जल संसाधन विभाग में शुरू हुई सफाई!सिंघारे पर कार्रवाई से खुलीं पुरानी फाइलें, 10 साल के संविदा दौर से लेकर ठेकेदार चंदेल लॉबी तक उठे सवाल अब जांच की आंच में कौन-कौन?
2021 के आदेश को पांच साल बाद किया निरस्त, प्रमुख अभियंता कार्यालय में अटैच हुए अधीक्षण अभियंता शिवराम सिंघारे, पहले संजय भागवत भी हटाए गए थे, शिकायतों और विवादों के बीच विभाग में लगातार हो रही कार्रवाइयों ने बढ़ाई हलचल -

रायपुर – जल संसाधन विभाग में इन दिनों सिर्फ तबादले और पदस्थापन के आदेश नहीं निकल रहे हैं, बल्कि वर्षों से जमी व्यवस्था की परतें भी धीरे-धीरे खुलती दिखाई दे रही हैं। अधीक्षण अभियंता शिवराम सिंघारे को 17 अगस्त 2026 को उनके पुराने पदस्थापना आदेश से हटाकर प्रमुख अभियंता कार्यालय में अटैच किया जाना इसी सिलसिले की एक अहम कड़ी है। प्रमुख अभियंता कार्यालय से जारी आदेश में वर्ष 2021 के आदेश क्रमांक 3317045/छ.ग./2019/8338 को निरस्त करते हुए सिंघारे को तत्काल प्रभाव से प्रमुख अभियंता कार्यालय, शिवनाथ भवन, नवा रायपुर में आगामी आदेश तक कार्य करने के निर्देश दिए गए हैं। कागज पर भले ही यह एक प्रशासनिक आदेश है, लेकिन इसके पीछे की कहानी इससे कहीं ज्यादा बड़ी है।
क्योंकि सिंघारे को लेकर विभागीय स्तर पर शिकायतें पहले से मौजूद थीं। दिसंबर 2025 में दंतेवाड़ा पुलिस के उप पुलिस अधीक्षक कार्यालय से प्रमुख अभियंता को भेजे गए पत्र में उनके खिलाफ प्राप्त शिकायत की जांच का उल्लेख है। शिकायत में सरकारी सेवा में रहते हुए विभागीय अनुमति के बिना नियमित बी.ई. सिविल की पढ़ाई करने, सेवा नियमों की अनदेखी और वित्तीय अनियमितता जैसे आरोप लगाए गए थे। अब इसी अधिकारी के पदस्थापन से जुड़े पांच साल पुराने आदेश को निरस्त कर दिया गया है। तो सवाल उठना स्वाभाविक है क्या विभाग अब पुरानी फाइलों को नए सिरे से पढ़ रहा है?
सिर्फ सिंघारे नहीं, इससे पहले भी हट चुके हैं बड़े अधिकारी –
सिंघारे पर हुई कार्रवाई को अलग-थलग देखकर पूरी तस्वीर समझना मुश्किल होगा। इससे पहले लंबे समय तक संविदा पर रहे तत्कालीन प्रमुख अभियंता संजय भागवत को भी पद से हटाया गया था। उनके कार्यकाल को लेकर तकनीकी अनियमितताओं और विभागीय असहमति से जुड़ी शिकायतें सामने आई थीं। यानी विभाग में कार्रवाई की यह कोई पहली घटना नहीं है। सवाल यह है कि क्या अब विभाग उन तमाम पुराने मामलों की कड़ियां जोड़कर देख रहा है, जिन पर वर्षों से सवाल उठते रहे हैं?
अधिकारी और ठेकेदारों के रिश्तों पर भी नजर क्यों जरूरी? –
जल संसाधन विभाग में सबसे बड़ा सवाल हमेशा तकनीकी गुणवत्ता और सरकारी धन से जुड़ा रहा है। हजारों करोड़ रुपये के बांध, एनीकट, नहर और सिंचाई परियोजनाओं से जुड़े कामों में विभागीय अधिकारियों और ठेकेदारों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में किसी अधिकारी के किसी खास ठेकेदार समूह से करीबी के आरोप सामने आते हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच जरूरी हो जाती है। सिंघारे को लेकर भी ठेकेदार लॉबी से करीबी के आरोप और चर्चाएं सामने आती रही हैं। इन चर्चाओं में ठेकेदार अनिल चंदेल का नाम भी लिया जाता रहा है। जिस पर भ्रष्टाचार से लेकर शासकीय राशि के दुरुपयोग का मामला विधानसभा में उठ चुका है।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी प्रभाव का सवाल –
सिंघारे को लेकर यह आरोप भी लगाए जाते रहे हैं कि न्यायालय के आदेशों और विभागीय विवादों के बावजूद वे प्रभावशाली ठेकेदार समूहों के संपर्क में बने रहे। यह गंभीर आरोप है और इसकी पुष्टि संबंधित न्यायालयीन आदेशों तथा विभागीय रिकॉर्ड से की जानी चाहिए। अगर जांच में यह साबित होता है कि किसी अधिकारी ने न्यायालयीन आदेशों या विभागीय निर्देशों की अवहेलना करते हुए किसी ठेकेदार समूह के हित में काम किया, तो मामला केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
सवाल कार्रवाई का नहीं, अगली फाइल का है –
जल संसाधन विभाग में यदि वास्तव में सफाई शुरू हुई है तो यह केवल अधिकारियों को एक जगह से दूसरी जगह अटैच करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। पुरानी निविदाओं की जांच होनी चाहिए। विवादित परियोजनाओं की तकनीकी जांच होनी चाहिए। अधिकारियों और ठेकेदारों के संबंधों की पड़ताल होनी चाहिए।
लंबित शिकायतों की स्थिति सामने आनी चाहिए। और जिन मामलों में शिकायतें दबा दी गईं, उनकी फाइलें फिर से खुलनी चाहिए।
क्योंकि किसी अधिकारी को पद से हटाना व्यवस्था की सफाई नहीं है। असली सफाई तब होगी, जब यह पता चले कि उसे इतने लंबे समय तक ताकत किसने दी और शिकायतों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
मुख्यमंत्री के विभाग में अब नजर ऊपर तक –
जल संसाधन विभाग मुख्यमंत्री के सीधे फोकस वाले विभागों में है। इसलिए विभाग में हालिया कार्रवाइयों को सामान्य प्रशासनिक फेरबदल मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। सिंघारे की कार्रवाई के बाद अब निगाह उन पुरानी फाइलों पर है, जिनमें वर्षों से शिकायतें, विवाद, तकनीकी आपत्तियां और ठेकेदारों के प्रभाव की चर्चाएं दर्ज हैं।
शायद विभाग में सफाई की शुरुआत हो चुकी है। लेकिन यह सफाई कितनी गहरी जाएगी, इसका फैसला अगले कुछ आदेश करेंगे। क्योंकि फाइलें अगर सचमुच खुलीं, तो सवाल सिर्फ शिवराम सिंघारे का नहीं रहेगा। सवाल उस पूरी व्यवस्था का होगा, जिसमें अधिकारी बदले, पद बदले, सरकारें बदलीं लेकिन ठेकेदार लॉबी का प्रभाव बढ़ता गया।










