कही अनकही बातें – कुर्सी पर सरकार, फैसलों के पीछे कौन?

कही अनकही बातें –
कुर्सी पर सरकार, फैसलों के पीछे कौन?
राजधानी – छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक पुरानी बीमारी है। कुर्सी पर बैठता कोई और है, लेकिन आसपास की परछाइयां कभी-कभी उससे ज्यादा लंबी दिखाई देती हैं। मसलन, सरकार में पद सलाहकार का हो तो काम सलाह देना होना चाहिए। लेकिन सलाह इतनी दूर तक पहुंच जाए कि डीजी से लेकर एसपी की कुर्सी तक उसका असर सुनाई देने लगे, तो सवाल बनता है
सरकार सलाह ले रही है या सलाह सरकार चला रही है?
अब इसका जवाब आज मत खोजिए। थोड़ा पीछे चलते हैं साल 2013 बीजेपी 90 में से 49 सीटें जीतकर सत्ता में लौटी। बहुमत से तीन ज्यादा सरकार मजबूत थी, सत्ता की गाड़ी भी पूरे भरोसे से चल रही थी। फिर आया 2018 और सरकार के आखिरी दौर में आई एक योजना दावा था डिजिटल क्रांति आएगी। इसके लिए लाखों मोबाइल बांटे गए। इधर सरकारी मोबाइल ब्लास्ट हो रहे थे, उधर कोई अपनी अलग ही क्रांति की कहानी लिख रहा था। मोबाइल जांजगीर और कटघोरा में फटे, लेकिन सवाल पूरे प्रदेश में फैल गए। योजना के पीछे सलाह किसकी थी, कॉरपोरेट कनेक्शन कहां तक था और सरकार में इस सलाह की हैसियत कितनी थी इन सवालों की चर्चा तब भी थी। बताया जाता है कि मोबाइल बांटने की इस योजना में तत्कालीन मुखिया ने भी आपत्ति जताई थी यहाँ तक इसका विरोध तक किया था। लेकिन सत्ता के गलियारों में यह भी कहा जाता था कि उनकी बेबसी का कारण यही था
“क्या करूं, मेरा यह आदमी चाहता है कि ऐसा होना चाहिए।”
आखिर इतनी जिद क्यों थी? तब चर्चा कमीशन की भी थी। आरोप था कि इस पूरे खेल में सलाहकार की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि उनके भाई का रिलायंस से लाइजनिंग का जुड़ाव था और कहा जाता है कि यह रिश्ता आज भी कायम है। यानी सरकार मोबाइल बांट रही थी, जनता डिजिटल क्रांति देख रही थी और सत्ता के भीतर कोई कमीशन की क्रांति की कहानी लिख रहा था।
फिर 2018 का चुनाव आया और 49 सीटों वाली बीजेपी 15 पर सिमट गई।
अब मोबाइल से सरकार गई थी या उस ‘क्रांतिकारी’ सलाह से इसका फैसला इतिहास करे। लेकिन संचार क्रांति के बाद सत्ता का जनता से राजनीतिक कनेक्शन जरूर डिस्कनेक्ट हो गया।
अब सवाल सिर्फ इतना कि
मोबाइल सरकार की जरूरत थी या किसी सलाह का सपना?
इधर सत्ता गई उधर वह सलाहकार भी स्तीफा देकर निकल गए कॉरपोरेट दुनिया में नई पारी खेलने…
कहानी खत्म?
नहीं।
राजनीति में कुछ किरदार सत्ता से जाते हैं, कहानी से नहीं। फिर आया 2023। सत्ता बदली। पुराने चेहरे लौटे। पुराने रिश्तों की चर्चा फिर शुरू हुई। इस बार हाथ में मोबाइल नहीं था। पोस्टिंग की फाइल थी। कहा-सुना यह जाता है कि डीजी स्तर की पोस्टिंग में भी इस पुराने शक्ति-केंद्र की राय को खास महत्व मिलता है। एक डीजी स्तर के अधिकारी की पोस्टिंग को लेकर कहा गया
“उस अधिकारी की पोस्टिंग नहीं होनी चाहिए, यह मेरी नाक का सवाल है।”
अब सरकारी पोस्टिंग में नाक का सवाल कब से आने लगा? और अगर आ भी गया तो नाक किसकी है यही तो कहानी है। बताते हैं, बात एक ‘हाउस’ से दूसरे ‘हाउस’ तक फोन के रास्ते पहुंची। फाइल सरकार की। कुर्सी सरकार की। आदेश सरकार का। लेकिन आपत्ति किसकी?
अब चर्चा सिर्फ डीजी तक नहीं है। रायपुर का एसपी कौन? बिलासपुर का एसपी कौन? कौन कलेक्टर? कौन आईजी? हर सूची के साथ गलियारों में एक अदृश्य कॉलम भी जुड़ जाता है
“पसंद किसकी?”
कागज पर आदेश सरकार का होता है। लेकिन आदेश निकलने से पहले ही उसकी खबर किसी और दरबार में पहुंच जाए, तो लोकतंत्र थोड़ा असहज तो होगा ही। सरकार को ढाई साल हो चुके हैं। कानून-व्यवस्था पर सवाल हैं, पुलिसिंग पर सवाल हैं और अब तो देश की सर्वोच्च अदालत ने राज्य के पुलिस के सर्वोच्च पद पर बैठे अधिकारी को अयोग्य तक कह दिया हो इससे ज्यादा भयावह क्या होगा।
सलाहकार सलाह दे सकता है, राय दे सकता है। लेकिन उसकी नाराजगी अगर किसी अफसर की कुर्सी तय करने लगे तो फिर उसे सलाह कहना भी सलाह की तौहीन है। फिर वह सत्ता का वह दरवाजा बन जाता है, जिसकी कोई नेमप्लेट नहीं होती। और राजनीति में सबसे खतरनाक दरवाजा वही होता है, जिसका पता सरकारी नक्शे में नहीं मिलता, लेकिन फाइलें वहां तक पहुंच जाती हैं। चुनाव भले दूर है, लेकिन हिसाब-किताब शुरू हो चुका है।
अंत में एक सवाल यही रह जाएगा
जब सरकार आपकी थी,
तो फैसले कौन ले रहा था?










