काजू पर दो साहब फ़िदा! एक दिल्ली दरबार में, दूसरा समुद्र मंथन में… अफसरशाही का मीठा महासंग्राम –

काजू पर दो साहब फ़िदा! एक दिल्ली दरबार में, दूसरा समुद्र मंथन में… अफसरशाही का मीठा महासंग्राम –
राजधानी : – छत्तीसगढ़ में पिछले एक सप्ताह से एक आईएएस और एक आईपीएस अफसर खासा चर्चाओं में हैं। इन चर्चाओं के केंद्र में कोई सरकारी योजना, कोई बड़ा फैसला या कोई प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक चर्चित सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर बताई जा रही हैं। कहा जा रहा है कि इस इंफ्लुएंसर ने दोनों साहबों के दिलों में ऐसा काजू डाला कि पूरा मामला कतली बन गया। काजू… यानी वह किरदार, जिसके इर्द-गिर्द इन दिनों दो बड़े अफसरों का अपना-अपना समुद्र मंथन चल रहा है।
कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि काजू कभी पंद्रह-पंद्रह दिन बस्तर की वादियों में दिखाई देती है। जंगल, झरनों और पहाड़ों के बीच काजू-कतली का स्वाद कुछ अलग ही होता है। फिर अचानक वही काजू दिल्ली पहुंच जाती है, जहां प्रशासनिक गलियारों में भी उसकी मिठास घुलने लगती है। अफसरशाही में मजाक उड़ता है कि काजू का कैलेंडर सरकारी दौरों से भी ज्यादा व्यस्त रहता है।
अब सवाल यह नहीं कि काजू कहां गई। सवाल यह है कि काजू का बिल कौन भर रहा है? क्योंकि काजू कोई सस्ता मेवा नहीं होता। और जब उसके साथ लग्जरी गाड़ियों के काफिले, आलीशान स्वागत और सरकारी तामझाम की चर्चाएं जुड़ जाएं तो सवाल उठना लाजिमी है।
एक दौर था जब जैसे ही काजू की फ्लाइट उतरती, एयरपोर्ट पर बीएमडब्ल्यू, पोर्शे, ऑडी और जैगुआर जैसी लग्जरी कारें स्वागत के लिए कतार में खड़ी रहती थी। अब अफसरशाही के गलियारों में नया किस्सा यह है कि समुद्र मंथन वाले साहब ने कहानी में मर्सिडीज का नया अध्याय जोड़ दिया है। यह कितना सच और कितना अफसाना, यह तो जांच का विषय हो सकता है, लेकिन सचिवालय की चाय पर यही सबसे पसंदीदा चर्चा बनी हुई है।
उधर दिल्ली वाले लाला साहब भी कम चर्चित नहीं बताए जाते। जब छत्तीसगढ़ में थे, तब एयरपोर्ट से लेकर शहर की सड़कों तक पोस्टरों की ऐसी बहार रहती थी कि कई बार सरकारी योजनाओं से ज्यादा चर्चा उनके प्रचार की होती थी। अब दिल्ली में हैं, लेकिन कहते हैं कि छत्तीसगढ़ का काजू आज भी उन्हें खूब याद आता है। शायद यही वजह है कि यहां की चर्चाएं दिल्ली तक और दिल्ली की चर्चाएं फिर रायपुर लौट आती हैं। ठेकों की फेहरिस्त हो या प्रचार का शौक, दोनों की कहानियां आज भी प्रशासनिक गलियारों में तैरती रहती हैं।
अब चर्चा यह है कि दोनों के बीच मानो एक अनोखी प्रतिस्पर्धा चल रही है आखिर काजू कौन ज्यादा खाएगा? एक तरफ किसी को मर्सिडीज दिलाने के किस्से उड़ते हैं, तो दूसरी तरफ मुद्रा मीनार में ऑफिस दिलाने की चर्चाएं सुनाई देती हैं। दिल्ली वाले साहब के बारे में तो यह भी कहा जाता है कि उनकी निगाहें केवल काजू तक ही सीमित नहीं है , कनिष्ठ अधिकारियों पर भी उनकी खास दिलचस्पी चर्चा का विषय बनी रहती थी। इसके किस्से फिर कभी बताएंगे मगर कुल मिलाकर इन दिनों अफसरशाही में नीतियों, योजनाओं और जनहित से ज्यादा काजू चर्चा का विषय है। सचिवालय से लेकर कॉरिडोर तक हर कोई अपने-अपने अंदाज में इस समुद्र मंथन की व्याख्या कर रहा है।
अब देखना यह है कि इस मंथन से आखिर अमृत निकलता है, विष निकलता है… या फिर एक और डिब्बा काजू कतली का।










