कही-अनकही बातें – 22 करोड़ की कहानी में इनोवा का सफर, ‘रख ले जा’ का भरोसा और सिपाही बनाने का सपना!

राजधानी – जंगल में नक्सली खामोश हैं, साहब खामोश हैं, लेकिन 22 करोड़ की कहानी रोज नई आवाज निकाल रही है। पिछली कड़ी में रकम की बरामदगी, उसके हिसाब और ‘रख ले जा’ की चर्चा थी। अब कहानी में इनोवा आ गई है, दो खास किरदार आ गए हैं और साथ में कॉन्स्टेबल बनाने का ऐसा सपना भी, जिसकी चर्चा ने पूरे घटनाक्रम में नया तड़का लगा दिया है।
बताते हैं, ‘रख ले जा’ साहब अपने एक खास और भरोसेमंद गोपनीय सैनिक तथा एक थाना प्रभारी साहब के साथ अपनी इनोवा लेकर जंगल पहुंचे थे। जंगल में करोड़ों की बरामदगी हुई और फिर उसी इनोवा से मुख्यालय वापसी भी हो गई। अब जंगल से राजधानी तक रकम का सफर किस गाड़ी में हुआ, यह तो सामने है, मगर रकम कितनी थी, कहां से उठाई गई और रास्ते में किस-किस की निगाह उस पर थी, यही असली कहानी है। कहने वाले तो यहां तक बताते हैं कि इन दोनों खास किरदारों को रकम की पूरी जानकारी थी। यानी जंगल का रास्ता भी मालूम, बरामदगी का ठिकाना भी मालूम और रकम के सफर की कहानी भी मालूम! अब सवाल यह है कि जब इतनी जानकारी रखने वाले किरदार मौजूद हैं, तो फिर 22 करोड़ के हिसाब की फाइल में इतना सन्नाटा क्यों है साहब?
इनोवा में रकम का सफर हुआ या कहानी का?
अब असली मजा सुनिए! मुख्यालय लौटने के बाद कहानी में एक ऐसा मोड़ आया, जिसने जंगल की बरामदगी को सीधे वर्दी की तरक्की से जोड़ दिया। चर्चा है कि ‘रख ले जा’ साहब ने अपने उसी भरोसेमंद गोपनीय सैनिक को कुछ दिया और साथ में भविष्य का एक सुनहरा सपना भी दिखा दिया।
कहते हैं, साहब ने बड़े भरोसे से फरमाया –
“तुम जल्दी ही कॉन्स्टेबल बन जाओगे, बस इस बात की भनक किसी को नहीं लगनी चाहिए!”
वाह रे वर्दी का मोह और साहब का स्नेह! जंगल में 22 करोड़ की बरामदगी और मुख्यालय लौटते ही गोपनीय सैनिक के लिए कॉन्स्टेबल की कुर्सी का सपना! इधर जंगल में नोटों की गड्डियां मिलने की चर्चा, उधर खाकी में तरक्की की उम्मीद। संयोग भी ऐसा कि कहानी में दोनों की एंट्री एक ही घटनाक्रम के बाद बताई जा रही है। अब यह कोई सामान्य मेहरबानी थी, किसी खास भरोसे का इनाम था या फिर कहानी में कोई ऐसा पन्ना भी है, जिसे अभी तक फाइल से बाहर नहीं आने दिया गया? यह सवाल है और इसका जवाब जांच से ही सामने आना चाहिए।
साहब, जंगल में नोट मिले थे या भरोसे की नई गड्डी खुली थी?
क्योंकि साहब, 22 करोड़ कोई जंगल में पड़ा महुआ तो है नहीं कि बीनकर लाए और टोकरी रख दी। इतनी बड़ी रकम का स्रोत, बरामदगी, गिनती, सुपुर्दगी और सुरक्षित रख-रखाव हर कदम का अपना हिसाब होता है। फिर इस कहानी में हिसाब से ज्यादा चर्चा किरदारों की क्यों हो रही है?
अब सवाल कनिष्ठ अफसरों से आगे, इनोवा की पिछली सीट तक भी पहुंच गया है!
पिछली कड़ी में कनिष्ठ अफसरों की भूमिका को लेकर गोपनीय रिपोर्ट और एफआईआर की चर्चा थी। अब कहानी में इनोवा के सफर और भरोसेमंद किरदारों का जिक्र भी जुड़ गया है। ऐसे में जांच का दायरा सिर्फ नीचे वालों की फाइल तक सीमित रहा, तो जंगल के इस रहस्य के कई पन्ने शायद बंद ही रह जाएंगे।
और साहब, कॉन्स्टेबल बनाने का सपना भी कोई छोटी बात नहीं है। पुलिस में भर्ती और पदोन्नति की अपनी प्रक्रिया होती है। अगर किसी को ऐसा भरोसा दिया गया, तो किस आधार पर दिया गया? किस नियम के तहत दिया गया? और क्या इस भरोसे का उस बरामदगी से कोई संबंध है? इन सवालों का जवाब किसी की मूंछ के ताव से नहीं, दस्तावेजों और निष्पक्ष जांच से ही निकलेगा।
अब देखना यह है कि जांच की गाड़ी जंगल से निकलकर इनोवा के सफर तक पहुंचती है या फिर कनिष्ठ अफसरों की फाइल में ही पेट्रोल खत्म हो जाएगा। 22 करोड़ कहां से आए, किसके पास पहुंचे और अब किसकी निगरानी में हैं यह हिसाब खुलना बाकी है।
साहब, 22 करोड़ की बरामदगी तो हो गई… अब जरा भरोसे की कीमत, इनोवा का हिसाब और सिपाही बनाने के सपने की फाइल भी खोल दीजिए। आखिर जंगल में नोट मिले थे, कोई राजगद्दी तो नहीं कि हर किरदार अपने हिस्से का सपना लेकर लौट आए!










