अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)
कहीं विकास के बजट में प्रतिशत का गणित चढ़ रहा है तो कहीं महादेव की रोशनी में चमकने वाले चेहरों पर अंधेरे का पहरा है। खाकी की ईमानदारी, जंगल की हरियाली और वेतनमान की फाइलों के बीच कुछ साहबों की छुट्टियां भी बड़े दिलचस्प सवाल खड़े कर रही हैं।

विकास का गणित
राजधानी में विकास का गणित भी बड़ा रोचक है। मध्य छत्तीसगढ़ के एक इलाके से आने वाले साहब के चेहरे पर इन दिनों अलग ही रौनक है। वजह भी खास है। जिस प्राधिकरण की राशि कभी 50 करोड़ थी, वह बढ़कर 75 करोड़ हो गई। रकम बढ़ने की खबर पहुंची तो चेहरे पर चुटीली मुस्कान तैर गई। मुस्कान के साथ मोबाइल पर भी हलचल बढ़ी और बताते हैं कि हिसाब-किताब की नई कसरत शुरू हो गई। रकम बढ़ी तो प्रतिशत का आंकड़ा भी ऊपर चढ़कर 20 फीसदी तक पहुंच गया। साहब कभी स्कॉर्पियो में सफर करते थे, लेकिन 17 फीसदी के गणित ने फॉर्च्यूनर का स्वाद चखा दिया। अब कार्यकाल के ढाई साल बाकी हैं और निगाहें डिफेंडर की तरफ है। सुशासन बाबू जरा ध्यान दीजिए, साहब डिफेंडर में आ गए तो पकड़ में भी नहीं आएंगे! खैर, गाड़ियों का सफर अपनी जगह है और विकास का सफर अपनी जगह। जमीनी आंकड़े बताते हैं कि 2024-25 में 508 काम स्वीकृत हुए, लेकिन बैठक के वक्त तक महज 123 पूरे हो पाए थे। शेष 385 कामों का हिसाब अब भी धरातल पर तलाशा जा रहा है। आदिवासी अंचलों को सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य की दरकार है। बजट बढ़ने से ज्यादा जरूरी है कि उसका लाभ जमीन पर दिखे। आखिर साहब का प्रतिशत तो बढ़ रहा है, इलाके का विकास कब रफ्तार पकड़ेगा?
दिवाली का अंधेरा –
महादेव का सरगना भारत लौटा और दुबई में उप्पल की गिरफ्तारी हुई तो दिवाली की रोशनी में भी कई अफसर-ए-आ’ला के जीवन में अंधेरा छा गया। ये वही चेहरे हैं, जिन पर महादेव के सट्टा साम्राज्य को संरक्षण देने और प्रोटेक्शन मनी के बदले युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ क़िया। कभी पर्दे के पीछे से चलने वाला यह खेल आज अंतरराष्ट्रीय जांच के दायरे में है। खबर है कि जांच एजेंसी ने ऐसे ही पांच अफसरों को नोटिस भेजा है। नोटिस की धमक ऐसी रही कि दिवाली में घरों पर जगमगाने वाली झालरें ही उतरवा दी गईं। वजह भी दिलचस्प है, कहीं घर की चमक देखकर जांच एजेंसी की नजर न पड़ जाए। अब साहब लोग अंधेरे में रहकर ही खुद को महफूज महसूस कर रहे हैं। बताते हैं, कोई महासमुंद की तरफ जमीन तलाश रहा है तो कोई कमाई को ठिकाने लगाकर दिल्ली में कोठी खरीदने की जुगत में है। कुछ पुराने ठिकाने सुरक्षित करने में जुटे हैं तो कुछ नए ठिकानों की तलाश में। वैसे इस दिवाली घर के बाहर झालर न दिखे तो समझ जाइए, कहीं रोशनी से ज्यादा अंधेरे की जरूरत तो नहीं पड़ गई! सवाल यह भी है कि महादेव के साम्राज्य में जिनकी सरपरस्ती की चर्चा रही, जांच की रोशनी में अब उनके चेहरे कितने बेनकाब होंगे?
