अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

दिल नए पते पर, मोबाइल पुराने ढर्रे पर!
कहते हैं कि दिल का तबादला किसी सरकारी आदेश का मोहताज नहीं होता। जब आना होता है तो आ ही जाता है। यह कहानी भी एक ऐसे ही कलेक्टर साहब की है, जिनका दिल रचनाओं से निकलकर नए पते पर शिफ्ट हो गया था। पुरानी रचना, उसी रचनाओं के किस्सों के साथ, रचना का अध्याय समाप्त हो चुका था। लेकिन नई पटकथा ने साहब का पूरा भांडा फोड़ दिया। इस बार हीरो का हार या महंगे तोहफों की चर्चा नहीं है, बल्कि एक संविदा नियुक्ति गलियारों में नई कहानी लिख रही थी। इधर सब कुछ बढ़िया चल रहा था। बाहर से तस्वीर शांत थी, अंदर से व्यवस्था चुस्त। कलेक्टर साहब भी आश्वस्त थे कि इस बार किला अभेद्य है। लेकिन तकनीक ससुरी भी बड़ी निर्दयी निकली। हेलमेट, गोपनीयता और सारी सावधानियों को धता बताते हुए सीधे गृह मंत्रालय के हाथ सबूत थमा आई।दरअसल हुआ यूं कि कलेक्टर साहब के मोबाइल में चल रही दिलफेंक चैटिंग पर घर के “गृह मंत्रालय” की नजर पड़ गई। बस फिर क्या था! जिस मोबाइल को साहब निजी संपत्ति समझ रहे थे, वह अचानक उच्च स्तरीय जांच के दायरे में आ गई। प्रत्यक्षदर्शी बताते है कि गृह मंत्रालय का पारा इतना चढ़ा कि तत्काल अंग्रेजी में आदेश जारी हुआ “You Bloody Scoundrel!”
बस, इस एक वाक्य ने साहब की सारी प्रशासनिक दक्षता को कुछ मिनटों के लिए निलंबित कर दिया। मामला घरेलू असंतोष से आगे बढ़कर थाने की दिशा पकड़ता, उससे पहले संकटमोचक मंडली मैदान में उतर आई। सबसे पहले दया के नंद पहुंचे, जिनकी विशेषज्ञता हर विवाद में समझौते का रास्ता निकालना बताई जाती है। फिर आए राजू महाराज, जिन्हें हाल ही में किनारे बिठा दिया गया है, लेकिन संकट प्रबंधन में उनकी उपयोगिता अभी भी बनी हुई है। तीसरे थे कुमार साहब, जिनका नाम गुप्त सूचनाओं की दुनिया में सम्मान से लिया जाता है। फिर चला रात भर मान-मनौव्वल, सफाई, समझाइश, भविष्य में सुधार के वादे और भावनात्मक पुनर्वास की गाथा। आखिरकार मामला शांत हुआ और संकट टल गया। लेकिन सवाल अब भी वही है। जब दिल नए पते पर पहुंच चुका था, व्यवस्थाएं सुचारू थीं और कहानी बिना किसी व्यवधान के आगे बढ़ रही थी, तो फिर मोबाइल पर चैटिंग का अतिरिक्त जोखिम आखिर क्यों? शायद इसका जवाब सदियों पहले बिहारी दे चुके हैं।
“अमिय हलाहल मद भरे, सेत स्याम रतनार। जियत-मरत झुकि-झुकि परत, जिहि चितवन इकबार॥”
अर्थात कुछ नजरों में अमृत भी होता है, विष भी और नशा भी। जो एक बार उस चितवन के प्रभाव में आ जाए, वह बार-बार उसी ओर खिंचा चला जाता है। लगता है कलेक्टर साहब भी उसी साहित्यिक परंपरा के आधुनिक साधक निकले। आखिर इश्क और प्रशासन में एक बुनियादी फर्क होता है। प्रशासन में फाइलें बंद हो सकती हैं, रिकॉर्ड दुरुस्त हो सकते हैं और नोटशीट बदली जा सकती है। लेकिन इश्क…इश्क छुपाए नहीं छुपता। और जब उसका खुलासा होता है, तो सबसे पहली जांच एजेंसी घर का गृह मंत्रालय ही बनता है। बाकी एजेंसियां तो बाद में आती जाती रहती हैं। इन साहब की दिलफेंक कहानी लंबी है कॉलम कम पड़ जायेगा बाकी किस्सा फिर कभी –

संकटमोचन खुद संकट में –
अब आगे सुनिए। यह जो संकटमोचन दया के नंद साहब हैं, जिनकी विशेषज्ञता हर विवाद और मसले का कोई न कोई रास्ता निकाल लेने में बताई जाती है, वे इन दिनों खुद एक ऐसे मसले में उलझे बताए जाते हैं जिसका रास्ता अभी तक किसी को नहीं मिला है। चर्चा है कि उनके परिवार से जुड़ा एक मामला लंबे समय से समाधान की प्रतीक्षा में है। कथित तौर पर उनकी धर्मपत्नी का मोबाइल नंबर सार्वजनिक हो गया और उसके बाद अनचाहे तथा आपत्तिजनक कॉलों का सिलसिला शुरू हो गया। बताया जाता है कि इसकी शिकायत भी की गई, लेकिन अब तक न कॉल करने वाले का स्पष्ट पता चल पाया है और न ही मामला किसी निर्णायक नतीजे तक पहुंचा है। यहीं से कहानी व्यंग्य का रूप ले लेती है। जो व्यवस्था मोबाइल की लोकेशन से लेकर मिनटों में आधी दुनिया का पता लगाने का दावा करती है, वह एक कथित फोन कॉल के स्रोत तक पहुंचने में क्यों जूझ रही है? सवाल किसी एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था का है। आखिर जब एक प्रभावशाली अधिकारी से जुड़ा मामला भी लंबे समय तक अनसुलझा दिखाई दे, तो आम नागरिक यह सोचने को मजबूर हो जाता है कि उसकी शिकायत की फाइल किस रफ्तार से चलती होगी। जिस सिस्टम से जनता उम्मीद करती है कि वह उसे सुरक्षा देगा, वही सिस्टम कभी-कभी अपने ही लोगों के सवालों का जवाब तलाशता नजर आता है। कहते हैं न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए, होता हुआ भी दिखना भी चाहिए। और जब जवाब मिलने में देर होती है, तो सवाल खुद-ब-खुद बढ़ने लगते हैं।

