अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

250 टन लोहा… आखिर गया कहाँ?
यह कहानी किसी कबाड़ी की दुकान से चोरी हुए सरिए की नहीं है। यह कहानी भिलाई के उस संयंत्र की है, जिसे देश की औद्योगिक रीढ़ कहा जाता है। 250 टन… यह कोई दो-चार ट्रकों का माल नहीं, बल्कि सुनियोजित तरीके से बाहर निकली एक विशाल मात्रा है। इतनी निगरानी के बावजूद 250 टन कीमती लोहे का स्क्रैप फ्लू डस्ट की आड़ में ऐसे बाहर निकला, मानो सिस्टम की आंखों पर ही धूल झोंक दी गई हो। इधर पुलिस की कार्रवाई ने सबको चौंका दिया। मामला सिर्फ 250 टन लोहे का नहीं था, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का था, जिसकी निगरानी में राष्ट्रीय संपत्ति सुरक्षित मानी जाती है। जब इतनी बड़ी मात्रा में स्क्रैप बाहर निकल सकता है, तो सवाल सिर्फ चोरों पर नहीं, चौकीदारों पर भी उठते हैं। एक-एक कर परतें खुलती चली गईं। गिरफ्तारियां हुईं, ट्रांसपोर्ट नेटवर्क जांच के घेरे में आया, अधिकारियों तक कार्रवाई पहुंची, करोड़ों की संपत्ति जब्त हुई, सीबीआई जांच की मांग हुई, बैंक खाते फ्रीज हुए और सुरक्षा मानकों पर सवाल खड़े हुए। क्या इतना बड़ा खेल कुछ लोगों के दम पर संभव था, या फिर सिस्टम की कई कड़ियां सब मिली हुई थी। यह केवल लोहे का हिसाब नहीं, बल्कि जवाबदेही, निगरानी और सिस्टम की विश्वसनीयता की भी बड़ी परीक्षा है।

सिंडिकेटपुराण – भाग 2
आगे सुनिए, कुछ कारोबार लाइसेंस से नहीं, लिहाज़ से चलते हैं। भिलाई के इस संयंत्र में सिंडिकेट की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। यह खेल कोई नया नहीं है, बल्कि चार दशक पुराना है। चेहरे बदलते रहे, ट्रकों के नंबर बदलते रहे, सरकारें बदलती रहीं, अफसर बदलते रहे लेकिन सिंडिकेट का पता वही रहा। इस कहानी में पहले बाप का नाम चलता था, अब बेटे की चोरी गुल खिला रही है। जिसके पास आज ऐसा साम्राज्य, कारोबार और रसूख खड़ा हो गया कि अब उसकी नजर विधायक की कुर्सी पर है। 1500 से ज्यादा गाड़ियों का यह ट्रांसपोर्ट नेटवर्क अब सिर्फ कंपनी नहीं, अपने आप में एक साम्राज्य बन चुका है। इतना बड़ा खेल और इतना बड़ा कारोबार आखिर राजनीति की नजर से कब तक बचता? फिर एक दिन इस रास्ते पर एक सिटिंग विधायक की भी नजर पड़ गई। पहले खेल को समझा गया, फिर उसकी ताकत और कमाई का हिसाब लगाया गया। इसके बाद नेताजी की एक गाड़ी पकड़ी गई और यहीं से सियासत ने रफ्तार पकड़ ली। मामला सोशल मीडिया तक पहुंचा। रोज नए खुलासे हुए, रोज नए सवाल उठे और दबाव बनाने की कोशिशें भी चलती रहीं। खुद को ईमानदार बताने वाले रीलबाज विधायक बरसों पुराने इस खेल को रोज सार्वजनिक मंच पर लाते रहे। लेकिन गलियारों में सवाल आज भी वही है क्या लड़ाई सचमुच भ्रष्टाचार के खिलाफ थी या फिर सिंडिकेट में हिस्सेदारी को लेकर? क्योंकि जब तक खेल बेखौफ चलता रहा, तब तक खामोशी भी बनी रही। शोर तब उठा, जब संतुलन बिगड़ा। बताते हैं कि दो-तीन दिन पहले एक अहम बैठक भी हुई। उसके बाद साहब के तेवर कुछ नरम पड़ते दिखाई दिए। इधर 250 टन लोहा बरामद हो गया, कई चेहरे भी बेनकाब हुए। लेकिन शहर आज भी उसी सवाल का जवाब ढूंढ़ रहा है पुलिस ने सिर्फ मोहरे पकड़े हैं, या शतरंज का असली खिलाड़ी अभी भी बोर्ड के बाहर बैठा अगली चाल का इंतजार कर रहा है?

