर कदम रखें। वैसे सख्ती बुरी बात नहीं दिसंबर में जुआरियों को संरक्षण देने के आरोप में करतला थाना प्रभारी तक को कप्तान ने निलंबित कर दिया था। सवाल सख्ती का नहीं, उसके तराजू का है। और अब असली दिलचस्पी देखिए। प्रदेश में सुशासन बाबू की सरकार आई और 6 फरवरी 2024 को कप्तान साहब कोरबा पहुंचे। तब से सरकारी कैलेंडर के पन्ने बदलते रहे, पुलिस महकमे में तबादलों की सूचियां आती रहीं, कई कुर्सियां हिलीं लेकिन कोरबा की कप्तानी को कोई छू तक नहीं पाया। लगता है कोरबा की धरती में कोयले के साथ कोई ऐसा चुंबक भी है, जिसने कप्तान की कुर्सी को मजबूती से पकड़ रखा है! अनुशासन का डंडा सबके लिए बराबर है या खास चौकड़ी के लिए नियम भी खास हैं? और यह चौकड़ी महज पुलिस गलियारों की अफवाह है तो कप्तान साहब को तस्वीर साफ कर देनी चाहिए। लेकिन अगर आरोपों में रत्तीभर भी सच्चाई निकली, तो सवाल तिवारी-पाण्डेय-प्रेम-राठौर तक नहीं रुकेगा। फिर हिसाब चौकड़ी का नहीं, कप्तानी का होगा।

जो करना है कर लो!
डबल इंजन की सरकार में इन दिनों तीसरे इंजन बड़े जलवे में है। एक साहब हैं IAS हैं, स्वास्थ्य संभालते हैं, सरकारी वेतन के नाम पर एक रुपया लेने की कहानी मशहूर है और इंटरनेट उन्हें करोड़ों की संपत्ति के साथ देश के सबसे धनी IAS अधिकारियों में गिनता रहा है। यानी साहब को तनख्वाह की चिंता नहीं और शायद अब नेताओं की चिट्ठियों की भी नहीं! उधर नेताजी भी कोई मामूली नहीं। चार बार मंत्री रह चुके हैं, अब सांसद हैं और सरकार भी अपनी है। मगर आरोप है मंत्री जी महीनों से चिट्ठियां लिख रहे हैं, मगर जवाब नहीं। आखिर ऊपर शिकायत हुई, फोन पर बात हुई और सांसद की लिखित शिकायत के मुताबिक साहब का जवाब था “जो करना है कर लो!” नेताजी ने भी शायद इसे दिल पर ले लिया। सोचा होगा अपनी सरकार में इतना तो कर ही सकते हैं! सीधे लोकसभा अध्यक्ष तक विशेषाधिकार हनन की शिकायत पहुंचा दी। अब दिल्ली ने बाकायदा ‘फैक्चुअल नोट’ मांग लिया है। वैसे एक रुपये वाले साहब का अंदाज पुराना है। कभी प्रधानमंत्री के सामने काला चश्मा चर्चा में आया, कभी बिना हेलमेट ट्रिपल राइडिंग, और अब तेवर सीधे संसद की चौखट पर हैं। चश्मा उतर गया, बाइक भी छूट गई, मगर अंदाज आज भी फुल स्पीड में है! मगर असली चटकारा नेताजी की हालत में है। कभी जिनके इशारे भर से सत्ता के गलियारों में हलचल मच जाती थी, आज अपनी ही सरकार में एक अफसर के खिलाफ दिल्ली से विशेषाधिकार की दवा मंगानी पड़ रही है। अब चार बार के मंत्री और मौजूदा सांसद का यह हाल है तो मंडल-बूथ वाला कार्यकर्ता अपनी अर्जी लेकर कहां जाए स्वास्थ्य भवन या सीधे संसद? बाकी विभाग स्वास्थ्य का है और बीमारी सत्ता में दिखाई दे रही है एक रुपये वाले साहब बोले “जो करना है कर लो”, चार बार वाले नेताजी सचमुच करने दिल्ली चले गए! अब देखना है इलाज रायपुर में होता है या पर्ची भी दिल्ली से लिखवानी पड़ेगी!

तब ‘सूर्य’ चमकता था, अब ‘चंदेल’ का जलवा!
पिछली सरकार का दौर याद कीजिए। तब एक ऐसे तिवारी जी की चर्चा थी, जिनकी चमक के आगे सूर्य भी फीका पड़ जाए। सरकार बदली, किरदार बदले, लेकिन सत्ता के गलियारों की कहानियां कहां बदलती हैं! उस दौर में जो जलवा-जलाल तिवारी जी का बताया जाता था, कुछ वैसा ही जलवा इन दिनों एक चंदेल साहब का जल संसाधन विभाग में सुनाई दे रहा है। चंदेल साहब कोई छोटे-मोटे खिलाड़ी नहीं है इन्होंने तो पूरा जल संसाधन विभाग मुट्ठी में कर रखा है। इनके काम करने का अंदाज भी बड़ा दिलचस्प है पहले बड़े-बड़े अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों के साथ तस्वीर खिंचवाइए, फिर उसी तस्वीर को अपनी पहुंच का प्रमाण बनाकर घूमिए। इसी तस्वीर की आड़ में दबाव और ब्लैकमेलिंग का खेल तक चलता है। आजकल चंदेल साहब स्पीकर हाउस के सिसोदिया साहब के इर्द-गिर्द घूमते
नजर आते है। विभाग में उनकी पकड़ को लेकर ऐसी-ऐसी बातें सुनाई देती हैं कि मानो कौन अधिकारी कहां बैठेगा, इसकी फाइल सरकारी टेबल से पहले चंदेल दरबार से होकर गुजरती हो! तत्कालीन ENC की कुर्सी को लेकर भी चंदेल साहब के किस्से कम नहीं हैं। उस दौर में उन्होंने ENC से अपनी नजदीकी और उनके नाम का खूब इस्तेमाल किया। और साहब की पहुंच सरकारी दफ्तर से निकलकर ENC के घर की चौखट तक पहुंच गई थी।
लेकिन सत्ता की तस्वीर में एक दिक्कत है हर फोटो हमेशा काम नहीं आती। बताया जाता है कि जब कुछ उच्चाधिकारियों को इस पूरे खेल की भनक लगी तो उन्होंने चंदेल साहब से दूरी बनानी शुरू कर दी। बस फिर क्या था जिन दरवाजों से सम्मानपूर्वक दूरी बनाई गई, उन्हीं अधिकारियों के खिलाफ दुष्प्रचार का बाजार गर्म होने लगा। और अब सबसे दिलचस्प किस्सा मौजूदा ENC को लेकर सुनाई दे रहा है। उन पर यह कहकर दबाव बनाया जा रहा है कि तुम्हें कुर्सी पर बैठाने में चार खोखा खर्च हुआ है! अब ये चार खोखे किसने खर्च किए, कहां खर्च हुए और कौन उनका हिसाब मांग रहा है यह सवाल अपने आप में किसी जांच से कम नहीं। सचिव से लेकर इंजीनियर तक अगर किसी गैर-सरकारी चंदेल दरबार के नाम से दबाव महसूस कर रहे हैं, तो सवाल चंदेल से ज्यादा व्यवस्था से है। आखिर जल संसाधन विभाग सरकार चला रही है या कोई चंदेल दरबार? बाकी आरोपों में कितना पानी है, यह सरकार जांच ले। क्योंकि जल संसाधन विभाग में पानी का हिसाब तो बहुत होता है…बस इन दिनों चर्चा चार खोखे के बहाव की ज्यादा है!

यश की आमीन और स्पीकर की सुरबाला!
सत्ता के गलियारों में इन दिनों यश की आमीन और स्पीकर की सुरबाला के बीच सुर-ताल बिगड़ा हुआ है। एक तरफ कॉरपोरेट का यश है, जिसकी आमीन बड़े अमन-चैन से अपना हर काम करा लेती है, तो दूसरी तरफ स्पीकर हाउस की सुरबाला है, जो तार छेड़ते-छेड़ते मन मसोसकर रह जाती है। कहने वाले कहते हैं कि यश की आमीन की फरमाइश हो तो रास्ते अपने आप खुल जाते हैं। फाइल हो, फैसला हो या कोई और काम सब अमन-चैन से हो जाता है। उधर सुरबाला कितना भी राग छेड़ ले, आजकल उसके सुर वहां तक पहुंच ही नहीं रहे, जहां से कभी उसकी धुन पर फैसले हुआ करते थे। कहानी का असली मजा अतीत में छिपा है। कभी एक साहब ऐसे भी हुआ करते थे, जिन्होंने नियम-कायदों की दीवारें लांघकर इसी आमीन को अपने सबसे करीबियों में जगह दी थी। आज यश की आमीन जहां खड़ी है, उसकी बुनियाद भी उसी पुराने दरबार में पड़ी थी। मगर वक्त बदला, ठिकाना बदला और साहब कॉरपोरेट के यश में ऐसे रम गए कि पुराने दरबार के सुर ही भूल बैठे। अब हालत यह है कि जिसे कभी स्पीकर हाउस की सुरबाला अपना ही संगीत समझती थी, वही यश की आमीन आज उसके सुरों को नकारकर अमन-चैन से आगे बढ़ रही है। खींचतान भी अब कानाफूसी तक सीमित नहीं बताई जाती। खबर है कि दोनों तरफ के सुर इतने बिगड़ चुके हैं कि कभी-कभी राग की जगह राग-द्वेष और बोल की जगह खरी-खोटी सुनाई देने लगती है। बाकी सत्ता का संगीत है साहब यहां सुर बदलने में देर कहां लगती है! फिलहाल कॉरपोरेट में यश है, यश के साथ आमीन है और आमीन के हिस्से पूरा अमन-चैन है…बस स्पीकर हाउस की सुरबाला है, जिसके तार आजकल कुछ ज्यादा ही तने हुए हैं!

सत्ता की ऊर्जा के लिए विष्णु की शिव पूजा!
प्रदेश की जनता इन दिनों ऊर्जा के बढ़ते बिल से परेशान है और इधर सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि प्रदेश के विष्णु अपनी राजनीतिक ऊर्जा बढ़ाने के लिए शिव आराधना में लगे हैं। फर्क बस इतना है जनता की ऊर्जा मीटर से नापी जा रही है और सत्ता की ऊर्जा मंत्रोच्चार से! कहते हैं ऐसे विशेष वैदिक अनुष्ठानों की परंपरा नई नहीं है। राजा-महाराजाओं के जमाने में भी राज्य की समृद्धि, संकट निवारण और सत्ता की स्थिरता के लिए विशेष पूजा-अनुष्ठान कराए जाते थे। मान्यता यह भी है कि प्राचीन और सिद्ध मंदिर में किया गया अनुष्ठान विशेष फलदायी होता है। शायद इसीलिए इसके लिए चुना गया प्राचीन भोरमदेव शिव मंदिर। चर्चा तब और बढ़ी जब विशेष अनुष्ठान के दौरान कई दिनों तक आम श्रद्धालुओं के दर्शन प्रभावित रहने की बात सामने आई। बाहर भक्त और भीतर विशेष अनुष्ठान बस यहीं से सवाल भी निकल पड़ा कि आखिर ऐसी कौन-सी कामना थी, जिसके लिए भगवान और भक्त के बीच भी व्यवस्था को पहरा लगाना पड़ा? वैसे पूजा व्यक्तिगत आस्था है और उसमें किसी को आपत्ति भी क्यों हो। राजा प्रदेश की खुशहाली के लिए प्रार्थना करें तो अच्छी बात है। लेकिन अगर अनुष्ठान राज्य के कल्याण के लिए था, तो नया रायपुर में भी कराया जा सकता था। और अगर प्राचीन शिवालय का ही शत-प्रतिशत फल चाहिए था, तो फिर सवाल स्वाभाविक है कल्याण राज्य का मांगा जा रहा था या कुर्सी का? महादेव तो भोले हैं। भक्त की भावना जानते ही होंगे।
फिलहाल प्रदेश में दो तरह की ‘ऊर्जा’ चर्चा में है जनता बिजली की ऊर्जा का बिल भर रही है और सत्ता अपनी ऊर्जा बढ़ाने के लिए अनुष्ठान करा रही है। अब देखना है महादेव किसकी सुनते हैं बढ़े हुए बिजली बिल से परेशान जनता की, या अपनी कुर्सी की ऊर्जा बढ़ाने पहुंचे ‘विष्णु’ की!

यक्ष प्रश्न –

1 – बिजली विभाग में संविदा नियुक्ति का खेल नेताम को अधीक्षण अभियंता से सीधे मुख्य अभियंता की कुर्सी तक पहुंचाने के बदले विभाग की मुखिया द्वारा कितनी ‘फीस’ वसूली गई?

2 – आदिवासी मुख्यमंत्री के राज में फर्जी जाति प्रमाण-पत्र वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं आदिवासी हितों को लेकर सरकार कितनी सजग है?

3 – प्रदेश में आरक्षक, प्रधान आरक्षक, ASI और SI की संपत्तियों की जांच कब होगी आखिर सीमित वेतन में कुछ वर्दीवालों के पास करोड़ों की संपत्ति आती कहां से है?

 

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