तस्वीरें गायब, सवाल बाकी!
पिछले हफ्ते कॉलम में जिस कीर्तन बाबू का जिक्र हुआ था, उसके बाद एक दिलचस्प घटनाक्रम देखने को मिला। कॉलम प्रकाशित होते ही एडिशनल साहब के सोशल मीडिया खाते अचानक तपस्वी मुद्रा में चले गए। जो तस्वीरें कल तक विदेश यात्राओं, आलीशान दफ्तरों और प्रभावशाली संगतों की गवाही देती थीं, वे देखते-देखते गायब हो गईं। अफसरशाही में इसे आत्ममंथन कम और डिजिटल सफाई अभियान ज्यादा माना जा रहा है। अब आगे सुनिए। बीते कुछ महीनों में जांच एजेंसियों की नजरें इस कीर्तक बाबू के इर्द-गिर्द घूम रही थीं। फाइलें खुलीं, सूचनाएं जुटीं और कार्रवाई की आहट भी सुनाई दी। लेकिन ऐन मौके पर फिर वही पुराना तर्क सामने आ गया कि इससे विभाग और सरकार की बदनामी होगी। सवाल यह है कि यदि किसी पर कार्रवाई होती है तो बदनामी भ्रष्टाचार की होती है या कार्रवाई करने वाले सिस्टम की? यह कोई पहला मौका नहीं है जब बदनामी का तर्क ढाल बना हो। पहले भी महादेव सट्टा एप मामले में केंद्रीय जांच एजेंसियों ने दबिश दी थी। गाड़ियां पहुंचीं, दस्तावेज खंगाले गए, लेकिन अंतिम परिणाम किस फाइल में दब गया, यह आज तक किसी को ठीक से पता नहीं चल पाया। इधर राज्य पुलिस सेवा के इस कीर्तन बाबू का करियर भी कम दिलचस्प नहीं है। सत्ता बदलती रही, चेहरे बदलते रहे, लेकिन बाबू की अनुकूलता कभी नहीं बदली। कल जिन दरबारों में उपस्थिति जरूरी मानी जाती थी, आज दूसरे दरबारों में भी वही आत्मीयता दिखाई देती है। चर्चा अब भी मुद्रा मीनार की है, जहां वर्षों से निवेश, साझेदारी और प्रभाव की कहानियां कानाफूसी में घूमती रही हैं। लोग पूछ रहे हैं कि एक सरकारी अफसर की सेवा अवधि के साथ-साथ संपत्तियों की रफ्तार इतनी तेज कैसे हो गई? राजधानी का हाई-प्रोफाइल ऑफिस, नया रायपुर की संपत्तियां और रिश्तेदारों के नाम पर चल रही बताई जाने वाली गतिविधियां आखिर किस राग और किस ताल पर बढ़ती रहीं? मजेदार बात यह है कि इन सवालों के जवाब लगभग सभी के पास हैं, बस आधिकारिक रिकॉर्ड तक पहुंचते-पहुंचते जवाब मौन धारण कर लेते हैं। इंटेलिजेंस जानती है, जांच एजेंसियां जानती हैं, विभाग जानता है और गलियारे तो वर्षों से जानते ही हैं। फिर भी हर बार कहानी वहीं पहुंच जाती है समय उचित नहीं है। फिलहाल मुद्रा मीनार शांत है, तस्वीरें गायब हैं, फाइलें शायद अभी भी कहीं चल रही हैं और कीर्तन भी जारी है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार सुर थोड़ा धीमा जरूर हुआ है, लेकिन बंद अभी भी नहीं हुआ। क्योंकि सत्ता के गलियारों में कहा जाता है कि कुछ लोग पद से नहीं, अपने कीर्तन से पहचाने जाते हैं। और कीर्तन बाबू अभी भी सुर में हैं।

अपराध कम हुए या भौकाल बढ़ा?
राजधानी में कमिश्नरेट व्यवस्था को चार महीने पूरे हो चुके हैं। दावा था कि अपराध पर लगाम कसेगी, लेकिन इन महीनों में गैंगवार, हत्या, चाकूबाजी, स्नेचिंग और नशे के मामलों ने लगातार सुर्खियां बटोरी हैं। एमडी जैसे मादक पदार्थों की खेप भी पकड़ी गई, कार्रवाई भी हुई, लेकिन जनता अब भी पूछ रही है अपराधी ज्यादा डरे या सोशल मीडिया की पोस्ट ज्यादा बढ़ी? राजधानी की सुरक्षा की जिम्मेदारी कई वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों के हाथ में है। व्यवस्था पहले से ज्यादा शक्तिशाली है, फिर भी कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल कायम हैं। गलियारों में चर्चा है कि एक डीसीपी साहब अपराध नियंत्रण से ज्यादा सूचना और समीकरणों के खेल में व्यस्त हो गए। शाम ढलते ही उनका दरबार शेखु के आनंदम दरबार में सजता है, जहां अपराध के आंकड़ों से ज्यादा संपर्को और समीकरणों का गणित समझाया जाता है। वहीं अक्सर जांचलोक के एक साहब भी मौजूद बताए जाते हैं। इधर एक और चर्चा खूब चली। कमिश्नरेट व्यवस्था के भीतर ही समानांतर क्राइम ब्रांच जैसी व्यवस्था खड़ी कर दी गई। एक थाना प्रभारी को ऐसी भूमिका में बैठाया गया कि विभाग के भीतर ही भौंहें तन गईं। मामला इतना चर्चित हुआ कि आखिरकार थाना प्रभारी साहब को हटाना पड़ा। लेकिन सवाल यह है कि जिस फैसले पर इतना हल्ला मचा, उसकी जिम्मेदारी किसकी थी? गलियारों की मानें तो थाना प्रभारी हट गए, मगर साहब सिर्फ फटकार खाकर आगे बढ़ गए। उधर देश वीआईपी संस्कृति खत्म करने की बात करता है, इधर डीसीपी साहब का काफिला और प्रोटोकॉल भी चर्चा का विषय बना रहता है। निजी दौरा हो या सार्वजनिक कार्यक्रम, भौकाल में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। जनता का सवाल सीधा है कि कमिश्नरेट का असर अपराधियों पर दिखना चाहिए या प्रोटोकॉल पर? चार महीने बाद राजधानी यही पूछ रही है कि कानून का डर आखिर किसे है अपराधी को या आम आदमी को?

