अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)
आरटीओ दलाल, दस्तावेज़ और डूबता राजस्व –
एक दफ्तर है जहाँ फाइलें चलती कम हैं,चलाई ज़्यादा जाती हैं। बाहर कतारें लंबी, अंदर रास्ते छोटे बस रास्ता पता होना चाहिए। ड्राइविंग लाइसेंस हो, परमिट हो या टैक्स हर काम का अपना एक अनकहा तरीका है। कागज़ों में नियम सख्त हैं, मगर फाइलों में रास्ते मुलायम है। कहते हैं लाइन में लगो तो वक्त लगता है, लाइन से हटो तो काम फ्लो में आ जाता है। कहते है कि जिन पर बकाया है, उन्हें भी क्लीन दिखा दिया जाता है। रिकॉर्ड का खेल ऐसा कि कागज़ और जमीन की कहानी अलग-अलग दिखती है। ऊपर से सब व्यवस्थित ऑनलाइन, नियम, प्रक्रिया लेकिन नीचे एक समानांतर सिस्टम चलता है, जो सबको जोड़ देता है। दलाल शब्द यहाँ गाली नहीं, व्यवस्था का हिस्सा माना जाता है। जो नया आता है, उसे जल्दी समझा दिया जाता है सीधे मत जाओ, घुमकर आओ।।कहते हैं कि हर फाइल का अपना रास्ता है, और हर रास्ते का अपना इशारा। शिकायतें भी आती हैं, खुलासे भी होते हैं, लेकिन असर अक्सर नोटिंग तक सीमित रह जाता है। सब जानते हैं पर कोई खुलकर नहीं बोलता। अब सवाल यह नहीं कि गड़बड़ी है या नहीं, सवाल यह है कि यह सब कब से सामान्य हो गया। क्योंकि जब कागज़ का खेल बड़ा हो जाए तो असर सड़क पर दिखता है।और नुकसान सिर्फ राजस्व का नहीं, भरोसे का भी होता है।
एप्सिटीन फाइल रायपुर एडिशन –
पिछले कॉलम में हमने मंदिर से जिम तक का रास्ता लिखा तो शहर में जिम की कहानी अचानक सुर्खियों में आ गया। जो बात फुसफुसाहट में थी, वह अब चर्चा में है और चर्चा भी ऐसी कि हर ट्रेडमिल पर एक नई कहानी दौड़ रही है। कहते हैं अब ट्रांसफर की फाइलें मंदिर नहीं, मशीनों के बीच फिट होती हैं। सुबह की एक्सरसाइज के साथ नेटवर्किंग का पूरा सेट चलता है। डम्बल उठते हैं और साथ में रिश्ते भी। और अब जो नया सामने आया वह वीआईपी रोड का एक मनी टॉवर, जहाँ जिम रात भर खुला रहता है। बताया जाता है कि अब डील्स होटल या क्लब में नहीं, बल्कि ट्रेडमिल और योगा मैट के बीच सेट होती हैं। बीते दिनों एक महिला अफसर लिफ्ट में फंसी, तब कई लोगों को पहली बार पता चला कि सातवें माले पर सिर्फ योग नहीं, योग से आगे भी चलता है। यहाँ आने वाले भी आम नहीं है बड़े अफसर, उनके परिवार, और कुछ खास चेहरे। कहानी यहीं और दिलचस्प हो जाती है कहा जा रहा है कि इन जिम में कैमरों की नजर भी है, जहाँ एक्सरसाइज से ज्यादा एक्सेस रिकॉर्ड होता है। कहीं निवेश नेताओं का, कहीं हिस्सेदारी अफसरों की और बीच में पूरा नेटवर्क। पिछले कॉलम ने जो दरवाजा खोला था, अब उसके पीछे का गलियारा दिखने लगा है। अब सवाल सिर्फ फिटनेस का नहीं यह सिस्टम का नया कंट्रोल रूम है या नहीं इसका है। क्योंकि रायपुर में पसीने से ज्यादा सेटिंग बहती है।
गिन्नी की चमक, कुर्सियों की कीमत –
शहर में एक दुकान है नाम गहनों का, लेकिन काम तय करने का। कहते हैं, फाइलें यहीं सांस लेती हैं। पहले यहीं पिचर रिलीज़ होती है , फिर आगे का रूट मिलता है। इसके केंद्र में है दो चेहरे ब्रदर्स जो हर दौर में कायम रहे। कल के चहेते, आज के लाडले बने हुए है मतलब सिर्फ सरकार बदली है, रास्ता नहीं। कहानी यह कि तबादले की कीमत गिन्नियों में तौली जाती है। नोट यहाँ रंग बदलते हैं गिन्नी बनते हैं, और गिन्नी जगह बनाती है। यह सब ऊपर से तो प्रतिष्ठा नजर आता है , मगर भीतर से यही व्यवस्था का बैकडोर एंट्री गेट है। यहाँ रसीद में तो गहने लिखाते है , मगर इसके पीछे कुर्सियाँ का भाव तय किया जाता है। इतना ही नही यही से हवाला की फुसफुसाहट, मनी का बहाव सब कुछ बिना आवाज़ के चलता है। जो नहीं समझते, वे कतार में रहते हैं जो समझते हैं, वे सीधे अंदर जाते हैं। कहते हैं पहले यहाँ पैसा छूटता है, फिर फाइल चलती है। और जहाँ फाइल चलती है, वहीं से सिस्टम मुड़ता है। अगर कभी परतें खुलीं, तो चमक धूल बन जाएगी। क्योंकि गिन्नी की असली कीमत बाजार नहीं, मंज़िल तय करती है। सवाल अभी भी खड़ा है यह व्यापार है या तंत्र का छिपा हुआ नक्शा? और इसका जवाब शायद किसी तिजोरी में बंद है। जो वक्त आने पर खुलेगी जरुर।
