अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)
कहीं कुर्सी का जलवा, कहीं गाड़ियों का काफिला, कहीं जमीन का खेल तो कहीं डामर में हजारों करोड़ का सवाल! साहबों की सादगी और सुशासन के दावों के बीच जनता के हिस्से में आखिर गड्ढे और इंतजार ही क्यों -

कथरी ओढ़कर घी खाना –
अफ़सरशाही की दुनिया में कुछ साहब ऐसे होते हैं, जिनकी सादगी और मासूमियत देखकर लगेगा कि ईमानदारी की इससे बेहतर मिसाल क्या होगी! मगर पर्दे के पीछे कुर्सी का जलवा देखिए तो बड़े-बड़े सूरमा मात खा जाएं। लो-प्रोफाइल ऐसी कि सत्ता के गलियारों से कोई वास्ता ही नहीं, लेकिन मलाईदार पदों से नाता ऐसा कि सरकार बदल जाए, तबादलों की आंधी चल जाए, मगर साहब को कोई टस से मस नही कर सकता है। प्रकाश की तरह चमकने वाले अपर कलेक्टर साहब संपदा विभाग संभाल रहे हैं। सरकारी मकान किसे मिले, किसे इंतजार करना पड़े, यह इसी व्यवस्था से तय होता है। ऊपर से स्टेट गैरेज का प्रभार भी, यानी रहने का ठिकाना हो या चलने की सवारी, सरकारी सुविधाओं के दोनों मोर्चों पर साहब की जिम्मेदारी है। अब जहां आवंटन और इंतजार के बीच इतना बड़ा संसार है और है 40 पेटी हर महीने का खेल। कांग्रेस शासन में जो प्रकाश चमक रहा था नई सरकार में राजपुताना भी हावी हो गया। पिछले पखवाड़े 122 लोगों की तबादला सूची आई, कई इधर से उधर हो गए, मगर साहब की कुर्सी पर कोई आंच नहीं आई। आखिर ऐसा कौन-सा प्रशासनिक गुण है कि तबादलों की आंधी भी साहब के सामने आकर ठिठक जाती है? कभी संपदा जैसे अहम महकमे में आईएएस अफसरों की तैनाती हुआ करती थी। साहेब के प्रकाश ने आईएएस को भी मात दे दी। अब जिम्मेदारियां हैं और छवि भी एकदम लो-प्रोफाइल! अफ़सरशाही में कहते हैं हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और। मगर कुछ साहब तो कथरी ओढ़कर घी खाने की कला में ही पीएचडी कर चुके है।
अफसरों का वीआईपी मॉडल!
अफ़सरशाही में सरकारी गाड़ी महज आने जाने का साधन नहीं, रुतबे का चलता-फिरता प्रमाणपत्र है। किसी साहब के पास छह गाड़ियों का काफिला है तो किसी के पास आठ-आठ गाड़ियों का इंतजाम! आखिर एक साहब को इतनी गाड़ियों की जरूरत क्यों है? अफसरों की इस शाही व्यवस्था की बानगी बड़े-बड़े निजी स्कूलों के बाहर सुबह-सुबह दिख जाती है। बच्चों को स्कूल छोड़ने के लिए अलग सरकारी गाड़ी, मैडम की सब्जी-भाजी और शॉपिंग के लिए अलग इंतजाम! कुछ गाड़ियां बंगले की शोभा बढ़ाती हैं, तो कुछ ड्राइवरों और कर्मचारियों के इस्तेमाल में रहती हैं। जनता के पैसे से चलने वाली इस सुविधा का हिसाब आखिर कौन रखता है? इन दिनों एक बॉडी बिल्डर साहब अपनी भुजाओं, मसल्स और कट्स-एब्स की तस्वीरों से सोशल मीडिया पर खूब महफिल लूट रहे हैं। इन साहब के पास छह गाड़ियां है। इनकी फिटनेस और कुछ दिलचस्प किस्से अगले कॉलम में बताएंगे। फिलहाल, एक