CM के जल संसाधन विभाग में ₹4500 करोड़ का खेल, सख्त नॉर्म्स से किसकी दुकान पर लगा ताला, सचिव को हटाने तक क्यों पहुंची लड़ाई?

सिकासार-कोडार, मटनार-देवरगांव और सिरपुर बैराज के टेंडरों पर घमासान ‘स्पीकर दरबार’ से ‘हाउस के रवि’ और ‘देवों के नंद’ तक की चर्चा, ठेकेदार-दलाल लॉबी पर उठे सवाल

रायपुर – छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग में इस बार दांव छोटा नहीं है। बस्तर से मैदानी इलाके तक सिंचाई परियोजनाओं के लिए ₹4500 करोड़ से अधिक के काम सामने आए और इसके साथ ही टेंडर की शर्तों को लेकर जबरदस्त खींचतान शुरू हो गई। मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि विभाग स्वयं मुख्यमंत्री के पास है। करीब ₹2549 करोड़ का सिकासार-कोडार, ₹1600 करोड़ का मटनार-देवरगांव और करीब ₹500 करोड़ का सिरपुर बैराज इतनी बड़ी रकम के बीच विभाग ने इस बार अनुभव, तकनीकी योग्यता और वित्तीय क्षमता के सख्त नॉर्म्स रखे। और यहीं से ठेकेदार-दलाल लॉबी की बेचैनी शुरू हुई।

भैंसाझार-केलो-हरदीडीह ने पहले ही दे रखी है चेतावनी –
सख्ती की वजह पुरानी फाइलों में दिखाई देती है। अरपा-भैंसाझार का ₹326 करोड़ का काम 36 महीने में होना था, लेकिन 13वें साल बाद भी काम अधर में है, जबकिं ₹317 करोड़ से ज्यादा भुगतान के बावजूद 25 हजार हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले फरवरी 2024 में करीब साढ़े 12 हजार हेक्टेयर सिंचाई याने लक्ष्य से आधी के स्थिति में है। भू-अर्जन में करीब ₹26.78 करोड़ के गलत मुआवजे की जांच अलग चल रही है।
केलो परियोजना पर CAG ने परियोजना प्रबंधन, अधूरे नहर नेटवर्क और अपेक्षित सिंचाई लाभ नहीं मिलने जैसी कमियां दर्ज कीं। हरदीडीह एनीकट में संरचना धरासाई होने से गुणवत्ता पर सवाल उठे। उस दौर में संबंधित स्तर पर कार्यपालन अभियंता रहे सुरेश पांडेय अब मुख्य अभियंता हैं। यानी पिछली परियोजनाओं ने सरकार को पर्याप्त कारण दिए कि इस बार केवल L-1 नहीं, काम पूरा करने की वास्तविक ताकत भी देखी जाए।

सख्त नॉर्म्स आए तो ठेके से सत्ता के गलियारों तक हलचल –
हजारों करोड़ की परियोजनाओं में जैसे ही अनुभव और वित्तीय क्षमता के सख्त नॉर्म्स सामने आए, खींचतान केवल ठेकेदारों तक सीमित नहीं रही। विभागीय गलियारों में चर्चा का दायरा ठेकेदारी से इंजीनियरिंग और वहां से सत्ता के दरबार तक पहुंच गया। ठेकेदारी के मैदान में अनिल सिंह चंदेल और सुनील अग्रवाल के नाम चर्चा में हैं, तो विभागीय इंजीनियरिंग व्यवस्था में सुरेश पांडेय का नाम सामने आता है। इसके आगे कहानी सत्ता के गलियारों तक जाती है, जहां अपने प्रभाव और पहुंच के लिए चर्चित ‘स्पीकर दरबार’, ‘हाउस के रवि’ और पूर्व में जल संसाधन का प्रभार संभाल चुके ‘देवों के नंद’ जैसे किरदारों भी शामिल है। इसी कड़ी में करीब दस वर्षों से संविदा व्यवस्था में टिके संजय भागवत का नाम भी बार-बार सामने आता है। सवाल इन नामों की मौजूदगी भर का नहीं है। सवाल यह है कि ₹4500 करोड़ से अधिक की परियोजनाओं में सख्त नॉर्म्स से आखिर किसके हित प्रभावित हो रहे थे और टेंडर की शर्तों तथा विभागीय फैसलों को प्रभावित करने के लिए किसने, किस स्तर पर और किस हैसियत से भूमिका निभाई?

