अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी — सुशांत की कलम से) अफ़सर-ए-आ’ला

सत्ता के भीतर पसरे फोन के डर से लेकर विधानसभा के करोड़ों के हिसाब तक, ठेकेदार के दरबार से सत्ता के अदृश्य प्रभाव तक, तबादले के संयोग से लेकर बस्तर की बदलती हवा और मुख्यमंत्री की कुर्सी की गर्म होती रेस तक सवाल भी हैं, व्यंग्य भी और सत्ता के गलियारों की कुछ अनकही कहानियां भी।

अफ़सर-ए-आ’ला

फोन बना जासूस
सत्ता में सबसे खतरनाक चीज हमेशा विरोधी नहीं होता, कभी-कभी वह डर होता है जो सत्ता के भीतर पैदा होता है। इन दिनों प्रशासन के गलियारों में कुछ ऐसा ही डर तैर रहा है। फोन उठाने से पहले सावधानी, बात शुरू करने से पहले संकोच और कॉल खत्म होते ही एक सवाल कहीं यह बातचीत कोई सुन तो नही रहा है? कॉल टेपिंग और सर्विलांस की चर्चाएं नई नहीं हैं, लेकिन इस बार बेचैनी सचिवालय से लेकर पुलिस और इंटेलिजेंस तक पहुंचती महसूस हो रही है। व्हाट्सऐप कॉल पर भरोसा डगमगाने लगा है और संवेदनशील बातचीत के लिए फेसटाइम जैसे विकल्पों की सलाह दी जा रही है। तकनीक आगे बढ़ी, लेकिन भरोसा पीछे छूट गया। बीते दिनों सचिव स्तर के एक अधिकारी ने विभागीय ग्रुप में इसी आशंका से जुड़ी पोस्ट साझा की। पोस्ट सामान्य डिजिटल सावधानी थी या भीतर के डर की अभिव्यक्ति यह अलग सवाल है। लेकिन उसकी गूंज मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंची तो मामला सामान्य साइबर सावधानी से आगे निकल गया। असल चिंता फोन की नहीं है। चिंता उस व्यवस्था की है जिसकी सबसे बड़ी ताकत संवाद और भरोसा होता है। अगर कोई अधिकारी किसी वरिष्ठ से बात करने से पहले यह सोचने लगे कि फोन सुरक्षित है या नहीं, तो सलाह की जगह सावधानी और संवाद की जगह संदेह बैठ जाएगा। फिर फैसलों की मेज पर खुली बातचीत के बजाय शब्दों का हिसाब होने लगेगा। विडंबना देखिए सरकार नागरिकों को साइबर सुरक्षा और डिजिटल निजता बचाने का पाठ पढ़ाती है। लेकिन सत्ता के भीतर ही अगर लोग यह सोचने लगें कि मेरी निजी बातचीत आखिर कितनी निजी है? तो मामला तकनीक से आगे निकल जाता है। निगरानी सच है तो निजता खतरे में है। और अगर निगरानी सिर्फ डर है, तो उससे भी बड़ी चीज खतरे में है सत्ता के भीतर का भरोसा। क्योंकि सरकारें सिर्फ आदेशों से नहीं चलतीं, बातचीत से चलती हैं। अफसर सिर्फ फाइलों पर हस्ताक्षर नहीं करते, सलाह भी देते हैं। और सलाह तभी निकलती है जब बोलने वाले को भरोसा हो कि उसकी बात उसी तक रहेगी, जिसके लिए कही गई है। अब हालात यह हैं कि अफसर फोन उठाने से पहले ठहरता है, आवाज धीमी करता है और कॉल खत्म होने के बाद मोबाइल को शक की नजर से देखता है।
फोन सिर्फ जासूस नहीं रहा। वह डर का सबसे छोटा उपकरण बन चुका है।

