अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)
साहबों की महफिल में उठता धुआं हो या कुर्सी के पीछे चलता खेल राजधानी की अफसरशाही में कहानी बहुत कुछ कहती है और नाम लेने की जरूरत कम ही पड़ती है। इस बार कोबरा फुफकार रहा है, रजत चमक रहा है, वर्मा का तराना गूंज रहा है और पांडेय जी की कुर्सी अब भी अडिग है। उधर रख ले जा के 22 करोड़ से 20 लाख हुए हिसाब ने जंगल से लेकर मुख्यालय तक सवाल खड़े कर दिए हैं। और यक्ष प्रश्न सीधे कुर्सियों तक पहुंच रहे हैं…

साहबों का सूखा नशा –
राजधानी में इन दिनों हैश-हशीश और सूखे नशे का खुमार कुछ ऐसा चढ़ा है कि इसकी महक आम गलियों से निकलकर अफसरशाही की महफिलों तक पहुँच रही है। वीआईपी गलियों के एक थाने के पीछे, हाइवे से लगे होटल जिसकी पांचवी मंजिल के कमरे में रात होते ही खास बैठकी जमती है। दरवाजा बंद, रोशनी मंद और फिर शुरू होते हैं छल्ले पर छल्ले बताया जाता है कि महफिल में दवाइयों के उपकरणों की खरीद से जुड़े साहब ही नहीं, सरकार की छवि चमकाने वाले साहब भी शामिल होते हैं। एक साहब के पास खरीद की ताकत, दूसरे के पास छवि की जिम्मेदारी। अब दोनों की शाम एक ही कमरे में कटे तो इसे संयोग कहें या सुशासन का नया स्वाद यह समझना मुश्किल नहीं है। सूखा सामान राजधानी से लगे उसी औद्योगिक इलाके से आता है जहाँ से गांजे की पहली खेप पकड़ाई थी। फर्क सिर्फ इतना है कि तब माल बाइक पर आता था और अब डिलीवरी देने वाला लक्जरी कार में पहुंचने लगा है। यानी धंधा वही, बस डिलीवरी का रुतबा बदल गया। आखिर साहबों की महफिल है, तो डिलीवरी भी साहबी होनी चाहिए! अब दवाइयों के उपकरण खरीदने वाले साहब हों या सरकार की छवि चमकाने वाले शौक महंगा हो तो हिसाब भी बड़ा चाहिए। वैसे सूखे नशे की एक खासियत है कि नजर बदल जाती है। शायद इसी वजह से साहबों को चारों तरफ हरियाली ही हरियाली दिखाई देती है। महफिल में खुशी भी है और सुशासन भी। बस दिखाई नहीं देता तो वह धुआं, जो बाहर निकलकर सरकार की छवि पर बैठ सकता है। सरकार नशे के खिलाफ अभियान चलाए और उसी दौर में अफसरों की ऐसी महफिले सजने लगे, तो सवाल सिर्फ नशे का नहीं रह जाता। सवाल यह है कि साहबों के कमरे तक पहुंचने वाला धुआं निगरानी करने वालों की नाक तक क्यों नहीं पहुंच रहा? आखिर छवि चमकाने वाले साहब को इतना तो पता होना ही चाहिए कि जो छल्ला कमरे में उड़ता है, वह धुआं दीवारों से नहीं रुकता और सुशासन की छत के नीचे उठे धुएं की गंध ऊपर तक पहुँच ही जाती है।
कोबरा –
कभी कोल-लेवी मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच की आंच में घिरे एक साहब की नजर अब एसीबी-ईओडब्ल्यू की कुर्सी पर है। एक दौर में साहब खुद जांच के घेरे में थे, अब वही जांच की कुर्सी पर बैठने की तैयारी में हैं। बस हरी झंडी का इंतजार है। आगे सुनिए… तत्कालीन सरकार में साहब की खूब चलती थी। सरकार की छवि चमकाने से लेकर परिवहन का जिम्मा संभालने तक, सरकार बदलने के बाद कुछ समय ब्रेक जरूर लगा, लेकिन अफसरशाही में कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जिनका इंजन बंद नहीं होता, सिर्फ रास्ता बदलता है। यह वही साहब हैं, जहां कभी इनका डेरा रहा, वहीं 98 खोखा भी पकड़ा गया था। बाद में मामला कैसे और किस रास्ते से सेटल हुआ, यह यक्ष प्रश्न बना हुआ है। अब पुराने किस्सों के बीच नया अध्याय जुड़ गया है फाइनेंस का कारोबार। बेटा बालिग हुआ तो कारोबार भी जैसे बालिग हो गया। कंपनी को गांव-गांव तक पहुंचाने की तैयारी है। नेटवर्क खड़ा किया गया और वीआईपी रोड के एक मॉल में फाइनेंस का दफ्तर भी ठिकाना बना चुका है। इस कारोबार और इसके भव्य जलसे की कहानी हम पहले बता चुके हैं। अब सवाल कारोबार से ज्यादा पूंजी पर है। पैसा कहां से आया? निवेश किसने किया? कंपनी की कमान किसके हाथ में है और रकम का स्रोत क्या है? कारोबार में रिश्ते कागजों से और पैसे की कहानी बैलेंस शीट से साबित होती है। साहब को जांच करने वाली कुर्सी चाहिए और साहब के घर से जुड़ा कारोबार और साहब खुद जांच के दायरे में है। इसे संयोग कहें, समय का फेर या कोबरा की नई करवट, लेकिन कल तक जो नाम जांच की आंच में था, आज उसका बड़ा कारोबार है और कल किस कुर्सी पर बैठेंगे, इसकी अटकलें अलग। कुर्सी बदल सकती है, कारोबार बदल सकता है, लेकिन पैसे का हिसाब वह आज नही तो कल देना तो पड़ेगा।
वर्मा का तराना –
अफसरशाही में इन दिनों वर्माओं का तराना खूब गूंज रहा है। एक तरफ केंद्र के आयकर विभाग से आईं एक मैडम को State GST में विशेष आयुक्त की अहम कुर्सी मिलती है, दूसरी तरफ VRS ले चुकीं एक पूर्व IRS अधिकारी को फिर सरकार में विशेष सचिव की जिम्मेदारी। आखिर राज्य के कर और वित्त के मोर्चे पर बाहर से आए IRS अधिकारियों की इतनी जरूरत क्यों पड़ रही है। पहली मैडम का तराना सिर्फ कुर्सी तक सीमित नहीं। उनके नाम के साथ मुख्यमंत्री सचिवालय में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे एक साहब का नाम भी जुड़ा है। नाम लेने की जरूरत नहीं, तरन्नुम का ताल और साहब की छाया समझने वाले इशारा समझ जाएंगे। कहा जाता है कि आजकल यही साहब सुशासन बाबू के खासमखासों में हैं। कहते हैं आयकर का काम अब ज्यादा बाबूगिरी वाला हो गया है, इसलिए नजर State GST की तरफ है। वजह भी है यहां कारोबार, जांच और बड़े राजस्व के साथ प्रभाव का खेल है। जहां प्रभाव हो, वहां कुर्सी की कीमत भी अलग होती है। अब गुटखे तम्बाखू का सुर सुनिए। सितंबर के आखिर में केंद्रीय GST की खुफिया एजेंसी ने रायपुर के शदाणी दरबार मार्केट से 50 से ज्यादा बोरे सितार गुटखा पकड़ा। इससे पहले दुर्ग के कुम्हारी में भी कार्रवाई हुई। आखिर इतना बड़ा कारोबार और इतना बड़ा राजस्व नेटवर्क State GST को क्यों नहीं दिखा? या फिर इन दिनों तरन्नुम का तराना ऐसा बज रहा है कि गुटखा-तंबाकू की आवाज सुनाई ही नहीं दे रही? तंज यह भी है कि गुटखे पर नजर न जाए, इसलिए नजराने समय से पहुंच जाते हैं। एक तरफ State GST की अहम कुर्सी पर बाहर से आए IRS अधिकारी, दूसरी तरफ VRS के बाद पांच साल तक की संविदा पर पूर्व IRS अधिकारी। मजे की बात देखिए सुशासन के इस दौर के खुद ढाई साल बचे हैं और संविदा पांच साल की बांटी जा रही है। यानी सरकार का कार्यकाल छोटा, संविदा का तराना लंबा। आखिर यह कुर्सियों का संयोग है या कोई खास प्रशासनिक तालमेल? फिलहाल वर्मा का तराना बज रहा है, गुटखे का सितार अपनी धुन में बज रहा है।
रजत का रंग –
अफसरशाही में कुछ नाम ऐसे होते हैं जिन्हें लिखने की जरूरत नहीं पड़ती। बस कह दीजिए, बाकी कहानी समझदारों पर छोड़ दीजिए। सरकार बदली, चेहरे बदले, कुर्सियां बदलीं, मगर रजत का रंग फीका नहीं पड़ा।
अब जमीन का किस्सा देखिए। महासमुंद में गौठान की जमीन को सार्वजनिक नीतिगत उपयोग के नाम पर चांदी ने हीरा को 15 करोड़ रुपये में दे दिया। रायगढ़ में भी सार्वजनिक उपयोग के नाम पर जमीन और शुल्क का अलग खेल सामने आया। जमीन सरकारी, उपयोग सार्वजनिक और रकम करोड़ों में बस फायदा किसका, यह सवाल कागजों के बीच कहीं दबा पड़ा है। नाम मत लीजिए साहब..असली कहानी उन फाइलों की है, जिनमें सार्वजनिक हित लिखते-लिखते निजी हित की इबारत कब उतर जाती है, पता ही नहीं चलता। फिर हनीट्रैप की कहानी में भी बैच विशेष रजत की तरह चमक रहे है। जिसमे चैट 2020 की और डायरी 2021 में जब्त हुई। बाद में कहानी को डायरी की कपोल-कल्पित बताया गया। अफसरशाही में तारीख बड़ी बेरहम चीज होती है साहब। आदमी बयान बदल सकता है, कहानी का कोण बदल सकता है, लेकिन तारीख को मनाना मुश्किल है और पैसे की यात्रा? पिछली सरकार में एक रास्ता प्रदेश से निकलकर दुबई तक जाता था। अब सुशासन में रास्ते बदल गए तो ठिकाना गोआ पहुँच गया। यानी सरकार बदली तो पर्यटन स्थल बदल गया! प्रदेश का पैसा प्रदेश में रहे, यह पुरानी सोच हुई। बाहर जाए तो कम से कम देश में रहे इसे नया आर्थिक राष्ट्रवाद मान लीजिए। नाम न भी ले तो भी कहानी सीधी है जमीन किसी की, फाइल किसी की, पैसा किसी का और कहानी में रंग रजत की तरह चमक रहा है। अब यह रंग किसका है, कौन पहचानता है और किसे देखकर मुस्कुराता है अफसरशाही में इशारा ही काफी है।
पांडेय जी की कुर्सी –
समाज का कल्याण करने वाले विभाग में एक पांडेय जी हैं। इन्हें पांडेय जी कहिए या 40 प्रतिशत वाले साहब कहिए, कोई अलग बात नहीं। समाज का कल्याण कितना हो रहा है, यह तो विभाग जाने, लेकिन पांडेय जी की कुर्सी का कल्याण लगातार होता दिखाई देता है। तत्कालीन सरकार से लेकर सुशासन तक पांडेय जी का वर्चस्व बना हुआ है। सरकार बदली, विभाग के मुखिया बदले और अब तो संचालक की कुर्सी पर भी बदलाव हो गया। अगस्त में रणबीर शर्मा को संचालक समाज कल्याण से हटाकर गरियाबंद कलेक्टर बनाया गया और उनकी जगह गजेंद्र सिंह ठाकुर को संचालक समाज कल्याण का अतिरिक्त प्रभार दिया गया। लेकिन विभाग के भीतर पांडेय जी की पारी पर कोई असर नहीं पड़ा। यही तो समाज कल्याण विभाग का असली कल्याण है साहब! ऊपर की कुर्सियां बदलती रहें, मुखिया आते-जाते रहें, लेकिन पांडेय जी की कुर्सी अपनी जगह अडिग रहे। अब सवाल यह नहीं कि विभाग का संचालक कौन है। सवाल यह है कि संचालक बदलने के बाद भी विभाग में पांडेय जी का प्रभाव आखिर क्यों कायम रहता है। समाज का कल्याण करने वाले विभाग में अगर कुर्सी बदलने से भी पांडेय जी की कुर्सी न बदले, तो फिर समझिए…कल्याण कहीं और ही हो रहा है!
रख ले जा का हिसाब –
पिछली बार रख ले जा ने 22 करोड़ का ऐसा आंकड़ा उछाला कि जंगल से लेकर मुख्यालय तक हड़कंप मच गया। फाइलें खुलीं, फोन घनघनाए, इंटेलिजेंस से लेकर पुलिस मुख्यालय तक सवाल-जवाब शुरू हो गए। बड़े साहबों ने माथे पर हाथ रखा और छोटे साहबों से हिसाब मांग लिया गया। मामला इतना गरम हुआ कि कार्रवाई की तलवार भी नीचे वालों के सिर पर लटकने लगी। उन्हें हटाने से लेकर कार्रवाई की तैयारी शुरू हो गई। यानी 22 करोड़ ने ऐसा कमाल किया कि कुर्सियां हिलने लगीं। लेकिन कहानी में ट्विस्ट अभी बाकी था। जब मामला इतना गूंजा कि जवाब देना जरूरी हो गया, तो एक नया बयान आया 22 करोड़ नहीं, सिर्फ 20 लाख का डंप था। अब यहीं से रख ले जा का हिसाब गड़बड़ा गया और 22 करोड़ अचानक 20 लाख हो गया। क्या जंगल में रकम भी सरकारी फाइलों की तरह रास्ते में वजन कम कर लेती है या पहले आंकड़ा कुछ और था और हड़कंप मचने के बाद कैलकुलेटर ने नया हिसाब बता दिया? मजे की बात यह भी कि बड़े आंकड़े वाली कहानी में सवाल ऊपर तक पहुंचे, लेकिन जवाब नीचे वालों से मांगा गया। यानी रकम करोड़ों में हो तो सनसनी, हिसाब बिगड़े तो कनिष्ठ जिम्मेदार! अब जिस बयान में 20 लाख की बात कही गई है, उसमें यह भी कहा गया कि ऐसी किसी बरामदगी की जानकारी संबंधित अधिकारियों को नहीं थी। दूसरी तरफ पहले 22 करोड़ की चर्चा ने पूरा तंत्र हिला दिया था। दोनों बातों के बीच की दूरी आखिर कौन तय करेगा? क्योंकि सवाल अब सिर्फ यह नहीं कि डंप कितना था? सवाल यह है कि पहले 22 करोड़ किस हिसाब से निकले और बाद में 20 लाख किस हिसाब से? रख ले जा ने कहानी सुनाई, मुख्यालय हिल गया, कनिष्ठों पर गाज गिरने लगी और अब रकम भी सिकुड़ गई। जंगल में डंप मिला था या आंकड़ों का डंप? 22 करोड़ थे, 20 लाख थे या हिसाब-किताब के बीच कोई और रकम दब गई अब असली रख ले जा कौन है, यही सबसे बड़ा सवाल है।
यक्ष प्रश्न –
1 – धमतरी में पदस्थी के दौरान भ्रष्टाचार की इबारत लिखने और CGMSC में कारगुजारियों के दौरान ACB में मामला दर्ज होने के बावजूद आखिर वह कौन-सा अफसर है, जो अब सड़कों की ऐसी-तैसी करने पर आमादा है?
2 – राजनीति एक ऐसा व्यापार है, जहां कम समय में कई लाख करोड़ का खेल होता है! लेकिन छत्तीसगढ़ में वह कौन-सा मीडिया प्रमुख है, जो सरकार के बिचौलिये की भूमिका निभाते हुए राज्य निर्माण के बाद देखते ही देखते सैकड़ों करोड़ का आसामी बन गया?
3 – लोक सेवा आयोग की खाली पड़ी अध्यक्ष की कुर्सी पर चयन के लिए आखिर और कितना मंथन बाकी है?