कटारा साहब भी गाड़ियों के मामले में छह का आंकड़ा साधे हुए हैं। साहबों की फिटनेस और गाड़ियों की संख्या, दोनों का जलवा बरकरार है! और सुनिए, अफसरशाही का कमाल यह भी है कि एक ही अधिकारी के अलग-अलग पदों और जिम्मेदारियों के नाम पर कई गाड़ियों का काफिला है। पद बढ़ें तो जिम्मेदारी बढ़नी चाहिए, मगर यहां तो लगता है जिम्मेदारी से ज्यादा काफिलो कि संख्या बढ़ रही है। अब साहबों की गाड़ियों की भूख और रुतबे को देखिये कि अगर यही साहब कभी मुख्य सचिव की कुर्सी तक पहुंच गए, तो कहीं पूरे राज्य की सरकारी गाड़ियों को ही बंगले पर परेड के लिए न बुला लें! इधर जनता की गाड़ी गड्ढों में हिचकोले खा रही है और साहबों के काफिले में गाड़ियां घटने का नाम नहीं ले रहीं! सड़कें भले झटके दें, मगर साहबों के आराम में कोई झटका नहीं लगना चाहिए। सुशासन का ऐसा वीआईपी मॉडल हो, तो समानता भी बंगले के बाहर खड़ी सरकारी गाड़ी की तरह बस इंतजार ही करती रह जाएगी!
बीमार महकमे के सेहतमंद साहब –
छत्तीसगढ़ का स्वास्थ्य महकमा मरीजों से ज्यादा अपनी व्यवस्था के इलाज का मोहताज है। कहीं आयुष्मान के हजारों करोड़ के क्लेम, कहीं अस्पतालों की मॉनिटरिंग और इंस्पेक्शन, तो कहीं CGMSC की खरीदी में करोड़ों के सवाल। मगर इस पूरे साम्राज्य की चाबी आखिर किसके हाथ है सरकार, विभाग या कोई और? आयुष्मान की राज्य नोडल एजेंसी कोई मामूली कुर्सी नहीं। यहां से हजारों करोड़ के क्लेम की निगरानी और अस्पतालों की जांच-पड़ताल होती है। ऐसे में नियुक्ति का आधार योग्यता होनी चाहिए, न कि किसी की नजदीकी। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आयुष्मान में गड़बड़ियों का मुद्दा उठाया और चार दिन बाद, 5 अक्टूबर को उनके पूर्व ओएसडी देवेंद्र कुमार प्रधान को इसी व्यवस्था में अहम जिम्मेदारी मिल गई। शिकायत, बयान और फिर अचानक तैनाती महज संयोग मान लें, मगर सवाल तो उठेंगे ही! चर्चा है कि राजधानी के एक बड़े कॉरपोरेट अस्पताल से जुड़े प्रभावशाली पक्ष ने इस पूरे घटनाक्रम में भूमिका निभाई। अपने निजी हित साधने के लिए विपक्ष से सवाल उठवाए गए और सत्ता पक्ष को भरोसे में लेकर अपनी राह बना ली गई। अब यह कॉरपोरेट किस बड़े खेल की तैयारी में है, यह भी कम दिलचस्प सवाल नहीं है। उधर CGMSC के ‘हमर लैब’ मामले में करीब 550 करोड़ रुपये के घोटाले की जांच और लगभग 161 करोड़ रुपये के रिएजेंट इस्तेमाल से पहले एक्सपायर होने का मामला, स्वास्थ्य मंत्री जी बताइए, आयुष्मान के क्लेम की निगरानी कौन करेगा, अस्पतालों की जांच कौन करेगा और इस पूरे तंत्र की चाबी आखिर किसके हाथ है? मरीज इलाज ढूंढ रहा है, रिएजेंट एक्सपायर हो रहे हैं और कुर्सियों की सेहत दुरुस्त रखी जा रही है। सुशासन बाबू बताइये कि महकमे का इलाज होगा या सत्ता की चाबी चलाने वालों का खेल चलता रहेगा?
अफ़सरनी का जलवा –
सूबे में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक गफलत के किस्से सिर्फ अफसरों तक सीमित नहीं हैं। कुछ अफसरनियां भी अपने कामकाज और विवादों को लेकर खूब चर्चा बटोर रही हैं। आरआई से नायब तहसीलदार तक का सफर तय करने वाली एक ऐसी ही अफसरनी के इर्द-गिर्द जमीन से जुड़े विवादों की कहानी घूमती रही है। मामला वीआईपी रोड की करीब 25 करोड़ रुपये कीमत वाली बेशकीमती सरकारी जमीन का हो, जिसे निजी खसरे में शामिल करने की कोशिश का आरोप सामने आया था। इस प्रकरण में दलालों के साथ गठजोड़ के आरोप भी लगे। जमीन, नामांतरण और सीमांकन से जुड़े मामलों में आखिर किसकी भूमिका क्या रही, यह जांच और सरकारी रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकता है। मगर कहानी का दिलचस्प पहलू सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं बताया जाता। प्रशासनिक गलियारों में अफसरों से नजदीकियों और उनके कामकाज में दखल को लेकर भी बातें है। अफसरनी का यह खेल राजस्व तक सीमित नही है। आईएएस और आईपीएस अधिकारियों से नजदीकियों के किस्से भी तैरते हैं, मगर चर्चाओं और प्रमाणित तथ्यों के बीच फर्क करना जरूरी है। इन रिश्तों की हकीकत और उनकी सीमाएं क्या हैं, यह तो संबंधित लोग ही जानें, लेकिन इन नजदीकियों को लेकर उठती कानाफूसी ने ब्यूरोक्रेसी की निगाहें जरूर खींची हैं। जमीन सरकारी हो या निजी, कानून की सीमा सबके लिए एक होनी चाहिए। वरना खसरे में नाम बदलते-बदलते कहीं प्रशासन की साख ही बेनाम न हो जाए!
वर्दी पर बाबू भारी –
छत्तीसगढ़ पुलिस मुख्यालय में वर्दी की अपनी अकड़ है, आईपीएस की अपनी धमक, मगर असली कमाल तो उन बाबुओं का है, जिनकी कलम चले तो कर्मचारी मुख्यालय में दर्ज रहें और सेवा कहीं दूसरे साहब की बजाने पहुंच जाएं! करीब 11 अनुसचिवीय कर्मचारियों का किस्सा कुछ ऐसा ही है। बरसों से पसंदीदा आईपीएस अफसरों के साथ काम कर रहे है। मगर लिखित आदेश का हिसाब सामने नहीं है। यानी सरकारी नौकरी में हाजिरी का ठिकाना अलग और कामकाज का ठिकाना अलग! अब जरा इस व्यवस्था की खूबी देखिए। आम कर्मचारी को अपनी जगह बदलवाने के लिए आवेदन, सिफारिश और आदेश की लंबी परिक्रमा करनी पड़ती है। मगर यहां मौखिक व्यवस्था से ही काम चल जाता है। सरकारी दफ्तरों में मौखिक आदेश आखिर कितने दिनों तक लिखित नियमों की जगह ले सकते हैं? और अगर यह व्यवस्था वर्षों से चल रही है, तो इसकी जिम्मेदारी तय करने वाला कौन है? पुलिस मुख्यालय कोई साधारण दफ्तर नहीं, पूरे पुलिस महकमे के संचालन का अहम केंद्र है। यहां नियमों का पालन दूसरों से कराने वाले महकमे में अपने ही कर्मचारियों की तैनाती और कार्यस्थल का हिसाब साफ होना चाहिए। डीजीपी साहब के पास पुलिस प्रशासन की सर्वोच्च जिम्मेदारी है। अगर यह सब नियमानुसार है, तो लिखित आदेश सामने आने में हर्ज क्या है? और अगर आदेश ही नहीं हैं, तो वर्षों से चल रही व्यवस्था की जवाबदेही किसकी होगी? सरकारी वेतन जनता के पैसे से मिलता है, इसलिए काम कहां हो रहा है, इसका हिसाब भी साफ होना चाहिए। वर्दी का अनुशासन अगर मुख्यालय की चौखट पर ही मौखिक हो जाए, तो फिर बाकी महकमे को नियमों का पाठ आखिर कौन पढ़ाएगा?