खाकी का नया निजाम
एक लंबे साहब हैं। इतने लंबे कि उनकी ईमानदारी की ऊंचाई भी उनकी कद-काठी के बराबर बताई जाती है। मीटिंग में बड़े अदब से जेब से पेन निकालकर आगे बढ़ाते हैं और कहते हैं, मेरी ईमानदारी ऐसी है कि पेन की रिफिल तक मैं किसी से नहीं लेता। मगर त्योहार आते ही फरमान जारी हुआ। बताते हैं, हर यूनिट से 50-50 मंगवाए गए। अब ये 50 किसके हिस्से आए और किसकी जेब में गए, यह लंबे साहब ही जानें। उधर कमिश्नरी के नए निजाम में एक बड़े कारोबारी के रायपुर आगमन पर सरकारी पुलिस स्कॉर्पियो काफिले की पायलटिंग करती नजर आई। पीछे लग्जरी गाड़ियों से लोग बाहर लटककर स्टंट करते रहे और आगे खाकी रास्ता बनाती रही। ट्रैफिक प्रभावित हुआ, लेकिन कानून की निगरानी करने वाली निगाहें शायद इस नजारे से चूक गईं। सरकारी गाड़ी निजी काफिले में किसके आदेश पर लगी, आम आदमी स्टॉप लाइन पार कर दे या सीट बेल्ट न लगाए तो खाकी तत्काल चालान थमा देती है। मगर रसूखदारों के काफिले में नियमों की धज्जियां उड़ें तो कानून मौन क्यों? क्या यातायात नियम भी गाड़ी की कीमत और सवारियों का रसूख देखकर लागू होते हैं? एक तरफ साहब की ईमानदारी पेन की रिफिल तक नहीं लेती, दूसरी तरफ सरकारी पुलिस गाड़ी निजी काफिलों की राह आसान करती है। सुशासन बाबू, यह कमिश्नरी है या आम आदमी के लिए चालान और रसूखदारों के लिए पायलटिंग का नया इंतजाम?
वेतन का इंतजार –
महिला एवं बाल विकास विभाग की सुपरवाइजर बहनों का वेतनमान भी बड़ा दिलचस्प किस्सा है। करीब तीन दशक से ग्रेड पे सुधार की मांग उठ रही है। ज्ञापन दिए, आंदोलन किए, हड़ताल तक हुई। मार्च 2025 में मंत्री जी से मुलाकात हुई तो मांग को जायज मानते हुए जल्द निराकरण का भरोसा भी मिला। लेकिन भरोसे का वेतनमान में बदलना अभी बाकी है। संघ ₹2,400 ग्रेड पे को बढ़ाकर ₹4,200 करने की मांग कर रहा है।
इधर पशुधन विकास विभाग में सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्र अधिकारियों की फाइल ने रफ्तार पकड़ ली। 5 नवंबर को सरकार ने उनका ग्रेड पे ₹2,400 से बढ़ाकर ₹2,800 करने का आदेश जारी कर दिया। वित्त विभाग की सहमति मिली, सामान्य प्रशासन विभाग की मंजूरी आई और आदेश भी निकल गया। एक ही सरकार, एक ही ग्रेड पे और दो विभागों की दो अलग-अलग कहानियां! महिला एवं बाल विकास की सुपरवाइजरों का सवाल भी वाजिब है कि जब दूसरे विभाग में ग्रेड पे सुधार का रास्ता निकल सकता है तो उनकी तीन दशक पुरानी मांग पर फैसला क्यों नहीं? क्या उनकी जिम्मेदारियां कम हैं या उनकी फाइल का वजन कम पड़ गया है? सरकार को चाहिए कि महिला एवं बाल विकास पर्यवेक्षकों की वेतन विसंगति पर भी गंभीरता से विचार करे। आखिर आंगनबाड़ी व्यवस्था की जमीनी जिम्मेदारी संभालने वाली इन महिलाओं को भी अपने काम के अनुरूप वेतनमान और सम्मान मिलना चाहिए। पशुधन विभाग की फाइल दौड़ गई, अब महिला एवं बाल विकास विभाग की फाइल को भी थोड़ा चलाइए, क्योंकि इंतजार की भी आखिर कोई समय-सीमा होनी चाहिए!