विधानसभा बदली, हिसाब नहीं
छत्तीसगढ़ में विधानसभा का भवन बदल गया। पुराना भवन पीछे छूटा और नई विधानसभा अपने भव्य रूप में सामने आ गई। नई इमारत के साथ सुरक्षा व्यवस्था के लिए करीब 8 करोड़ 65 लाख रुपये का आवंटन भी हुआ।लेकिन इतनी बड़ी रकम मिलने के बाद भी नई विधानसभा जैसे अति-संवेदनशील परिसर में एक भी सुरक्षा उपकरण स्थापित नहीं किया गया, तो सवाल सिर्फ व्यवस्था का नहीं, उस रकम की पूरी कहानी का है आखिर आठ करोड़ पैंसठ लाख गए कहां? कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 1 नवंबर 2025 को नई विधानसभा के उद्घाटन के समय करीब 125 नए स्मार्ट टीवी खरीदकर अलग-अलग कक्षों में लगाए गए। फिर कुछ ही समय बाद टीवी निकाल दिए गए। अब सवाल है खरीदे किसलिए गए, लगाए क्यों गए और निकाले तो गए कहां? पुराने विधानसभा भवन में पहले से मौजूद सैकड़ों एसी, स्मार्ट टीवी और फर्नीचर भी उपयोग योग्य स्थिति में थे। भवन बदला तो सामान का हिसाब भी जैसे हवा में बदल गया। दस्तावेजों में सत्यापन, मूल्यांकन, राइट-ऑफ और निस्तारण तक पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। और इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प स्थायी पात्र है सचिव की कुर्सी। सरकार बदली, स्पीकर बदले, यहाँ तक कि विधानसभा भवन भी बदल गया… लेकिन दिनेश शर्मा सचिव की कुर्सी पर बने रहे। चरणदास महंत के दौर में भी वही, सत्ता बदली और डॉ. रमन सिंह विधानसभा अध्यक्ष बने, तब भी वही। ऐसे में सवाल यह नहीं कि कुर्सी पर कौन बैठा रहा। सवाल यह है कि इतनी बड़ी गफलत के दौर में जवाबदेही किसकी थी और उस जवाबदेही का हिसाब कौन देगा? जिस विधानसभा में बैठकर सत्ता सरकार से सवाल पूछती है, उसी विधानसभा की करोड़ों की संपत्ति और सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े हों तो जवाब भी उतना ही साफ होना चाहिए। भवन नया है, सामान नया है, बजट नया है…बस सवाल पुराने नहीं अब हिसाब मांगने वाले हैं।

चंदेल का दरबार तस्वीरों से रसूख तक
जल संसाधन विभाग का ठेकेदार इन दिनों पुरानी तस्वीरों के सहारे अपना पुराना दरबार फिर सजाने में जुटा है। कभी अफसरों के साथ खिंचवाई गई तस्वीरें उसकी ताकत थीं, अब वही तस्वीरें उसके कमजोर पड़ चुके रसूख की निशानी बन चुकी है। एक दौर ऐसा चला कि इस चौखट को विभाग की अनौपचारिक फाइल शाखा कहा जाने लगा था। कौन अफसर कब पहुंचा, किस फाइल पर चर्चा हुई और किस काम का रास्ता कैसे निकला इन सवालों के जवाब उसके डीबी अपार्टमेंट वाले दफ्तर के पुराने सीसीटीवी और विभागीय रिकॉर्ड में तलाशे जा सकते हैं। लेकिन चंदेल का दरबार सिर्फ फाइलों और अफसरों तक सीमित रहा हो, ऐसा भी नहीं। अब उसके तौर-तरीकों के ऐसे किस्से बाहर आ रहे हैं, जिनमें अधिकारियों के परिवार और निजी रिश्ते तक प्रभाव के खेल का हिस्सा बना दिया गया था। किसी की बेटी को फिल्मी दुनिया में हीरोइन बनाने का सपना दिखाना हो या किसी के पारिवारिक जीवन की सीमा लांघने की कोशिश अगर इन शिकायतों में रत्ती भर भी सच है तो यह ठेकेदारी नहीं, रसूख के नशे का दूसरा ही अध्याय है। आज वही विभाग चंदेल से किनारा कर चुका है और चंदेल पुराने दौर की तस्वीरें दिखाकर शायद यह याद दिलाना चाहता है कि कभी उसका भी दरबार हुआ करता था। लेकिन तस्वीरें पुरानी हों तो उनमें चेहरे तो वही रहते हैं, रसूख नहीं। अब असली सवाल यह है कि चंदेल के उस पुराने दरबार में कौन आता था, कौन सी फाइलें वहां घूमती थीं और किसके इशारे पर कौन सा काम आगे बढ़ता था? इसका जवाब तस्वीरों से नहीं, फाइलों, भुगतान और जांच से मिलेगा। और अगर जांच ने उन बंद दरवाजों के पीछे की कहानी खोल दी, तो फिर चंदेल को तस्वीरों में चेहरा ढूंढने की जरूरत नहीं पड़ेगी चेहरा खुद बेनकाब हो जाएगा। क्योंकि हर दरबार की एक उम्र होती है। दरबार खत्म हो जाए तो तस्वीरें सिर्फ याद नहीं रहतीं, कभी-कभी सबूत की शुरुआत भी बन जाती हैं।