जिम्मेदारी छूटी, रुतबा बदला, फिर ‘देवों के नंद’ की WRD में इतनी दिलचस्पी क्यों?
सत्ता के शुरुआती दौर में ‘देवों के नंद’ की गिनती सरकार के सबसे ताकतवर चेहरों में होती थी। मुख्यमंत्री सचिवालय में विभागों की मॉनिटरिंग और समन्वय के लिए जो जिम्मेदारियां बांटी गई थीं, उसमें जल संसाधन के प्रभारी सलाहकार की भूमिका भी उनके हिस्से में थी। तब प्रशासनिक गलियारों में उनके नाम भर से कई फाइलों की चाल तेज हो जाती थी। वक्त बदला, समीकरण बदले और सत्ता की लिफ्ट भी कुछ नए मुसाफिरों को ऊपर ले गई ‘देवों के नंद’ कई पायदान नीचे दिखाई देने लगे। अब जल संसाधन की वह जिम्मेदारी भी उनके हिस्से में नहीं है। मगर लगता है पुराने विभाग का पानी अभी उतरा नहीं है जिम्मेदारी गई, पर प्रवाह बरकरार है। ₹4500 करोड़ से अधिक की परियोजनाओं और सख्त टेंडर नॉर्म्स पर खींचतान के बीच ‘देवों के नंद’ द्वारा WRD की बैठक लेने की बात सामने आई तो विभागीय गलियारों में सवाल तैरने लगे। दिलचस्प यह कि इस बैठक में करीब दस वर्षों से संविदा व्यवस्था में अंगद के पांव की तरह जमे संजय भागवत की मौजूदगी भी बताई जा रही है। अब सवाल यह है कि जब नदी उनके हिस्से में नहीं, तो घाट पर इतनी आवाजाही क्यों? बैठक किस हैसियत से ली गई, एजेंडा क्या था और किन परियोजनाओं पर चर्चा हुई? जवाब ज्यादा दूर नहीं है। बैठक का आदेश, एजेंडा और मिनट्स सामने आ जाएं तो साफ हो जाएगा कि यह सामान्य प्रशासनिक समन्वय था या ₹4500 करोड़ की परियोजनाओं के बीच ‘देवों के नंद’ को पुराने जल संसाधन में कोई नई धारा बहती दिखाई दे रही थी।

सचिव ने सख्ती दिखाई तो निशाने पर आ गई कुर्सी?
₹4500 करोड़ की इस कहानी में असली मोड़ तब आया, जब जल संसाधन सचिव राजेश कुमार टोप्पो ने अनुभव, गुणवत्ता और वित्तीय पात्रता की कसौटी पर समझौता करने के बजाय नॉर्म्स की दीवार मजबूत रखी। जिन रास्तों से अब तक ठेकेदारी की गाड़ी आसानी से निकल जाती थी, वहां इस बार पात्रता का बैरियर खड़ा हो गया। बैरियर लगा तो दूसरी तरफ बेचैनी भी बढ़नी थी। इसके बाद लड़ाई टेंडर की शर्तों से निकलकर सचिव की कुर्सी तक पहुंचती दिखाई देने लगी। शिकायतें निकलीं, आरोप उछले और विभागीय गलियारों में सचिव को किनारे कराने की मुहिम की चर्चा तेज हो गई। सवाल गंभीर है कि क्या जिन रास्तों को सख्त नॉर्म्स ने बंद किया, उन्हें दोबारा खोलने के लिए नॉर्म्स के बजाय सचिव को ही बदलने की कोशिश शुरू हो गई? इसी बीच सिकासार-कोडार का विवाद हाईकोर्ट पहुंचा और न्यायालय के आदेश ने पूरे समीकरण को नया मोड़ दे दिया। जिन शर्तों को लेकर इतना शोर और खींचतान थी, उनकी कानूनी परीक्षा के बाद लॉबी के मंसूबों को भी झटका लगने की चर्चा है। अब इस कहानी का सच गलियारों की कानाफूसी में नहीं, फाइलों के भीतर बंद है। किसने नॉर्म्स बदलने की पैरवी की, किसने आपत्ति दर्ज की, किसकी बैठक किससे हुई और सचिव के खिलाफ शिकायतों का सिलसिला इसी दौर में क्यों तेज हुआ नोटशीट, बैठकों के मिनट्स और टेंडर रिकॉर्ड सामने आएं तो पूरी तस्वीर खुद बोलने लगेगी। क्योंकि सवाल अब सिर्फ यह नहीं कि सचिव को किनारे कौन करना चाहता था। असली सवाल यह है कि ₹4500 करोड़ की परियोजनाओं में सचिव की सख्ती से आखिर किसके रास्ते बंद हो रहे थे और किसके हितों पर चोट पड़ रही थी?

₹4500 करोड़ की लड़ाई में CM की साख भी दांव पर
जल संसाधन विभाग मुख्यमंत्री के पास है। इसलिए विभाग में टेंडरों को लेकर खींचतान और सचिव को हटाने की कोशिशों का नुकसान अंततः मुख्यमंत्री के विभाग की छवि को भी पहुंचता है। भैंसाझार, केलो और हरदीडीह के बाद सरकार के सामने इस बार मौका है कि सिकासार-कोडार जैसी परियोजनाओं को पुरानी कहानी बनने से रोके। क्योंकि ₹4500 करोड़ किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए आए हैं, किसी ठेकेदार-दलाल लॉबी की हिस्सेदारी तय करने के लिए नहीं।

बहरहाल सबसे बड़ा सवाल यही है सख्त नॉर्म्स से आखिर किसका रास्ता बंद हुआ कि लड़ाई टेंडर की फाइल से निकलकर सचिव की कुर्सी और CM के विभाग की साख तक कैसे पहुंच गई?

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *