राजनांदगांव में कानून-व्यवस्था पर सवालों के साथ अफसरों की संपत्तियां भी चर्चा में, कीर्तन के चर्चे सत्ता के गलियारों तक –

राजनांदगांव में कानून-व्यवस्था पर सवालों के साथ अफसरों की संपत्तियां भी चर्चा में, कीर्तन के चर्चे सत्ता के गलियारों तक –
राजनांदगांव – महाराष्ट्र सीमा से लगे राजनांदगांव जिले में कानून-व्यवस्था, अवैध कारोबार और पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे है। जिले में अपराधों पर लगाम कसने के बजाय अब पुलिस व्यवस्था ही सवालों के घेरे में दिखाई दे रही है। यही नही प्रशासनिक गलियारों में कुछ अधिकारियों की प्रभावशाली पदस्थापनाओं, तेजी से बढ़ी संपत्तियों और राजनीतिक संरक्षण को लेकर भी चर्चाओं का दौर तेज है। अलग-अलग घटनाओं और आरोपों ने अब पूरे घटनाक्रम को एक बड़े सवाल में बदल दिया है, जिस पर निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच की मांग उठ रही है।
बढ़ता अपराध और सवालो में सीमावर्ती जिला –
यह जिला महाराष्ट्र की सीमा से लगा होने के कारण सीमावर्ती क्षेत्रों से पशुओं की तस्करी, डोंगरगढ़ क्षेत्र में अवैध शराब, जुआ-सट्टा, कबाड़ कारोबार तथा अन्य अवैध गतिविधि पर अंकुश नही लग पा रहा है इससे अपराधियो के हौसले बुलंद है। पुलिस महकमे पर आरोप यह भी हैं कि कार्रवाई सभी के खिलाफ समान रूप से नहीं होती, बल्कि चुनिंदा कार्रवाई के बाद कथित समझौते और वसूली कर मामले को दबा दिया जाता है।
मालखाने का मोबाइल और सवालों के घेरे में पुलिस महकमा –
ऐसा ही एक मामला बसंतपुर थाना से जुड़ा लंबे समय से चर्चा में है। जहाँ जुआ-सट्टा प्रकरण में जब्त कर मालखाने में जमा मोबाइल फोन को बाहर निकालकर उसके माध्यम से लाखों रुपये का ऑनलाइन ट्रांजेक्शन किया गया। बताया जाता है कि मामला न्यायालय तक पहुंचा, यह केवल एक मोबाइल फोन के दुरुपयोग का मामला नहीं, बल्कि पुलिस मालखाने में सुरक्षित रखे गए न्यायिक साक्ष्यों की सुरक्षा, पुलिस अभिरक्षा की विश्वसनीयता और आपराधिक न्याय प्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। बताया जाता है कि इसमे राज्य पुलिस सेवा के अधिकारी की भूमिका संदिग्ध रही है। जिले में पदस्थ एक राज्य पुलिस सेवा के अधिकारी कीर्तन राठौर जिनकी 18 साल की सेवा में इन्हें रायपुर, कोरबा, और राजनांदगांव इन्ही तीन महत्वपूर्ण जिलों के इर्द गिर्द ही पदस्थापना मिलती रही। सत्ता परिवर्तन के बाद भी उनकी तैनाती पर विशेष असर नहीं पड़ा। अब यह साहब राज्य पुलिस सेवा से आईपीएस पदोन्नति की कतार में हैं। इसी बीच उनकी अचल संपत्तियों, परिजनों के नाम पर निवेश और राजधानी व नया रायपुर में कारोबारी गतिविधियों को लेकर भी सवाल उठ रहे है।
चाय समोसे का कर्ज –
सवाल इसलिए भी चूंकि पूर्ववर्ती सरकार के दौरान एक बड़े कारोबार से जुड़े एक अधिकारी की जांच चल रही थी। और उन्हें सपत्नीक जांच एजेंसी के दफ्तर बुलाया जाता था। उस समय यह साहब मौके की नजाकत को समझते हुए जांच न कर खातेदारी किया करते थे। इन चर्चाओं को व्यंग्य में चाय-समोसे का कर्ज कहकर भी जोडा जाता है अमन का चैन चाय समोसे की वजह से ही आ पाया था। जब मामला शांत हुआ तो जाते जाते उस कारोबारी अधिकारी ने कहा था कभी जरूरत पड़े तो याद करना आज उसी कर्ज को उतारने के लिए यह पोस्टिंग पदस्थापना का खेल जारी है। हालांकि अब यह सच मे चाय समोसे का जलवा है या इन साहब के द्वारा फैलाई अफवाह यह तो वही जानते होंगे लेकिन इनके कनिष्ठ अधिकारी कहते है कि काश उस समय हमने भी चाय समोसा खिला दिया होता।
मुद्रा मीनार से नया रायपुर कथित बेनामी संपत्ति –
इसकी एक बानगी यह भी थी कि जैसे ही सरकार बदली साहब ने राजधानी स्थित चर्चित मुद्रा मीनार में अपनी पत्नी के नाम पर आलीशान ऑफिस ले लिया। ऑफिस का काम बताया गया इंटीरियर डिजाइनिंग मगर इसकी आड़ में काला मुद्रा सफेद करने का भी खेल शुरू हो गया। फिर दिन दूना रात चौगुना ऐसी तरक्की की सीढ़ी चढ़ी गई कि नया रायपुर में करोड़ो की बेनामी संपत्ति अलग अलग जगहों में जमीन प्रॉपर्टी बनाई गई। अंदाजा लगाइए लोग अपनी पूरी सर्विस काल मे एक घर लोन या ईएमआई में बना पाते है और यह साहब करोड़ो की बेनामी संपत्ति के मालिक बन गए।
तस्वीरें गायब, विदेश यात्राएं और प्रमोशन –
इन मामलों से जुड़ी शिकायतें समय-समय पर विभिन्न जांच एजेंसियों तक पहुंचती रही हैं। कुछ मामलों में प्रारंभिक स्तर पर जानकारी जुटाई गई, लेकिन आगे की कार्रवाई सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आ सकी। हाल के दिनों में संबंधित अधिकारी के सोशल मीडिया खातों से कई तस्वीरें हटाई गई जिसमें विदेश यात्रा से जुड़ी तस्वीर थी। इनके विदेश यात्राओं का खाका भी निकाला जाना चाहिए कि आखिर एक राज्य पुलिस सेवा का अधिकारी इतनी विदेश यात्राएं किस उद्देश्य से करता है इसके पीछे के अगर तार खंगाले जाये तो अलग ही तस्वीर सामने आने की संभावना से इनकार नही किया जा सकता है।
राजधानी रायपुर में पदस्थ अवधि के दौरान भी इनपर टिकट ब्लैक से लेकर अपने कनिष्ठ अधिकारी कर्मचारियों पर दबाव बनाकर आईफोन लेना और मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगता रहा है। इन आरोपो के बीच उक्त अधिकारी के आईपीएस प्रमोशन कि बात भी प्रशासनिक गलियारों के तैरने लगी है। अब देखना होगा कि सरकार इन चर्चाओं और आरोपों को महज अफवाह मानकर नजरअंदाज करती है या फिर निष्पक्ष जांच के जरिए पूरे घटनाक्रम की वास्तविकता सामने लाने का प्रयास करती है।










