झोला नहीं, कुर्सी चाहिए! रिटायरमेंट के बाद भी नई तैनाती की तलाश में पूर्व वन प्रमुख, लेकिन सत्ता के दरवाजे अब तक बंद –

झोला नहीं, कुर्सी चाहिए! रिटायरमेंट के बाद भी नई तैनाती की तलाश में पूर्व वन प्रमुख, लेकिन सत्ता के दरवाजे अब तक बंद –

रायपुर – श्रीनिवासन राव की सेवानिवृत्ति को समय बीत चुका है, लेकिन सत्ता के गलियारों में उनकी सक्रियता कम होने के बजाय बढ़ती दिखाई दे रही है। वन विभाग के भीतर और राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि रिटायरमेंट के बाद भी वे किसी न किसी आयोग, मंडल या परिषद में नई जिम्मेदारी पाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। दिलचस्प यह है कि अब तक हर कोशिश अधूरी ही साबित हुई है। लेकिन फोन कराने का दौर अब भी जारी है बताते है कि राव साहब दफ्तर दफ्तर चक्कर काट रहे है और मिन्नतें कर रहे है कि एक बार उन्हें और मौका दे दिया जाए।

यह अफसर रिटायरमेंट से पहले अक्सर कहा करते थे हम एक जून को झोला उठाएगा और सीधे हैदराबाद जाएगा। लेकिन एक जून निकल गई, कई सप्ताह बीत गए और हैदराबाद जाने के बजाय उनकी मौजूदगी अब भी रायपुर के सत्ता गलियारों में महसूस की जा रही है। यह साहब अब घूम घूम कर ऑफर भी बांट रहे है जितना चढ़ावा चढे वह चढ़ाएंगे लेकिन कैसे कोई भी आयोग मंडल मिल जाए। कांग्रेस शासन काल मे राज्य भर को लूट खसोट कर जो संपत्ति इन्होंने बनाई वह अब नई पोस्टिंग में लगाने की तैयारी में है। एक दिलचस्प चर्चा और है कि जो झोला उठकर हैदराबाद जाना था अब उस झोले में चढावा भरकर यही घूम रहे है और चाहते है मेरा झोला ले लो और मुझे यही रहने दो।

पहला दरवाजा बंद, फिर दूसरा…
सबसे पहले पर्यावरण संरक्षण मंडल में जिम्मेदारी पाने का भरकस प्रयास हुआ। इसके लिए राजनीतिक और संगठनात्मक स्तर पर भी सिफारिशें कराई गईं, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ सकी। चर्चा है कि मुख्यमंत्री ने इस प्रस्ताव पर सहमति नहीं दी। इसके बाद छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद में नई भूमिका की संभावना तलाशने की कोशिश शुरू हुई। वहां भी लगातार संपर्क और सिफारिशों का दौर चलता रहा, लेकिन अब तक कोई सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आया। दरवाजे भले बन्द है लेकिन यह साहब चौखट में ही डेरा डाल दिये है।

रोज घनघना रहा फोन , लेकिन फैसला नहीं –
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि प्रभावशाली लोगों और संगठन से जुड़े माध्यमों के जरिए लगातार फोन करवाए जा रहे हैं। यहां तक कि एक युवा आईएएस मंत्री पर खासा दबाव बनाने की कोशिश की गई और कई संगठनात्मक कॉल कराया गया लेकिन मंत्री ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। सूत्र बताते हैं कि मुख्यमंत्री और युवा मंत्री का रुख शुरू से स्पष्ट रहा है कि सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें किसी नए बोर्ड, आयोग या मंडल में जिम्मेदारी न दी जाए। यही वजह बताई जा रही है कि लगातार प्रयासों के बावजूद कोई नियुक्ति अब तक नहीं हो सकी।

आखिर इतनी बेचैनी क्यों?
यही सवाल अब वन विभाग के गलियारों में सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है। आखिर ऐसा क्या कारण है कि रिटायरमेंट के बाद भी नई कुर्सी पाने की कोशिशें लगातार जारी हैं?
जानकारों का कहना है कि श्रीनिवासन राव के कार्यकाल से जुड़े कई फैसलों और शिकायतों पर पहले से सवाल उठते रहे हैं। कैम्पा फंड के उपयोग, वन रक्षक भर्ती प्रक्रिया, तेंदूपत्ता बोनस सहित कई मामलों को लेकर समय-समय पर शिकायतें और जांच की मांग होती रही है। श्रीनिवासन राव जिसने कैम्पा फंड और वन प्रमुख रहते हुए हैदराबाद में करोड़ो का आलीशान बंगला , कई शॉपिंग मॉल , लक्जरी गाड़ियों का काफिले के साथ कई सौ करोड़ की बेनामी संपत्ति बनाई है। इनपर घोटालों की इतनी लंबी फेहरिश्त है कि अगर जांच हुई तो राज्य के बजट का एक बड़ा हिस्सा इस अधिकारी ने ही डकार लिया है। इस लूट और घोटाले की रकम से इसने आज पूरा का पूरा साम्राज्य खड़ा कर दिया है। यही कारण है कि प्रभाव और पहुंच बनाए रखने की कोशिशों को इन्हीं विवादों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

झोला पैक है… लेकिन सफर नहीं
वन विभाग में अब इस पूरे घटनाक्रम पर व्यंग्य भी सुनाई देने लगा है। लोग कहते हैं झोला तो कब का पैक हो चुका है, लेकिन हैदराबाद की टिकट अब तक कन्फर्म नहीं हुई। क्योंकि मंजिल बदल गई है। अब पहले नई कुर्सी चाहिए, उसके बाद ही सफर होगा।

अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या सरकार अंततः उन्हें किसी आयोग, मंडल या परिषद में जिम्मेदारी देती है या फिर रिटायरमेंट के बाद सक्रिय रहने की यह कोशिश केवल सत्ता के गलियारों तक ही सीमित रह जाती है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *