अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से)
अयोग्य कुर्सी –
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में जज की टिप्पणी छत्तीसगढ़ के DGP पूरी तरह अयोग्य हैं सिर्फ एक तल्ख वाक्य नहीं है। यह उस पुलिस नेतृत्व की कार्यक्षमता पर सर्वोच्च अदालत की असाधारण टिप्पणी है, जिसके अधीन हिरासत में मौत जैसे गंभीर मामले की जांच हुई। मामला इतना गंभीर था कि राज्य की जांच पर भरोसा नहीं किया गया और CBI को जांच सौंपनी पड़ी। यानी जिस पुलिस तंत्र के शीर्ष पर DGP हैं, उसी तंत्र की जांच को सर्वोच्च अदालत ने दूसरी एजेंसी को सौंप दिया। जब किसी राज्य के पुलिस प्रमुख पर ही सुप्रीम कोर्ट ऐसी टिप्पणी कर चुका हो, उसी मामले में CBI जांच चल रही हो और पुलिस नेतृत्व की भूमिका अदालत के सवालों के घेरे में हो, तो क्या उसी DGP को कुर्सी पर बनाए रखकर निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की उम्मीद की जा सकती है? और सवाल सिर्फ DGP तक सीमित क्यों रहे? DG Prisons भी इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने जवाबदेह पक्ष हैं। पुलिस हिरासत से जेल प्रशासन तक पहुंची इस पूरी कड़ी में जब सर्वोच्च अदालत को राज्य के तंत्र से जवाब मांगना पड़ा, तो फिर जवाबदेही भी सिर्फ नीचे के स्तर पर तय करके कैसे पूरी हो सकती है? जिस पुलिस प्रमुख की कार्यक्षमता पर सर्वोच्च अदालत सवाल उठा चुकी हो और जेल प्रशासन के शीर्ष अधिकारी को भी उसी मामले में जवाब देना पड़ा हो, अगर दोनों अपने-अपने पद पर बने रहें तो स्वाभाविक सवाल है जांच प्रभावित नहीं होगी, इसकी गारंटी कौन देगा? क्योंकि जांच CBI कर रही है, लेकिन जिस सिस्टम से यह मामला निकला है, उसकी कमान तो अभी भी उन्हीं कुर्सियों के पास है। कभी-कभी कुर्सी से हटाना कार्रवाई नहीं होता, निष्पक्ष जांच के लिए कुर्सी से दूरी बनाना होता है और जब सर्वोच्च अदालत ने पुलिस नेतृत्व की क्षमता पर सवाल उठा दिया हो, तो उस कुर्सी पर बने रहने का तर्क सरकार को देना है जांच को नहीं।
किस्सा कुर्सी का –
न्यायधानी में इन दिनों एक अजीब संयोग दिखाई दे रहा है। अपराध के आंकड़े बढ़ रहे हैं, हाईकोर्ट सवाल पूछ रहा है और पुलिस की जांच प्रक्रिया भी अदालत की नजर से बच नहीं पा रही। मगर इन सबके बीच एक कुर्सी ऐसी है, जिस पर शायद मौसम का असर भी नहीं पड़ता। पिछले साल हाईकोर्ट के सामने जनवरी से जुलाई तक के आंकड़े रखे गए थे 120 चाकूबाजी, 7 मौत और 122 घायल। तब सवाल चाकुओं की खुलेआम बिक्री और अपराध पर लगाम को लेकर था। अब NDPS के एक मामले में कोर्ट ने जांच के तरीके पर ही सवाल उठा दिया। जिस अधिकारी ने देहाती नालिश दर्ज की, वही जांच अधिकारी और चार्जशीट दाखिल करने वाला कैसे बन गया? DGP से शपथपत्र मांग लिया गया। यानी न्यायधानी में अदालत की दस्तक एक बार नहीं, बार-बार सुनाई दे रही है। इसी बीच सवाल उस कप्तान की कुर्सी पर भी है, जो सरकार बनने के बाद से अब तक कायम है। पिछली तबादला सूची में नाम की चर्चा हुई, छह महीने की मोहलत मिली और मामला टल गया। अब फिर नई सूची की आहट है। यह वही साहब हैं, जिनकी मोहलत की कहानी अब पुलिस महकमे में सुनाई जाती है। तबादला सूची बनने से पहले शायद साहब से पूछा जाता है और कितना समय चाहिए? कप्तान साहब का गणित कुछ अलग है अपराध के आंकड़े बढ़ते रहे, हाईकोर्ट टिप्पड़ी करता रहे मगर साहब की कुर्सी अभी मोहलत में है। साहब की मोहलत से जुड़ी पुरानी चर्चाएं भी फिर गलियारों में लौट आई हैं। बलौदा बाजार में प्रॉपर्टी में निवेश से लेकर हर छह महीने में कुछ अधूरे काम पूरे करने की, इसमे कितना सच कितना गणित यह साहब ही जानें। मगर हर बार मोहलत मिलना अपने आप में एक अलग कहानी जरूर है। जब न्यायधानी में हाईकोर्ट लगातार पुलिसिंग का हिसाब मांग रहा हो, तब कप्तान की कुर्सी का हिसाब कौन मांगेगा अपराध के आंकड़े, अदालत की टिप्पणियां या कुर्सी पर बिताए साल?
जल संसाधन में सफाई अधूरी –
जल संसाधन विभाग में सफाई अभियान चला तो लगा कि काफी पुराना कचरा बाहर हो गया। लेकिन सरकारी विभागों में सफाई की एक दिक्कत है झाड़ू लगाने के बाद भी कुछ कोने ऐसे रह जाते हैं, जहां धूल नहीं, व्यवस्था की आदत जमी होती है। संजय भागवत के जाने के बाद अब मुख्यालय में नजर कुछ और संविदा चेहरों पर टिकती है। इदरीश खान करीब दो साल से संविदा पर हैं, प्रसून शर्मा करीब पांच साल से संविदा पर हैं और SE प्रशासन की कुर्सी भी संविदा व्यवस्था से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई है। उधर चौहान साहब वित्त नियंत्रक की भूमिका में हैं। यानी विभाग में संविदा का अध्याय अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है, बस कुछ पात्र बदल गए हैं। मजेदार बात यह है कि विभाग में ठेकेदार लॉबी के प्रभाव को लेकर पहले से सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में यह जानना कोई अपराध नहीं कि इन कुर्सियों तक पहुंचने वाले फोन आखिर कहां-कहां से आते हैं और किनसे कितनी बार संवाद होता है। अगर विभाग को सचमुच सफाई पर भरोसा है तो संबंधित अधिकारियों के आधिकारिक कॉल रिकॉर्ड और निर्णयों की टाइमलाइन का मिलान भी हो जाए। दूध का दूध और संविदा का संविदा। क्योंकि सवाल किसी व्यक्ति के संविदा पर होने का नहीं है। सवाल यह है कि जिस विभाग में हजारों करोड़ के काम हों, वहां निर्णायक कुर्सियों के आसपास कितने पुराने संपर्क अब भी नए नामों के साथ कायम हैं। कचरा बाहर निकालना आसान है साहब, यह देखना मुश्किल है कि झाड़ू के बाद भी कोने में कुछ बोरे क्यों बचे रह गए।
डर भरोसा –
बीते दिनों एक विधायक साहब से मुलाकात हुई। राजनीति में आने से पहले कलाकार रहे हैं, इसलिए आत्मविश्वास और प्रस्तुति दोनों भरपूर। बात शुरू हुई तो मैदान का पूरा हिसाब सामने था कितने दौरे, कितने संपर्क, कहां पकड़ मजबूत, कहां समीकरण अपने पक्ष में। डेटा इतना कि लगा चुनाव नहीं, यूपीएससी की तैयारी चल रही है। नतीजा भी साहब के हिसाब से लगभग तय था। तिरंगा यात्रा का जिक्र आया तो बताया कि लोगों के चेहरे और हाव-भाव देखकर भी पता चल जाता है कि कौन कितने प्रतिशत साथ है। हम सुनते रहे और सोचते रहे कि राजनीति में अब सर्वे की जरूरत नहीं, चेहरे पढ़कर ही आंकड़े निकाले जा सकते हैं। हमने जमीन से मिल रहे कुछ अलग संकेत भी बताए, लेकिन आत्मविश्वास अपनी जगह कायम रहा। फिर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई का जिक्र आया, जिस पर ग्रामीणों का विरोध, पुलिस से टकराव और FIR तक हुई। मामला विधानसभा पहुंचा और विरोधियों को मुद्दा भी मिला। साहब का आकलन था कि राजनीतिक जमीन पर इसका खास असर नहीं पड़ा। यहीं थोड़ा चटकारा है। दिल कहता है जमीन मजबूत है, दिमाग कहता है एक सर्वे और कर लो। आंकड़े अगर परीक्षा लेते तो शायद यूपीएससी भी निकल जाती। मगर अफसोस, यह चुनाव है बाबू भैया यहां प्रश्नपत्र जनता बनाती है और रिजल्ट उंगली पर दिखाई देता है।
नींद उड़ी –
कल सुबह 2003 PSC की पुरानी फाइल फिर सुर्खियों में आई। खबर छपी कि EOW जल्द चालान पेश कर सकती है और 15 से ज्यादा अधिकारी जांच के घेरे में हैं। खबर बाहर आते ही उन अधिकारियों में सनसनी दौड़ गई, जो कभी इस परीक्षा के परीक्षार्थी थे। इधर इन अधिकारियों ने पहले VC की और अब मुखिया समेत प्रमुख सचिव से मिलने की बात भी सामने आ रही है। यह डर है या डराने की खबर, यह तो पता नहीं, लेकिन नींद सबकी उड़ी हुई है। हमने मामले में ACB चीफ से बात की। उनका साफ कहना था जांच पहले से चल रही है, उनसे किसी ने कोई बयान नहीं लिया और फिलहाल मामले में सिर्फ दो आरोपी हैं, दोनों का संबंध तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक से है। यानी खबर में 15 और जांच एजेंसी के मुखिया की जानकारी में दो। 2003 की परीक्षा में गड़बड़ी का मामला नया नहीं है। तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक के खिलाफ 2007 में विभागीय कार्रवाई का रिकॉर्ड भी मौजूद है। PSC के पुराने मामलों में यह भी सामने आ चुका है कि परीक्षा में गड़बड़ी और आयोग के अध्यक्ष की व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी हमेशा एक बात नहीं होती। अशोक दरबारी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बाद में उन्हें दोषी नहीं माना था। तो सवाल सीधा है फाइल खुली है या किसी ने फाइल की धूल उड़ाकर डर का माहौल बना दिया है? क्योंकि फिलहाल जांच चल रही है, सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है और जांच एजेंसी के मुताबिक आरोपी सिर्फ दो हैं। बाकी 15 कौन हैं, चालान कब आएगा और किसके खिलाफ आएगा यह जांच बताएगी। फिलहाल इतना जरूर है 23 साल पुरानी परीक्षा के परीक्षार्थी आज अफसर हैं, और कल की खबर ने उन्हीं अफसरों की नींद उड़ा दी है।
पर्दा उठेगा –
महादेव की कहानी को अब तक जितना समझा और जाना गया, कहानी उससे कहीं ज्यादा गहरी है। खेल सिर्फ सट्टे का नहीं था, उसके पीछे एक ऐसा सिंडिकेट था, जो पर्दे के पीछे से पूरे खेल को बैकअप दे रहा था। अब उसी गिरोह से पर्दा उठने का समय आ गया है। दुबई की चमक से निकलकर ओमान की धरती से आई एक खबर ने कहानी को नया मोड़ दे दिया है। किंगपिन सौरभ चंद्राकर ने ओमान में भारतीय जांच एजेंसियों के साथ सहयोग की इच्छा जताई है। बदले में उसे और उसके परिवार को सुरक्षा चाहिए। वह नेटवर्क, उसके लाभार्थियों और छत्तीसगढ़ से जुड़े नेताओं अफसरों के चेहरों से पर्दा उठाने को तैयार है। साथ ही भारत लाए जाने पर सुरक्षित हिरासत, पूछताछ में न्यायिक निगरानी और अपना बयान अदालत के सामने दर्ज कराने जैसी शर्तें भी रखी हैं। महादेव की कहानी में पहली बार ऐसा लग रहा है कि जिसे पकड़ने के लिए एजेंसियां दरवाजे खटखटा रही थीं, वही अब दरवाजा खोलकर अंदर की पूरी अलमारी दिखाने को तैयार है। बस शर्त एक है पहले सुरक्षा। इस शर्त का मतलब समझिए। अगर खतरा सिर्फ कानून से होता तो अदालत का डर काफी था। यहां डर उन लोगों से बताया जा रहा है, जो कभी इस नेटवर्क की छतरी के नीचे थे। CBI पहले ही पूर्व मुख्यमंत्री से लेकर कई अधिकारियों और चार IPS अधिकारियों के यहां छापेमारी कर चुकी है। यानी जांच की आंच सत्ता और सिस्टम के कई दरवाजों तक पहुंच चुकी है। इधर विपक्ष की नींद तो उड़ी ही है और सत्ता पक्ष के माननीय भी बेचैन हैं। क्योंकि इस कहानी में कुछ किरदार सामने हैं तो कई अब भी पर्दे में हैं। एक शेख चिल्ली, एक आनंद में रहने वाले साहब, एक मुनीम, जिसे मालूम है कि किस खाते में कितना आया और किस रास्ते से गया। इन सबके बीच एक ऐसा किरदार भी है, जो मंच पर तो नहीं आया, लेकिन सत्ता की कहानी में उसका रिश्ता बेहद नजदीकी बताया जाता है। इतना नजदीकी कि एक यात्रा में किया गया खासा निवेश भाई की सियासत को प्रदेश की सीमा से निकालकर केंद्र की चौखट तक पहुंचा दिया। एक और बात जो खाते जांच के दौरान फ्रीज हुए थे, उनमें पैसा बचा है या नहीं, यह भी जांच का महत्वपूर्ण बिंदु हो सकता है। उधर चंद्राकर की कहानी में एक और परत है फर्जी इंडोनेशियाई पासपोर्ट, बदली हुई पहचान और ओमान में अलग से चल रही कानूनी प्रक्रिया। भारतीय एजेंसियां प्रत्यर्पण के रास्ते तलाश रही हैं और भारत-ओमान प्रत्यर्पण संधि के तहत प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। अब महादेव की अगली किस्त में सिर्फ सट्टेबाजों के नाम आएंगे, या उन चेहरों के भी, जो सट्टे की मेज पर बैठे नहीं थे, लेकिन मेज चलती रहे, इसकी कीमत लेते थे? अगर चंद्राकर बोलता है तो यह सिर्फ एक आरोपी का बयान नहीं होगा। यह उन लोगों के लिए खतरे की घंटी होगी, जिन्होंने सोचा था कि पैसा घूम जाएगा, सरकार बदल जाएगी, फाइल पुरानी हो जाएगी और कहानी भी। क्योंकि पैसा भले बैंक से निकल जाए,
कहानी कभी-कभी खाते से नहीं… किसी आदमी के बयान से खुलती है। और इस बार डर यही है कि जिसे अब तक कहानी का सिर्फ एक किरदार समझा जा रहा था, कहीं वही पूरी पटकथा लेकर न बैठा हो।
यक्ष प्रश्न –
1 – क्या छत्तीसगढ़ की नैया डुबोकर ही अमन-चैन से रहेंगे? आखिर पतवार किन हाथों में है?
2 – क्या DGP की कुर्सी में फेविकोल से भी मजबूत जोड़ हो गया है, जो छूटने का नाम ही नहीं ले रहा?
3 – क्या कीर्तन का ढोल सीमा से राजधानी तक कुछ ज्यादा ही जोर से बज रहा है?

