अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)
कुर्सियों का खेल, कनेक्शनों की रेल और पर्दे के पीछे का पूरा राज…कहीं शहर जल रहा है, कहीं कारवां दौड़ रहा है, तालाब में तिवारी है और शुक्ला का आशीर्वाद है, कहीं पतवार पर कब्जे की जंग, इस रविवार, अफ़सर-ए-आ’ला में पढ़िए सत्ता के गलियारों के वे किस्से, जिन पर सवाल बहुत हैं और जवाब कम…

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)
किस्सा कुर्सी का-2
पिछले सप्ताह अफसर-ए-आला में न्यायधानी के कप्तान साहब की कुर्सी और बिगड़ती कानून-व्यवस्था पर तथ्य आधारित सवाल उठाए गए थे। सवाल चाकूबाजी, लूट, हत्या और बढ़ते अपराधों के आंकड़ों को लेकर थे। हाईकोर्ट की टिप्पणियां भी सामने थीं। हमने आगाह किया था कि शहर की कानून-व्यवस्था पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। सवाल था जब अपराध बढ़ रहे हैं और अदालतें पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रही हैं, तो कप्तान की कुर्सी का हिसाब कौन मांगेगा? कॉलम छपा तो तथ्यों का जवाब नहीं आया। अलबत्ता, जिले से लेकर मुख्यालय तक घंटी घूम गई। कप्तान साहब ने मीटिंग बुला ली। हमारी फाइल खोजने का अभियान शुरू हो गया। शायद कहीं ऐसी बात ढूंढनी थी, जिसे जोड़कर कॉलम में उठाए गए सवालों को खारिज किया जा सके। हमने आगाह किया था, लेकिन कॉलम के कुछ ही दिनों बाद न्यायधानी खुद तनाव की आग में घिर गई। दो पक्षों की पुरानी रंजिश और सोशल मीडिया की चिंगारी ने ऐसा रूप लिया कि पथराव हुआ, लोग घायल हुए और पुलिस को हालात संभालने के लिए बल प्रयोग करना पड़ा। आज भी स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं है और धारा 144 लागू है। पुलिस बल की तैनाती के बीच प्रशासन हालात पर नजर रखे हुए है। यह वही शहर है, जहां हाईकोर्ट है, मुख्य न्यायाधीश और कई न्यायाधीशों के निवास हैं, रेंज आईजी का मुख्यालय है। सवाल यह है कि जिनके बीच पहले से रंजिश थी, क्या वे पुलिस की नजर से बाहर थे? पुरानी तनातनी नहीं दिखी, सोशल मीडिया की चिंगारी नहीं दिखी, शहर में बढ़ता तनाव नहीं दिखा। लेकिन कॉलम लिखने वाले की फाइल जरूर दिख गई। कप्तान साहब ढाई साल से जमे हैं। अपराधों पर सवाल उठे, हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी की और अब सांप्रदायिक तनाव ने न्यायधानी की छवि पर सवाल खड़े कर दिए। मगर कुर्सी है कि टस से मस नहीं। हर तबादला सूची से पहले चर्चा होती है अबकी बार जाएंगे। सूची आती है, कोई दूसरा चला जाता है और साहब फिर अपनी जगह, गलियारों में पुराने रिटायर्ड खुफिया साहब और पुराने कनेक्शन की चर्चा होती है। वही साहब, जिनके साथ कभी फोन-टैपिंग के चर्चित प्रकरण में कप्तान साहब का नाम भी सामने आया था। क्या पुराने समीकरण आज भी कुर्सी का सुरक्षा कवच बने हुए हैं? जिस तेजी से कॉलम के बाद पत्रकार की फाइल खंगालने में मशीनरी जुट गई, उसी तेजी से अगर पुरानी रंजिश, बढ़ते अपराध और शहर में बनते तनाव पर नजर रखी गई होती तो क्या न्यायधानी को यह दिन देखना पड़ता? आखिर पुलिस के लिए ज्यादा जरूरी क्या था पत्रकार की फाइल खंगालना या शहर की शांति बचाना? क्योंकि पत्रकार की फाइल तो मिल गई, मगर पुलिस की नजर से शहर की शांति कब निकल गई इसका जवाब अभी बाकी है।
