अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

सरकार किसकी… सत्ता किसके हाथ?
इतिहास बार-बार याद दिलाता है कि जब भी चुनी हुई सरकार से ज्यादा ताकत अफसरशाही के हाथों में गई, उसकी कीमत आखिरकार सत्ता को ही चुकानी पड़ी। चेहरे बदलते रहे, मुख्यमंत्री बदलते रहे, लेकिन यह बीमारी कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई। कभी अजित जोगी के दौर में फैसलों से ज्यादा अफसरों के नाम चलते थे। फिर पंद्रह साल रमन सिंह काल मे मुकेश अमन चर्चाओं में थे। भूपेश बघेल के समय तो सुपर सीएम तैयार हो चुकी थी। अब सुशासन में भी वही सवाल फिर सिर उठाने लगे हैं।अंदरखाने बताते है कि कई मंत्री अपने ही विभागों में पूरी तरह मंत्री नहीं रह गए हैं। फाइल पर हस्ताक्षर उनके होते हैं, लेकिन फैसला कहीं और से होकर आता है। मंत्री जवाबदेह हैं, मगर अधिकार सीमित दिखाई देते हैं। यही वजह है कि सरकार की उपलब्धियों से ज्यादा अफसरों के नाम चर्चा में हैं। कहा जा रहा है कि बढ़ती अव्यवस्था, अपराध और प्रशासनिक विवादों की आड़ लेकर मुख्यमंत्री की छवि को भी कमजोर करने की कोशिशें हो रही हैं। और निशाना केवल सरकार नहीं, नेतृत्व भी है। इतिहास साक्षी है कि सरकारें विपक्ष से कम, अपने ही सिस्टम से ज्यादा हारती हैं। अब देखना यह है कि सुशासन की कमान चुने हुए नेतृत्व के हाथ मजबूत करती है या फिर इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराता है।

दिल्ली की खामोशी… रायपुर की बेचैनी
राजनीति का एक पुराना नियम है। मुख्यमंत्री का दिल्ली दौरा कभी सिर्फ शिष्टाचार नहीं होता। वहां जितनी मुलाकातें होती हैं, उससे कहीं ज्यादा उनकी खामोशी पढ़ी जाती है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय दिल्ली पहुंचे। साथ में उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने केंद्रीय नेतृत्व से मुलाकात की। इसी दौरान बस्तर को नया आईजी भी मिल गया। इसके बाद राष्ट्रीय नेतृत्व से मुलाकातों का सिलसिला चला। लेकिन राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा मुलाकातों की नहीं, बल्कि उन चेहरों की रही जो दिखाई नहीं दिए। मुख्यमंत्री के साथ दिल्ली गए उनके प्रमुख सचिव अब तक रायपुर नहीं लौटे हैं, जबकि मुख्यमंत्री वापस आ चुके हैं। आखिर ऐसा कौन-सा काम है, जिसकी वजह से उनकी दिल्ली में मौजूदगी अभी भी जरूरी है? क्या केवल प्रशासनिक बैठकों का सिलसिला है, या फिर आने वाले दिनों की कोई नई पटकथा लिखी जा रही है? उधर, मुख्यमंत्री के दौरे से ठीक पहले कुछ मंत्रियों की दिल्ली यात्रा ने भी अटकलों को हवा दी। इसके बाद सत्ता के गलियारों में मंत्रिमंडल विस्तार, जिम्मेदारियों में फेरबदल और प्रशासनिक पुनर्संतुलन की चर्चाएं फिर तेज हो गई हैं। दिल्ली कभी जल्दी जवाब नहीं देती। वह पहले संकेत छोड़ती है, फिर फैसले सुनाती है। अब देखना यह है कि यह दौरा महज औपचारिक मुलाकातों तक सीमित था या छत्तीसगढ़ की राजनीति में किसी नए अध्याय की भूमिका लिखी जा चुकी है।

