अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)
तालाब गंदा है, कुर्सियां सुरक्षित हैं, विवेचना कमजोर है और खबर रोकने की बेचैनी है। आरक्षक भर्ती से लेकर डीजी पदों तक, जमानत से CBI जांच तक हर रास्ता आखिर उसी दरवाजे पर क्यों आकर रुकता है? अलग-अलग मामले, अलग-अलग किरदार… लेकिन सवाल एक जवाबदेही आखिर किसकी है? अफ़सर-ए-आ’ला पूछता है आखिर सिस्टम चला कौन रहा है?

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)
तालाब का पानी गंदा क्यों है –
कवर्धा में पुलिस आरक्षक भर्ती के अभ्यर्थी 21 अगस्त से डेरा डाले हैं। कभी सद्बुद्धि यज्ञ, कभी मोमबत्ती, कभी तांत्रिक क्रिया और अब अर्थी निकालने तक की नौबत। वजह आरक्षक भर्ती की दूसरी सूची, मामला समझिए 5,967 पदों की भर्ती हुई। पहली चयन सूची और पहली वेटिंग लिस्ट भी आई, लेकिन कई अभ्यर्थियों का एक से ज्यादा जिलों में चयन होने से ज्वाइनिंग के बाद पद खाली रह गए। हाईकोर्ट भी कह चुका है कि बचे पद नियमों के तहत वेटिंग लिस्ट से भरे जाएं। अभ्यर्थियों का दावा है कि करीब 1,600 से 1,940 पद खाली हैं और इन्हीं पर दूसरी वेटिंग/चयन सूची की मांग है। गृहमंत्री विजय शर्मा भी कह चुके हैं कि पहली सूची और पहली वेटिंग हो चुकी है, अब मामला दूसरी वेटिंग का है। प्रस्ताव सरकार को भेजा गया है और अंतिम फैसला कैबिनेट को लेना है। मुख्यमंत्री ने भी मामले के लिए टीम बनाई है। जब पद खाली हैं, अभ्यर्थी इंतजार में हैं और रास्ता सरकार के सामने है, तो अड़चन कहां है? अड़चन है मुख्यालय! आरक्षक भर्ती की पूरी मॉनिटरिंग पुलिस मुख्यालय के नेतृत्व में होती है, मंत्री की नहीं। फिर पद खाली होने से लेकर दूसरी सूची तक की उलझन का जवाब सड़क पर गृहमंत्री क्यों दें? फाइल PHQ की निगरानी में, सवाल मंत्री से आखिर तालाब का पानी गंदा किसने किया? चर्चा एक ‘बगुला भगत’ लॉबी की, जो पूरे तालाब में तैर रही है। जिसे दूसरी सूची मंजूर नहीं। वजह कुछ भी हो, सड़क पर जवाब गृहमंत्री को देना पड़ रहा है और सवाल सिस्टम से पूछे जा रहे हैं। नक्सल जैसे कठिन मोर्चे पर मिली सफलताओं से गृहमंत्री का राजनीतिक कद बढ़ा है। ऐसे में उपलब्धि का श्रेय ऊपर जाता है तो विवाद का छींटा भी वहीं पड़ता है। लेकिन फाइल सिस्टम की अटके और स्याही मंत्री की छवि पर लगे यह हिसाब कुछ जमता नहीं। बात सिर्फ 1,600 या 1,940 पदों की नहीं, सिस्टम के संदेश की है और बगुला भगतों से बस इतना सवाल मछली तो बाद देखी जाएगी… पहले तो यह बताओ, तालाब का पानी इतना गंदा क्यों है?