22 करोड़ का खेल
बस्तर संभाग के एक जिले में नक्सलियों द्वारा डंप किए गए 22 करोड़ रुपये की बरामदगी हुई। कार्रवाई को बड़ी कामयाबी माना गया। मामला इतना बड़ा था कि कुछ कनिष्ठ अफसरों ने भी पूरी तस्वीर देखी और आपस में चर्चा कर ली। बस, यहीं से 22 करोड़ की पटकथा बदल गई। फिर बड़े साहब की एक गोपनीय रिपोर्ट संभाग के उससे भी बड़े साहब तक पहुंची। वहां से बिना तथ्यों और साक्ष्यों की गहराई से पड़ताल किए कुछ कनिष्ठ अफसरों के खिलाफ एफआईआर के लिए मामला पुलिस मुख्यालय भेज दिया गया। लेकिन मुख्यालय ने बिना ठोस आधार के सीधे अपराध दर्ज करने से बचना बेहतर समझा। अब बात दो जगह अटकी है मातहतों का क्या होगा और 22 करोड़ का क्या हुआ? जंगल में कभी नक्सली ढूंढे जाते थे। इस बार नक्सलियों का डंप मिल गया, रकम भी बरामद हो गई। लेकिन उसके बाद कुछ लोगों ने जो देखा और जिस पर चर्चा की, वह शायद भारी पड़ गया। अब रकम से ज्यादा चर्चा करने वाले रडार पर हैं। गलियारों में अब नाम नहीं लिए जा रहे, मगर निखिल का सन्नाटा, अशोक का धुआं और कुमार का हिसाब खूब चर्चा में है। जानने वाले इशारा समझ रहे हैं और न जानने वाले अब भी 22 करोड़ की गिनती में उलझे हैं। नक्सलवाद का चैप्टर बंद होने को है, लेकिन 22 करोड़ की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। इंतजार यह है कि कनिष्ठ अफसरों की फाइल का अंजाम क्या होगा और रकम की पूरी तस्वीर कब सामने आएगी। कभी जंगल में नक्सली 22 करोड़ डंप करते थे। अब चर्चा है कि साहब के नाम में ही “रख ले जा” है तो फिर 22 करोड़ आखिर रखा किसने और ले गया कौन?
कारवां, कृपा और कनेक्शन
विधानसभा के एक उप सचिव महोदय के लिए लाखों रुपये की सुविधाओं से लैस Caravan की कहानी इन दिनों सत्ता के गलियारों में खूब घूम रही है। Caravan यानी ऐसा चलता फिरता वाहन, जिसमें घर जैसी तमाम सुविधाएं मौजूद रहती हैं। कहा जा रहा है कि साहब पर विधानसभा सचिव की ऐसी कृपा हुई कि सरकारी दायरे में कारवां भी दौड़ पड़ा और प्रचार-प्रसार भी जमकर हुआ। बस सवाल यह है कि अनुमति पहले मिली थी या कारवां पहले चल पड़ा? कहानी यहीं तक होती तो इसे सरकारी सुविधाओं का मामला मानकर छोड़ दिया जाता। मगर शर्मा बंधुओं के रिश्तों ने इसे और दिलचस्प बना दिया है। एक भाई विधानसभा-प्रमुख के कार्यालय से जुड़े हैं, दूसरा विपक्ष-प्रमुख के आसपास। आरोप तो यहां तक हैं कि विधानसभा की कुछ अंदरूनी गतिविधियों और सूचनाओं का रास्ता भी भाईचारे के जरिए इधर से उधर पहुंचता है। अगर इसमें जरा भी सच्चाई है तो मामला सिर्फ पारिवारिक प्रेम का नहीं, विधानसभा की गोपनीयता का भी है और फिर पुरानी फ्लोर सीलिंग वाली घटना का किस्सा भी साथ चल रहा है। कार्रवाई के बजाय छुट्टी, सूचना के बजाय चुप्पी, अब सवाल यह है कि विधानसभा में सबसे मजबूत चीज नियम हैं या रिश्ते? Caravan तो साहब का है, मगर असली सफर सूचना का बताया जा रहा है। बस फर्क इतना है कि Caravan सड़क पर चलता है और कनेक्शन परदे के पीछे और अब विधानसभा की निष्पक्षता पूछ रही है यह करुणा है, कारवां है या कनेक्शन का ताना-बाना?
तिवारी जी की दो यात्राएँ –
एक तरफ तिवारी जी पत्रकारों को पेंगोंग झील की खूबसूरती दिखा रहे हैं, इधर राजधानी में लोग उस जगह का पता खोज रहे हैं, जहां कागजों में तालाब दर्ज है और जमीन पर एटमोसफिरिया, जनसंपर्क की भाषा में इसे शायद पॉजिटिव स्टोरी मैनेजमेंट कहते होंगे। तिवारी जी कोई नए खिलाड़ी नहीं हैं। राज्य बनने के बाद से सरकार की छवि चमकाने वाले महकमे के आसपास उनकी मौजूदगी बनी रही। सरकारें बदलीं, मंत्री बदले, सचिव बदले, मगर साहब का ठिकाना नहीं बदला। कभी पत्रकार से भिड़ंत, कभी कार्यशैली पर सवाल और अब सरकारी तालाब पर निजी कारोबार, फिर भी उनकी कुर्सी लेह-लद्दाख की ठंडी हवा खाकर आने के बाद भी गर्म है। आखिर इतनी गर्मी आती कहां से है? बताते हैं, शुक्ला जी का अदृश्य आशीर्वाद आज भी काम करता है। सत्ता में न रहकर भी सत्ता के आसपास पकड़ रखने वाले शुक्ला जी और गृह महकमे की ताकत के बीच साहब की कुर्सी का गणित ऐसा है कि शिकायतें भी ज्यादा देर तक गर्म नहीं रह पातीं। अब जनसंपर्क की पोस्ट कोई साधारण पोस्ट नहीं। यहां सरकार की तस्वीर बनाई जाती है। साहब ने शायद तस्वीर के साथ प्रतिशत का प्रबंधन भी खूब सीख लिया। तालाब पर रेस्टोरेंट हों, नोटिस हों, कार्रवाई के निर्देश हों या शिकायतें कहानी हर बार कहीं न कहीं जाकर ठंडी पड़ जाती है। यही वजह है कि लोग पूछते हैं रिकॉर्ड में तालाब, आदेश में कार्रवाई और जमीन पर कारोबार है, तो बुलडोजर की चाबी आखिर किसके पास है? इधर पत्रकार पेंगोंग की विशाल झील निहार रहे हैं, उधर राजधानी में एक सरकारी रिकॉर्ड वाला तालाब अपनी पहचान तलाश रहा है। वहां बर्फीले पहाड़ों के बीच पानी की खूबसूरती दिखाई जा रही है, यहां तालाब की जगह रोशनी, संगीत और कारोबार चल रहा है। साहब पत्रकारों को पेंगोंग दिखा रहे हैं और शहर अपने तालाब को ढूंढ रहा है। अब पत्रकारों के टूर चलते रहें, सरकार की तस्वीर चमकती रहे और कागजों वाला तालाब कारोबार में बदलता रहे तो इसे भी शायद इमेज मैनेजमेंट का हिस्सा ही समझा जाए। आखिर सरकार की छवि बनाने वाले महकमे में, एक तालाब का गायब हो जाना भी कभी-कभी सिर्फ एक ‘निगेटिव न्यूज’ भर होता है।
छपास और प्रभाव –
राजधानी से लगे एक विधानसभा क्षेत्र के रीलबाज विधायक जी इन दिनों सोशल मीडिया पर कुछ ज्यादा ही सक्रिय हैं। कभी किसी आईपीएस के लिए जेल की कमोड वाली संडास तय कर रहे हैं, तो कभी लोहे की चोरी का पूरा हिसाब-किताब। पोस्टों की रफ्तार देखकर लगता है कि विधायक जी के पास विधानसभा के अलावा CBI, GST और गृह विभाग का भी कोई अनौपचारिक प्रभार आ गया है। लेकिन असली मजा कहानी के दूसरे किरदार में है। लोहे के कारोबार के जिस बड़े खिलाड़ी पर विधायक जी इन दिनों खूब नजर रखे हुए हैं, उसके ठिकानों पर हाल में GST ने छापेमारी की। जनाब के पास करीब डेढ़ हजार ट्रकों साम्राज्य है। अब कारोबार बड़ा हो तो राजनीतिक प्रभाव और वर्चस्व की चाह भी बड़ी हो जाती है। सो, लंबे समय से छपास रोग से पीड़ित साहब कैमरा, यूट्यूबर और मीडिया के सामने समाजसेवा की ऐसी परत चढ़ाते रहे कि कभी-कभी ट्रकों का हॉर्न कम और इंटरव्यू का माइक ज्यादा सुनाई देता था। अब जनाब राजनीतिक चोला पहनकर मैदान में उतरने की तैयारी में हैं। इधर विधायक जी की टाइमलाइन पर रोज किसी न किसी बहाने उन्हीं के इर्द-गिर्द घंटी बज रही है। शायद डर यह भी है कि कहीं डेढ़ हजार ट्रकों का कारवां चुनावी सड़क पर