GPM – लीना मंडावी के कार्यकाल का एक और घोटाला! मुकेश रावटे की भूमिका पर भी सवाल, सचिवों से लेनदेन कर उसी जगह बहाली, FIR का पत्र भी बेअसर, वेंडर बेखौफ
15वें वित्त के 1.19 करोड़ रुपये के भुगतान में गड़बड़ी, आठ सचिवों का निलंबन वापस लेकर उन्हीं पंचायतों में पदस्थापना, साल की शुरुआत में सामने आया मामला, साल के अंत तक कार्रवाई नदारद

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही – डीएमएफ में करोड़ों के घोटाले की कहानी अभी शांत भी नहीं हुई थी कि जिले में एक और बड़ा घोटाला सामने आ गया। इस बार 15वें वित्त आयोग की राशि में करोड़ों रुपये की बंदरबांट का मामला है, जिसमें तत्कालीन कलेक्टर लीना मंडावी और जिला पंचायत सीईओ मुकेश रावटे की भूमिका संदिग्ध सवालों के घेरे में है। पंचायतों के खातों से 1 करोड़ 19 लाख 56 हजार रुपये अलग-अलग वेंडरों को भुगतान किए गए। ई-ग्राम स्वराज पोर्टल में मोबाइल और ई-मेल बदलने से लेकर डिजिटल सिग्नेचर के दुरुपयोग तक का मामला सामने आया, लेकिन इतने बड़े वित्तीय मामले में अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
इस पूरे घटनाक्रम में जिला पंचायत सीईओ मुकेश रावटे की भूमिका सबसे अहम सवाल बनकर उभरी है। बताते है कि मामले को ठंडे बस्ते में डालने के लिए रावटे ने सचिवों को अलग-अलग अपने चैंबर में बुलाया और उनसे बड़ी रकम की वसूली कर मामले को रफा-दफा कर दिया। शुरुआत में आठ पंचायत सचिवों को निलंबित किया गया, लेकिन लेनदेन के कुछ ही दिनों बाद उनका निलंबन समाप्त कर उन्हें उन्हीं पंचायतों में दोबारा पदस्थ कर दिया गया। निलंबन से बहाली तक के इस घटनाक्रम ने सचिवों से बड़े लेनदेन की चर्चाओं को और हवा दी है। सवाल है कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थिति बनी कि वित्तीय अनियमितताओं के बीच निलंबित सचिवों को इतनी जल्दी राहत मिल गई?
आठ पंचायतें, 1.19 करोड़ का भुगतान और वेंडरों के खाते –
जांच से जुड़े दस्तावेजों और भुगतान विवरण के अनुसार आठ ग्राम पंचायतों में 15वें वित्त आयोग की राशि से नियमों के विपरीत भुगतान हुआ। ग्राम पंचायत तेंदुमुड़ा में 29.98 लाख रुपये, नेवरी नवापारा में 26.13 लाख, ठाड़पथरा में 23.26 लाख, आमाडोब में 10.91 लाख, पूटा में 10.72 लाख, आमगांव में 6.40 लाख, साल्हेघोरी में 6.69 लाख और हर्राटोला में 5.47 लाख रुपये का भुगतान किया गया।
इस तरह कुल 1 करोड़ 19 लाख 56 हजार रुपये वेंडरों के खातों में पहुंचे। जांच में सरकारी राशि के दुरुपयोग, अधूरे निर्माण कार्यों के बावजूद भुगतान और फर्जी बिल-वाउचर के जरिए रकम निकालने जैसी वित्तीय अनियमितताओं के तथ्य सामने आए। इसके बावजूद जिन वेंडरों के खातों में रकम पहुंची, उनकी भूमिका और भुगतान के बदले हुए वास्तविक कार्यों का हिसाब अब तक स्पष्ट नहीं है।
ई-ग्राम स्वराज का सिस्टम किसके नियंत्रण में था –
पंचायत प्रतिनिधियों की शिकायत थी कि ई-ग्राम स्वराज पोर्टल में सचिवों के पंजीकृत ई-मेल और मोबाइल नंबर बदलकर कंप्यूटर ऑपरेटर का नंबर दर्ज कर दिया गया। इसके बाद भुगतान प्रक्रिया पर सचिवों का नियंत्रण समाप्त हो गया और ओटीपी तक उनके पास नहीं पहुंचा। पंचायतों के डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट (DSC) का इस्तेमाल कर बिना उनकी विधिवत जानकारी के वेंडरों को भुगतान किया गया।