मुख्तियारनामापुराण
सरकारी घोटालों की सबसे खतरनाक बात रकम नहीं होती, बल्कि वह तरीका होता है जिससे पूरा सिस्टम धीरे-धीरे किसी सिंडिकेट के सामने घुटने टेक देता है। पैरी परियोजना का मामला भी कुछ ऐसा ही दिखाई देता है। पहली नजर में यह ₹14 करोड़ के अतिरिक्त भुगतान का मामला लगता है, लेकिन परतों को समझे तो यह वर्षों तक सरकारी व्यवस्था, डिजिटल पेमेंट सिस्टम, पर्यावरणीय नियम और तकनीकी निगरानी सब पर गंभीर सवाल खड़े करता है। इस पूरे खेल की बुनियाद 2020 में पड़ी। पैरी दाई मुख्य नहर और सीसी लाइनिंग का ठेका ₹44 करोड़ में दिया गया।कुछ ही महीनों बाद, 15 जनवरी 2021 को एक खास किस्म का मुख्तियारनामा तैयार हुआ। मूल ठेकेदार कागजो में सिमट गया और काम रायपुर के ठेकेदार अनिल सिंह चंदेल को मिल गया। यह वही चंदेल साहब हैं, जिनकी सिंचाई विभाग में ऐसी पैठ बताई जाती है कि इनके इशारे के बिना न ईएनसी बैठता है, न विभागीय सचिव। कहते हैं, स्पीकर हाउस के सिसोदिया का भी इन्हें वरदहस्त प्राप्त है। कुछ ही समय में मूल ठेकेदार कागजों तक सीमित रह गया और पूरा काम इनके हाथ में आ गया। जबकि नियमों के तहत इस तरह का सब-लेट प्रतिबंधित ही नहीं, गैरकानूनी भी माना जाता है। इसके बाद सवाल सिर्फ ठेके तक सीमित नहीं रहे। जिन स्वीकृत खदानों से मिट्टी और मुरुम लाई जानी थी, उसकी जगह बांध क्षेत्र से ही खुदाई किए जाने के आरोप सामने आए। केंद्रीय प्रयोगशाला ने गुणवत्ता पर सवाल उठाए, तकनीकी रिपोर्टों में भी आपत्तियां दर्ज हुईं। लेकिन इधर सवाल बढ़ते रहे और उधर भुगतान का सिलसिला भी चलता रहा। इसमे ठेकेदार ही नही वह सभी आरोपी है जिन्होंने दस्तखत कर फाइल को आगे बढ़ाया। जल संसाधन विभाग का पूरा भुगतान MIS से होता है। बिना डिजिटल स्वीकृति के एक रुपया तक नही निकल सकता फिर ₹53.02 करोड़ की प्रशासनिक स्वीकृति वाला काम ₹67.76 करोड़ तक कैसे पहुँच गया? इस नेटवर्क ने नियमों, प्रक्रियाओं और सिस्टम को ही नही पूरे प्रशासनिक ढांचे को कटघरे में ला दिया। फाइल किसने बढाई? किसने गुणवत्ता पर समझौता किया? किसने डिजिटल सिस्टम को मंजूरी दी? और किसने आंखें मूंद लीं? क्योंकि सरकारी खजाने की सबसे बड़ी सेंध ताला तोड़कर नहीं लगती वह फाइलों पर दस्तखत करके लगती है।