डामर घोटाले को अमलीजामा –
छत्तीसगढ़ में करीब 2 हजार करोड़ के डामर संकट और 13 हजार करोड़ के निर्माण कार्यों पर ब्रेक की कहानी सिर्फ कीमतों की नहीं है। सवाल उस पूरे तंत्र का है, जहां डामर की आपूर्ति से लेकर ठेकेदारों की शर्तों तक, हर मोड़ पर सरकारी खजाने की परीक्षा हो रही है। सड़कें बदहाल हैं, निर्माण अटके हैं और विभागीय व्यवस्था की चमक कैमरों की तस्वीरों में दिखाई दे रही है। मगर जमीन पर विकास का डामर आखिर कहां है? डामर की कीमतों में उछाल और आपूर्ति की परेशानी वास्तविक हो सकती है, लेकिन इसी संकट की आड़ में यदि हजारों करोड़ के कामों की रफ्तार थामकर लागत बढ़ाने का दबाव बनाया जाता है, तो यह सरकारी व्यवस्था के लिए बड़ा सवाल है। ठेका लेते वक्त कम दरों की प्रतिस्पर्धा और काम के वक्त बढ़ी लागत का हवाला इस गणित में नुकसान जनता का और फायदा किसका? PWD की तकनीकी व्यवस्था में लंबे समय से कायम नेतृत्व, ठेकेदारों का प्रभाव और विभाग के भीतर फैसले लेने वाले जिम्मेदार चेहरों की भूमिका की पड़ताल जरूरी है। ENC के परिवार से जुड़े ठेकेदारी हितों का सवाल भी इसी तस्वीर का हिस्सा है। सरकारी पद और निजी कारोबारी हितों के बीच पारदर्शिता की कसौटी पर पूरी व्यवस्था को खरा उतरना होगा। उधर, विभागीय सचिव की ईमानदार प्रशासनिक छवि का असली पैमाना प्रचार और निरीक्षण की तस्वीरें नहीं, बल्कि सड़क की गुणवत्ता, ठेकेदारों पर नियंत्रण और सरकारी धन का हिसाब है। साहब की पीआर वाली तस्वीरों में सड़कें कितनी भी चमकें, जनता को गड्ढों से ही गुजरना पड़ रहा है। फाइलों में कसावट और कैमरे के सामने सक्रियता का दावा तभी मायने रखता है, जब उसका असर जमीन पर दिखे। मसला डामर की कीमतों का नहीं, पूरे निर्माण तंत्र की जवाबदेही का है। कहीं डामर संकट को अमलीजामा पहनाने की आड़ में ठेकेदारी हितों का कोई बड़ा खेल तो नहीं चल रहा? आखिर सड़कें जनता के लिए बनेंगी या सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ाने का रास्ता बनेंगी?
यक्ष प्रश्न –
1 – भ्रष्टाचार के आकंठ तक डूबा पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के मंत्री जी की कुर्सी पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं? क्या किसी महिला नेत्री को लाने की कवायद चल रही है?
2 – सामान्य प्रशासन के वो कौन-से अविनाशी हैं, जिन्हें अंश ने दबा रखा है और जिनके बिना प्रशासन का पत्ता तक नहीं डोलता?



