गोपाल अग्रवाल की जी.के. टाउनशिप का काला खेल? शासकीय भूमि पर अवैध कॉलोनी, तीन-तीन नोटिस फिर भी निर्माण जारी! तत्कालीन मंत्री के नाम का दुरूपयोग या वरदहस्त?

गोपाल अग्रवाल की जी.के. टाउनशिप का काला खेल? शासकीय भूमि पर अवैध कॉलोनी, तीन-तीन नोटिस फिर भी निर्माण जारी! तत्कालीन मंत्री के नाम का दुरूपयोग या वरदहस्त?
पेण्ड्रा – गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही जिले के पेण्ड्रा नगर में कथित उद्योगपति गोपाल कृष्ण अग्रवाल से जुड़ी जी.के. टाउनशिप के काले खेल और अवैध कॉलोनी निर्माण गंभीर सवालों के घेरे में है। मामला केवल बिना अनुमति कॉलोनी विकसित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि शासकीय भूमि के उपयोग, बिना वैधानिक स्वीकृति प्लॉटिंग, मुख्य मार्ग पर अवैध निर्माण और प्रशासनिक निष्क्रियता जैसे गंभीर सवाल भी इससे जुड़ गए हैं। उपलब्ध सरकारी दस्तावेज, राजस्व रिकॉर्ड और नगर पालिका के नोटिस पूरे मामले को और गंभीर बनाते हैं।
दस्तावेजों के अनुसार 24 फरवरी 2026 को नगर पालिका परिषद पेंड्रा ने जी.के. टाउनशिप तथा गोपाल कृष्ण अग्रवाल के नाम अलग-अलग नोटिस जारी किए। नोटिस में स्पष्ट उल्लेख है कि सक्षम प्राधिकारी से स्वीकृति प्राप्त किए बिना कॉलोनी निर्माण एवं प्लॉटिंग का कार्य किया जा रहा है, जो छत्तीसगढ़ नगर पालिका अधिनियम, 1961 की धारा 339-क एवं 339-ख का उल्लंघन है। सात दिवस के भीतर जवाब प्रस्तुत करने तथा अन्यथा विधिवत कार्रवाई एवं कॉलोनाइजर लाइसेंस निरस्त किए जाने की चेतावनी भी नोटिस में दी गई है। मगर आज पांच माह बाद भी उक्त नोटिस का कोई जवाब नही दिया गया।

सरकारी रिकॉर्ड में शासकीय भूमि, मौके पर कॉलोनी विकास –
राजस्व विभाग के भुइयां पोर्टल और उपलब्ध खसरा अभिलेखों के अनुसार खसरा क्रमांक 605/4 एवं 602/11 शासकीय भूमि के रूप में दर्ज हैं। इसके अलावा मामले में 607/12, 607/22 सहित अन्य खसरा भी शासकीय भूमि हैं। इन शासकीय भूमियों का उपयोग कॉलोनी के विकास, सड़क, डिवाइडर, स्ट्रीट लाइट एवं अन्य आधारभूत सुविधाएं विकसित करने में किया गया है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह अवैध निर्माण कोई अंदरूनी इलाके में नही हो रहा है बल्कि यह काला खेल खुलेआम प्रशासन ने नाक के नीचे पेण्ड्रा-गौरेला मुख्य मार्ग पर चल रहा है, जहां से प्रतिदिन जिले के वरिष्ठ प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों सहित हजारों लोगों का आवागमन होता है। बावजूद इसके यदि शासकीय भूमि पर अवैध निर्माण होता रहा तो सवाल उठता है कि संबंधित विभागों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की।
सरकारी सड़क जैसा विकास, फिर भी अनुमति नहीं –
इतना ही नही कॉलोनी को आकर्षक और वैध दिखाने के लिए शासकीय भूमि पर सड़क, डिवाइडर, स्ट्रीट लाइट और अन्य सुविधाएं विकसित कर लोगों को प्लॉट खरीदने के लिए लुभाया जा रहा है। जो कि एक गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। आम नागरिकों के सामने विकसित कॉलोनी की तस्वीर पेश की जा रही है, जबकि इस परियोजना के लिए आवश्यक वैधानिक स्वीकृतियां प्राप्त नहीं की गई हैं। इसी आकर्षण का हवाला देकर टुकड़ो टुकड़ो में प्लाट बेचा जा रहा है।