अमन-चैन का अमनराज
रमन राज का वह दौर शायद ही कोई भूल पाया होगा। सत्ता के गलियारों में एक साहब हुआ करते थे अमन-चैन वाले साहब। नाम भले अमन-चैन हो, लेकिन उनके दौर में सत्ता का चैन कितना गया, इसका हिसाब चुनावी नतीजों ने कर दिया। सरकार 14 सीटों पर सिमट गई। सत्ता बदली तो साहब ने भी समय की नब्ज पहचान ली। इस्तीफा दिया और कॉरपोरेट की छतरी के नीचे जा बैठे। पीछे रह गईं फाइलें, सवाल और जांच एजेंसियों की दस्तक। पांच साल कांग्रेस सत्ता में रही तो साहब कभी जांच के सवालों में, कभी एसीबी-ईओडब्ल्यू के चक्कर में नजर आए। लेकिन राजनीति में टाइमिंग बड़ी चीज है। सत्ता बदली, 2023 आया और अमन-चैन साहब का फिर से अमन लौट आया। इस बार फील्डिंग पहले से ज्यादा पक्की थी। पुराने संपर्क काम आए, नए समीकरण बने और कॉरपोरेट की दुनिया से आए लोग भी इसी नए जाल में उलझते चले गए। अब नौबत यहां तक पहुंच गई कि सत्ता के गलियारों में यह कहने वाले कम नहीं कि सरकार में फैसले जहां से निकलते हैं, वहां अमन-चैन साहब की परछाईं पहले पहुंच जाती है। विभाग कोई हो, मामला कोई हो दखल की कहानी कहीं न कहीं इन्हीं तक पहुंचती है।
विडंबना देखिए जिसे कभी रमन राज में सरकार की नाक का बाल कहा जाता था, वही आज सरकार के गले का फांस बनता दिखाई दे रहा है। अमन-चैन का यह खेल अगर इतना ही प्रभावशाली है तो फिर सवाल सरकार से है। ढाई साल बाद जनता के बीच जाने की तैयारी है। सड़क, रोजगार, निवेश, प्रशासन और विकास के सवालों के बीच क्या सरकार यह भी बताएगी कि सत्ता के फैसलों पर किसका कितना प्रभाव है? क्योंकि जनता को अब सिर्फ अमन का नाम नहीं चाहिए, उसे चैन भी चाहिए। और अगर चुनाव के दरवाजे पर खड़ी सरकार के पास विकास का रिपोर्ट कार्ड है, तो उसे सामने रखना चाहिए। लेकिन अगर रिपोर्ट कार्ड के पीछे हर पन्ने पर वही एक चेहरा दिखाई देता है, तो फिर सवाल उठेगा क्या सरकार अमन-चैन के चेहरे पर वोट मांगने जनता के बीच जाएगी, या चुनाव से पहले इस ‘अमनराज’ से खुद को अलग करेगी? सत्ता में चेहरे बदलते रहते हैं। कुर्सियां बदलती रहती हैं। लेकिन कुछ किरदार ऐसे होते हैं, जो सरकार बदलने के बाद भी कहानी में बने रहते हैं।शायद यही अमन-चैन की सबसे बड़ी उपलब्धि है राज बदला, लेकिन दरबार नहीं।