डीजीपी मिल गए, होम गार्ड कहाँ गया?
16 मई 2026 को अरुण देव गौतम को पूर्णकालिक डीजीपी बना दिया गया। आदेश साफ है, लेकिन एक छोटा सा सवाल बड़े सवाल खड़े कर रहा है कि आखिर होम गार्ड अब किसके पास है? प्रभारी डीजीपी रहते हुए उनके पास होम गार्ड, सिविल डिफेंस और फायर सर्विसेज का भी प्रभार था। लेकिन नए आदेश में सिर्फ डीजीपी (पुलिस बल प्रमुख) का उल्लेख है। होम गार्ड का कहीं जिक्र नहीं।
यहीं से रूल ऑफ बिजनेस की चर्चा शुरू होती है। शासन में केवल काम होना पर्याप्त नहीं होता, यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि काम किस अधिकारी के अधिकार क्षेत्र में हो रहा है। यदि प्रभार जारी है तो उसका आदेश कहाँ है, और यदि नहीं है तो फिर वर्तमान में होम गार्ड की फाइलों पर अंतिम अधिकार किसके पास है? दिलचस्प बात यह है कि कामकाज लगातार चल रहा है। लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था में कई बार पूरा विवाद किसी फैसले से नहीं, बल्कि एक आदेश की अनुपस्थिति से खड़ा हो जाता है। फिलहाल सवाल सिर्फ इतना है कि डीजीपी तो मिल गए, लेकिन होम गार्ड आखिर गया कहाँ?

ठेला, ताला और जांच स्वास्थ्य विभाग की कहानी –
पिछले दो वर्षों में स्वास्थ्य विभाग अपनी उपलब्धियों से ज्यादा विवादों के कारण चर्चा में रहा। कहीं जशपुर में बुजुर्ग महिला को हाथठेले पर अस्पताल पहुंचाने का वीडियो वायरल हुआ, तो कहीं शव वाहन और मरीज परिवहन व्यवस्था पर सवाल उठे। जनता पूछती रही कि योजनाएं कागजों में दौड़ रही हैं, फिर मरीज सड़क पर क्यों दौड़ रहे हैं? राजधानी के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में लगभग 17 करोड़ रुपये की PET-CT मशीन वर्षों तक बंद पड़ी रही। मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा और अदालत को भी सवाल उठाने पड़े कि आखिर जनता के पैसे से खरीदी गई मशीन मरीजों के काम कब आएगी। उधर CGMSC, हमर लैब और रिएजेंट खरीदी मामलों में EOW-ACB की जांच पहुंची। एफआईआर हुई, गिरफ्तारियां हुईं, चार्जशीट दाखिल हुई और सरकारी खरीद व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े हुए। कोंडागांव में NHM फंड के कथित दुरुपयोग के आरोपों के बीच जांच टीम को CMHO कार्यालय तक सील करना पड़ा। स्वास्थ्य विभाग से जुड़े सप्लायरों पर GST कार्रवाई भी सुर्खियों में रही। मितानिनों और NHM कर्मियों के आंदोलन ने अलग ही तस्वीर दिखाई। गांव-गांव स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ मानी जाने वाली व्यवस्था खुद सड़क पर उतर आई। सवाल उठा कि जब पहली कड़ी ही असंतुष्ट है तो अंतिम छोर तक सेवा कैसे पहुंचेगी?दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे दौर में अधिकारी बदले, तबादले हुए, सीजीएमएससी में कार्रवाई हुई, संचालनालय में फेरबदल हुआ, लेकिन विभाग की सबसे महत्वपूर्ण कुर्सी पर बैठे सचिव साहब की कुर्सी टस से मस नहीं हुई। सचिव साहब की पहचान एक ईमानदार अधिकारी की बताई जाती है। चर्चाएं तो यहां तक हैं कि वे प्रतीकात्मक रूप से एक रुपये वेतन लेने के लिए जाने जाते हैं। स्वास्थ्य भवन के गलियारों में यह चर्चा भी सुनाई देती है कि उनका परिवार दिल्ली में रहता है और उनके दिल्ली प्रवास नियमित रहते हैं। यह उनका निजी विषय हो सकता है, लेकिन विभाग के आलोचक पूछते हैं कि जब स्वास्थ्य विभाग लगातार विवादों और जांचों के केंद्र में हो, तब जवाबदेही की चर्चा शीर्ष स्तर तक क्यों नहीं पहुंचती? आखिर प्रशासन का पुराना नियम है कि सफलता का श्रेय ऊपर जाता है, तो विफलताओं के सवाल भी वहीं पहुंचने चाहिए। दो वर्षों में जांचें बहुत हुईं, समितियां भी बहुत बनीं, लेकिन जनता आज भी सिर्फ इतना जानना चाहती है कि स्वास्थ्य व्यवस्था बेहतर हुई या सिर्फ फाइलों का वजन बढ़ा?

महासमुंद में कौन चला रहा प्रशासन?
महासमुंद में कृषि विभाग और जिला प्रशासन के बीच चल रही खींचतान अब खुले विवाद का रूप लेती दिखाई दे रही है। यूरिया और खाद कारोबार से जुड़े मामले में कृषि विभाग की जांच के बाद भी कोई ऐसा ठोस आधार सामने नहीं आया, जिस पर FIR दर्ज की जा सके। इसके बावजूद कार्रवाई की मांग और दबाव का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा। इसी प्रकरण में पहले दो कृषि विस्तार अधिकारियों का निलंबन हुआ और अब कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों पर भी कार्रवाई की तलवार लटकने की चर्चा है। इससे कृषि महकमे में असहजता बढ़ी है। सवाल उठ रहा है कि यदि जांच रिपोर्ट किसी अनियमितता की पुष्टि नहीं करती, तो फिर कार्रवाई का आधार क्या है? विवाद केवल कृषि विभाग तक सीमित नहीं है। जिले में यह चर्चा भी तेज है कि कुछ प्रभावशाली कारोबारी समूहों और प्रशासनिक फैसलों को लेकर लगातार विरोधाभासी स्थितियां बन रही हैं। एक ओर किसानों के हित और कालाबाजारी रोकने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर जांच करने वाले अधिकारियों को ही कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। मामला अब एक FIR या निलंबन से आगे बढ़ चुका है। असली सवाल यह है कि शासन व्यवस्था में अंतिम महत्व जांच रिपोर्ट का है या फिर किसी अधिकारी की मंशा का? महासमुंद में पैदा हुआ यह विवाद आने वाले दिनों में प्रशासनिक जवाबदेही, अधिकारों की सीमा और निर्णय प्रक्रिया पर बड़ी बहस का कारण बन सकता है। सरकार के लिए भी यह परीक्षा है कि वह नियमों के साथ खड़ी दिखाई देती है या विवादों के साथ।

यक्ष प्रश्न 

1 – बस्तर आईजी बनने का सम्मान किसको मिलने वाला है, ?

2 – क्या पुर के अंदर मंत्रिमंडल के अंदर दिखने वाले हैं? 

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