कही-अनकही बातें – नक्सली चुप, साहब चुप… जंगल के सन्नाटे में 22 करोड़ चीख रहे हैं, और ‘रख ले जा’ का धुआं दूर तक उठ रहा है

राजधानी – जंगल में सन्नाटा हो और अचानक 22 करोड़ की खनक सुनाई दे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। बस्तर के जंगलों से 22 करोड़ की बड़ी रकम बरामद हुई। कामयाबी बड़ी थी, रकम बड़ी थी, लिहाजा चर्चा भी राजधानी तक पहुंचनी ही थी। लेकिन कहानी में असली मोड़ तब आया, जब बरामद रकम से जुड़े कुछ सवालों पर कुछ छोटे साहबों ने थोड़ा गौर किया और आपस में दो-चार बातें भी कर लीं। कहते हैं, बात जंगल से निकलकर बड़े साहब के दफ्तर तक पहुंच गई।
बड़े साहब की गोपनीय रिपोर्ट संभाग के उससे भी बड़े साहब तक पहुंची। कुछ कनिष्ठ अफसरों की भूमिका को लेकर सवाल उठे और एफआईआर की तैयारी शुरू हुई। मामला खाकी के मुख्यालय तक भी पहुंचा। मगर वहां शायद सवाल यही था कि 22 करोड़ का मामला है साहब, सिर्फ रिपोर्ट के भरोसे कहानी को अपराध तक कैसे पहुंचा दें? ठोस तथ्य और साक्ष्य के बिना एफआईआर दर्ज करने में मुख्यालय ने फिलहाल कदम पीछे खींच लिए।
अब जंगल में नक्सली कम और फाइल में कनिष्ठ अफसर ज्यादा तलाशे जा रहे हैं।
और 22 करोड़?
वह तो बरामद हो गए साहब… लेकिन अब सवाल यह है कि बरामदगी के बाद 22 करोड़ हैं कहाँ? किसके कब्जे में हैं? और उनका अगला हिसाब किस फाइल में लिखा जा रहा है? क्योंकि रकम मिल जाना कहानी का अंत तो नहीं हो सकता। बरामदगी के बाद उसका सुरक्षित रख-रखाव, कानूनी प्रक्रिया और आगे की जांच भी उतनी ही अहम है। आखिर 22 करोड़ कोई जंगल की लकड़ी तो हैं नहीं कि बरामद किए और बात खत्म।
इधर ‘रख ले जा’ भी इस पूरी कहानी में अपने ढंग से चर्चा में हैं। सूत्र तस्दीक बताते हैं कि बरामदगी के बाद रकम को ‘रख ले जा’ ने ही रख लिया। जो नाम से संपूर्ण है निखिल है। ऐसे में जंगल से निकली 22 करोड़ की रकम आखिर किस रास्ते से किसके पास पहुंची और उसकी निगरानी किसके जिम्मे रही? छोटा कनिष्ठ अधिकारी इत्ते करोड़ पचा पाएगा साहब? ऊपर तक मामला है, इसलिए जंगल की इस कहानी में नीचे वाले किरदारों से ज्यादा ऊपर तक जाती डोर तलाशना भी जरूरी हो जाता है।*
कहने वाले सवाल उठा रहे हैं कि इतनी बड़ी रकम जंगल तक पहुंची कैसे? किस रास्ते से आई? किसके भरोसे आई? और बरामदगी के बाद उसकी पूरी तस्वीर सामने क्यों नहीं है? इन सवालों के जवाब जांच के दायरे में हैं।
मगर कहानी यहीं खत्म नहीं होती। एक तरफ कनिष्ठ अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की चर्चा है, दूसरी तरफ 22 करोड़ की बरामदगी है और तीसरी तरफ यह सवाल कि रकम का स्रोत और रास्ता क्या था। इंटेलिजेंस को इसकी भनक कब लगी, रकम जंगल तक पहुंचने से पहले क्या कोई सूचना थी और बरामदगी के बाद किन-किन स्तरों पर पड़ताल हुई इन सवालों के जवाब ही इस कहानी की अगली कड़ी तय करेंगे।
अब देखना यह है कि कनिष्ठ अफसरों वाली फाइल आगे बढ़ती है या वहीं ठहर जाती है। और 22 करोड़ का हिसाब सिर्फ “मिल गए” तक रहता है या फिर “कहां से आए, किसके पास पहुंचे और अब किसके कब्जे में हैं” तक भी पहुंचता है। क्योंकि जंगल में रकम का डंप मिलना एक कामयाबी है। लेकिन 22 करोड़ जंगल तक पहुंचे कैसे और बरामद होने के बाद उनकी पूरी कहानी क्या है यही असली सवाल है।
जंगल का सन्नाटा अभी टूटा नहीं है। बस इस बार बंदूक की आवाज नहीं… 22 करोड़ की खनक सुनाई दे रही है।