नगर पालिका अध्यक्ष का दावा एक भी अनुमति जारी नहीं हुई –
नगर पालिका परिषद पेंड्रा के अध्यक्ष राकेश जालान ने बताया कि नगर प्रशासन द्वारा इस कॉलोनी के लिए कोई अनुमति जारी नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि नियमानुसार कॉलोनी विकसित करने से पहले निर्धारित प्रक्रिया पूरी करनी होती है तथा लगभग 10 प्रतिशत भूमि नगर प्रशासन को हस्तांतरित किए जाने के बाद ही अनुमति जारी की जाती है, लेकिन इस मामले में नियमों का पालन नहीं किया गया। अध्यक्ष ने बताया कि नगर पालिका द्वारा तीन बार विधिवत नोटिस जारी किए गए, इसके बावजूद निर्माण कार्य जारी रहा। उनके अनुसार गेट, होटल तथा प्लॉटिंग पूरी तरह अवैध है और नियमानुसार ऐसे प्रोजेक्ट में एक भी प्लॉट की बिक्री नहीं हो सकती।
ढाई साल से निर्माण, कार्रवाई क्यों नहीं?
एक और महत्वपूर्ण बात यह कोई आज का नही है यह अवैध निर्माण पिछले लगभग ढाई वर्षों से निरंतर जारी है। इसके बावजूद प्रशासन द्वारा प्रभावी कार्रवाई नहीं किए जाने पर भी सवाल उठ रहे हैं। मामले की जानकारी एसडीएम पेंड्रारोड को भी कई बार दी गई। और जवाब में जांच कराने का आश्वासन भी दिया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई या सार्वजनिक जवाब सामने नहीं आया। इससे यह परिलक्षित होता है कि अवैध निर्माण में राजस्व के अधिकारियो की भूमिका भी संदिग्ध है अगर ऐसा नही है तो राजस्व के अधिकारियो को जवाब देना चाहिए।
होटल निर्माण भी सवालों के घेरे में –
कॉलोनी परिसर में निर्मित होटल जो कि एक शासकीय भूमि में है। इतना बड़ा होटल कॉलोनी क्या यह प्रशासन को नजर नही आता या प्रशासन ने उक्त कथित उद्योगपति को खुला संरक्षण दे रखा है।
राजनीतिक चर्चाएं भी तेज –
इस अवैध निर्माण कारोबार में न्यायधानी के तत्कालीन मंत्री और वर्तमान में सत्ता दल के विधायक जो राजनीति के प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं, का नाम भी खुलकर लिया जाता है कहा जाता है उक्त नेता का इन्हें संरक्षण मिला हुआ है। अधिकारियो पर इन्ही नेता जी का डर दबाव दिखाया जाता है शायद यही कारण है कि अधिकारी भी इस काले अवैध निर्माण पर कार्रवाही करने से परहेज करते है। अब यह नेताजी का नाम बदनाम करने की साजिश है या सच मे नेता जी इन्हें संरक्षण दिया है इसका सही जवाब तो नेता जी ही दे पाएंगे। उक्त मामले में हमने नेता जी से संपर्क करने की कोशिश की मगर उनसे बात नही हो सकी। यदि संबंधित विधायक का पक्ष प्राप्त होता है, तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
मामले में एक तथ्य यह भी है कि गलत चौहद्दी प्रस्तुत कर भूमि को वैध दर्शाने की कोशिश की गई तथा राजस्व अमले की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच की मांग की गई है।
बड़ा सवाल –
यदि नगर पालिका स्वयं तीन-तीन नोटिस जारी कर चुकी थी, यदि अनुमति नहीं थी, यदि कॉलोनी विकास को अवैध बताया गया था, तो फिर निर्माण कार्य आखिर कैसे चलता रहा? यदि मुख्य सड़क किनारे यह सब हो रहा था, तो संबंधित विभागों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की? और यदि सरकारी भूमि का उपयोग हुआ है, तो उसकी जवाबदेही किसकी तय होगी?
जांच की मांग –
मामले में शासकीय भूमि का पुनः सीमांकन, सभी अनुमतियों की जांच, प्लॉटिंग की वैधता, निर्माण कार्यों की जांच तथा यदि शासकीय भूमि पर अतिक्रमण या अन्य अनियमितता पाई जाती है तो वैधानिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।