उपसमितिपुराण
एक मंत्री हैं… विभाग भी उनका, जिम्मेदारी भी उनकी, लेकिन जब उसी विभाग के लिए मंत्रिमंडलीय उपसमिति बनी तो अध्यक्ष की कुर्सी किसी और के हिस्से में चली गई। साहब सदस्य बनकर बैठ गए और कमान उपमुख्यमंत्री के हाथ में चली गई। अब गलियारों में सवालों की फसल लहलहा रही है। क्या यह सिर्फ प्रशासनिक सुविधा है या परफॉर्मेंस रिपोर्ट का नया प्रारूप? क्या खाद संकट ने ऊपर तक खाद-पानी पहुंचा दिया या फिर सरकार ने बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह दिया? राजनीति में कई बार संदेश प्रेस कॉन्फ्रेंस से नहीं, कुर्सियों के क्रम से पढ़े जाते हैं। अब देखना यह है कि यह सिर्फ उर्वरक प्रबंधन की समिति है… या फिर भविष्य की राजनीतिक खेती की भी तैयारी।

संस्कृतिपुराण
महाभारत में जिस तरह दूरदृष्टि रखने वाले संजय युद्धभूमि का हाल सुनाते थे, वैसे ही यहाँ भी एक संजय हैं। जिस जिले में रहे, वहाँ डीएमएफ की चर्चा खदानों से कम, इनके परसेंट से ज्यादा होती है। परसेंट भी कोई छोटा-मोटा नहीं, 27 से 30 प्रतिशत कहते हैं, यही चर्चाएं धीरे-धीरे साहब की छवि पर लंबी परछाईं डालने लगीं। जब इन परसेंट की गूंज ऊपर तक पहुंची तो एक प्रभावशाली मंत्री ने भी नाराजगी जताई। नतीजा यह हुआ कि नई सूची में साहब किनारे लगा दिए गए। आजकल साहब संस्कृति के करीब हैं, लेकिन मन अब भी किसी दूसरे जिले की कुर्सी में अटका हुआ है। बताते हैं, संस्कृति संभालने से ज्यादा चिंता संस्कृति बदलने की है और इसी उम्मीद में तीन-चार खोखा लेकर साहब लगातार चक्कर काट रहे हैं। लेकिन जिस क्षीरसागर में साहब मंथन करना चाहते हैं, उसकी अपनी अलग कथा है। वहां के साहब इन दिनों काजू प्रेम के कारण खुद सुर्खियों में हैं। कभी पटवारी प्रेम की चर्चाएं थीं, अब काजू प्रेम गलियारों की नई कहानी बना हुआ है। कहते हैं, समुद्र मंथन का ऐसा अभ्यास है कि हर लहर की गहराई नाप लेते हैं, मगर इस बार मंथन से ज्यादा पुराने किस्से ही सतह पर तैरने लगे हैं। ऐसे में उधर संस्कृति वाले साहब क्षीरसागर में जगह खाली होने का इंतजार कर रहे हैं, और इधर काजू वाले साहब अभी अपनी कुर्सी छोड़ने के मूड में नहीं दिखते। नतीजा यह है कि परसेंट संस्कृति और काजू संस्कृति दोनों का मंथन फिलहाल अधूरा ही है।

