जनता जिन गड्ढों से रोज गुजरती रही, उन्हीं में संगठन का पहिया अटक गया, अंबिकापुर की बदहाल सड़कों ने पवन साय का पारा चढ़ाया, मंत्री से लेकर संगठन के नेताओं तक को खरी-खरी

अंबिकापुर – प्रदेशभर में खस्ताहाल और गड्ढों से भरी सड़कें अब सरकार को मुँहबाये चिढ़ा रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि आम आदमी इन गड्ढों से रोज गुजरता है, लेकिन इस बार संगठन के एक बड़े भाईसाहब की गाड़ी गड्ढे में फंस गई। मामला इस कदर तूल पकड़ा की सरकार तक हिल गई।
हुआ यूं कि प्रदेश संगठन महामंत्री पवन साय 33 जिलों के दौरे पर हैं। 19 अगस्त को जशपुर से अंबिकापुर आते समय सीतापुर के रास्ते में उनकी गाड़ी गड्ढे में फंस गई। इसके बाद बची कुची कसर लुचकी घाट से खरसिया नाका तक ने पूरी कर दी सड़क की बदहाल स्थिति से गाड़ी ही नही संगठन के भाईसाहब की कमर भी जवाब दे गई। इसके बाद रात में सर्किट हाउस में भाजपा नेताओं के साथ बैठक हुई तो सड़क का मुद्दा सीधे संगठन की कार्यशैली तक पहुंच गया। पवन साय ने नेताओं को खरी-खरी सुनाते हुए कहा “सब ठेकेदार बन गए हैं, संगठन का काम कौन करेगा और जनता का काम कौन करेगा?”
अगली सुबह मंत्री राजेश अग्रवाल की मौजूदगी में भी अंबिकापुर और सीतापुर की सड़कों का मुद्दा उठा। प्रभारी मंत्री ओपी चौधरी को फोन तक किया गया। यानी एक गड्ढा स्थानीय समस्या से निकलकर सीधे सरकार तक पहुंच गया। लेकिन पवन साय की नाराजगी को सिर्फ सड़क के गड्ढे से जोड़कर देखना शायद इस पूरे घटनाक्रम को छोटा करके देखना होगा।
दरअसल, इस सत्ता के मुख्य शिल्पियों में पवन साय भी भूमिका अहम है। भूपेश सरकार के कुशासन काल को जनता के बीच उजागर करने से लेकर संगठन के बिखरे मोतियों को एक धागे में पिरोने और रात-दिन संगठन का दायित्व निभाकर उसे एकजुट रखने तक उनकी भूमिका अहम रही। 2023 में जिन नामों की सत्ता के शिल्पकार के तौर पर चर्चाएं थीं, उनमें से कुछ के तत्कालीन सत्ता के लोगों से मेल-मुलाकात के किस्से भी सियासी गलियारों में चलते रहे। लेकिन संगठन के स्तर पर पवन साय की मेहनत और उनकी लाइन के आगे आखिरकार किसी की नहीं चली और सरकार बनी।
अब वही पवन साय दो साल बाद फिर चुनावी मैदान में जाने से पहले जमीन का हाल देख रहे हैं। इसलिए उनकी बेचैनी का सवाल शायद सड़क से कहीं बड़ा है दो साल बाद जनता के बीच जाएंगे तो क्या जवाब देंगे का है। कानून-व्यवस्था का हाल हो या पुलिसिंग, विभागों में शिकायतें हों या बुनियादी सुविधाओं की बदहाली हर मोर्चे पर सरकार को जनता के सवालों का सामना करना है। और अगर विकास की पहली तस्वीर मानी जाने वाली सड़कें ही गड्ढों में तब्दील हों, तो संगठन के लिए चिंता होना स्वाभाविक है।
अब हो सकता है अंबिकापुर की सड़क ठीक हो जाए। थूक-पॉलिश ही सही, गड्ढे भर दिए जाएं और ऊपर से डामर बिछा दिया जाए। लेकिन सवाल रहेगा ये गड्ढे इससे पहले किसकी नजर से बचते रहे? मंत्री इसी रास्ते से गुजरते हैं। अफसर भी गुजरते हैं। जनप्रतिनिधि भी अपने इलाकों में आते-जाते हैं। फिर जनता की रोज की परेशानी उन्हें क्यों नहीं दिखी? शायद फर्क इतना है कि इस बार आम आदमी नहीं, संगठन के एक बड़े व्यक्ति की गाड़ी गड्ढे में फंस गई। पहिया फंसा तो शिकायत ऊपर तक पहुंच गई।
यहीं से सवाल सड़क से निकलकर सिस्टम तक पहुंचता है क्या जनता की परेशानी तब ही गंभीर मानी जाएगी, जब वही परेशानी किसी बड़े आदमी के सामने आ जाए? लक्जरी गाड़ियों में बैठकर उन्हीं सड़कों से गुजरने वाले मंत्री-अफसर अगर सड़क की हालत महसूस नहीं कर पा रहे हैं, तो फिर जनता की परेशानी उन तक पहुंचेगी कैसे? और यही वह जगह है जहां पवन साय की चिंता में एक और नाम अनायास सामने आता है ‘बगुला भगत’ का सरकार के भीतर कानून-व्यवस्था से लेकर प्रशासन तक की जिम्मेदारी संभालने वालों को यह बताना होगा कि जनता के बीच सरकार की जो तस्वीर बन रही है, उसे सिर्फ फाइलों और बैठकों से ठीक नहीं किया जा सकता।
पवन साय की नाराजगी के बाद सड़क सुधर जाए तो अच्छी बात है। लेकिन असली परीक्षा तब होगी, जब अगली बार किसी सड़क की हालत सुधारने के लिए किसी संगठन के नेता की गाड़ी को गड्ढे में उतरने की जरूरत न पड़े। क्योंकि जनता को अपनी तकलीफ साबित करने के लिए किसी बड़े आदमी के पहिए की गवाही नहीं चाहिए।
अंबिकापुर का यह गड्ढा इसलिए छोटा मामला नहीं है। यह संगठन और सत्ता दोनों के लिए संकेत है कि जनता के बीच जाने से पहले अपनी जमीन टटोल लेना बेहतर है। क्योंकि दो साल बाद सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि सरकार ने क्या बनाया। सवाल यह भी होगा कि जब जनता गड्ढों में चल रही थी, कानून-व्यवस्था पर सवाल उठ रहे थे और व्यवस्था पर शिकायतें बढ़ रही थीं, तब सरकार और संगठन कहां थे।
और शायद यही वजह है कि पवन साय का गुस्सा सिर्फ सड़क का गुस्सा नहीं है।
यह उस व्यक्ति की चिंता है, जिसने सत्ता की जमीन तैयार करने में अपना हिस्सा निभाया और अब उसी सत्ता को दो साल बाद जनता की अदालत में ले जाने की तैयारी देख रहा है।
पवन साय की चिंता इसलिए वाजिब है क्योंकि चुनाव के समय जनता को भाषण नहीं, अपने अनुभव का हिसाब याद रहता है।










