अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

जांचपुराण
एक साहब हैं…जिनकी पूरी पहचान जांच से है। फाइल उनके टेबल पर पहुंच जाए तो बड़े-बड़े लोगों की धड़कन बढ़ जाती है। लेकिन इस बार जांच खुद साहब के इर्द गिर्द घूम रही है। बड़ा सवाल यह भी है कि जांच वाले साहब की जांच आखिर करेगा कौन? लंबे समय से एक ही कुर्सी पर जमे साहब से जब भी मुलाकात हो, उनका एक ही तकिया-कलाम सुनाई देता है कि बस… जल्दी दिल्ली जाना है। यह जल्दी कब आएगी, इसका इंतजार तो वर्षों से है, लेकिन दिल्ली जाने की चर्चा के बीच साहब के नए-नए किस्से जरूर बाजार में सुनाई देते रहते है। अंदरखाने की खबर है कि साहब ने महासमुन्द में 34 एकड़ जमीन खरीदी है। दिलचस्प बात यह है कि जमीन उनके नाम से खरीदी गई है जहाँ से साहब आते है आईडी कार्ड में बक्सर के उनके ही पुराने दोस्तों का नाम है। चाय की हर मेज पर कहानी का नया संस्करण सुनने को मिल जाता है। लेकिन विडंबना देखिए कि जिन साहब की कलम दूसरों के मामलों में सबसे पहले चलती थी, आज उन्हीं को लेकर सबसे ज्यादा सवाल पूछे जा रहे हैं। बाकी साहब तो आज भी मुस्कुराकर वही कहते हैं बस…जल्दी दिल्ली जाना है। मगर दफ्तर वाले ठहाका लगाकर जवाब देते हैं कि साहब, दिल्ली तो कभी भी चले जाइएगा… पहले ये जमीन वाली वाले अध्याय को शांत तो कर लीजिए –

मोहलत 6 महीने की –
एक साहब हैं बड़े अफसर हैं हर बार तब याद आते हैं जब तबादला सूची आने वाली होती है। कहते हैं, लिस्ट बने और साहब की मोहलत न बढ़े, ऐसा भला कैसे हो सकता है! छह महीने ऐसे मांगते हैं, जैसे सरकारी सेवा का कोई जन्मसिद्ध अधिकार हो। जिला बदलने की चर्चा शुरू होती है, उधर साहब की फाइल में फिर छह महीने जुड़ जाते हैं। लोग मज़ाक में कहते हैं कि शासन तबादले की सूची नहीं निकालता, पहले साहब से पूछता है और कितना समय चाहिए? इधर जिले में अपराधों के आंकड़े, हत्या, चाकूबाजी अदालतो की दहलीज पर है, मगर साहब की कुर्सी पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। गलियारों में इसका भी अपना-अपना गणित है। हर किसी के पास वजह अलग है, लेकिन नतीजा यह साहब यथावत। अब जब जमीन की बात छिड़ी ही है, तो सरकारी गलियारों में एक और किस्सा भी खूब घूम रहा है। कहते हैं, साहब को छह महीने इसलिए भी चाहिए कि कुछ अधूरे काम पूरे हो जाएं और कुछ किस्तें भी। जमीन बलौदाबाजार में बताई जाती है जहाँ साहब ने अपनी धर्मपत्नी के नाम पर एक अच्छी खासी प्रॉपर्टी में निवेश किया है। हर बार जो 6 महीने की मोहलत मिलती है उसमें एक निवेश तैयार हो जाता है। बहरहाल लिस्ट आने वाली है इस बार तबादला होगा या फिर एक और मोहलत मिलेगी, इसका इंतज़ार सबको है। साहब को भी… और उनके शुभचिंतकों को भी।