बगुला राज –
पुलिस मुख्यालय में इन दिनों एक अजीब-सी हलचल है। 70 हजार पुलिसकर्मियों के भत्ते की फाइल इंतजार में है और तीन नए डीजी पदों की चर्चा तेज है। कमाल यह कि जवानों के हिस्से में इंतजार और साहबों के हिस्से में एक्स-कैडर! छत्तीसगढ़ में अभी स्वीकृत डीजी कैडर के दो और एक्स-कैडर के दो पद हैं। अब तीन और एक्स-कैडर पद बनाने की चर्चा है, जिनमें 1994 बैच के एसआरपी कल्लूरी, 1995 बैच के प्रदीप गुप्ता और 1996 बैच के विवेकानंद के नाम सामने हैं। मगर इन अतिरिक्त पदों के लिए केंद्र की पूर्व मंजूरी अभी बाकी है। याददाश्त भी बड़ी अजीब चीज है। 2018 में तीन एक्स-कैडर डीजी पदों का ऐसा ही खेल हुआ था और बाद में मामला अदालत तक पहुंचा। अब वही ‘तीन’ फिर लौट आए हैं, बस चेहरे नए हैं। इधर 70 हजार पुलिसकर्मियों के लिए ₹5 हजार विशेष रिस्पांस अलाउंस की सिफारिश हुई थी, मगर उसकी फाइल अभी भी रास्ता देख रही है। जवानों के लिए पद कम पड़ते हैं, बड़े साहबों के लिए पद बढ़ जाते हैं पुलिस मुख्यालय का यह कैसा गणित है। कहा जा रहा है कि नए पद सिर्फ पदोन्नति का रास्ता नहीं, आगे की बड़ी कुर्सी का समीकरण भी साध सकते हैं। आखिर पसंद का चेहरा मुखिया की कुर्सी तक पहुंचे, तो रास्ते में कितनी कुर्सियां बनानी पड़ेंगी यह गणित बगुला भगत सटीक समझता है। हाउस के तालाब में बगुला बहुत शांति से अपने हिस्से की मछली का इंतजार कर रहे हैं। मगर बगुला भगत पानी में चाहे जितना निर्विकार खड़ा रहे, तालाब के पानी में उठती लहरें बता देती हैं कि पैर किस तरफ चल रहे हैं।
जमानत की विवेचना –
दुर्ग के दो हाईप्रोफाइल मामलों में हाईकोर्ट से जमानत क्या मिली, अब सवाल आरोपियों से ज्यादा विवेचना की धार पर खड़ा हो गया है। एक तरफ करीब पांच एकड़ में अफीम की खेती का मामला। कार्रवाई के लिए पुलिस, राजस्व, आबकारी, NCB, FSL और सीन ऑफ क्राइम तक की टीम पहुंची। मामला NDPS एक्ट में दर्ज हुआ। लेकिन जमानत के वक्त अदालत के सामने यह तथ्य आया कि विनायक ताम्रकार न खेत में मौजूद था, न उसके कब्जे से नशीला पदार्थ मिला। जांच पूरी, चार्जशीट दाखिल और सह आरोपियों को जमानत नतीजा सामने है। दूसरी तरफ BSP से लोहा चोरी का मामला मास्टरमाइंड संजय सिंह को भी जमानत मिल गई। FIR रद्द करने की मांग कोर्ट ने जरूर खारिज की, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि इस स्तर पर साक्ष्यों का परीक्षण या मिनी-ट्रायल नहीं किया जा सकता। अब असली सवाल यही है इतनी बड़ी-बड़ी टीमें, इतनी बड़ी कार्रवाई और इतने गंभीर आरोप… फिर अदालत में केस की पकड़ इतनी ढीली क्यों पड़ रही है? अगर विवेचना मजबूत थी तो जमानत के आधारों में पुलिस की मेहनत क्यों नहीं दिखी? और अगर कहीं विवेचना में कमी रह गई, तो टीम बनाने और उसकी निगरानी करने वाले अफसरों की जवाबदारी कौन तय करेगा? क्योंकि मामला सिर्फ दो आरोपियों के बाहर आने का नहीं है। सवाल यह है कि क्या हाईप्रोफाइल केसों में कार्रवाई मैदान में बड़ी दिखती है और विवेचना अदालत की कसौटी पर आते-आते कमजोर पड़ जाती है? जमानत अदालत का अधिकार है, लेकिन कमजोर विवेचना किसी की मजबूरी नहीं हो सकती। अब कप्तान से सवाल है विवेचना की निगरानी किसने की? और विवेचक से केस को अदालत की कसौटी तक पहुंचाने की तैयारी कितनी थी? टीम बड़ी थी, दावा बड़ा था… फिर केस की नींव कमजोर क्यों निकली?
