छत्तीसगढ़ पुलिसिंग की वह कहानी जिसे फाइलें दबाती रहीं, अदालत ने खोल दिया, कुर्सी से कस्टडी तक फाइलें खुलीं तो कई चेहरे होंगे बेनकाब –

बिलासपुर/रायपुर – जब कोई नागरिक पुलिस की हिरासत में जाता है, तब उसके पास अपनी सुरक्षा के लिए सिर्फ दो उम्मीदें बचती हैं राज्य और न्याय। श्रवण सूर्यवंशी की मौत ने इन दोनों उम्मीदों पर कडी नाराजगी जताते हुए कहा कि जब राज्य की जांच व्यवस्था ही सवालों में घिर जाए, तब न्याय की उम्मीद किस दरवाजे पर दस्तक दे? छत्तीसगढ़ में श्रवण सूर्यवंशी की मौत के मामले ने इसी भरोसे की ऐसी परीक्षा शुरू की है, जिसकी गूंज अब थाने से निकलकर जेल, पुलिस मुख्यालय और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है। और सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद अब कहानी में CBI की एंट्री हो गई है। लेकिन यह कहानी सिर्फ एक कस्टोडियल डेथ की नहीं है। क्योंकि अदालत की नाराजगी उस व्यवस्था के शीर्ष तक पहुंची है, जिसकी कमान दो महत्वपूर्ण DG के हाथों में रही DGP अरुण देव गौतम और जेल DG हिमांशु गुप्ता। एक की कार्यप्रणाली पर सर्वोच्च अदालत ने “Totally Incompetent” याने की पूरी तरह अयोग्य जैसी बेहद कठोर टिप्पणी की, तो दूसरे को भी अदालत की फटकार सुननी पड़ी। और यहीं से एक मौत की कहानी अचानक दो DG की कुर्सियों और उन तक पहुंचने वाली पुरानी फाइलों की कहानी बन जाती है।
श्रवण की मौत से शुरू हुई कहानी –
बिलासपुर के मोहरा निवासी श्रवण सूर्यवंशी को सीपत पुलिस ने आबकारी मामले में गिरफ्तार किया था। 19 जनवरी 2024 को उसे केंद्रीय जेल बिलासपुर भेजा गया। जेल में उसकी तबीयत बिगड़ी और 21 जनवरी को सिम्स अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई। परिवार न्याय मांगता रहा। जांच चलती रही। फाइल चलती रही। लेकिन FIR तक पहुंचने में ढाई साल लग गए। और फिर परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सर्वोच्च अदालत ने जिस तरह पुलिस की कार्यप्रणाली और जांच में देरी पर नाराजगी जताई, उसने राज्य की पूरी जांच व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया। अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर CBI जांच कर रही है। यानी जिस पुलिस व्यवस्था पर सवाल था, उससे जांच छीनकर केंद्रीय एजेंसी को दे दी गई। यह अपने आप में किसी भी सरकार के लिए सामान्य स्थिति नहीं है।
एक श्रवण नहीं, आंकड़े भयावह है –
जेल अभिरक्षा में मौतों के आंकड़े भयावह है जो इसे और भी गंभीर बना देते हैं। 2021 में 71 मौतें, 2022 में 90, 2023 में 57 और 2024 में 67। याने कि चार साल में 285 मौतें। इसके बाद 2025 में 55 और 31 मार्च 2026 तक 14 मौतों की जानकारी भी सामने आई। आखिर इतनी मौतों के बाद व्यवस्था ने क्या सीखा? कितने मामलों में निष्पक्ष जांच हुई? कितनों में जिम्मेदारी तय हुई? और कितने मामलों में फाइल ने नीचे के कर्मचारी तक जाकर अपनी यात्रा पूरी कर ली? श्रवण की मौत ने इसी पुराने सवाल को इस बार सर्वोच्च अदालत के सामने ला खड़ा किया है। अब जब जांच का दरवाजा खुला है, तो इन भयावह आंकड़ों की भी पड़ताल होनी चाहिए आखिर इनमें ऐसे कितने मामले हैं, जो थाने की चौखट से अदालत की कचहरी तक पहुंचते-पहुंचते और वकील की फीस जुटाते-जुटाते दम तोड़ गए? कितने परिवार न्याय की लड़ाई लड़ते-लड़ते थक गए और कितनी फाइलें जिम्मेदारी तय होने से पहले ही दफ्तरों की धूल में दब गईं?
जब सवाल DGP तक पहुंचा –
सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी का सबसे गंभीर पहलू यह रहा कि बात किसी थाना प्रभारी या जिला अधिकारी तक सीमित नहीं रही। राज्य के DGP अरुण देव गौतम की कार्यप्रणाली पर अदालत ने बेहद कठोर टिप्पणी करते हुए उन्हें “Totally Incompetent” पूरी तरह अयोग्य तक कहा। पुलिस विभाग में DGP वह कुर्सी है जहां से पूरी मशीनरी को दिशा मिलती है। अगर सर्वोच्च अदालत पुलिस के सर्वोच्च अधिकारी की कार्यप्रणाली पर इतनी गंभीर टिप्पणी करे, तो उस अधिकारी के अधीन चल रही पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता का क्या होगा? क्या इतनी गंभीर टिप्पणी के बाद भी वही अधिकारी उसी कुर्सी पर रहकर उस व्यवस्था की निगरानी करता रहेगा? क्या इससे जांच प्रभावित नही होगी?
दूसरी तरफ जेल DG की कुर्सी –
श्रवण पुलिस से जेल गया था। इसलिए कहानी का अगला अध्याय केंद्रीय जेल में खुलता है। उसकी तबीयत कब बिगड़ी? जेल प्रशासन को कब जानकारी हुई? मेडिकल सहायता कब मिली? अस्पताल भेजने में कितना समय लगा? इन सवालों के जवाब जेल रिकॉर्ड में होंगे और जेल प्रशासन के शीर्ष पर हैं हिमांशु गुप्ता। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में जेल प्रशासन और DG स्तर की भूमिका को लेकर भी अदालत की नाराजगी और फटकार सामने आई। अब मामला सिर्फ एक मौत का नहीं रह गया। पूरी कमांड चेन सवालो के घेरे में है।
यहीं से खुलती है हिमांशु गुप्ता की दूसरी फाइल –
हिमांशु गुप्ता 1994 बैच के IPS अधिकारी हैं और मूल रूप से त्रिपुरा कैडर के अधिकारी रहे हैं। कैडर ट्रांसफर के बाद मध्यप्रदेश और फिर छत्तीसगढ़ कैडर में आए। अब उनकी DG पदोन्नति को लेकर प्रधानमंत्री स्तर पर गंभीर शिकायत है। आरोप है कि DPC के लिए UPSC को भेजी गई जानकारी में वरिष्ठता और पदोन्नति की तारीख से जुड़े तथ्य गलत और भ्रामक तरीके से रखे गए। दावा है कि 1995 की मध्यप्रदेश वरिष्ठता सूची में हिमांशु गुप्ता का नाम नहीं था, जबकि जीपी सिंह और SRP कल्लूरी के नाम थे। कैडर ट्रांसफर के नियमों और उसके बाद तय हुई वरिष्ठता को लेकर भी गंभीर सवाल हैं मूल वरिष्ठता सूची में स्थिति क्या थी, DPC के सामने कौन-से तथ्य रखे गए और आखिर पदोन्नति किस आधार पर तय हुई? इन सवालों का जवाब मूल फाइलों से मिलेगा। क्योंकि अगर सब कुछ नियम के मुताबिक हुआ है तो वही फाइल सबसे मजबूत गवाह है, और अगर नियमों को दरकिनार किया गया है तो वही फाइल सबसे बड़ा सबूत भी बन सकती है।
जीपी सिंह की वापसी ने बदल दिया गणित –
जीपी सिंह की न्यायिक आदेश के बाद सेवा में वापसी ने 1994 बैच की वरिष्ठता और DG पदों की गणना को फिर महत्वपूर्ण बना दिया। जिस समय DG पदों पर पदोन्नति की प्रक्रिया हुई, उस समय वरिष्ठता और पद की उपलब्धता से जुड़े तथ्यों को इस तरह प्रस्तुत किया गया जिससे हिमांशु गुप्ता को लाभ मिल सके। दावा यह भी है कि Review DPC की सिफारिश और UPSC को भेजे गए प्रस्ताव में पदोन्नति की तारीख को लेकर अंतर था। DPC ने क्या कहा था और UPSC को क्या बताया गया? बस यही सवाल है क्योंकि ब्यूरोक्रेसी में कई बड़े खेल हजारों पन्नों में नहीं, कभी-कभी एक तारीख में छिपे होते हैं।
अरुण देव गौतम की DGP वाली फाइल –
हिमांशु की पदोन्नति की कहानी खुलती है तो DGP चयन की कहानी भी पीछे से दिखाई देने लगती है। UPSC को भेजे गए पैनल में पवन देव, अरुण देव गौतम, जीपी सिंह और हिमांशु गुप्ता के नामों की चर्चा रही। फिर पैनल छोटा हुआ। और मुकाबला गौतम और हिमांशु तक पहुंच गया। अब सवाल बाकी नाम क्यों हटे? किस कसौटी पर? किसकी वरिष्ठता मानी गई? किसकी पात्रता? और किसके पक्ष में कौन-सी प्रशासनिक दलील काम आई? यहीं तत्कालीन मुख्य सचिव अमिताभ जैन का अध्याय सामने आता है। उस समय वे भूपेश बघेल सरकार के मुख्य सचिव थे। आज जब उसी चयन से निकले नेतृत्व की कार्यप्रणाली पर सर्वोच्च अदालत सवाल उठा रही है, तो उस चयन प्रक्रिया की फाइल पर सवाल उठना भी अस्वाभाविक नहीं। कल चयन की फाइल बंद थी। आज अदालत की टिप्पणी ने उसकी धूल उड़ा दी है।
सरकार बदल गई, फाइलें वहीं रहीं –
भूपेश सरकार गई। सरकार बदली। चेहरे बदले। राजनीतिक समीकरण बदले। लेकिन ब्यूरोक्रेसी की फाइलें वहीं रहीं। यही प्रशासन की सबसे विचित्र खूबी है। राजनीति की उम्र पांच साल होती है, फाइल की उम्र कई सरकारें। जिस निर्णय पर कल सत्ता की मुहर लगी थी, वह आज भी प्रशासनिक सच बना रहता है। इसलिए आज सवाल यह नहीं कि फैसला किस सरकार में हुआ। सवाल यह है कि क्या फैसला नियम से हुआ था? अगर हुआ था तो किसी को डरने की जरूरत नहीं। अगर नहीं हुआ था तो सरकार बदलने से नियम की तारीख नहीं बदलती।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का वह दृश्य –
इस कहानी का सबसे प्रतीकात्मक दृश्य वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का वह अंश है, जिसमें अदालत की सख्ती और अरुण देव गौतम की कार्यप्रणाली पर सवालों के बीच हिमांशु गुप्ता की ओर संकेत करते हुए “मैं संभाल लूंगा” जैसा भाव/वाक्य सामने आता है। ब्यूरोक्रेसी की भाषा समझने वालों के लिए यह दृश्य बहुत कुछ कहता है। एक तरफ अदालत पूछ रही है जिम्मेदारी किसकी है? दूसरी तरफ व्यवस्था का आत्मविश्वास कहता है “मैं संभाल लूंगा।” यही वह जगह है जहां सरकारी मशीनरी और न्यायपालिका की भाषा अलग हो जाती है। सरकार कहती है मामला देख लिया जाएगा। अदालत पूछती है अब तक किया क्या? अब मामला संभालने का नहीं, हिसाब का है। क्योंकि इस बार CBI सामने है। श्रवण की मौत की जांच होगी। पुलिस रिकॉर्ड देखे जाएंगे। जेल रिकॉर्ड देखे जाएंगे। मेडिकल रिकॉर्ड देखे जाएंगे। पोस्टमार्टम देखा जाएगा। अधिकारियों की भूमिका देखी जाएगी। और यदि जरूरत पड़ी तो उस पूरी कमांड चेन को देखा जाएगा जिसके नीचे यह सब हुआ।
बड़ा सवाल अब यह नहीं है कि कौन DGP बना या कौन DG बना। सवाल यह है कि किस रास्ते से बना, किस नियम के तहत बना और उस कुर्सी पर बैठकर व्यवस्था कैसी चली इसका हिसाब कौन देगा। कल तक फाइलें बंद कमरों में थीं, आज सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने उन्हें सार्वजनिक जवाबदेही के सामने ला खड़ा किया है और कल तक जो मामला विभागीय दायरों में था, वह आज CBI की जांच में है। अगर पुरानी फाइलें भी खुलती हैं तो ब्यूरोक्रेसी के उन गलियारों में भी रोशनी पहुंचेगी, जहां आम आदमी की नजर शायद ही कभी पहुंचती है। कुर्सियां बदलती रहेंगी, सरकारें बदलती रहेंगी, लेकिन फाइलों में दर्ज फैसलों की जवाबदेही नहीं बदलेगी। अब यह तय होना है कि किसने क्या किया, किसने क्या छिपाया और किसकी जिम्मेदारी कहां तक थी। क्योंकि व्यवस्था सिर्फ “मैं संभाल लूंगा” कहने से नहीं चलती व्यवस्था तब चलती है, जब जिम्मेदार अधिकारी यह बताने के लिए भी तैयार हों कि आखिर मामला बिगड़ा क्यों और उसकी कीमत किसने चुकाई।