रील, रुतबा और रिश्ते…
कभी पहचान पद और परिचय से बनती थी, लेकिन अब सोशल मीडिया की रील बहुत कुछ कहती है। ऐसी ही एक प्रोफ़ाइल इन दिनों चर्चा में है। प्रोफ़ाइल की बायो में सलीके से लिखा है Civil Servant और ठीक नीचे Travel Content Creator। जिस प्रोफ़ाइल पर वीडियो अपलोड होते हैं, उसमें Brand Promotions, Ad Films, Corporate Summits, Product Launches और Event Management जैसी कमर्शियल सेवाएं भी सूचीबद्ध हैं। फिर शुरू हो जाता है कैमरे, ड्रोन, सिनेमैटिक शॉट्स और एक कमर्शियल प्रोडक्शन हाउस का सिलसिला, जहां हर रील में वही चेहरा और वही ब्रांड दिखाई देता है। रीलों का दौर चल रहा है, तो सिर्फ सिविल सेवा वाली वाइफ ही नहीं, मंत्री पति भी कभी खेत में, कभी सड़क किनारे, तो कभी लग्जरी कार में बैठकर भोजन करते हुए रीलों के जरिए लगातार अपडेट रहते हैं। लेकिन जब इसी डिजिटल फ्रेम में सरकारी सेवा, कमर्शियल ब्रांडिंग और सत्ता से जुड़े रिश्ते एक साथ नजर आने लगें, तो चर्चा स्वाभाविक हो जाती है। संयोग देखिए, एक तरफ घर का एक हिस्सा सरकारी सेवा में है, तो दूसरी तरफ घर का दूसरा हिस्सा राज्य के सबसे प्रभावशाली मंत्रालयों में से एक वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहा है। ऐसे में सवाल उठना भी स्वाभाविक है। कैमरा सिर्फ यादें रिकॉर्ड कर रहा है या फिर प्रभाव भी? क्योंकि जहां सत्ता का रुतबा और कमर्शियल ब्रांड एक साथ दिखने लगें, वहां चर्चा अपने आप शुरू हो जाती है। बाकी… सोशल मीडिया के इस दौर में कैमरा सिर्फ दृश्य नहीं रिकॉर्ड करता, धारणाएं भी बनाता है। अब पहचान सिर्फ नेमप्लेट से नहीं, कभी-कभी एक रील से भी तय होने लगी है।

मुद्रा मीनार की चौथी मंज़िल –
राजधानी के वीआईपी रोड पर एक इमारत है मुद्रा मीनार नाम ही ऐसा कि लगता है जैसे इमारत बनने से पहले ही उसके भविष्य की पटकथा लिख दी गई हो। कहते हैं, इस इमारत के हर फ्लोर की अपनी अलग महिमा है। कोई दफ्तरों के लिए जाना जाता है, कोई कारोबार के लिए, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चाएं चौथी मंजिल की होती हैं। यहां समय का गणित थोड़ा अलग चलता है। लोग कहते हैं, विमान बाद में उड़ता है और मुद्रा पहले पहुंच जाती है। दिल्ली हो या मुंबई, दूरी किलोमीटर में नहीं, संपर्कों में नापी जाती है। एयरपोर्ट पास है, पार्किंग आसान है, लिफ्ट सीधी चौथी मंजिल तक जाती है। यहां सिर्फ कारोबारी नहीं आते बड़े अफसरों के प्रतिनिधि सत्ता के गलियारों से जुड़े कई चेहरे भी इस मंजिल का रास्ता अच्छी तरह जानते हैं। इधर एक मंत्री जी भी इन दिनों सुर्खियों में हैं। उनका विभाग जनता की सेहत सुधारने का दावा करता है, लेकिन उनकी अपनी कुर्सी की सेहत खासा बिगड़ी हुई है। कुर्सी को विटामिन कमी हो गई लिहाजा इलाज के लिए राजधानी से लेकर दिल्ली तक नुस्खे आजमाए जा रहे हैं। सुनने में आया कि दिल्ली से बुलावा आया तो मंत्री जी अगली उपलब्ध फ्लाइट से रवाना हो गए। मगर उड़ान भरने से पहले ही शुभचिंतकों ने भरोसा दिला दिया साहब, आप बाद में पहुँचेगे मुद्रा व्यवस्था पहले पहुँच जाएगी। अब दिल्ली में मुलाकात का नतीजा क्या निकलता है, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन सत्ता के गलियारों में इतना जरूर कहा जा रहा है कि राजनीति में कभी-कभी कुर्सी बचाने के लिए तर्क कम और व्यवस्था ज्यादा काम आती है। बाकी… मुद्रा मीनार की चौथी मंजिल की महिमा ऐसी बताई जाती है कि वहां लिफ्ट ऊपर जाती है, लेकिन चर्चाएं सीधे दिल्ली पहुंच जाती हैं।

साइबर का साइबर…
साइबर अपराधों की जांच का सबसे बड़ा आधार होता है भरोसा। लेकिन जब जांच करने वाली टीम पर ही सवाल उठने लगें, तो फिर जांच किस पर छोड़ी जाए? सरगुजा संभाग के रेंज साइबर थाना के एक चर्चित मामले में आखिरकार वही हुआ, जिसकी चर्चा लंबे समय से गलियारों में थी। करीब 33 लाख रुपये की साइबर ठगी का मामला। शेयर मार्केट में पैसा दोगुना करने का झांसा। पीड़ित लगातार आरोप लगाता रहा कि उसे न्याय नहीं मिल रहा। शिकायतें स्थानीय स्तर से लेकर पुलिस मुख्यालय तक पहुंचीं। मामला यहीं नहीं रुका, बल्कि जांच से जुड़े अधिकारियों और स्टाफ के खिलाफ दिल्ली की अदालत में परिवाद भी दायर हो गया। इसके बाद जो हुआ, वही सबसे दिलचस्प है। सरगुजा रेंज के पुलिस महानिरीक्षक ने आदेश जारी कर पूरा प्रकरण रेंज साइबर थाना से हटाकर बलरामपुर पुलिस अधीक्षक को सौंप दिया। आदेश में साफ लिखा गया कि प्रकरण की निष्पक्ष जांच आवश्यक प्रतीत होती है। जब किसी जांच को निष्पक्षता के नाम पर उसी एजेंसी से हटाना पड़ जाए, तो यह अपने आप में कई सवाल छोड़ जाता है। बाकी… पुलिस व्यवस्था में सबसे बड़ी ताकत वर्दी नहीं, उस पर जनता का भरोसा होता है। और जब भरोसे की जांच शुरू हो जाए, तो समझिए मामला सिर्फ एक एफआईआर का नहीं, पूरी व्यवस्था की साख का हो जाता है।