जेब का सबूत कहां गया –
झीरम पर अदालत का फैसला आ गया। 10 आरोपी दोषी ठहराए गए, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल फिर कह रहे हैं झीरम की बड़ी राजनीतिक साजिश की जांच अब तक नहीं हुई, इसलिए न्याय अधूरा है। बात याद दिलाने की है। विपक्ष में रहते हुए यही बघेल कहते थे कि झीरम की साजिश के सबूत उनकी जेब में हैं। फिर पांच साल सरकार भी रही अगर सबूत जेब में थे तो जांच की मेज तक क्यों नहीं पहुंचे? अब फिर वही सवाल, वही साजिश और वही अधूरे न्याय की बात। तेरह साल बाद दस दोषी मिल गए, अब जेब वाला सबूत भी मिल जाए। झीरम के शहीदों को राजनीति नहीं, पूरा सच चाहिए। सवाल सीधा है जेब में सबूत था, तो फाइल तक क्यों नहीं पहुंचा?
कुर्सी का सवाल –
बिलासपुर के श्रवण सूर्यवंशी की पुलिस हिरासत में मौत का मामला अब थाने की चारदीवारी से निकलकर सुप्रीम कोर्ट और CBI जांच तक पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर बेहद सख्त टिप्पणी की और इसी सुनवाई में DGP को “टोटली इनकम्पीटेंट” यानी अयोग्य तक कहा गया। जांच का दायरा पुलिस हिरासत, जेल दाखिले और घटना के बाद की कार्रवाई से जुड़े अधिकारियों तक पहुंच रहा है। यानी पुलिस और जेल, दोनों तंत्र जांच के घेरे में हैं। CBI की नजर घटना से जुड़े मोबाइल और दूसरे डिजिटल साक्ष्यों पर भी है। पुराने मोबाइल बदलने, डिवाइस इधर-उधर करने और सबूतों को ठिकाने लगाने की चर्चाओं ने सवाल और गंभीर कर दिए हैं क्या मौत के बाद सच के निशान भी मिटाने की कोशिश हो रही है। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल है कि आरोपी की मौत हो जाने के बावजूद बिलासपुर पुलिस ने चालान आखिर किस आधार पर पेश कर दिया। क्या मौत के बाद भी कार्रवाई की यह प्रक्रिया महज औपचारिकता थी या कहानी को किसी तय दिशा में मोड़ने और सबूतों पर पर्दा डालने की कोशिश। अब मामला सिर्फ “क्या हुआ” तक सीमित नहीं है, बल्कि “क्या छिपाया गया और मौत के बाद क्या किया गया?” तक पहुंच चुका है। विडंबना देखिए जिन महकमों की भूमिका पर सवाल हैं, उनके मुखिया आज भी अपनी-अपनी कुर्सियों पर कायम हैं और उसी मामले की जांच CBI कर रही है। फाइल अब पुलिस मुख्यालय में नहीं, CBI की मेज पर है। और जिस कुर्सी पर बैठकर जवाब देना था, उसी कुर्सी पर सवाल खड़े हो जाएं तो अफ़सर-ए-आ’ला से बस इतना पूछना बनता है कुर्सी बड़ी है या जवाबदेही?
न्यायधानी में अन्याय –
न्याय की राजधानी में जब कानून-व्यवस्था संभालने के लिए धारा 144 का सहारा लेना पड़े, तो सवाल सिर्फ सड़क पर खड़े लोगों से नहीं, सिस्टम से भी पूछे जाते हैं। बिलासपुर में बीते दिनों दो पक्षों का विवाद इतना बढ़ा कि पथराव, तनाव और पुलिस पर हमले के बाद धारा 144 लगानी पड़ी। यही वह न्यायधानी है, जहां श्रवण सूर्यवंशी की हिरासत में मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए और जांच CBI को सौंप दी। हाईकोर्ट भी बिलासपुर की कानून-व्यवस्था और अपराध को लेकर पुलिस को कई मौकों पर आईना दिखा चुका है। यानी न्यायधानी की पुलिसिंग पहले से ही अदालतों की निगाह में है। अब कप्तान इसे दो लोगों का आपसी विवाद बता रहे है। बात मान भी लें, लेकिन दो लोगों की लड़ाई अगर भीड़, पथराव, पुलिस पर हमले और धारा 144 तक पहुंच जाए तो फिर मामला सिर्फ दो