अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)

दो करोड़ का हार, सफेद मछली का साम्राज्य, चंदन की आस्था, मूंछ का ताव और जमीन का जजिया… राशन मशीन का करोड़ों का किराया और खाकी की फ्रेंचाइजी तक, तालाब किसका है, मछली कौन है और हिसाब आखिर किसका चल रहा है इस रविवार अफ़सर-ए-आ’ला में सत्ता के तालाब से गलियारों तक की पूरी दास्तान

 

सफेद मछली का साम्राज्य
पश्चिम का वह जिला जो संस्कार वाला इलाका माना जाता है। लेकिन इन दिनों यहाँ संस्कारों ने भी छुट्टी की अर्जी लगा दी है। आखिर मोहब्बत, मेहरबानी और चमक-दमक के आगे संस्कार कब तक टिकते! पहले कहानी में मुर्गा आया, फिर प्यार आया और फिर करीब दो करोड़ का हीरे का हार, यह हार एक व्यापारी की तरफ से सफेद मछली तक पहुंचा। हार किस खुशी में आया, किस रिश्ते की निशानी था और बदले में क्या मिला यह सब पूछना तो संस्कारों के खिलाफ होगा। सो, हम भी नहीं पूछते। बस इतना कहेंगे कि पश्चिम के संस्कार वाले जिले में इन दिनों संस्कारों की जगह चमक कुछ ज्यादा दिखाई दे रही है। सीमावर्ती इलाके में सफेद मछली का अपना साम्राज्य चल रहा है। सीमा से आने-जाने वाली चीजों में इस मछली की हिस्सेदारी फिक्स है। फिर गौ-तस्करी हो या सीमा पार से आने-जाने वाला कोई और माल, 50 प्रतिशत हिस्सा सफेद मछली के तालाब में जाता है और बाकी पानी ऊपर की ओर बहता है। पानी आखिर कहां तक जाता है, यह अभी शोध का विषय है। मगर मछली सिर्फ सीमा के पानी में नहीं तैरती। आजकल पुराने राजा के घराने के आसपास भी खूब दिखाई दे रही है। तस्वीरें जगह-जगह आ रही हैं और तस्वीरों के साथ सफेद मछली की पूंछ भी अब साफ दिखाई देने लगी है। बीते दिनों कप्तानों की सूची आई तो लगा कि सफेद मछली अब तालाब बदलने वाली है। विदाई लगभग तय बताई गई। लेकिन तभी पुराने वाले मुखिया का स्पीकर बज उठा। आवाज आई संगीत बंद नहीं होना चाहिए। फिर क्या नाम आया, लेकिन विदाई रुक गई। आजकल सोशल मीडिया पर सफेद मछली फिर से तैर रही है। पुराने दबंग वाले गाने बज रहे हैं। कहते हैं, युवराज को संगीत पसंद है और जब तक युवराज का म्यूजिक बजता रहेगा, सफेद मछली के तालाब में हलचल क्यों हो! दो करोड़ का हार, व्यापारी की मेहरबानी, सीमा का साम्राज्य और ऊपर तक जाती हिस्सेदारी की कहानी में सब कुछ है। बस एक चीज गायब है… संस्कार। संस्कार बेचारा करे भी तो क्या करे! फिलहाल सफेद मछली तैर रही है। तालाब सीमा से लेकर सत्ता के गलियारों तक फैला हुआ है और मछली इतनी सफेद है कि दाग दिखाई नहीं देते… बस चमक दिखाई देती है।

आस्था का चंदन –
चंदन की खुशबू बड़ी अजीब है। जंगल में हो तो दूर से पहचान में आ जाती है और गलियारों में हो तो लोग पहचानते हुए भी अनजान बने रहते हैं। बस्तर से निकली एक ऐसी ही खुशबू की कहानी है। जगदलपुर में चंदन और आस्था का परिचय हुआ। आस्था तब राजस्व की कुर्सी पर थीं और चंदन जिले की बड़ी कुर्सी पर, फाइलें बंद हुईं, जगहें बदलीं, लेकिन खुशबू चलती रही जगदलपुर से कांकेर और फिर राजधानी तक। अब चंदन के पास बजट की बड़ी किताब है पैसा, रुपया और सरकारी हिसाब-किताब। आस्था ने जमीन-जायदाद की दुनिया में अपना ठिकाना बना लिया है। संयोग देखिए, राजधानी में भी दूरी ज्यादा नहीं है, चंदन सेक्टर-18 में और आस्था सेक्टर-17 बीच में सिर्फ एक सड़क है। सड़क आखिर सड़क है, आने-जाने वालों से वह कभी नहीं पूछती कहां से आए और किसके पास जा रहे हैं। प्रकृति भी चंदन के बारे में दिलचस्प बात बताती है। वह पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं होता, आसपास से पोषण लेता है और उसकी असली खुशबू बाहर नहीं, भीतर की पकी लकड़ी में होती है। रिश्तों की दुनिया भी शायद ऐसी ही है बाहर सब हरा-भरा, असली कहानी भीतर, इस कहानी में एक पुराना घर भी है और एक नई आस्था भी है। नया अध्याय खुलने की तैयारी हो, मगर पुरानी किताब बंद होने का नाम न ले, तो कहानी थोड़ी दिलचस्प हो जाती है। कहते हैं, चंदन को नई आस्था पसंद है, मगर पुराना देवता अभी विस्थापित होने को तैयार नहीं। बाकी कौन किसकी छाया है और कौन किस खुशबू का इंतजार कर रहा है, यह पाठक समझें। हम तो बस इतना कहेंगे चंदन की खुशबू बड़ी जिद्दी होती है। पेड़ कहीं भी लगा हो, हवा अपना रास्ता खुद बना लेती है।

मूंछ, माला और मेवा का मोल
उत्तर की तरफ एक विधानसभा है, यहां मूंछ का ताव भी है, माला का भाव भी और हिंदुत्व का डंका भी, मंच से धर्म, नीति और नियत का पाठ चलता है, मगर इलाके में इन दिनों एक दूसरा पाठ भी खूब पढ़ा जा रहा है, रेत का, जमीन का और मेवा का। साहब की मूंछ अपनी जगह मशहूर है और आवाज में ऐसा भरोसा कि सामने वाला सवाल पूछने से पहले शब्द तौल ले, कभी धर्म की बात, कभी हिंदुत्व की हुंकार और कभी एक बड़े हिंदुत्ववादी नेता की पाठशाला के शिष्य होने का गौरव, गुरु ने शायद विचार और संस्कार दिए होंगे, मगर वक्त के साथ शिष्य ने पाठ्यक्रम में कुछ स्थानीय विषय जोड़ लिए, रेत, जमीन और राजनीति। रेत के कारोबार में साहब की अपनी अहमियत बताई जाती है, रेत हो, लोहा हो या कबाड़, हर माल पर किसी न किसी हिस्से की चर्चा है, जमीन की खरीद-बिक्री में तो ‘जजिया’ लिया जाता है, कहा जाता है, जमीन आपकी, कागज आपके, पैसा आपका, मगर जमीन पर मालिकाना हक जताने से पहले जजिया का हिसाब जरूरी है, रकम चुकाए बिना खरीद हो या बिक्री, रास्ता कितना आसान है, यह जमीन वाले बेहतर जानते हैं। इधर एक और मजेदार बात है, कार्यकर्ता झंडा उठाए रहें और निजी करीबियों की किस्मत चमकती रहे तो संगठन और दरबार के बीच की दूरी कुछ कम लगने लगती है, सेवा का बोर्ड लगा हो और भीतर मेवा की चर्चा हो, तो व्यंग्यकार आखिर चुप कैसे रहे। मूंछ का ताव अपनी जगह, हिंदुत्व का भाव अपनी जगह, लेकिन अगर रेत से जमीन तक हर रास्ते पर हिस्से और जजिया की चर्चा होने लगे तो सवाल तो उठेगा ही, यह राजनीति सेवा है या सेवा के नाम पर मेवा। बाकी हिसाब-किताब का जवाब जिनके पास है, वही दें, हम तो बस इतना जानते हैं, मूंछ जितनी ऊपर उठती है, सवाल भी उतने ही ऊपर उठते हैं।