मंत्री के आगे वज़ीर –
इन दिनों कैबिनेट का असली कंट्रोल एक ऐसे मंत्री के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है, जिसके सरकारी बंगले पर सुबह से शाम तक अफसरों की आवाजाही लगी रहती है। कई अहम प्रशासनिक फैसलों की दिशा यही तय होती है। संबंधित मंत्री ने कभी अपनी अलग राजनीतिक लॉबी खड़ी नही की। लेकिन नौकरशाही में उनकी पकड़ इतनी मजबूत बताई जाती है कि कई वरिष्ठ आईएएस अधिकारी उन्हें अपना सबसे भरोसेमंद मानते हैं। नतीजा मंत्रालयों में एक समानांतर व्यवस्था खड़ी हो गई है। हालात यह है कि मंत्री अपने लेटरहेड पर लगातार अनुशंसा पत्र लिख रहे हैं, फाइलों पर हस्ताक्षर कर रहे हैं, लेकिन फाइलें आगे नहीं बढ़ रहीं। मंत्रालयों में फाइलों का ढेर बढ़ता जा रहा है और जनता यह समझ नहीं पा रही कि आखिर मंत्री के आदेश का असर क्यों नहीं दिख रहा। कई विभागों में मंत्री के अधीन बैठे सचिव या वरिष्ठ अधिकारी हर महत्वपूर्ण फाइल पर पहले अपने विशेष बैच के प्रभावशाली सत्ता केंद्र से अनौपचारिक सहमति लेते हैं। हरी झंडी मिलने के बाद ही फाइल आगे बढ़ती है। यानी निर्णय की औपचारिक मुहर मंत्री लगाते हैं, लेकिन वास्तविक मंजूरी कहीं और से आती है। यह किसी एक मंत्री की परेशानी नहीं है। कई मंत्री निजी बातचीत में फाइलों के अटकने और विभागीय नियंत्रण सीमित होने की शिकायत करते दिखाई देते हैं। राजनीतिक जिम्मेदारी मंत्रियों की है, लेकिन प्रशासनिक लगाम किसी और के हाथ में है। सबसे दिलचस्प चर्चा उस सरकारी बंगले को लेकर है, जो कभी मुख्य सचिव का आधिकारिक निवास हुआ करता था। आज वह बंगला केवल एक आवास नहीं, बल्कि प्रभाव और समन्वय का ऐसा केंद्र बन चुका है, जहां से कई प्रशासनिक समीकरण तय होते हैं। क्या सरकार वही चलाता है, जिसके पास संवैधानिक अधिकार हैं, या फिर वह, जिसके पास व्यवस्था की असली चाबी है?

गौठान की ज़मीन खेल किसके इशारे पर?
सरकारी ज़मीनों को लेकर एक नया खेल सत्ता के गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। सवाल गौठान और चारागाह जैसी सार्वजनिक भूमि का है, जिनका उद्देश्य स्पष्ट है और जिनके उपयोग को लेकर नियम भी तय हैं। बाउजूद इसके महासमुंद और रायगढ़ में गौठान की भूमि को निजी कंपनी गोदावरी को सौप दिया गया। जबकिं गौठान की भूमि का उपयोग बदलना कोई सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया, सक्षम स्वीकृतियां और पारदर्शी आवंटन आवश्यक माने जाते हैं। क्या इसमे सभी वैधानिक औपचारिकताओं का पालन हुआ? क्या निर्णय पूरी पारदर्शिता के साथ लिया गया? और यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप हुआ, तो फिर इतने सवाल क्यों खड़े हो रहे हैं? इस पूरे प्रकरण के पीछे वही छोटे कद पांचवी मंजिल वाले साहब और चांदी की चमक वाले कुमार साहब की भूमिका बताई जा रही है। बताया जा रहा है कि गौठान की भूमि के लिए 15 करोड़ का लेनदेन भी हुआ है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि इसका जवाब दस्तावेज़ देंगे या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा। चूँकि सरकारी ज़मीन का मामला केवल ज़मीन का नहीं होता, जनता के भरोसे का भी होता है। इसलिए जवाब भी उतने ही स्पष्ट होने चाहिए, जितने स्पष्ट नियम हैं।

कीर्तन, सारथी और ख़ामोश फाइलें…
मेडम-सर के सारथी इन दिनों फिर चर्चाओं में हैं। कहते हैं, इन्होंने 19 साल के करियर में ऐसा कीर्तन साधा कि मुद्रा मीनार से लेकर नई राजधानी तक बेशकीमती ज़मीनों के मालिक बन बैठे। पत्नी के नाम पर निवेश का ऐसा ताना-बाना बुना कि उसकी गूंज अब राजधानी के गलियारों तक सुनाई देने लगी है। जहां-जहां इनकी तैनाती रही, वहां प्रशासनिक फैसलों से ज्यादा उनके कीर्तन की चर्चा होती रही।गलियारों में एक तंज भी खूब सुनाई देता है बाप भले गरीब हो, लेकिन ससुर करोड़पति होना चाहिए। कहते हैं, साहब ने इस सूत्र को इतनी शिद्दत से अपनाया कि आज उनकी संपत्ति की चर्चा ससुराल की हैसियत से भी आगे निकल गई। जो जीवनसाथी में भी कारोबार की संभावना तलाश ले, उसके पेशेवर हुनर पर भला कौन सवाल उठाए! हाल ही में एक कबाड़ कारोबारी पर कार्रवाई ने खूब सुर्खियां बटोरीं। छापे की शुरुआत तो तेज रही, लेकिन कुछ ही दिनों में मामला ठंडा पड़ गया। अब सवाल यह है कि अनियमितताएं सचमुच खत्म हो गईं या फिर फाइलों का रास्ता ही बदल गया? इधर, जिस जिले को संस्कारों की धरती कहा जाता है, वहां चाकूबाजी, गोलीबारी, अवैध शराब और महिलाओं व नाबालिग बच्चियों से जुड़े गंभीर अपराध लगातार सुर्खियों में रहे। लेकिन इन सबके बीच भी कीर्तन की लय नहीं टूटी। यही कीर्तन अब मैडम-सर का सारथी बन चुका है। राज्य पुलिस सेवा से आईपीएस बनने की मंज़िल सामने है, इसलिए सुर, ताल और साधना पूरे समर्पण से जारी है। अब देखना यह है कि यह कीर्तन केवल पदोन्नति तक पहुंचता है, या कभी जवाबदेही की चौखट पर भी सुनाई देगा।