रवि का प्रकाशपुराण
इन दिनों एक रवि का प्रकाश ऐसा फैला है कि उसके आगे कई आंखें खुद-ब-खुद झुक जाती हैं। कहते हैं, यह शख्स केवल भरोसेमंद नहीं, बल्कि कई राज़ों का भी रखवाला है। दामाद से लेकर ड्रॉइंग रूम तक की चर्चाओं में उसका नाम ऐसे तैरता है, मानो हर रिश्ते की डोर कहीं न कहीं उसी के हाथ में हो। उसका प्रभाव, या कहिए प्रकाश, सिर्फ प्रदेश तक सीमित नहीं है बल्कि सीमावर्ती राज्य उत्तरप्रदेश में बन रहे एक आलीशान रिसॉर्ट तक भी पहुंचता बताया जाता है। कहते हैं, हाउस स्तर की ट्रांसफर-पोस्टिंग, पैरवी और बुराई वाली फाइलें भी सीधे मंजिल तक नहीं, बल्कि इसी प्रकाश से होकर गुजरती हैं। स्वर्ण भूमि के बगल में बने एक दफ्तर में बैठकों का दौर चलता है और वहीं कई फैसलों की पटकथा लिखे जाने की चर्चा है। आखिर इस भरोसे और करीबियत की वजह क्या है, यह सवाल अब भी गलियारों में तैर रहा है। लेकिन इतना जरूर है कि हर कोई इस ‘रवि के प्रकाश’ में खुद को लाना चाहता है और कहते हैं, यह प्रकाश मनीराम पंकज के बिना दिखाई ही नहीं देता। जिसका जितना बड़ा रिचार्ज, उसकी उतनी लंबी टॉकटाइम। एयरली पैकेज अलग, भुगतान अलग। ऐसे में सवाल यही उठता है कि यह प्रशासनिक प्रक्रिया ज्यादा है या करीबियत की ताकत? और अगर फैसले संस्थागत व्यवस्था से ज्यादा निजी पहुंच पर निर्भर होने लगें, तो फाइलें आखिर सचिवालय में चलती हैं… या किसी और दरबार में?

पटवारीपुराण
एक और साहब हैं बड़े जिले के बड़े साहब। रौब ऐसा कि आदेश पहले निकलता है, वजह बाद में तलाश ली जाती है। साहब का एक पटवारी पर कार्रवाई का मन बना। पहले निलंबन की चर्चा हुई, फिर तबादले का आदेश निकल गया। लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू हुई। पटवारी ने नई जगह जाकर कार्यभार ही ग्रहण नहीं किया। साहब को उम्मीद थी कि जॉइनिंग होगी, फिर फाइल चलेगी… या 20 पेटी अंदर आएगी। लेकिन अफसरशाही के शतरंज में कभी-कभी प्यादा भी ऐसी चाल चलता है कि वज़ीर सोच में पड़ जाता है। वैसे साहब का अपना भी गौरवशाली इतिहास रहा है। सीमावर्ती राज्य के ताकतवर लोगों से रिश्तों की चर्चा हो, हेलमेट पहनकर स्कूटी से निकलने के किस्से हों, संविदा में नौकरी दिलाने की बातें हों, हीरो के हार बंटने की कहानी हो या फिर लंबे व्हाट्सऐप चैट के गलियारों में घूमते चर्चे साहब हमेशा सुर्खियों में रहे हैं। कहते हैं, कभी वही चैट गृहमंत्रालय तक भी पहुंच जाती है। फिर प्यार कब तकरार और तकरार कब रार में बदल जाती है, पता ही नहीं चलता। बहरहाल, अफसरशाही का अपना ही गणित है। जिसके एक आदेश से पूरा जिला हिल जाता हो, वही जब छोटे-छोटे खेलों में उलझ जाए तो प्यादे भी वज़ीर को मात देने लगते हैं। हेलमेट सिर को तो बचा सकता है, लेकिन छवि को नहीं। कुर्सी का रौब कुछ दिन चलता है, मगर गलियारों की कहानियां उससे कहीं लंबी उम्र पाती हैं। अब देखना यह है कि साहब पहले पटवारी की फाइल निपटाते हैं… या अपनी चर्चा।

यक्ष प्रश्न –

1 – नगर सेवा वाले दफ़्तर में उपयोग का सामान अचानक समेटने की नौबत क्यों आई? क्या बड़े बदलाव की आहट है?

2 – अपने ही विभाग की उपसमिति में जगह नहीं… क्या मंत्री के लिए बाहर का रास्ता तय हो चुका है?

 

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