₹326 करोड़ का अरपा-भैंसाझार 36 महीने का काम 13वें साल बाद भी अधूरा , ठेकेदार को फिर मोहलत ₹27 करोड़ के मुआवजे में 11 SDM के कार्यकाल पर सवाल –
25 हजार हेक्टेयर सिंचाई का लक्ष्य, लाभ करीब आधे क्षेत्र को ही, केलो-हरदीडीह के बाद अब ₹2500 करोड़ के सिकासार-कोडार को ठेकेदार-दलाल लॉबी से बचाने सख्त नॉर्म्स पर सरकार का जोर -

रायपुर/बिलासपुर – छत्तीसगढ़ की बड़ी सिंचाई परियोजनाओं की पुरानी फाइलें अब सिकासार-कोडार के टेंडर विवाद को समझने की चाबी बन रही हैं। कहीं तीन साल का काम 13 साल बाद भी अधूरा है। तो कहीं करोड़ों खर्च होने के बाद भी सिंचाई लक्ष्य आधे से कम है, कहीं CAG ने परियोजना प्रबंधन पर सवाल उठ रहे है तो कहीं एनीकट की संरचना ही धरासाई होकर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। इन सब अनुभवो के बाद अब करीब ₹2500 करोड़ की सिकासार-कोडार परियोजना में सरकार ऐसी एजेंसी चाहती है जिसके पास सिर्फ कम रेट डालने की क्षमता नहीं, बल्कि बड़े काम का अनुभव, मजबूत वित्तीय हैसियत और उसे समय पर पूरा करने की ताकत भी हो। क्योंकि इतनी बड़ी परियोजनाओं के आसपास सक्रिय ठेकेदार-दलाल लॉबी पात्रता की शर्तों को लेकर लगातार खींचतान का केंद्र बनी हुई है।
भैंसाझार 36 महीने लिखे थे, कैलेंडर 13 साल आगे निकल गया –
23 सितंबर 2013 को अरपा-भैंसाझार का करीब ₹326.50 करोड़ का काम राधेश्याम अग्रवाल-सुनील कुमार अग्रवाल और एमआरकेके कंस्ट्रक्शन के ज्वाइंट वेंचर को दिया गया। बोली निर्धारित लागत से 12.38 प्रतिशत कम थी और काम पूरा करने के लिए सिर्फ 36 महीने दिए गए थे। ठेकेदार को अगस्त 2023 तक ₹317.59 करोड़ का भुगतान हो चुका था, बावजूद इसके अब तक काम अधर में लटका हुआ है। हैरानी यह कि 7 मई 2026 को उसी मूल अनुबंध के काम के लिए ठेकेदार को 30 जून 2026 तक फिर समयवृद्धि दे दी गई। आखिर तीन साल का अनुबंध तेरहवें साल तक कैसे पहुंच गया? यही से भ्रष्टाचार की दास्तान शुरू होती है।
₹326 करोड़ की असली कसौटी बैराज नहीं, खेतों तक पहुंचा पानी है –
अरपा-भैंसाझार का लक्ष्य लगभग 25 हजार हेक्टेयर में सिंचाई देना था। लेकिन फरवरी 2024 में विधानसभा में सरकार ने करीब साढ़े 12 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में ही सिंचाई होने की जानकारी दी। यानी वर्षों और सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद परियोजना उस समय अपने घोषित सिंचाई लक्ष्य के लगभग आधे तक ही पहुंच पाई थी। यहीं से भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन की जांच का सबसे बड़ा सवाल निकलता है। यदि 25 हजार हेक्टेयर के नाम पर परियोजना स्वीकृत हुई, उस पर सैकड़ों करोड़ खर्च हुए और वर्षों बाद भी करीब आधे क्षेत्र को ही सिंचाई मिल रही थी, तो यह पता लगाना जरूरी है कि बाकी क्षमता क्यों विकसित नहीं हुई और इसके लिए कौन जिम्मेदार है। क्या ठेकेदार और अधिकारी मिलकर खानापूर्ति कर रहे है और अपनी जेब भरने में मस्त है। या इन ठेकेदारों के आगे विभाग भी नतमस्तक है।
मुआवजे की फाइल खुली तो ₹26.78 करोड़ की अलग कहानी –
भैंसाझार में निर्माण और सिंचाई लक्ष्य के सवालों के बीच भू-अर्जन की फाइल ने दूसरी परत खोल दी। 75 गांवों से संबंधित करीब ₹26.78 करोड़ के गलत मुआवजा वितरण का मामला सामने आया है। जांच 11 तत्कालीन SDM के कार्यकाल से जुड़े मामलों तक पहुंची है। संभाग कमिश्नर ने चार सदस्यीय समिति से दोबारा जांच शुरू कराई है। यानी भैंसाझार में अब केवल यह नहीं पूछा जा रहा कि काम देर से क्यों हुआ, बल्कि यह भी कि जमीन और मुआवजे के करोड़ों रुपये आखिर कहां और कैसे उलझे?
केलो पर CAG ने दिखाई थी अधूरे लाभ की तस्वीर –
केलो सिंचाई परियोजना में भी CAG ने गंभीर कमियां दर्ज की थीं। भूमि अधिग्रहण में देरी, निर्धारित नहर नेटवर्क का पूरा निर्माण नहीं होना और वर्षों बाद भी अपेक्षित सिंचाई क्षमता हासिल नहीं होना ऑडिट में सामने आया।
केलो का अनुभव बताता है कि परियोजना पर पैसा खर्च कर देना सफलता नहीं है। असली हिसाब उस पानी का है जो किसान के खेत तक पहुंचा।
हरदीडीह ने पूछा काम पास किसने किया था? –
फिर हरदीडीह एनीकट आया। करोड़ों रुपये खर्च कर बनी संरचना क्षतिग्रस्त हुई तो निर्माण गुणवत्ता पर सवाल खड़े हुए। उस दौर में संबंधित स्तर पर कार्यपालन अभियंता रहे सुरेश पांडेय अब मुख्य अभियंता हैं। ऐसे में जांच ठेकेदार पर जाकर खत्म नहीं होनी चाहिए। गुणवत्ता किसने जांची, माप किसने स्वीकार किया, बिल किसने पास किया और निर्माण मानकों के अनुरूप था या नही जवाबदेही की पूरी श्रृंखला सामने आनी चाहिए।
CAG भी एनीकटों की योजना, निर्माण और उनके उपयोग को लेकर पूर्व में विभागीय व्यवस्था की कमियां दर्ज कर चुका है। अब सिकासार-कोडार में सरकार पुरानी कहानी दोहराना नहीं चाहती, भैंसाझार में देरी और अधूरा सिंचाई लाभ, केलो में CAG की आपत्तियां और हरदीडीह में गुणवत्ता के सवाल इन सबके बीच अब विभाग के सामने करीब ₹2500 करोड़ की सिकासार-कोडार परियोजना है।
यही वजह है कि टेंडर में बड़े काम का अनुभव और मजबूत वित्तीय पात्रता महत्वपूर्ण बनाई गई है। इन शर्तों को लेकर विवाद अदालत तक पहुंचा है। लेकिन यहां मूल सवाल किसी एक कंपनी का नहीं है। क्या ₹2500 करोड़ की परियोजना केवल L-1 देखकर सौंप दी जाए, या यह भी देखा जाए कि ठेकेदार के पास उसे पूरा करने की आर्थिक और तकनीकी ताकत है? भैंसाझार में ठेका 12.38 प्रतिशत कम दर पर गया था। लेकिन तीन साल की समय-सीमा तेरहवें साल तक पहुंच गई। इसलिए कम रेट अपने आप में सफल परियोजना की गारंटी नहीं है।
दलाल लॉबी से बची तो सिकासार-कोडार बन सकती है नई कसौटी –
बड़ी परियोजनाओं में ठेकेदारों के साथ सक्रिय दलाल लॉबी और टेंडर शर्तों को अपने अनुकूल कराने के आरोप नए नहीं हैं। इसीलिए सिकासार-कोडार में सरकार की जिम्मेदारी दोहरी है पात्रता इतनी मजबूत हो कि कमजोर एजेंसी हजारों करोड़ के काम में प्रवेश न कर सके और इतनी निष्पक्ष भी कि किसी खास कंपनी के लिए रास्ता बनाया या रोका न जाए। भैंसाझार की फाइल सरकार के सामने चेतावनी की तरह रखी है 36 महीने का काम 13वें साल तक, ₹317 करोड़ से ज्यादा भुगतान, 25 हजार हेक्टेयर के मुकाबले करीब आधा सिंचाई लाभ और अब ₹27 करोड़ के मुआवजे की जांच।
अब सिकासार-कोडार में फैसला सिर्फ यह नहीं होना है कि ठेका किसे मिले। फैसला यह होना है कि ₹2500 करोड़ की परियोजना किसानों के खेत तक पानी पहुंचाएगी या किसी ठेकेदार-दलाल लॉबी और अंतहीन ‘समयवृद्धि’ की अगली फाइल बनकर रह जाएगी।