दान, दक्षिणा और राम की नगरी
अयोध्या केवल एक शहर नहीं, करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। श्रद्धा की वह धरती, जहाँ इसी आस्था के भरोसे भव्य राम मंदिर खड़ा हुआ। रोज़ लाखों श्रद्धालु आते हैं, करोड़ों रुपये का चढ़ावा चढ़ता है। लेकिन जब उसी दान-दक्षिणा पर सवाल उठते हैं, तो चोट किसी खाते पर नहीं, सीधे आस्था पर लगती है। अब ज़रा राम के ननिहाल आइए। वीआईपी रोड पर बना एक भव्य मंदिर भी इन दिनों उतनी ही धीमी, लेकिन उतनी ही दिलचस्प चर्चाओं में है। कहते हैं, वनवासी राम के नाम पर चंदा जुटाने के इतने रास्ते निकाले गए कि लोग दान देते रहे और एक यहाँ बैठे भाई साहब की किस्मत चमकती चली गई। लोग दबी ज़ुबान में कहते हैं कि मंदिर जितना ऊँचा बना, उतनी ही ऊँची कुछ लोगों की हैसियत भी हो गई। लक्ष्मी आई तो मानो विष्णु की कृपा भी साथ चली आई। अफसरों का आना-जाना, ट्रांसफर-पोस्टिंग, सप्लाई, रसूख… सब कुछ मानो रामकाज का हिस्सा हो गया। राम की कृपा का प्रसाद भाई साहब के रिश्तेदारों तक भी पहुँचा। पहले भतीजों को सेट किया गया। और विकलांगता का प्रमाणपत्र भी बन गया। अयोध्या की गूँज जब दूर तक सुनाई देती है, तो उसकी प्रतिध्वनि दूसरे मंदिरों तक भी पहुँचती है। क्योंकि मंदिर पत्थरों से नहीं, विश्वास से बनते हैं। और जब दान पर सवाल उठता है, तो हिसाब रुपये का नहीं, आस्था का माँगा जाता है। यही हिसाब अब लोग उस भाई साहब से भी पूछने लगे हैं।

राहुल की रफ़्तार, कांग्रेस की तलाश
राष्ट्रीय राजनीति में राहुल गांधी की स्वीकार्यता पहले की तुलना में बढ़ती दिखाई दे रही है। लेकिन क्या छत्तीसगढ़ कांग्रेस इस माहौल का राजनीतिक लाभ उठा पाएगी, या फिर एक बार फिर वही पुरानी कहानी दोहराई जाएगी? अगर कांग्रेस को राज्य में अपनी जमीन मजबूत करनी है, तो केवल चेहरा नहीं, संगठन की सोच भी बदलनी होगी। प्रदेश अध्यक्ष को लेकर चल रही रस्साकशी इसी बदलाव की दिशा तय करेगी। दावेदार कई बताए जा रहे हैं।कहीं बाबा के नाम की चर्चा है, कहीं युवा चेहरे के रूप में देवेंद्र यादव का जिक्र, तो कहीं उमेश पटेल को लेकर अटकलें हैं। वहीं यह भी कहा जा रहा है कि पार्टी पूरी तरह नए चेहरे की तलाश में है। इन्हीं चर्चाओं के बीच एक नाम फिर से धीरे-धीरे उभर रहा है मोहन मरकाम।आदिवासी अंचल से आने वाले मरकाम पहले भी प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। संगठन की पकड़, कार्यकर्ताओं से संवाद और सियासी संतुलन उनकी ताकत मानी जाती है। उनके कार्यकाल में कांग्रेस को चुनावी हार जरूर मिली, लेकिन संगठन के भीतर उनकी छवि अपेक्षाकृत बेदाग मानी जाती है। अब देखना यह है कि कांग्रेस पुराने समीकरणों पर भरोसा करती है, किसी युवा चेहरे पर दांव लगाती है, या फिर संगठन को साधने के लिए एक बार फिर अनुभवी हाथों की ओर लौटती है। क्योंकि 2028 की राह, 2026 के फैसलों से ही होकर गुजरेगी।

यक्ष प्रश्न –

1 – महिलाओं और बाल विकास विभाग की एक शाखा के लिए वित्त विभाग ने सिर्फ ₹2,000 का बजट… आखिर क्यों?

2 – क्या जंगल विभाग के सेवानिवृत्त ‘लोमड़ी’ को पुनर्स्थापना के लिए संघ का साथ मिल रहा है?

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