इस पूरे मामले में कंप्यूटर ऑपरेटर दीपक जायसवाल की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। शिकायतकर्ताओं ने उस पर भुगतान प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाने के आरोप लगाए थे। लेकिन डिजिटल लॉगिन, ओटीपी और डीएससी के इस्तेमाल से जुड़े सवालों का अब तक स्पष्ट जवाब नहीं मिला है।
निलंबन के बाद बहाली, सचिवों की वापसी के पीछे क्या हुआ –
जांच के बाद आठ पंचायत सचिवों को निलंबित किया गया था। लेकिन 30 अप्रैल 2026 के कार्यालयीन आदेश में पूर्व की कार्रवाई को आगामी आदेश तक स्थगित कर दिया गया। आदेश में राज्य स्तरीय जांच दल और साइबर जांच लंबित होने का हवाला दिया गया।
वर्तमान कलेक्टर से हुई बातचीत में सचिवों की बहाली और उनकी पुरानी पदस्थापना की पुष्टि हुई है। जिला पंचायत सीईओ मुकेश रावटे ने निलंबन के कुछ ही दिनों बाद सचिवों को बहाल कर उन्हीं पंचायतों में वापस पदस्थ कर दिया, जहां से उन्हें हटाया गया था।
इस बहाली के पीछे सचिवों से मोटी रकम की डिमांड की गई और एक बड़ा लेनदेन हुआ। आखिर जब साइबर और राज्य स्तरीय जांच लंबित थी, तो सचिवों को इतनी जल्दी राहत क्यों दी गई? क्या बहाली का फैसला किसी आर्थिक समझौते से प्रभावित था? यह पूरे मामले का सबसे गंभीर सवाल है।
FIR के लिए रावटे ने लिखा पत्र, फिर कार्रवाई कहां अटकी –
इस मामले में जिला पंचायत सीईओ मुकेश रावटे ने एफआईआर दर्ज कराने के लिए संबंधित अधिकारियों को पत्र भी लिखा था। इसके बावजूद पुलिस में एफआईआर दर्ज होने और आगे की कार्रवाई का कोई स्पष्ट नतीजा सामने नहीं आया।
साल की शुरुआत में सामने आए इस मामले में अब साल का अंत करीब है, लेकिन एफआईआर का अता-पता नहीं। सवाल यह है कि जब सीईओ खुद एफआईआर के लिए पत्र लिख चुके थे, तो फिर पुलिस कार्रवाई आगे क्यों नहीं बढ़ी? पत्र का फॉलोअप किसने किया और मामला किस स्तर पर अटक गया?
लीना मंडावी के कार्यकाल की फाइलें खुल रहीं, जवाबदेही किसकी –
डीएमएफ के बाद 15वें वित्त का यह मामला भी तत्कालीन कलेक्टर लीना मंडावी के कार्यकाल की प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है। भुगतान की प्रक्रिया, पोर्टल में बदलाव, डिजिटल सिग्नेचर का इस्तेमाल और वेंडरों के खातों में पहुंची रकम जैसे मामलों में जिम्मेदारी तय होना जरूरी है।
जिला पंचायत सीईओ मुकेश रावटे की भूमिका भी इसलिए अहम है क्योंकि निलंबन, बहाली और एफआईआर के लिए पत्राचार जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम उनके स्तर से जुड़े हैं। एक तरफ पुलिस कार्रवाई के लिए पत्र लिखा गया, दूसरी तरफ सचिवों का निलंबन वापस लेकर उन्हें उन्हीं पंचायतों में पदस्थ कर दिया गया। वहीं वेंडरों की जवाबदेही भी अब तक तय नहीं हुई।
आखिर 1.19 करोड़ रुपये का भुगतान किसके निर्देश पर हुआ? सचिवों को निलंबित करने के बाद उन्हीं पंचायतों में वापस भेजने के पीछे क्या वजह थी? बहाली के पीछे लेनदेन हुआ या नहीं? और एफआईआर के लिए पत्र लिखे जाने के बावजूद पुलिस कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
डीएमएफ के बाद 15वें वित्त की यह फाइल भी प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़ा सवाल बन गई है। साल की शुरुआत में सामने आया मामला साल के अंत तक कार्रवाई का इंतजार कर रहा है। अब देखना है कि इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों और वेंडरों की जवाबदेही कब तय होती है।










