10 साल बाद फिर गिरी ‘फर्जी जाति’ की दीवार! उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने फिर निरस्त किया क्रिस्टीना एस. लाल का अनुसूचित जनजाति प्रमाण-पत्र, अब नौकरी पर संकट –

10 साल बाद फिर गिरी ‘फर्जी जाति’ की दीवार! उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने फिर निरस्त किया क्रिस्टीना एस. लाल का अनुसूचित जनजाति प्रमाण-पत्र, अब नौकरी पर संकट –
रायपुर : – लगभग एक दशक तक न्यायालय के स्थगन आदेश के सहारे शासकीय सेवा करती रहीं महिला एवं बाल विकास विभाग की अधिकारी क्रिस्टीना एस. लाल एक बार फिर गंभीर कानूनी संकट में घिर गई हैं। राज्य स्तरीय उच्च स्तरीय जाति प्रमाण-पत्र छानबीन समिति ने विस्तृत जांच के बाद उनके अनुसूचित जनजाति (गोंड) जाति प्रमाण-पत्र को निरस्त कर दिया है। इसके साथ ही अब उनकी शासकीय सेवा पर भी तलवार लटक गई है।

यह मामला नया नहीं है। वर्ष 2015 में भी तत्कालीन छानबीन समिति ने जांच के बाद उनका जाति प्रमाण-पत्र निरस्त कर दिया था। उस समय तत्कालीन सचिव दिनेश श्रीवास्तव ने सेवा समाप्ति की प्रक्रिया भी शुरू कर दी थी, लेकिन श्रीमती लाल ने उच्च न्यायालय में WPC 581/2016 दायर कर स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया। उसी स्थगन के आधार पर वे वर्ष 2026 तक शासकीय सेवा में बनी रहीं। बाद में उच्च न्यायालय के निर्देश पर छानबीन समिति का पुनर्गठन किया गया। नई समिति ने पूरे मामले की दोबारा जांच की और एक बार फिर उनके अनुसूचित जनजाति प्रमाण-पत्र को निरस्त करने का आदेश जारी कर दिया।

जांच में क्या-क्या सामने आया?
समिति के आदेश में कई ऐसे तथ्य दर्ज किए गए हैं, जिन्होंने उनके दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े किए हैं। जांच दल जब ग्राम तुरमादर, तहसील कुंडम, जिला जबलपुर पहुंचा तो ग्रामसभा ने बताया कि गांव में लगभग 100 गोंड परिवार निवास करते हैं, लेकिन किसी भी परिवार ने ईसाई धर्म स्वीकार नहीं किया है। जबकि श्रीमती क्रिस्टीना एस. लाल ईसाई धर्म से संबंधित हैं। ग्रामसभा ने यह भी कहा कि गांव के गोंड परिवारों में दर्जी का पारंपरिक व्यवसाय नहीं रहा, जबकि दस्तावेजों में उनके पूर्वजों का व्यवसाय दर्जी बताया गया।

जांच के दौरान प्रस्तुत राजस्व अभिलेखों पर संबंधित पटवारी ने अपने हस्ताक्षर होने से ही इनकार कर दिया। समिति ने इस तथ्य को भी आदेश में दर्ज किया। समिति को वंशावली, पैतृक निवास और सामाजिक स्थिति संबंधी कई दावों का स्वतंत्र एवं विश्वसनीय समर्थन भी नहीं मिला।

भाई ने बनवाया प्रमाण-पत्र –
जांच के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि जाति प्रमाण-पत्र तैयार कराने में उनके भाई की भूमिका बताई गई, जो उस समय जबलपुर कमिश्नरी में जाति प्रमाण-पत्र शाखा से जुड़े थे।

10 साल की नौकरी, करोड़ों का खर्च –
स्थगन आदेश के कारण श्रीमती लाल लगभग दस वर्षों तक शासकीय सेवा में बनी रहीं। यदि उनके वेतन और अन्य शासकीय सुविधाओं का मोटा आकलन किया जाए तो शासन पर इस अवधि में करीब ₹2.5 करोड़ का वित्तीय भार पड़ा। यदि शुरुआती आदेश के बाद ही सेवा समाप्त हो जाती तो यह राशि बच सकती थी और आरक्षित पद पर किसी पात्र अनुसूचित जनजाति अभ्यर्थी को नियुक्ति का अवसर मिल सकता था।

GAD का स्पष्ट आदेश भी मौजूद –
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) का 31 जुलाई 2015 का परिपत्र है। इसमें सभी विभागों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि यदि उच्च स्तरीय छानबीन समिति किसी शासकीय सेवक का फर्जी अथवा गलत जाति प्रमाण-पत्र निरस्त कर देती है, तो बिना विभागीय जांच के उसकी नियुक्ति निरस्त कर सेवा समाप्त की जाए। यदि किसी प्रकरण में न्यायालय से स्थगन आदेश मिला हो तो उसे समाप्त कराने की जिम्मेदारी संबंधित विभाग की होगी।
अब निगाहें प्रमुख सचिव पर –
अब सबसे बड़ा सवाल महिला एवं बाल विकास विभाग की प्रमुख सचिव शहला निगार के सामने है। समिति का नया आदेश आने के बाद क्या विभाग सामान्य प्रशासन विभाग के निर्देशों के अनुरूप तत्काल सेवा समाप्ति की कार्रवाई करेगा, या फिर श्रीमती क्रिस्टीना एस. लाल को एक बार फिर न्यायालय से राहत लेने का अवसर मिलेगा?
यदि वे इस आदेश को भी उच्च न्यायालय में चुनौती देती हैं, तो अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के अधीन होगा। लेकिन फिलहाल छानबीन समिति का नया आदेश एक बार फिर इस बहुचर्चित प्रकरण को सुर्खियों में ले आया है और अब सबकी निगाहें विभागीय कार्रवाई पर टिकी हैं।