संयोग, प्रयोग या कुछ और?
सियासत और नौकरशाही में संयोग भी बड़े कमाल की चीज है। कभी-कभी तबादले की एक सूची आती है और किसी के चेहरे पर ऐसी रौनक लौट आती है, जैसे बरसों की प्रतीक्षा को आखिरकार सरकारी आदेश मिल गया हो।जंगल विभाग वाले साहब का राजधानी तबादला हुआ और पंकज रूपी कमल की खुशी देखते ही बनती है। संयोग कहिए, प्रयोग कहिए या फिर इसे महज वक्त का खेल मानिए गजब का मेल बैठा। तबादले की सूची उसी दिन आई, जिस दिन कल्पना का जन्मदिन था। यानी सरकारी आदेश भी आया और जन्मदिन का तोहफा भी, वह भी बिना रैपर के! लंबे समय से अपनी कल्पनाओं से दूरी रही होगी, लेकिन अब साहब राजधानी पहुंच गए हैं। यानी तन्हाई का दौर खत्म और कल्पनाओं की सवारी फिर राजधानी की सड़कों पर। कभी महासमुंद की गहराइयों में इन साहब को लेकर सवाल उठे थे, गंभीर आरोपों की फाइलें भी चर्चा में आई थीं। लेकिन वक्त बड़ा मरहम है। आरोप पीछे छूटते गए, पोस्टिंग आगे बढ़ती गई और साहब संगीत-कला की दुनिया वाले ठिकाने तक पहुंच गए। अब देखना यह है कि राजधानी की हवा में कल्पना कितनी उड़ान भरती है और पंकज रूपी कमल कितना खिलता है। वैसे अंदरखाने की बातों पर भरोसा करें तो इस राजधानी-प्रवेश के लिए पंकज रूपी कमल ने भी खूब मनीराम पंकज चढ़ाया है। आखिर सरकारी तबादले भी कभी-कभी सिर्फ आदेश नहीं होते किसी की प्रतीक्षा का परिणाम और किसी की कल्पना का सरकारी संस्करण भी होते हैं। अब सवाल सिर्फ इतना है यह संयोग था, प्रयोग था या फिर किस्मत का कोई और खेल? जवाब साहब के पास होगा। लेकिन जन्मदिन और तबादले की तारीख ने तो कहानी में अफ़सर-ए-आ’ला वाला मसाला डाल ही दिया है।

बस्तर की हवा में कुर्सी की खुशबू
कभी बस्तर में बंदूक का डर था, अब तिरंगे की चर्चा है। कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों तक पहुंची तिरंगा यात्रा ने बस्तर की तस्वीर बदल दी। लेकिन तस्वीर बदलते ही राजधानी में कुछ चेहरों की चमक भी बढ़ गई है। बस्तर में कभी कलेक्टर बनकर फाइलें निपटाने वाले साहब आज राजधानी में मंत्री हैं। तब बस्तर उनका प्रशासनिक मैदान था, आज वही बस्तर उनके राजनीतिक भविष्य का मैदान बन गया है। उधर गृह विभाग वाले साहब 600 किलोमीटर की तिरंगा यात्रा लेकर नक्सलवाद के खात्मे का परचम लहरा रहे हैं। बस्तर की सियासत के पुराने वारिस भी साथ हैं। कैमरे घूम रहे हैं, तिरंगे लहरा रहे हैं और राजधानी में राजनीतिक कैलकुलेटर अपना हिसाब लगा रहे हैं। किसी के पास गृह विभाग का नक्सल-विरोधी रिपोर्ट कार्ड है, किसी के पास बस्तर की पुश्तैनी राजनीतिक जमीन, और किसी के पास बस्तर का वह पुराना कलेक्टरी वाला अनुभव, जिसे अब मंत्री पद की सीढ़ी मिल चुकी है। अब मजा यह है कि बस्तर में लड़ाई नक्सलवाद से खत्म होने की ओर है, लेकिन राजधानी में क्रेडिट की लड़ाई शुरू हो गई है। जिस जमीन पर कभी लाल आतंक का कब्जा था, वहां अब तिरंगा है। और तिरंगे के नीचे खड़े हर चेहरे की नजर शायद एक ही चीज पर है कुर्सी। कभी साहब बस्तर में कलेक्टर थे। आज मंत्री हैं। कल क्या होंगे, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन मुख्यमंत्री की रेस में उनका नाम पहले भी घूम चुका है और बस्तर की यह नई कहानी उस पुराने सपने में फिर हवा भर सकती है। क्योंकि राजनीति में साहब, कलेक्टरी में बस्तर संभालना एक बात है, बस्तर की बदली तस्वीर को अपने राजनीतिक भविष्य में भुनाना दूसरी। फिलहाल कर्रेगुट्टा पर तिरंगा लहरा रहा है और राजधानी में कई सपनों की पतंग। बस्तर की हवा बदली है…अब देखना है, इस हवा से किसकी कुर्सी का पाल खुलता है।

यक्ष प्रश्न – 

1 – क्या अडानी कंपनी का सीओ अब पुलिस विभाग में डीजी स्तर की पोस्टिंग तय करता है?

2 – क्या सरकार की छवि चमकाने वाले विभाग की अपनी छवि का कोई अता-पता नहीं है? क्या यहां भी किसी योग्यतम व्यक्ति की पदस्थापना होगी?

3 – जांच एजेंसी का वह कौन-सा मुखिया है, जिसका दिल्ली-मुंबई पोस्टिंग का सपना चकनाचूर हो गया और अब उसकी खीज अपने ही मातहतों पर निकल रही है?

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