सुबोध सिंह : कम बोलने वाले अफसर की लंबी पारी, अनुभव की अब बड़ी परीक्षा

 

रायपुर – नौकरशाही में हर अफसर का अपना अंदाज होता है। कोई अपनी बात कहने में आगे रहता है, कोई फैसले लेने में और कुछ ऐसे भी होते हैं, जो पहले पूरा सुनते हैं, फिर बोलते हैं। 1997 बैच का एक ऐसा ही अफसर है, जो भले ही लो-प्रोफाइल रहता हो, लेकिन उसकी फाइलें और फैसले उसकी मौजूदगी का एहसास करा देते हैं। नाम है सुबोध कुमार सिंह। जिनकी पहचान इसी तीसरी श्रेणी के अफसर के तौर पर होती है। कम बोलना, सामने वाले को गौर से सुनना, बात को समझना और फिर निर्णय तक पहुंचना करीब तीन दशक की उनकी प्रशासनिक यात्रा में यह अंदाज बार-बार दिखाई देता है। शायद यही वजह है कि सुबोध सिंह के बारे में सार्वजनिक चर्चा उनके बयानों से कम और उनके पदों, काम और फैसलों से ज्यादा होती रही है।

इस आईएएस अधिकारी ने प्रशासनिक सफर की शुरुआत मंडला में Assistant Collector के रूप में की। इसके बाद कोरिया में SDO और बस्तर में जिला पंचायत CEO रहे। फिर रायगढ़ की कलेक्टरी मिली, जहां ग्रामीण विकास योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन के लिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला। शुरुआती दौर में ही मैदान में काम करने और नतीजे देने की पहचान बनती चली गई।

रायगढ़ के बाद रायपुर और बिलासपुर जैसे महत्वपूर्ण जिलों की कमान भी मिली। यानी अफसरी की शुरुआती पाठशाला सीधे जमीन पर रही, जहां फाइल सिर्फ कागज नहीं होती, उसके पीछे कोई गांव, कोई योजना और कोई उम्मीद भी खड़ी होती है। यही मैदानी अनुभव आगे चलकर उनके प्रशासनिक सफर की मजबूत बुनियाद बना।

फिर 2009 के बाद उनका सफर मुख्यमंत्री सचिवालय की ओर मुड़ा। यह उनके कैरियर का लंबा और महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। करीब नौ साल तक अलग-अलग जिम्मेदारियों में मुख्यमंत्री सचिवालय से जुड़े रहे। इसी दौरान बिजली, खनिज, उद्योग और अधोसंरचना जैसे क्षेत्रों में काम करने का मौका मिला। प्रशासन को तकनीक से जोड़ने और मॉनिटरिंग व्यवस्था को मजबूत करने के प्रयासों में भी उनकी भूमिका रही। खनिज नीलामी में डिजिटल पारदर्शिता के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला।

यहीं उनके प्रशासनिक व्यक्तित्व का दूसरा पहलू भी सामने आता है तकनीक और सिस्टम में रुचि। Electrical Engineering की पढ़ाई और प्रशासनिक अनुभव का मेल शायद इसकी एक वजह रहा कि बिजली और डिजिटल प्रशासन जैसे विषय उनके कैरियर में बार-बार लौटते रहे।

मुख्यमंत्री सचिवालय में लंबी पारी का मतलब सत्ता के कामकाज को भीतर से समझना भी है। इसे कोई प्रशासनिक अनुभव कह सकता है, कोई सत्ता के करीब रहने का दौर। नजरिया अलग हो सकता है, लेकिन तथ्य यह है कि सरकार बदली तो भी उनका कैरियर वहीं नहीं रुका।

इसके बाद दिल्ली का रास्ता खुला। Food & Public Distribution विभाग में Joint Secretary और फिर Additional Secretary की जिम्मेदारी मिली। राज्य में Civil Supplies से शुरू हुआ अनुभव अब देश की खाद्य व्यवस्था के बड़े ढांचे तक पहुंच चुका था।

इसके बाद उनके कैरियर ने एक और बड़ा मोड़ लिया और वे देश की महत्वपूर्ण संस्थाओं में जिम्मेदारी संभालते हुए फिर केंद्र और राज्य के प्रशासनिक दायरे में लौटे। दिसंबर 2024 में छत्तीसगढ़ वापसी के बाद मुख्यमंत्री के Principal Secretary बने और 2026 में ऊर्जा विभाग की जिम्मेदारी भी उनके पास आ गई। यानी करीब तीन दशक की नौकरी में जिम्मेदारियों का दायरा लगातार बदलता रहा, लेकिन प्रशासनिक सफर थमा नहीं।