जंगल का हिसाब –
महासमुंद के जंगलों में पौधों की सुरक्षा के नाम पर 22 करोड़ रुपये खर्च हो गए। कागजों में फेंसिंग भी लग गई, गड्ढे भी खुद गए और पौधों की सुरक्षा भी हो गई। बस जंगल जाकर देखा तो कागजी हरियाली के अलावा कुछ खास नजर नहीं आया। अब जांच बैठी है तो झाड़ियों की सफाई और कटाई भी शुरू हो गई। लगता है जंगल को भी जांच आने की खबर पहले ही मिल गई थी। मामला खुला तो जिम्मेदारी तय करने के बजाय वसूली का डंडा छोटे कर्मचारियों पर चलने लगा। डिप्टी रेंजर, वनरक्षक और चौकीदार तक को नोटिस थमा दिए गए। यहां तक कि रिटायर हो चुके कर्मचारी भी हिसाब-किताब में शामिल कर लिए गए। मजेदार यह कि टेंडर और वित्तीय स्वीकृति के अधिकार बड़े अधिकारियों के पास होते हैं, लेकिन वसूली की बारी आई तो छोटे कर्मचारी याद आ गए। उधर तत्कालीन DFO का कहना है कि मामला 22 करोड़ का नहीं, 12 करोड़ का है और नए सिरे से जांच हो रही है। अब सवाल यह है कि जंगल में पौधे लगाने और उनकी सुरक्षा का जिम्मा जिनका था, वे किसकी निगरानी में काम कर रहे थे? भुगतान किसने मंजूर किया और काम पूरा होने का प्रमाणपत्र किसने दिया? सुना है जंगल में पौधों की सुरक्षा के लिए करोड़ों खर्च हुए थे, अब देखना है कि जांच में जिम्मेदारों की सुरक्षा कौन करता है।
धान का भरोसा –
धान खरीदी की नीति में इस बार सरकार ने एक बड़ा बदलाव किया है। अब कृषक उन्नति योजना की सहायता प्रति क्विंटल के बजाय प्रति एकड़ के मान से जोड़ने का फैसला हुआ है। 21 क्विंटल के मानक पर किसान ने यदि 15 क्विंटल धान बेचा तो शेष 6 क्विंटल की अंतर राशि भी देने का प्रावधान है। यानी कम पैदावार होने पर भी किसान की आमदनी को सुरक्षा देने की कोशिश। साथ ही धान के विकल्प में दलहन, तिलहन और मिलेट्स को बढ़ावा दिया जा रहा है। अरहर, मूंग, उड़द और सोयाबीन जैसी फसलों की भी अपनी MSP है। दूसरी फसल लेने पर प्रति एकड़ प्रोत्साहन राशि का प्रावधान भी है। इस नीति के पीछे मुख्यमंत्री सचिवालय में बैठे एक ऐसे प्रशासनिक बोध की चर्चा है, जहां आंकड़ों और विभागों के बीच तालमेल बिठाकर नई सोच को आकार दिया गया है। हालांकि असली परीक्षा इसके क्रियान्वयन की है। दो फसली जमीन का हिसाब कैसे होगा? दूसरी फसल लेने वाले किसान को खरीदी की गारंटी कौन देगा? और सहायता की राशि समय पर खाते में पहुंचेगी या नहीं? सरकार के कार्यकाल के ढाई साल बाकी हैं। यदि यह नीति जमीन पर सफल होती है तो अगले साल किसानों के बीच सरकार के लिए भरोसा अर्जित करने का बड़ा आधार बन सकती है। साहब को बस यही सलाह है कि जिस बोध से नीति का खाका तैयार हुआ है, उसी बोध से उसका लाभ अंतिम किसान तक पहुंचाने की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाए।
यक्ष प्रश्न –
1 – सीमावर्ती पश्चिम दिशा की कप्तान साहब
पिछले 10 दिनों से प्रशासनिक छुट्टी पर हैं। क्या इस दौरान पाणिग्रहण संस्कार संपन्न हो गया या अभी शुभ मुहूर्त का इंतजार है?
2 – सीबीआई के प्रेम-पत्र से क्या प्रशासनिक तंत्र में आएगा बदलाव, या फाइलों में ही सिमटकर रह जाएगा मामला?



