अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)

कहीं काले कारोबार की सफेद मछली, कहीं जंगल का सैलाभ, तो कहीं 22 करोड़ की ‘रख ले जा’ और वर्दी का सपना। तिवारी का तिलिस्म, जनसंपर्क का दरबार और सियासत की विषकन्या, सत्ता का तालाब, अपने जाल और अपने रखवाले! इस रविवार हर किरदार का अपना खेल, हर खेल के पीछे एक चेहरा!

 

सफेद मछली –
यह प्रजाति वैसे तो तलहटी में पाई जाती है, मगर इन दिनों उफान ऐसा है कि मुर्गे से लेकर जानवरों तक और धर्मस्थल से लेकर सत्ता के स्पीकर तक यह मछली अपना अलग ही हुनर दिखा रही है। पहले मुर्गे से मिली तो गले में दो करोड़ का हार आ गया। अब सीमावर्ती जिले में नए-नए पैंतरे आजमा रही है। मछली भले ब्राह्मण समाज से आती है, मगर इस काले खेल की थाली में मुर्गा ही नहीं, अवैध जानवर और शराब की खेप भी तैर रही है। धर्मनगरी और आस्था के दरबार तक खुलेआम शराब पहुंच रहा है। कहानी इतनी ही नहीं। सीमावर्ती जिले से जानवरों का अवैध तस्करी ऐसी फल-फूल रही है कि माल गृहमंत्री के जिले से होकर मध्यप्रदेश तक पहुंच जाता है। जानवरों के इस काले कारोबार के आगे गांजे और दूसरे तस्करी के धंधे भी छोटे नजर आते हैं। अब सीमा पर कारोबार का पैमाना ही ऐसा हो तो समझिए, तालाब में मछली नहीं, मगरमच्छों का साम्राज्य तैर रहा है! जानवरों के इस खेल में हर महीने दस खोखे मछली के पेट में चला जाता है। तो शराब का फिक्स भी खोखे का है। विडंबना यह कि इस खेल में पत्रकार, नेता और अधिकारी तक शामिल है। किसको कितना मिलता है, इसकी बाकायदा सूची भी बनी है। सीमा से राजधानी तक कई सफेदपोशों के नाम इस सूची में है। इसका जिक्र फिर कभी फिलहाल सूची खुली तो कई चेहरों की सफेदी उतर जाएगी। कल तक यह मछली साहित्य-कला वाले जिले के युवराज के साथ जुगलबंदी में थी। अब स्पीकर वाले युवराज के साथ अलग धुन में नाच रही है। अब जब स्पीकर ही सहारा देने लगे तो जाल का डर किसे! तालाब अपना, धुन अपनी और रखवाले भी अपने! इसे संयोग कहिए या प्रशासनिक मत्स्य नीति, मछली का उफान लगातार बढ़ रहा है। अब इतने बड़े खेल और काले कारोबार के बाद चेहरे की चमक जरूरी हो जाती है। सो राजधानी के मुद्रा मीनार मछली अपना सफेद चेहरा और चमकाने आती है। उस जगह जो सेलिब्रिटियो का नउआ कहलाता है। आखिर करोड़ों के इस खेल में चेहरे पर शिकन अच्छी थोड़े ही लगती है! तालाब में गंदगी हो, मगर ऊपर से चमक कायम रहनी चाहिए। यही सफेद मछली का हुनर है!

तिवारी को 10 थाने –
संस्कारों के इस जिले में 12 थाने हैं, मगर 10 थानों की चाबी तिवारी जी के हाथो में सौप दी गई। ये वही तिवारी जी हैं, जो बगल वाले जिले में धार्मिक विवाद को लेकर सुर्खियां बटोर चुके हैं। अब सफेद मछली ने स्पीकर बजाया और तिवारी जी की एंट्री हो गई। सत्य के प्रकाश शेख चिल्ली के भी बेहद करीबी बताए जाते हैं। तत्कालीन सरकार में जो औरा बना था, उसका असर आज भी बरकरार है। सरकार बदली, सत्ता के गलियारों में चेहरे बदले, मगर सत्य के तिवारी जी के रुतबे की रोशनी अब भी मंद नहीं पड़ी। इन्हे ट्रैफिक का इंचार्ज बनाया, मगर पुराने साहब ने चार्ज नहीं दिया। अब चार्ज मिले न मिले, तिवारी जी मछली के करीबी ठहरे, सो काम संभालने लगे। सरकारी चार्ज के लिए कागज जरूरी है, मगर मछली का भरोसा हो तो कागज किस खेत की मूली है। इधर सफेद मछली का अपना सिंघम अवतार भी है। रोजाना दबंग अंदाज में रीलें बनती हैं। शराब के एक-दो आरोपी पकड़े, कैमरा चालू, रील तैयार और सोशल मीडिया पर सिंघम का जलवा! मगर धर्मनगरी में शराब की खेप पहुंचने की बात हो तो कैमरा भी आंखें मूंद लेता है। छोटे शिकार पर दहाड़, बड़े कारोबार पर सन्नाटा छा जाता है। आखिर कैसी सिंघमई है, जिसकी दहाड़ आरोपी देखकर निकलती है और खेप देखकर गले में अटक जाती है? इसी जिले में उसी कैडर की एक महिला प्रशिक्षु अधिकारी भी हैं। नई हैं, समझदार हैं, सीखने की ललक रखती हैं, मगर उन्हें किनारे लगा दिया गया। कहीं कल को प्रशिक्षु रील बनाने लगे, सवाल पूछ बैठे या सिंघम की दबंगई के पीछे का हिसाब समझने लगे! सो प्रशिक्षु किनारे और तिवारी जी को खुला मैदान मिल गया। तिवारी जी भी मंझे हुए खिलाड़ी हैं। सीमा पार के अवैध खेल की निगरानी हो या शराब की खेप का हिसाब, कहां से उठाना है, कहां पहुंचाना है, हर खांचे में फिट बताए जाते हैं। मगर कभी-कभी खेल के जोश में ऐसी बात बोल जाते हैं कि अपनी ही मछली का पानी मटमैला हो जाता है। सफेद मछली जिस राज को तलहटी में दबाती है, तिवारी जी की जुबान उसी पर बुलबुले छोड़ देती है! अब हिसाब लगाइए 12 थानों का जिला, 10 थानों पर तिवारी जी, प्रशिक्षु किनारे, सिंघम की रीलें चालू और धर्मनगरी की शराब पर खामोशी। आखिर यह जिला है या सफेद मछली की निजी मत्स्य पाठशाला? रील में सिंघम हीरो है, मगर कैमरे के पीछे का किरदार कौन है, यही सबसे बड़ा सवाल है!

जंगल में सैलाभ का समुंदर –
जंगल विभाग में इन दिनों एक ऐसा सैलाभ उठा है कि जंगल से निकलकर समुंदर में गोते लगा रहा है। बिट गार्ड से रेंजर, रेंजर से एसडीओ और एसडीओ से डीएफओ, सीसीएफ तक की पोस्टिंग हो या तबादले, टेंडर हो या वर्क ऑर्डर, हर जगह इसी सैलाभ की लहरें उठती है। लगता है, मंत्री जी के विभाग में सैलाभ ही समुंदर बन बैठा है। बताते हैं, छोटे से छोटे कर्मचारी से लेकर बड़े-बड़े अफसरों तक फोन की घंटी बजती है। राज्य सेवा का यह सैलाभ उच्च पदों पर बैठे अफसरों को भी चमकाने और देख लेने की बात कहता है।जंगल में किसकी पोस्टिंग होगी, किसका पत्ता कटेगा और किस काम का टेंडर किसे मिलेगा, यह ओएसडी साहब ही तय करते है। अब यह सैलाभ अपनी मर्जी से उठा है या मंत्री जी के इशारे पर, यह तो मंत्री जी ही जानें। वैसे जंगल विभाग की खासियत भी गजब है। हर बार कोई न कोई ऐसा किरदार जरूर पैदा हो जाता है, जो जंगल में अपना मोर नचाता है, खुद ही दृश्य देखता है, खुद ही समझता है और खेल भी खुद ही खेलता है। अफसरशाही किनारे खड़ी तमाशा देखती है और जंगल के असली रखवाले पोस्टिंग-तबादले के मौसम में अपनी बारी का इंतजार करते हैं। जंगल में यह सैलाभ किसका है? मंत्री जी का, ओएसडी का या फिर उस व्यवस्था का, जहां कुर्सी पर बैठा अफसर भी फोन की लहर से कांपने लगता है। जंगल में मोर नाच रहा है, मगर देख कौन रहा है और ताल किसके इशारे पर पड़ रही है, इसका हिसाब अभी बाकी है!

तिवारी का तिलिस्म,और हुस्न का सप्लायर –
सरकार की छवि चमकाने के लिए जनसंपर्क विभाग है, लेकिन यहां एक तिवारी जी है जो सरकार की छवि का बंटाधार करने में विपक्ष से ज्यादा मेहनत कर रहे है। छब्बीस साल से जमे तिवारी जी का हुनर भी गजब है। सरकारें बदलीं, चेहरे बदले, मगर साहब का दरबार और दरबारदारी का अंदाज नहीं बदला। कहते हैं, साहब के पास हर मर्ज की दवा है। किसी को चढ़ावे से साधना हो, किसी को सप्लाई से और किसी को हुस्न के जलवों से, तिवारी जी के पास हर इंतजाम का अपना मसौदा है। साहब के संपर्कों का दायरा इतना व्यापक है कि शराब, शबाब और कबाब की त्रिवेणी से लेकर हुस्न की महफिल तक, खास लोगों की पसंद का पूरा ख्याल रखा जाता है। किसे किस शौक से साधना है, किसके लिए कैसी महफिल सजानी है और किसके दरबार में कौन-सी भेंट पहुंचानी है, इस कला में साहब को पुराने खिलाड़ी है। लेह-लद्दाख से लेकर केरल तक की सैर और आवभगत इसी तिलिस्म का हिस्सा हैं। अब जब घर की दहलीज ही शुक्ला दरबार तक पहुंच गई है तो शर्म और लज्जा किस खेत की मूली! साहब के पास लोगों के शौक पूरे करने के ऐसे-ऐसे इंतजाम हैं, जिनका जिक्र सरकारी फाइलों में नहीं, बंद कमरों की कहानियों में होता है। सुशासन बाबू भी सब कुछ जानकर मौन हैं। यह चुप्पी क्यों है, इसे समझने के लिए रॉकेट साइंस की जरूरत नहीं। छब्बीस साल का अनुभव, सत्ता के गलियारों में गहरी पैठ और हर दौर में सलामत कुर्सी यह कोई मामूली संयोग तो नहीं हो सकता! खैर, जनसंपर्क का काम सरकार की उपलब्धियां जनता तक पहुंचाना है, न कि शराब, शबाब और हुस्न के जलवों से खास लोगों को साधना। सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल किसी की निजी आवभगत या सप्लाई के लिए नही है और सरकारी विभाग कोई निजी दरबार नहीं, जहां साहब की मर्जी ही नियम और साहब का मसौदा ही संविधान बन जाए। साहब, सरकार की छवि चमकाने निकले थे, कहीं ऐसा न हो कि हुस्न के जाल और दरबारी तिलिस्म में सुशासन की साख ही उलझ जाए। क्योंकि जनसंपर्क का असली काम जनता से संपर्क है, किसी खास की पसंद का इंतजाम करना नहीं।

रख ले जा –
जंगल में 22 करोड़ मिले, इनोवा चली, साहब लौटे और कहानी में अब सिपाही बनाने का सपना भी जुड़ गया। यह बरामदगी थी या भरोसे का कोई नया कारोबार? ‘रख ले जा’ के साथ जंगल पहुंचे खास गोपनीय सैनिक और थाना प्रभारी को रकम की पूरी जानकारी थी। अब रकम कहां रखी गई, किसकी निगरानी में है और उसका हिसाब किस फाइल में बंद है, यह सवाल अपनी जगह खड़ा है। मगर कहानी का असली तड़का तो वापसी के बाद लगा। कहते हैं, गोपनीय सैनिक को कॉन्स्टेबल बनाने का भरोसा मिला और साथ में हिदायत भी किसी को भनक नहीं लगनी चाहिए! जंगल में करोड़ों की बरामदगी और लौटते ही वर्दी का सपना। अब यह महज संयोग है या भरोसे की कोई खास किश्त, यह तो जांच बताएगी। भर्ती की अपनी प्रक्रिया है, फिर साहब किस हैसियत से भविष्य की वर्दी का सपना बांट रहे हैं? उधर कनिष्ठ अफसरों पर एफआईआर की तलवार, इधर इनोवा के सफर और रकम की सुपुर्दगी पर सवाल। जांच अगर सिर्फ नीचे वालों की जेब टटोलती रही, तो ऊपर तक जाती कहानी के पन्ने कौन खोलेगा? साहब, ‘रख ले जा’ तो कह दिया, अब यह भी बता दीजिए 22 करोड़ किसके पास हैं और सिपाही बनाने का सपना किस भरोसे पर बांटा गया? जंगल में रकम मिली थी, कोई जागीर नहीं कि हर कोई अपना हिस्सा लेकर लौट जाए!

विषकन्या की नई सियासी पटकथा –
पुराने राजे-रजवाड़ों में विषकन्याओं से दुश्मनों को ठिकाने लगाने के किस्से मशहूर हैं। अब जमाना बदल गया है, तलवार की जगह टिकट और सियासत ने ले ली है। बिलासपुर से सटे इलाके में भी कुछ ऐसी ही सियासी पटकथा लिखी जा रही है। फर्क बस इतना है कि यहां निशाने पर कोई दुश्मन नहीं, कभी अपना ही मित्र रहा है। कहते हैं, एक नेताजी ने अपने मित्र को आगे बढ़ाया, मगर अब उसी मित्र के सियासी आंगन में एक नए किरदार की एंट्री हो गई है। मैडम कभी खुद टिकट की दावेदार थीं, मगर टिकट उसी समाज के दूसरे नेताजी को मिला, जो चुनाव जीतकर आगे बढ़ गए। मैडम की महत्वाकांक्षा खत्म नहीं हुई। अब इलाके के मंत्री और सांसद साहब के साथ उनकी मौजूदगी चर्चा में है। संयोग यह कि साहब भी उसी समाज से आते हैं। मैडम को उम्मीद है कि केंद्रीय स्तर के नेताजी फिर कोई मौका दिलवा देंगे। यह महज मेल-मुलाकात है या पुराने मित्र के सियासी समीकरणों में कोई नई चाल चली जा रही है? राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी के बीच टिकट का फासला बहुत छोटा होता है। मैडम अपनी मंजिल तलाश रही हैं, साहब अपने समीकरण साध रहे हैं और पुराने मित्र को शायद भनक भी नहीं कि पटकथा में उनका किरदार बदलने की तैयारी है। विषकन्या का रूपक अपनी जगह, मगर सियासत का असली जहर उम्मीद और महत्वाकांक्षा में घुला होता है। देखना यह है कि मैडम की सियासी मंजिल करीब आती है, पुराने मित्र का पत्ता कटता है या केंद्रीय नेताजी पटकथा में कोई नया किरदार उतार देते हैं। राजनीति की बिसात पर मोहरे भले अपने हों, चाल किसकी है, इसका पता बाजी पलटने के बाद ही चलता है!

यक्ष प्रश्न –

1 – पवन साय से गुपचुप सौजन्य भेंट कर अपनी बात रखने वाले ब्यूरोक्रेट्स को चिंता क्यों सताने लगी है? अब संविदा में अच्छी कुर्सी की आस लगाए बैठे सेवानिवृत्त अफसरों का क्या होगा?

2 – स्मृति ईरानी के प्रभारी बनते ही भाजपा के किन-किन नेताओं, मंत्री, मुखिया की चिंता बढ़ी आखिर कुर्सी किसकने का डर किसको सताने लगा है? 

3 – किस नेता ने एयरपोर्ट में ही पीड़ा जाहिर की और कहा ईरानी जी का बनना ठीक नहीं हुआ ?

 

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