176 करोड़ और न्यूज़ चैनल –
कहानी 2010 के आसपास शुरू होती है जब व्यापार के नाम पर एक बड़ा खेल quietly सेट हो रहा था। पाँच फर्मों का नेटवर्क, दिल्ली से तंबाकू, जर्दा, सुपारी, इलायची, पान मसाला आता रहा…लेकिन कागज़ों में तस्वीर छोटी थी।एफ-फॉर्म के आंकड़े असली खेप के सामने बौने नजर आ रहे थे। फिर 2015 आया फाइल खुली, 176 करोड़ की टेक्स चोरी सामने आई मामला तूल पकड़ा जांच हुई, दस्तावेज़ बोले कुछ समय हलचल रही, फिर सन्नाटा पसर गया। फिर यहीं से पूरा किरदार बदल गया जो कल तक कारोबारी था वह न्यूज़ चैनल का मालिक बन गया। पहले एक चैनल की फ्रेंचाइज़ी, फिर दूसरा चैनल इसके बाद सत्ता बदली तो एक मिश्रा, एक मंत्री चच्चा के बेटे का साथ मिला फिर राष्ट्रीय नाम की तर्ज वाला वेब पोर्टल आ गया इधर खबरें बढ़ रही थी, और पीछे फाइलो की परछाई भी। इसी बीच टेक्स चोरी के साथ मीडिया की ताकत में कारोबार ऐसा फैला कि क्लब, बार, तंबाकू, ऑटो डील, रिफाइनेंस, सिंडिकेट सब धड़ल्ले से चल रहा था। इसी बीच एक सरकारी क्लब में गोली चली, एफआईआर दर्ज हुई मगर रफ्तार नहीं रुकी। अब इन्ही टेक्स और कारोबार को आस्था का रूप देने की कवायद शुरू हुई। हर साल एक कवि की रामकथा सुनाई जाने लगी जहाँ सत्ता के शीर्ष लोगो की कुर्सियां सजने लगी। जहाँ मंच, भीड़, आस्था थी जो ऊपर से तो भक्ति थी, मगर नीचे नेटवर्क का बड़ा खेल चल रहा था। दिन में तंबाकू की गंध, रात में न्यूज़ का शोर, बीच में इमेज की परत चढ़ाई गई। जो कभी फाइलों में सवाल था, अब फ्रेम में पहचान है। सवाल आज भी वही है कि यह सफर सफाई का था या कहानी को नए मंच पर ले जाने का? क्योंकि कुछ फाइलें बंद नहीं होतीं है। वे बस कैमरे की रोशनी में धुंधली कर दी जाती हैं।
42 अफसरों का खेल बुर्ज खलीफा तक पहुँची फाइलें –
सरकारी गलियारों की फुसफुसाहट अब खुला सवाल बन चुकी है। बताया जा रहा है कि 42 अफसरों की कमाई अब जमीन पर नहीं, दुबई की ऊँचाइयों, यहाँ तक कि Burj Khalifa में दर्ज है। यह सिर्फ प्रॉपर्टी की नहीं, पूरे सिस्टम के खड़ा होने की कहानी है। जहाँ फाइलें चलती रहीं और खाते भरते रहे। इसमे कोई सचिव है, कोई एडीजी स्तर का अधिकारी, और कोई जिले का मुखिया भी है याने कि नाम अलग है मगर धागा एक ही है। आगे और सुनिए पासपोर्ट से लेकर एग्रीमेंट तक, कागज़ बोल रहे हैं और जांच की आहट ने इन अफसरों की नींद उड़ाकर रख दी है। कल तक जो नोटिंग लिखते थे, आज उन्हीं परतों में फँसे हैं। इधर जनता पूछ रही है कि यह वेतन था या कोई और व्यवस्था? कुर्सी सेवा के लिए थी या निवेश के लिए? यह ईंट-पत्थर नहीं, भरोसे के गिरवी रखने की कहानी है। और भरोसा जब बिकता है, तो उसकी कीमत चेहरे पर दिखती है। अब फाइलें जिंदा हैं और हर हस्ताक्षर कटघरे में। क्योंकि दुबई की ऊँचाई चाहे जितनी ऊंची हो मगर जवाबदेही उससे कही ज्यादा ऊँची होती है। और जब फाइलें देश से बाहर चली जाएँ तो जवाब भी सरहद पार खोजने पड़ते हैं।
यक्ष प्रश्न –
1 – कौन सी “आईएएस महिला अफसर दीदी” का ग्रुप इन दिनों “पति छुड़वाओ अभियान” की चर्चाओं में है?
2 – वीआईपी रोड के मठाधीश को विकलांगता सर्टिफिकेट से आखिर क्या-क्या फायदे मिल रहे हैं?