न उतर आए और मौजूदा सवारी का गणित न बिगाड़ दे। वैसे विधायक जी को भी कम नहीं समझना चाहिए। उन पर महादेव की विशेष कृपा है। यही कृपा हर महीने करोड़ों का फल देती है। इस बात में कितना सच, कितना प्रसाद यह तो महादेव ही जानें। लेकिन इतना तय है कि विधायक जी दूसरों के कर्मों का हिसाब फेसबुक और रीलों में बड़े मनोयोग से लेते रहते हैं। मजे की बात यह है कि एक को राजनीति में प्रभाव और वर्चस्व चाहिए और दूसरे को अपनी सीट पर किसी नए प्रभावशाली खिलाड़ी की दस्तक रास नहीं आ रही। लिहाजा जनता को रोज नया एपिसोड मिल रहा है कभी लोहा, कभी ट्रांसपोर्ट, कभी CBI और कभी कमोड वाली संडास। एक टिकट के लिए छपास रोग का इलाज खोज रहा है, तो दूसरा उसे रोकने के लिए फेसबुक पर राजनीतिक प्रिस्क्रिप्शन लिख रहा है। लोहे का वजन बड़ा है, राजनीति का वजन और बड़ा। अब देखना है कि पलड़ा किसका भारी पड़ता है महादेव की कृपा का या डेढ़ हजार ट्रकों के राजनीतिक काफिले का।
पतवार में अमन –
कहते हैं, नाव डुबाने के लिए हमेशा तूफान जरूरी नहीं होता। कभी-कभी पतवार ऐसे हाथों में चली जाए, जिसे नैया को किनारे लगाने से ज्यादा अपनी पकड़ मजबूत करने में दिलचस्पी हो, तो शांत पानी भी काफी है। छत्तीसगढ़ में इन दिनों एक बड़े कॉरपोरेट घराने की नैया को लेकर कुछ ऐसा ही सवाल उठ रहा है। जिस अमन को राज्य में उद्योग की राह आसान करने, सरकार-प्रशासन से समन्वय बनाने और माहौल तैयार करने का जिम्मा मिला, वह शायद अपनी पुरानी आदतों से बाहर नहीं निकल पाया। काम कॉरपोरेट की लाइन बड़ी करने का था, लेकिन चर्चा अपनी लाइन बड़ी करने की ज्यादा है। जहां संवाद होना चाहिए, वहां विवाद खड़े हो रहे हैं। जहां समन्वय चाहिए, वहां नियंत्रण की कहानी सुनाई देती है। सरकारी कुर्सी भले छूट गई हो, लेकिन व्यवस्था को कंट्रोल करने का पुराना शौक शायद नहीं छूटा। इसलिए सवाल उठने लगे हैं अमन समन्वयक है या पूरा कंट्रोल रूम? कॉरपोरेट ने अनुभवी आदमी देखकर सोचा था कि साहब रास्ते खोलेंगे। लेकिन रास्ते खोलते-खोलते अगर हर रास्ते का चौकीदार खुद ही बन जाए, तो मालिक को भी सोचना पड़ता है कि प्रतिनिधि रखा है या नया मालिक? राज्य में आज जो विरोधाभास दिखाई दे रहे हैं, उसके पीछे भी कई उंगलियां अमन की ओर उठती हैं। निवेश और उद्योग की बात करने वाले राज्य में, जहां-जहां अमन की सक्रियता बढ़ती है, वहां-वहां संवाद से ज्यादा विवाद की गुंजाइश क्यों पैदा हो जाती है? शायद समस्या वही पुरानी है मालिक की लाइन बड़ी करने से पहले अपनी लाइन बड़ी करना। एक दिन कॉरपोरेट को हिसाब जरूर देखना पड़ेगा कि पतवार नैया को किनारे लगाने के लिए दी गई थी या कोई अपनी दिशा में नाव मोड़ रहा था। फिर सवाल उठेगा अमन, छत्तीसगढ़ में कॉरपोरेट को आगे बढ़ाने आए थे या उसे डुबोकर ही अमन-चैन से रहने का इरादा है?
यक्ष प्रश्न –
1 – पुलिस विभाग में वह कौन से कप्तान साहब हैं, जिनके खिलाफ अपराध क्रमांक 06/19 एवं 07/19 में आपराधिक प्रकरण पंजीबद्ध होने के बावजूद पदोन्नति का लाभ मिल गया? आखिर प्रकरण दर्ज होने के बाद भी पदोन्नति का रास्ता कैसे साफ हो गया?
2- एक कप्तान साहब इन दिनों पायजेब में अपना नाम खोज रहे हैं। अब सवाल यह है कि सिर्फ नाम मिलेगा या मेहंदी के रंग में नई झंकार भी छिपी है?
3- भिलाई के छोटू के साथ किस विभाग के सबसे बड़े अफसर की तस्वीरें हैं, जो हर कार्यक्रम में उनके साथ शरीक नजर आते हैं?

