अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)
कहीं बंगले में घर की जंग, कहीं मोहिनी का मायाजाल, कहीं हरियाणवी रौब तो कहीं भोपाली पंखों की उड़ान! और सत्ता के तीन दरवाज़ों पर एक ही दलाल की दस्तक! अफसरी की अकड़, रसूख का खेल और सियासत की कथित सेटिंग के ऐसे किस्से कि नाम भले न खुलें, इशारे बहुत कुछ कह जाएंगे!

घर की जंग –
कहते हैं, बाहर की लड़ाई लड़ना आसान होता है, लेकिन जब जंग अपने ही घर में छिड़ जाए तो बड़े-बड़ों के चेहरे की रंगत उड़ जाती है। इन दिनों एक युवा साहब के चेहरे पर थकान और खामोशी कुछ ऐसी ही कहानी बयां कर रही है। साहब अब किसी कार्यक्रम में सबसे पहले पहुंचते हैं और सबसे पहले ही खिसक लेते हैं। न देर तक रुकना, न किसी से ज्यादा बतियाना। लगता है, साहब को भीड़ से ज्यादा भीड़ के सवालों का डर सताने लगा है। वैसे साहब की शिकायत भी कम दिलचस्प नहीं है। कहते हैं, किसी भी विभाग में कुछ गड़बड़ हो, ठीकरा आखिर उनके ही सिर फूटता है। लेकिन साहब, आप युवा भी हैं और पढ़े-लिखे भी। सवाल आपसे नहीं पूछे जाएंगे तो फिर किससे पूछे जाएंगे? मगर साहब की असली उलझन सरकारी फाइलों से इतर घर की दहलीज पर खड़ी बताई जाती है। अंदरखाने चर्चा है कि घर की एक निजी बात अब घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रही। साहब ने कुछ ऐसा अपनी आंखों से देख लिया कि जिसने उनके सुकून में खलल डाल दिया। मामला इतना बढ़ा कि बंगले में काम करने वाले एक खानसामे को ही बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। अब बेचारा खानसामा करे भी तो क्या! चर्चा किसी की, परेशानी किसी की और गाज गिरी उस पर, जो बंगले में नौकरी करता था। खैर, सरकारी बंगले की दीवारों के भी अपने कान होते हैं और वहां की खामोशी के भी कई मतलब निकाले जाते हैं। लेकिन इन चर्चाओं में कितना सच है और कितना सुना-सुनाया, यह तो साहब ही जानें। हां, इतना जरूर है कि जब जिम्मेदारियां सिर पर हों, सरकारी खजाने का हिसाब भी रखना हो और निजी जिंदगी में उथल-पुथल पीछा कर रही हों, तो संतुलन साधना आसान नहीं होता। दिमाग को फाइलों में होना चाहिए, दिल कहीं और उलझा हो तो फैसलों पर भी असर पड़ सकता है। साहब से सहानुभूति है। बस इतना कहेंगे सरकारी जिम्मेदारियां संभालिए, निजी उलझनों को निजी ही रहने दीजिए और धैर्य रखिए। क्योंकि बाहर की जंग में विरोधी दिख जाते हैं, मगर घर की जंग में सबसे पहले अपना ही सुकून घायल होता है!
मोहिनी का मायाजाल –
सूबे के एक आईएएस साहब हैं, जिन्हें हम कई बार कॉलम के ज़रिये आगाह कर चुके हैं कि साहब, इन उलझनों से बाहर निकलिए। मगर साहब हैं कि खुद को किशन कन्हैया समझते हैं। अब हालात ऐसे हो गए हैं कि न निगलते बन रहा है, न उगलते। प्रसंग वही है, जो कभी हीरे के हार से शुरू हुआ था और अब डिजिटल साक्ष्य, स्क्रीनशॉट और रिकॉर्डिंग तक पहुंच चुका है। इनमें से कुछ सामग्री हम तक भी पहुंची है और मामला प्रेम प्रसंग से विवाद में तब्दील हो चुका है। अब मुश्किल यह है कि आगे बढ़ें तो परेशानी और पीछे हटें तो नई मुसीबत का डर। मैडम ने इसी पूरे प्रसंग को ऐसा हथियार बना लिया है कि अब रायपुर की पॉश कॉलोनी में जमीन और उस पर मकान भी चाहिए। इधर साहब की हालत ऐसी है कि एक तरफ कुआं, दूसरी तरफ खाई। कहानी में एक दिलचस्प मोड़ और है। मोहिनी, जादू-टोने और किसी बाबा के चमत्कार की कहानी भी है।बताते हैं कि सफेद पाउडर जैसी किसी चीज को खाने-पीने की वस्तुओं में मिलाकर दिया जाता था। साहित्य-कला वाले जिले में एक बाबा हैं, जो यह सब सामग्री तैयार करते हैं। मैडम एक-दो बार साहब को वहां ले भी जा चुकी हैं और अब दबाव यह कि साहब को फिर बाबा के पास चलना पड़ेगा। साहब इन दिनों डिप्रेशन और एंग्जायटी से भी जूझ रहे हैं और इसके लिए दवाइयों के पन्ने भी भर-भरकर आ रहे हैं। बहरहाल, साहब! सलाह बस इतनी है डरिए मत, हिम्मत रखिए। अगर कोई आपको निजी प्रसंग के नाम पर दबाव में लेने की कोशिश कर रहा है, तो उसका समाधान किसी बाबा की मोहिनी में नहीं, बल्कि कानून और विवेक में तलाशिए। आखिर कब तक इस मायाजाल में उलझे रहेंगे?