अठारह का हुआ बेटा… और करोड़ों की कंपनी का मालिक भी!
कहीं बच्चे अठारह साल के होते ही वोटर बनते हैं, ड्राइविंग लाइसेंस बनवाते हैं, कॉलेज में एडमिशन लेते है। लेकिन छत्तीसगढ में एक वर्दीधारी साहब का बेटा जो जुम्मा जुम्मा 18 का हुआ वह सीधे करोड़ो की फाइनेस कंपनी का मालिक बन गया। यह नया भारत है, यहां उम्र नहीं, व्यवस्था मायने रखती है। तीन दिन पहले नए रायपुर के एक आलीशान होटल में ऐसी ग्रैंड गाला पार्टी हुई। जहाँ एक हजार से ज्यादा कर्मचारी और लोग शामिल हुए यह बिजनेश मिट थी जिसमे बताया गया यह फाइनेस कंपनी गांव गांव तक पहुँचेगी। यहाँ विदेशी शराब नाच गाना ही नही बल्कि ब्लैक मनी पर थिकरने वालो ने जमकर हुनर दिखाया। संगीत बज रहा था, जाम छलक रहे थे और कुछ लोग भविष्य के निवेश की नई कहानी लिख रहे थे। इस पटकथा के केंद्र में है एक फाइनेस कंपनी जो अचानक चर्चा में आई, बताया जाता है कि यह फाइनेस कंपनी एडीजी स्तर के वर्दीधारी अफ़सर और उसके बेटे की है। बेटा जो बालिग होने के साथ ही सीधे कारोबारी साम्राज्य के शिखर पर पहुंच गया। वर्दीधारी साहब का किस्सा भी कम दिलचस्प नही है, यह वही जो सरकार बदलते ही साइड लाइन लगा दिए गए थे और मूंदड़ा मूंदड़ा करते घूम रहे थे। तत्कालीन सरकार में इनकी पांचों उंगली घी में थी सीपीआर से लेकर परिवहन तक सीपीआर में कई हजार करोड़ खर्च होने बाउजूद जनता ने सरकार को उखाड़ फेंका। बताते है परिवहन में रहते साहब ने कई अवैध नाके खुलवाए और अपनी खुद की ट्रेवल एजेंसी भी खोल ली। इन सब के बाद ED साहब के ठिकानों पर रेड भी कर चुकी है। उस समय की काली कमाई अब फाइनेस में लगाई जा रही है और फाइनेस कंपनी का ऑफिस भी वीआईपी रॉड स्थित एक मॉल में संचालित हो रहा है। कहा यह भी जा रहा है साहब को जल्दी ही एडीजी जेल की जवाबदारी मिलने वाली है और दिल्ली से हरी झंडी भी मिल गई है। सवाल यह है कि इस कंपनी का डारेक्टर कौन है? Enforcement Directorate (ED), Income Tax Department को मामले की जांच करनी चाहिए। जिस अफ़सर पर इतने गंभीर आरोप है जिसपर ED पहले भी रेड कर चुकी है। वह फाइनेस कंपनी की आड़ में मनी लॉन्ड्रिंग की तैयारी है? कंपनी में लगाया गया निवेश किस स्रोत से आया? क्या वह घोषित आय, वैध ऋण या वैध निवेश से हुआ है? यदि नहीं, तो संबंधित एजेंसियों को इसकी जांच करनी चाहिए। अब यह प्रतिभा है, पारिवारिक विरासत है या वित्तीय चमत्कार इसका जवाब शायद वही दे पाएंगे, जिनके पास बैलेंस शीट भी है और जवाबदेही भी।

यक्ष प्रश्न –

1 – क्या पुलिस मुख्यालय में प्रमुख पदों पर परिवर्तन संभावित है?

2 – क्या हैदराबादी का झोला अब भी छत्तीसगढ़ में है, या झोला समेत फ्लाइट पकड़ ली गई?

 

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