अब सामने है ऊर्जा विभाग की बड़ी जिम्मेदारी

Electrical Engineering की पृष्ठभूमि वाले सुबोध सिंह के लिए ऊर्जा विभाग कोई नया मैदान नहीं है। पहले भी बिजली क्षेत्र की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं और अब वर्षों बाद फिर ऊर्जा विभाग की कमान उनके हाथ में है। साथ में राज्य की Power Companies की जिम्मेदारी भी है। फर्क इतना है कि तब अनुभव जुटाया जा रहा था, अब उस अनुभव की परीक्षा होनी है।

छत्तीसगढ़ में ऊर्जा का सवाल सिर्फ बिजली पैदा करने और पहुंचाने तक सीमित नहीं है। बढ़ती मांग, नई परियोजनाएं, निवेश, ट्रांसमिशन और वितरण व्यवस्था हर मोर्चे पर फैसले लेने हैं। ऐसे में तकनीकी समझ के साथ लंबा प्रशासनिक अनुभव उनके लिए मजबूत पक्ष है। लेकिन यहीं से उनकी कहानी को सिर्फ पोस्टिंग की सूची से पढ़ना अधूरा होगा। कैरियर पर नजर डालें तो एक दिलचस्प पैटर्न दिखाई देता है जिम्मेदारियां बदलती रहीं, लेकिन हर पड़ाव अगले पड़ाव की तैयारी जैसा नजर आया।

जिले ने मैदान समझाया, मुख्यमंत्री सचिवालय ने सरकार की कार्यप्रणाली करीब से दिखाई, बिजली और खनिज ने तकनीकी और आर्थिक फैसलों की बारीकियां सिखाईं, दिल्ली ने राष्ट्रीय स्तर की व्यवस्था का अनुभव दिया और अलग-अलग संस्थाओं की जिम्मेदारियों ने प्रशासन की दूसरी चुनौतियों से सामना कराया।

अब उसी लंबे अनुभव का अगला इस्तेमाल ऊर्जा विभाग में होना है। यहां किसी प्रेस बयान से ज्यादा महत्व आंकड़ों का होगा। कितनी बिजली बनी, कितनी पहुंची, वितरण व्यवस्था कितनी सुधरी, परियोजनाएं कितनी तेजी से आगे बढ़ीं और निवेश जमीन पर कितना उतरा यही धीरे-धीरे उनकी नई पारी का रिपोर्ट कार्ड बनाएगा और शायद यही उनकी कार्यशैली से भी मेल खाता है। कम बोलने वाले अफसर को इस बार ज्यादा बोलने की जरूरत नहीं होगी।

क्योंकि बिजली के मामले में फाइलें ज्यादा देर तक चुप नहीं रहतीं। कोई परियोजना अटकी तो असर दिखेगा, कोई निवेश आया तो आंकड़ों में दिखाई देगा, व्यवस्था सुधरी तो उपभोक्ता महसूस करेगा और कोई फैसला भारी पड़ा तो उसका हिसाब भी सामने आएगा।

सुबोध सिंह की कहानी इसलिए न पूरी तरह उपलब्धियों की है, न सिर्फ पदों की। करीब तीन दशक के इस सफर में मैदानी प्रशासन से लेकर मुख्यमंत्री सचिवालय, केंद्र सरकार और अब ऊर्जा विभाग तक की लंबी यात्रा मौजूद है। राष्ट्रीय सम्मान हैं, महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं और बदलते प्रशासनिक दौर के साथ खुद को ढालने का अनुभव भी।

किसी अफसर को समझने के लिए शायद पूरी फाइल पढ़नी चाहिए, सिर्फ एक पन्ना नहीं। और पूरी फाइल में एक बात लगातार दिखाई देती है लो-प्रोफाइल रहना। बयान कम, जिम्मेदारियां ज्यादा। सार्वजनिक मौजूदगी कम, काम का दायरा ज्यादा। सामने वाले को सुनना, बात को समझना और फिर निर्णय लेना।

अब इसी अंदाज की असली परीक्षा ऊर्जा विभाग में होगी।

तीन दशक की अफसरी के बाद शायद यह सबसे दिलचस्प मोड़ है जिस अफसर ने अपनी पहचान ज्यादा बोलकर नहीं बनाई, अब उसके फैसले कितना बोलते हैं, यही उसकी अगली पहचान तय करेगा।

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