लोगों तक कैसे रह गया। यहां कुछ पुराने आईने भी सामने हैं। बलौदाबाजार में हिंसा के बाद कलेक्टर-एसपी हटे, बाद में निलंबित भी हुए। कवर्धा के लोहारीडीह में हिंसा और हिरासत मौत के बाद कलेक्टर-एसपी का तबादला हुआ। फिर न्यायधानी में कप्तान छह महीने की मोहलत लेते रहे और इसी दौरान घटनाएं होती रहीं, तो जवाबदेही का पैमाना आखिर क्या है? आखिर माहौल बिगड़ने के संकेत पहले क्यों नहीं पकड़े गए। हालात धारा 144 तक पहुंचने से पहले पुलिसिंग कहां थी। क्योंकि धारा 144 लगाना व्यवस्था संभालने का उपाय है, पुलिसिंग की सफलता का प्रमाण नहीं। असली सफलता तो यह है कि हालात वहां तक पहुंचें ही नहीं। बलौदाबाजार और कवर्धा में घटना के बाद कुर्सियां बदलीं। बिलासपुर में सवाल है छह महीने में क्या बदला? न्यायधानी को पुलिस की जरूरत सिर्फ तब नहीं, जब हालात बिगड़ जाएं। जरूरत तो यह है कि हालात धारा 144 तक पहुंचें ही नहीं। अदालतों की टिप्पणियां चेतावनी थीं या सिर्फ कागज का हिस्सा? क्योंकि न्याय की नगरी में अगर अन्याय रोकने के लिए भी धारा 144 लगानी पड़े, तो परीक्षा भीड़ की हो रही है या सिस्टम की?
खबर से किसे डर –
विधानसभा की दस्तावेजी पड़ताल वाली सीरीज आगे बढ़ी तो सचिव दिनेश शर्मा के कार्यकाल से जुड़ी नियुक्तियों, पदोन्नतियों और दूसरी घटनाओं के दस्तावेज सामने आए। सवाल उठे, खबरें प्रकाशित हुईं और इसके बाद खबर रोकने का दबाव भी सामने आ गया। खास बात यह रही कि खबर रुकवाने के लिए नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत का हवाला देकर लोग पत्रकार तक भेजे गए। संदेश बताया गया दिनेश शर्मा उनके आदमी हैं, खबर रुकवाओ।
अब सवाल खबर से बड़ा है। जब विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह हैं और सरकार भाजपा की है, तो नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत को दिनेश शर्मा की इतनी चिंता क्यों सता रही है? अगर उनके कार्यकाल में हुई घटनाओं और सामने आए दस्तावेजों में कुछ गलत नहीं है, तो खबर रोकने की जरूरत क्या है? जवाब दिया जा सकता है, दस्तावेजों को खारिज किया जा सकता है या जांच की मांग की जा सकती है। लेकिन खबर रोकने की कोशिश क्यों? मामला इसलिए भी अहम है कि दिनेश शर्मा का मौजूदा कार्यकाल नवंबर में खत्म होने वाला है और उन्हें दूसरी बार एक्सटेंशन देने की तैयारी की बात सामने आ रही है। ऐसे में वर्षों के कार्यकाल को लेकर उठे सवालों के बीच यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर उसी व्यक्ति को फिर जिम्मेदारी देने की जरूरत क्यों पड़ रही है और फिर वही सवाल स्पीकर की कुर्सी पर रमन सिंह हैं, सरकार भाजपा की है, तो दिनेश शर्मा के लिए नेता प्रतिपक्ष पैरवी क्यों करवा रहे हैं? खबर दस्तावेजों से निकली है, इसलिए जवाब भी दस्तावेजों से ही दिया जाना चाहिए। कुर्सियां बदलती रहती हैं, दस्तावेज नहीं और खबर रोकने से सवाल खत्म नहीं होते आखिर दिनेश शर्मा की कुर्सी को लेकर इतनी बेचैनी किसे है? सवाल खबर का है या कुर्सी के पीछे खड़े किसी और किरदार का?
यक्ष प्रश्न –
1 – कौन से एक विभाग ने अंगद के पैर को उखाड़ फेंका, क्या इसके अच्छे परिणाम देखने को मिलेंगे?
2 – मलाईदार पोस्टिंग के लिए कप्तानों का रेट कौन तय कर रहा है और आखिर कुर्सी की कीमत क्या चल रही है?