ट्रक से फॉर्च्यूनर तक, जजिया का सफर –
उस विधानसभा की भी अपनी कहानी है, जहां कभी एक मुख्यमंत्री निकले और इलाके को ऐसी पहचान दे गए कि आज भी उनका नाम लेते ही भूगोल समझ में आ जाता है। फिर एक दौर आया जब एक पहलवान विधायक बने और विधायक बनते ही ट्रक खरीद लाएं, कहते हैं वह ट्रक इलाके की छाती पर ऐसा दौड़ा कि साहब दोबारा विधानसभा नहीं पहुंच पाए। वक्त बदला, गाड़ियां बदलीं, अब ट्रक की जगह फॉर्च्यूनर और इनोवा दौड़ती हैं, लेकिन इलाके में अब बात पहियों से ज्यादा हिस्से के हिसाब की है। कहते हैं विकास के कामों पर 27 से 30 फीसदी का जजिया तय है, सड़क हो, पुलिया हो या सीसी रोड, काम सरकार का, पैसा सरकार का, जमीन जनता की और जजिया साहब का। कागजों में विकास की लंबी सूची है, पुलिया हैं, सीसी रोड हैं, सामुदायिक भवन हैं और यात्री प्रतीक्षालय भी। एक यात्री प्रतीक्षालय के लिए 6.28 लाख रुपये की स्वीकृति दर्ज है, गांव में जिसे देखकर लोग शायद दो लाख का भी अंदाजा न लगाएं, लेकिन सरकारी हिसाब में वह छह लाख पार बैठा है। पुलिया की हालत ऐसी कि बरसात आते ही लोग छड़ और सीमेंट ढूंढने लगें और फाइलें भुगतान का रास्ता ढूंढ लें। ढाई साल में जनता के माथे पर अगर विकास से ज्यादा माथापच्ची दिखाई देने लगे तो पुराने ट्रक की कहानी याद आना स्वाभाविक है। तब ट्रक चर्चा में था, आज जजिया की चर्चा है, गाड़ी बदल गई, मगर सवाल अभी वही है विकास की सड़क पर आखिर कितना टोल लगेगा।

अंगूठा गरीब का, हिसाब सरकार का!
राशन की दुकान पर मशीन लगी तो कहा गया, अब कोई गड़बड़ी नहीं होगी, अंगूठा लगेगा, बीप बजेगी और राशन सीधे सही हाथ तक पहुंचेगा। मशीन ने अपना काम किया भी, मगर अब उसी मशीन ने सरकारी हिसाब-किताब में ऐसा कमाल दिखाया है कि राशन से ज्यादा चर्चा उसके किराये की होने लगी है। प्रदेश की 14,085 राशन दुकानों के लिए मशीनों का पांच साल का किराया करीब 140 करोड़ पहुँच गया, 92 करोड़ का भुगतान हो चुका है और करीब 48 करोड़ बाकी हैं। जबकि पड़ताल में मशीन, 4G और तकनीकी व्यवस्था की लागत करीब 35 करोड़ आंकी गई है। यानी मशीन खरीदने के बजाय किराये पर लेने का रास्ता करीब 105 करोड़ लंबा पड़ता दिखाई दे रहा है। अब सरकारी गणित का कमाल देखिए, मशीन खराब हो तो राशन वाला परेशान, सर्वर बैठ जाए तो हितग्राही परेशान, बायोमीट्रिक न चले तो दुकान परेशान, लेकिन किराया चलता रहे तो हिसाब बिल्कुल दुरुस्त। 2022 से 84 हजार से ज्यादा शिकायते हो चुकी है और 2024 में पेनाल्टी के नाम पर कंपनी से सिर्फ 27,218 रुपये की कटौती की गई। यानी गरीब को राशन लेने के लिए अंगूठा लगाना पड़ा और अब लगता है सरकार को भी इस पूरे सौदे पर अंगूठा लगाकर देखना चाहिए, मशीन में गड़बड़ी है, सिस्टम में है या फिर उस गणित में, जिसमें 15 हजार की मशीन का किराया करोड़ों में पहुंच गया। अंगूठा गरीब का था, बीप मशीन की थी, मगर खेल अगर कहीं हुआ है तो हिसाब की किताब में हुआ होगा, क्योंकि यहां राशन कम और किराये का वजन ज्यादा नजर आ रहा है।

खाकी का कारोबार –
एक दौर था जब खाकी में कारोबार की चर्चा होते ही गुप्ता जी, शेखचिल्ली, छाबड़ा साहब और एक मुनीम जैसे किरदार याद आते थे, तब लगता था कुछ लोगों ने वर्दी को दुकान समझ लिया है, मगर ढाई साल में कहानी ऐसी बदली कि दुकान बंद होने के बजाय फ्रेंचाइजी मॉडल पर चलती दिखने लगी। महादेव के दौर में पैसे की लाइन ऊपर से नीचे तक पुलिस महकमे में कहां-कहां जाती थी, इसकी पड़ताल ने पूरे सिस्टम को हिला दिया था, तब लगा था बहीखाता खुलेगा और कारोबार बंद होगा, मगर बहीखाता शायद इतना पुराना था कि पन्ने बदलते रहे, हिसाब नहीं। इधर बिलासपुर में थाने के भीतर नोटों की गड्डियां कैमरे में दिखीं, रायपुर में जांच खत्म करने का भाव सामने आया, दुर्ग में एनडीपीएस से निकलने का 50 हजार से दो लाख तक का हिसाब सुनाई दिया, राजनांदगांव में थाने के भीतर लेन-देन कैमरे तक पहुंच गया, कोरबा में 50 हजार की वसूली एसीबी के जाल तक पहुंची, रायगढ़ में टपरी वाले से 50 हजार मांगने का मामला आया, जीपीएम में सड़क पर वसूली का वीडियो आया और बस्तर में अपने ही महकमे की तनख्वाह में करोड़ों का हिसाब खुल गया। दुर्ग में डीएसपी सोम से जुड़ा कारोबारी विवाद हो, स्पा कारोबारियों से मंथली का मामला हो या फिर करोड़ों के लेन-देन और गोपनीय जानकारी से जुड़े आरोपों में घिरी डीएसपी कल्पना का मामला, हर कहानी में वर्दी और कारोबार की दूरी पर सवाल खड़ा हुआ। कल्पना वर्मा को फरवरी 2026 में निलंबित भी किया गया था। सवाल यह नहीं कि किस जिले में कौन पकड़ा गया, सवाल यह है कि जब हर जिले में कोई न कोई काउंटर खुलता दिखाई दे तो मुख्य दुकान आखिर कहां है। मुनीम नीचे पकड़ा जाता है, थाना बदलता है, जिला बदलता है, साहब बदलते हैं, मगर शिकायतों की रसीद बंद नहीं होती। डीजीपी साहब, जनता को थाने में एफआईआर चाहिए, फ्रेंचाइजी नहीं, कानून चाहिए, रेट कार्ड नहीं। पुराने मुनीम चले गए होंगे, नए भी आते रहेंगे, मगर असली सवाल यही है बोर्ड कितनी बार बदलना है, दुकान कब बंद करनी है।

यक्ष प्रश्न –

1 – पीएससी चेयरमैन के लिए क्या ट्रेंड बदलेगा, आईएएस, आईपीएस या आईएफएस?

2 – शासन और सुशासन क्या विकास के साथ विकासशील होने में असहज महसूस कर रहा है?

3 – जगमग दीप भाजपा के लिए सियासी रोशनी बनेगी या राजनीतिक उलझन?

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *