सिकासार से सिर्फ कानूनी बाधा नहीं हटी, वर्षों पुराने ‘ठेकेदारी तंत्र’ पर भी खड़ा हुआ बड़ा सवाल

हरदीडीह, समोदा, अरपा-भैंसाझार से केलो और सुतियापाट तक परियोजनाओं पर उठते रहे सवाल; इस बार ₹2549 करोड़ के काम में विभाग ने रखी कड़ी पात्रता हाईकोर्ट से भी नहीं बदली शर्त, आखिर किसे खटक रहा था नियमों का कसाव?

रायपुर – सिकासार-कोडार केवल करीब ₹2549 करोड़ का एक और सरकारी निर्माण नहीं है। यह उस जल संसाधन विभाग के लिए भी महत्वपूर्ण मोड़ है, जहां वर्षों से बड़ी परियोजनाओं की लागत, निर्माण गुणवत्ता, अधूरे काम और बाद की मरम्मत को लेकर सवाल उठते रहे हैं। हरदीडीह एनीकट, समोदा बैराज, अरपा-भैंसाझार से लेकर केलो और सुतियापाट तक अलग-अलग दौर में अलग अलग कारणों से विभाग की कार्यप्रणाली सवालों में रही है।

केलो इसका बड़ा उदाहरण है। परियोजना शुरू होने के करीब 18 साल बाद भी 2025 में कई शाखा और लघु नहरों के अधूरे रहने तथा किसानों तक अपेक्षित सिंचाई सुविधा नहीं पहुंचने की स्थिति सामने आई। वहीं सुतियापाट मध्यम सिंचाई परियोजना में CAG ने प्रतिकूल भूगर्भीय रिपोर्ट के बावजूद ₹42.10 करोड़ का काम दिए जाने और ₹4.70 करोड़ के निष्फल व्यय का उल्लेख अपनी ऑडिट रिपोर्ट में किया था। यानी सवाल केवल राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं रहे, सरकारी ऑडिट में भी विभाग की परियोजनाओं पर गंभीर टिप्पणियां दर्ज होती रही हैं।

लेकिन सिकासार-कोडार में कहानी इस बार अलग रही। इतनी बड़ी परियोजना में विभाग ने केवल कम दर को पर्याप्त मानने के बजाय वित्तीय क्षमता, बड़े काम का अनुभव और निर्धारित दस्तावेजी पात्रता पर कसाव रखा। अनुमानित लागत के दो गुना औसत वार्षिक टर्नओवर की शर्त इसी का हिस्सा थी। यही शर्त विवाद का केंद्र बनी और मामला आखिरकार हाईकोर्ट पहुंच गया।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने चुनौती खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने कहा कि Tender Inviting Authority अपनी व्यावसायिक और तकनीकी आवश्यकताओं का सर्वोत्तम निर्णायक है। अदालत ने विशेषज्ञ Tender Evaluation Committee के तकनीकी मूल्यांकन में भी हस्तक्षेप का आधार नहीं पाया।

यहीं से असली सवाल शुरू होता है। जिस विभाग के पुराने रिकॉर्ड में अधूरी परियोजनाओं से लेकर निष्फल सरकारी खर्च तक के उदाहरण मौजूद हैं, उसी विभाग ने जब सिकासार जैसी विशाल परियोजना में सक्षम और वित्तीय रूप से मजबूत एजेंसी चुनने के लिए पात्रता की कसौटी कड़ी की तो इतनी बड़ी खींचतान क्यों मची? इसके इर्द-गिर्द ‘हजारों करोड़ के घोटाले’ का नैरेटिव कैसे खड़ा हुआ?

हाईकोर्ट में पक्षपात, दुर्भावना और मिलीभगत जैसे आरोपों के समर्थन में ठोस आधार स्थापित नहीं हो सका। अदालत को निर्णय प्रक्रिया में ऐसी मनमानी या प्रक्रियागत अनियमितता भी नहीं मिली, जिसके आधार पर न्यायिक हस्तक्षेप किया जाए।

इसके बाद सवाल उस ठेकेदारी-दलाली तंत्र की तरफ लौटता है, जिसकी भूमिका पर हमारी पिछली पड़ताल में भी सवाल उठे थे। आखिर बड़ी परियोजनाओं में मजबूत तकनीकी अनुभव और वित्तीय क्षमता की शर्त किसके हितों के आड़े आ रही थी? सिकासार की कानूनी बाधा फिलहाल दूर हो गई है और इस फैसले ने जल संसाधन विभाग में वर्षों से चली आ रही ठेकेदारी, दलाल लॉबी और ऐसे सिंडिकेट गिरोह ध्वस्त कर दिया है जो वर्षों से विभाग को अंदर ही अंदर खोखला कर रहे थे। इस फैसले के बाद पुराने ठेकेदारी समीकरणों और ठेकेदार-दलाल तंत्र में खासी हलचल है। मुख्यमंत्री के अधीन इस विभाग में सिकासार अब सिर्फ एक बड़ी जल परियोजना नहीं, बल्कि बड़ी परियोजनाओं में नियम, क्षमता और जवाबदेही को प्राथमिकता देने की नई कसौटी बनकर उभरेगी।

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