क्योंकि साहब, ओखली में मुंडी डाल ही दी है, तो अब मूसल से क्या डरना
हरियाणवी रौब –
सूबे में एक आईएएस साहब हैं। बोली में हरियाणा की ठसक और जवाबों में ऐसी अकड़ कि सामने वाला सवाल पूछकर भी पछताए। मसलन, कोई पूछ बैठे साहब, ये बस रायपुर सीधे जाती है? तो जवाब मिलता है “ना भाई, यो तो उल्टी जावै सै!” अब आदमी माथा खुजलाए कि बस का रास्ता पूछा था या दर्शनशास्त्र की परीक्षा दे दी। साहब के ऐसे जवाबों से छत्तीसगढ़ का सीधा-सादा आदमी असहज हो जाता है। हाल के दिनों की ही बात है, साहब ने आदिवासी इलाके में पदस्थ एक इंजीनियर को फोन पर कहा “यू ब्लडी छत्तीसगढ़िया!” फिर उस अधिकारी को नौकरी करके दिखाने की चुनौती देते हुए कहा “आई हेट छत्तीसगढ़िया।” जिस अधिकारी को यह बात कही गई, वह अनुसूचित जाति से आता है। साहब, गलती है तो अधिकारी से जवाब मांगिए, लेकिन उसकी पहचान से नफरत कैसी? आप रहते भी यहीं हैं, खाते भी यहीं का हैं, फिर छत्तीसगढ़ियों से इतनी चिढ़ क्यों? अब साहब के घर का रौब सुनिए। साहब की धर्मपत्नी एक एनजीओ चलाती हैं और साफ-सफाई योजना में अहम जिम्मेदारी निभा रही हैं। इतना ही नहीं, मैडम का नई राजधानी के आयुक्त कार्यालय में अलग से चैंबर भी है। राज्य की सलाहकार बनकर जिले-जिले दौरा करती हैं, अधिकारियों को बुलाकर लताड़ती भी हैं और चमकाती भी हैं। बड़े-बड़े अधिकारी मैडम के सामने हाथ बांधे खड़े रहते हैं। सवाल बस इतना है कि मैडम के अधिकार और जवाबदेही किस नियम से तय हैं? सरकारी व्यवस्था में सलाहकार की भूमिका है या साहब की अफसरी का विस्तार? और सुनिए, साहब जिस जिले में कलेक्टर रहे हैं, वहां कलेक्टर तो साहब रहते थे, मगर कलेक्ट्री मैडम करती थीं। अब जरा सोचिए, कभी साहब मुख्य सचिव बन गए तो क्या मैडम पूरा प्रदेश चलाएंगी? आखिर सरकारी पदों की अपनी मर्यादा और जिम्मेदारियां होती हैं, जिन्हें किसी के निजी रुतबे से बड़ा नहीं होने दिया जा सकता। साहब की बोली की ठसक और मैडम की लताड़ दोनों का रौब अलग ही गुल खिला रहा है। मगर अफसरी का मतलब किसी प्रदेश के लोगों को नीचा दिखाना नहीं होता। हरियाणा की ठसक अपनी जगह, छत्तीसगढ़ का सम्मान अपनी जगह है। साहब, पद आपका है, प्रदेश नहीं! बस उल्टी दिशा में जाने का जवाब मजाक हो सकता है, लेकिन छत्तीसगढ़ियों से नफरत का ऐलान अफसरी नहीं, अहंकार है।
सुरमा भोपाली –
भोपाल में एक कहावत कही जाती है कि यहां कबूतर भी एक पंख से उड़ान भरता है। लेकिन मध्यप्रदेश की राजधानी से छत्तीसगढ़ की राजधानी पहुंचते ही कुछ सुरमा भोपालियों के दोनों पंख अपने आप फड़फड़ाने लगते हैं। रुतबे की कहानियां, रसूख के किस्से और ब्यूरोक्रेसी में गहरी पैठ के दावे ऐसे कि सामने वाला भी सोच में पड़ जाए कि आखिर माजरा क्या है! ऐसी ही एक सुरमा भोपाली हैं,जिनकी बड़ी-बड़ी कहानियां ब्यूरोक्रेसी में खूब सुनाई देती हैं। खुद को इतना बड़ा खिलाड़ी बताती हैं कि लगता है, राजधानी में आना-जाना सिर्फ पंख फड़फड़ाने के लिए ही होता है। अब ये पंख किसके इशारे पर फड़फड़ाते हैं और किसके एजेंडे को उड़ान देते हैं, यह अपने आप में दिलचस्प सवाल है। एक पढ़े-लिखे युवा मंत्री ने नक्सलवाद के मोर्चे पर परचम लहराने वाले दूसरे युवा साहब के खिलाफ मुहिम चलाने के लिए इसी सुरमा भोपाली की सेवाएं लीं। इसके लिए बाकायदा 30 पेटी की व्यवस्था भी करवाई। बताया जाता है कि इस भोपाली के पंख फड़फड़ाने के लिए कभी जांच वाले साहब तो कभी कोयला चोरी के मामलों से जुड़े अफसर भी व्यवस्था करते हैं। फिर भोपाली अपने एजेंडे के मुताबिक मुहिम में जुट जाती हैं। राजधानी वाले बताते हैं कि सुरमा भोपाली की एंट्री फीस 10 पेटी से कम नहीं होती।आखिर ऐसे सुरमाओं को एजेंडे की तरह इस्तेमाल कौन करता है? किसके इशारे पर मुहिम चलती है, किसके खिलाफ माहौल बनाया जाता है और पर्दे के पीछे से आर्थिक मदद कौन करता है? उधर, नक्सलवाद के मोर्चे पर साहब जंगल-जंगल दौड़ते रहे और इधर, राजधानी में उनके खिलाफ मायाजाल बुनने की कहानी चलती रही। कहते हैं, सियासत में लड़ाई हमेशा मैदान में नहीं लड़ी जाती। कभी मैदान कहीं और होता है और पंख फड़फड़ाने वाले सुरमा कहीं और बैठे होते हैं। अब यह सुरमा भोपाली वाकई इतनी बड़ी खिलाड़ी हैं या कुछ रसूखदारों के हाथों में खेलती ऐसी किरदार, जिसके पंखों की फड़फड़ाहट में दूसरों का एजेंडा उड़ान भरता है। फैसला पाठक करें, लेकिन राजधानी के इन सुरमाओं के पंखों का हिसाब होना चाहिए!
तीन मंत्रियों का एक दलाल –
छत्तीसगढ़ राज्य बना तो कई लोगों ने अपने सपनों की इबारत लिखनी शुरू की। लेकिन एक व्याख्याता की तरक्की की कहानी ऐसी है कि सरकारी सेवा की सीढ़ियां भी शर्मा जाएं। पंद्रह साल के रमन राज में साहब ने ऐसी छलांग लगाई कि व्याख्याता से उपसंचालक की कुर्सी तक जा पहुंचे। फिर सत्ता बदली और सांप-सीढ़ी के सांप ने 99 पर आकर डस लिया। साहब का डिमोशन हो गया, लेकिन पद बदला, रसूख नहीं। साहब का सियासी सफर भी गजब है। कभी डाला बाबू की दलाली, तो कभी ब्रिज के मोहन की बांसुरी की धुन पर कदमताल और अब समग्र शिक्षा के गलियारों में ड्रोलिया बंधुओं की दलाली तक। यानी सरकार और समीकरण बदलते रहे, मगर साहब की पहुंच के रास्ते कभी बंद नहीं हुए। यही तो असली हुनर है कुर्सी किसी की हो, संपर्कों की डोर अपने हाथ में रहे! कहानी यहीं खत्म नहीं होती। साहब आजकल जंगल-जंगल में मोर नचा रहे हैं। नाम में भले राम का निवास हो, लेकिन दलाली केदार के निवास की हो रही है। इतना ही नहीं, टंक के दरबार में भी साहब का निवास है। जमीन के कारोबार से लेकर जंगल और शिक्षा तक, हर जगह साहब की दलाली के किस्से चर्चा में हैं। कहते हैं, राजधानी में कुछ लोगों का कोई एक कारोबार नहीं होता, उनके पास संपर्कों का पूरा नेटवर्क होता है। सुबह शिक्षा में ड्रोलिया बंधुओं की दलाली, दोपहर में जमीनों का सौदा और शाम ढलते ही विधायक निवास कॉलोनी में सौदेबाजी का सिलसिला। अब इसे तीन मंत्रियों का एक दलाल कहें या सत्ता के तीन दरवाजों की एक चाबी, फैसला पाठक करें।
यक्ष प्रश्न –
1 – जल संसाधन विभाग में कितना कमीशन बंटा? जवाब पता है तो मजा लीजिए, नहीं तो अगले कॉलम का इंतजार कीजिए!
2 – संविदा सरकार? डीआईजी बी.एस. ध्रुव समेत न जाने कितने अफसरों की संविदा नियुक्ति! लेकिन कैबिनेट के बाद भी क्या लोक सेवा आयोग को नया अध्यक्ष मिल पाएगा?


