राजकीय गीत की पैरी पर करोड़ों का सवाल! 53 करोड़ की मंजूरी, 67.76 करोड़ का भुगतान… अब सरकार ही तलाशेगी जवाब विधानसभा में गूंजा मामला – अरपा पैरी के धार से करोड़ों के भुगतान तक… आखिर जल संसाधन विभाग में क्या चल रहा है?

राजकीय गीत की पैरी पर करोड़ों का सवाल! 53 करोड़ की मंजूरी, 67.76 करोड़ का भुगतान… अब सरकार ही तलाशेगी जवाब विधानसभा में गूंजा मामला –

अरपा पैरी के धार से करोड़ों के भुगतान तक… आखिर जल संसाधन विभाग में क्या चल रहा है?

रायपुर/गरियाबंद : – छत्तीसगढ़ का राजकीय गीत जब गूंजता है तो उसकी पहली पंक्तियों में ही प्रदेश की आत्मा बसती है अरपा पैरी के धार.. पैरी केवल एक नदी नहीं, बल्कि गरियाबंद और आसपास के क्षेत्रों की सिंचाई व्यवस्था की आधारशिला है। किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाने और हजारों हेक्टेयर भूमि को सिंचित करने के उद्देश्य से इस नदी पर सिंचाई परियोजनाएं विकसित की गईं। लेकिन अब उसी पैरी परियोजना का नाम करोड़ों रुपये के भुगतान को लेकर चर्चा में है।

मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि जिस नहर लाइनिंग कार्य के लिए 53 करोड़ रुपये की प्रशासनिक स्वीकृति दी गई थी, उसी कार्य पर 67.76 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ। विधानसभा में मामला उठने के बाद सरकार ने जांच समिति गठित कर दी है। लेकिन यह सवाल यहीं खत्म नहीं होता। पिछले कुछ महीनों में जल संसाधन विभाग कई अलग-अलग कारणों से लगातार सुर्खियों में रहा है।

पैरी परियोजना है क्या और नहर लाइनिंग क्यों कराई जाती है?
पैरी नदी महानदी की प्रमुख सहायक नदियों में से एक है। गरियाबंद जिले के लिए यह सिंचाई की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसी नदी पर बनी परियोजना से किसानों तक पानी पहुंचाने के लिए मुख्य और शाखा नहरों का जाल बिछाया गया। समय के साथ नहरों से पानी का रिसाव बढ़ने लगा। रिसाव कम करने, पानी की बचत करने और अंतिम छोर तक सिंचाई सुनिश्चित करने के लिए नहरों के भीतर सीमेंट-कंक्रीट की परत बिछाई जाती है, जिसे नहर लाइनिंग कहा जाता है। इसी कार्य के लिए वर्ष 2008 में प्रशासनिक स्वीकृति जारी हुई थी।

53 करोड़ की स्वीकृति… फिर भुगतान 67.76 करोड़ तक कैसे पहुंचा?
नहर लाइनिंग कार्य के लिए 53 करोड़ रुपये की प्रशासनिक स्वीकृति दी गई थी। लेकिन विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार बाद में कुल भुगतान 67.76 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
यानी लगभग 14.76 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान। यही अंतर अब पूरे विवाद का केंद्र है। विधानसभा में भी यही प्रश्न उठा कि यदि मूल स्वीकृति 53 करोड़ रुपये की थी तो अतिरिक्त भुगतान किस प्रक्रिया और किस स्वीकृति के आधार पर किया गया। सरकार ने अब इस पूरे मामले की जांच के लिए समिति गठित कर दी है।

यह पहला मामला नहीं… हाल के महीनों में लगातार चर्चा में रहा जल संसाधन विभाग –
पैरी परियोजना अकेली घटना नहीं है। पिछले कुछ महीनों में जल संसाधन विभाग अलग-अलग मामलों को लेकर लगातार चर्चा में रहा है। हरदीडीह एनीकट के निर्माण और उसकी गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल उठे। जशपुर जिले में टेंडर प्रक्रिया को लेकर भी विवाद सामने आया। अब पैरी परियोजना में अतिरिक्त भुगतान का मामला सामने आने के बाद विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सार्वजनिक बहस का विषय बन गई है। इन मामलों की प्रकृति अलग-अलग है, लेकिन एक समानता यह है कि हर बार विभागीय निर्णय और वित्तीय प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं। क्या निगरानी व्यवस्था कमजोर पड़ रही है? जब किसी विभाग में बार-बार अलग-अलग प्रकार के विवाद सामने आते हैं तो स्वाभाविक रूप से निगरानी व्यवस्था पर भी चर्चा शुरू होती है।

विभाग में लंबे समय से कई महत्वपूर्ण पद अतिरिक्त प्रभार के आधार पर संचालित होने हो रहा है। ऐसे में प्रशासनिक नियंत्रण, तकनीकी परीक्षण और वित्तीय अनुमोदन की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। इन सवालों के जवाब तथ्यों और आधिकारिक जांच के आधार पर ही स्पष्ट होंगे।

अब निगाहें सिर्फ जांच पर नहीं, जवाबदेही पर –
सरकार ने पांच सदस्यीय समिति बनाकर जांच शुरू कर दी है। लेकिन इस मामले में जनता की दिलचस्पी केवल यह जानने में नहीं है कि अतिरिक्त भुगतान क्यों हुआ, बल्कि यह भी कि यदि प्रक्रिया में कोई चूक हुई तो उसकी जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होगी। पैरी नदी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। ऐसे में उससे जुड़ी परियोजना में उठे वित्तीय सवाल केवल एक विभागीय मामला नहीं, बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही का विषय बन गए हैं।

 

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