सात की नौकरी गई, सुशांत राय को मंत्री की छांव! दिनेश शर्मा की भर्ती फाइल में कौन-सा खेल? एक भर्ती, आठ नाम, सात की सेवा समाप्ति और एक को अभयदान! –

 

रायपुर – विधानसभा में कानून बनाने वाले माननीयों के अपने सचिवालय में भर्ती का ऐसा खेल हुआ कि आठ नामों की सूची में सात की सेवाएं समाप्त कर दी गईं, मगर एक नाम सुशांत राय का है, जो तमाम विवादों के बावजूद अब भी सेवा में बने हुए हैं। मामला तब और भी दिलचस्प हो गया, जब राय को मंत्री गुरु खुशवंत साहेब का ओएसडी बना दिया गया। अब साहेब मंत्रीजी को सलाह-मशविरा देते और उनके साथ कदमताल करते नजर आते हैं।

जरा हिसाब लगाइए! जिस भर्ती की वैधता पर अदालत में सवाल उठे, जिस प्रकरण में सात लोगों की सेवाएं समाप्त हो गईं, उसी भर्ती से जुड़े सुशांत राय की नौकरी कैसे बची रही? बर्खास्तगी पर रोक किस आदेश से मिली और फिर मंत्री के कार्यालय तक पहुंचने का रास्ता किसने खोला? इन सवालों के जवाब नियुक्ति और पदस्थापना के आदेशों में छिपे हैं। बताया जाता है कि इस पदस्थापना के लिए मंत्री से लेकर विधानसभा सचिवालय स्तर के एक बड़े अधिकारी तक को खासा चढ़ावा चढ़ाया गया है।

आठ नाम, सीधी भर्ती और सात की विदाई –
पूरा मामला विधानसभा सचिवालय के सहायक मार्शल भर्ती प्रकरण का है। आठ नामों की सूची में सबसे पहले सुशांत राय का नाम है। इसके बाद प्रह्लाद कुमार सोनी, सुरेश कुमार, राजेश कुमार सिंह, मनीष चंद्राकर, दीपक अवस्थी, दिनेश कुमार सिंह ठाकुर और वीरेंद्र सिंह चंदेल के नाम दर्ज हैं। यह भर्ती विवाद अदालत तक जा पहुंचा। बताया गया कि भर्ती के लिए न तो व्यापक स्तर पर सार्वजनिक विज्ञापन निकाला गया और न ही पात्र अभ्यर्थियों को आवेदन का समान अवसर मिला, जिस अखबार में विज्ञापन प्रकाशित कराया गया, वह महज पेपर विज्ञापन की औपचारिकता थी अखबार को नियमित रूप से प्रकाशित ही नहीं होने दिया गया, ताकि भर्ती की भनक ज्यादा लोगों तक न पहुंचे और मनचाहे लोगों को बैकडोर से एंट्री दी जा सके।

यानी भर्ती की प्रक्रिया पर सवाल, विज्ञापन की पारदर्शिता पर सवाल और चयन के तरीके पर सवाल। मामला जब अदालत पहुंचा तो सात कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त हो गईं। लेकिन सुशांत राय के मामले में कहानी अलग ही मोड़ लेती नजर आती है। आखिर एक ही सूची में शामिल सात लोगों की नौकरी चली गई और आठवें की सेवा कैसे बरकरार रही? यही वह सवाल है, जिसका जवाब पूरी भर्ती फाइल में तलाशा जाना चाहिए।

भर्ती विवाद से मंत्री के कार्यालय तक का सफर –
सुशांत राय की कहानी सिर्फ सहायक मार्शल की नियुक्ति तक सीमित नहीं दिखती। अगस्त 2022 में उन्हें तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष नारायण चंदेल के कार्यालय में विशेष सहायक नियुक्त किया गया था। अब उनके मंत्री गुरु खुशवंत साहेब के कार्यालय में ओएसडी के रूप में पदस्थ है। एक तरफ नियुक्ति की वैधता पर पुराना विवाद, दूसरी तरफ राजनीतिक कार्यालयों में लगातार नई जिम्मेदारियां। यह पूरा सिलसिला किसी लिखी हुई स्क्रिप्ट जैसा नजर आता है। भर्ती विवाद के बावजूद सेवा में बने रहना, फिर नेता प्रतिपक्ष के कार्यालय में जिम्मेदारी और अब मंत्री के कार्यालय तक पहुंचना आखिर इस सफर में किस-किस का वरदहस्त रहा? मंत्री, विधानसभा सचिवालय और विधानसभा के शीर्ष स्तर तक से सुशांत राय को संरक्षण मिला हुआ है। यदि नियुक्ति नियमों के मुताबिक थी, तो सात अन्य कर्मचारियों की सेवाएं किस आधार पर समाप्त हुईं? और यदि सुशांत राय को कोई विशेष कानूनी राहत मिली, तो वह आदेश सार्वजनिक क्यों नहीं है?

दिनेश शर्मा की भर्ती फाइल में जवाबदेही किसकी –
इधर, सुशांत राय को अभयदान और वरदहस्त देने के बीच विधानसभा सचिव दिनेश शर्मा के विरुद्ध भी भर्ती अनियमितताओं को लेकर शिकायत और एफआईआर दर्ज कराने की मांग की जा चुकी है। शिकायत में अनियमित नियुक्तियों और दस्तावेजों को लेकर धोखाधड़ी तथा कूटरचना से संबंधित धाराओं में एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई किए जाने की मांग की गई है।

ये दिनेश शर्मा वही हैं, जिनका नाम विधानसभा में नियुक्ति फर्जीवाड़े और फर्जी कैंटीन को संरक्षण देने के विवादों में उछलता रहा है। शर्मा जी तत्कालीन सरकार में उस वक्त के स्पीकर और आज के नेता प्रतिपक्ष के बेहद करीबी है। दिलचस्प यह कि तब सुशासन वाली आज की भाजपा के सोशल मीडिया हैंडल से ही सचिव दिनेश शर्मा का 25 हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए वीडियो वायरल किया गया था। यानी कल जिनके खिलाफ भाजपा के अपने सोशल मीडिया पर सवाल उठ रहे थे, आज उन्हीं पर कार्रवाई के बजाय मेहरबानी और सेवा विस्तार दिया जा रहा है। सत्ता बदली, कुर्सियां बदलीं, लेकिन फाइलों में दबे सवालों की किस्मत नहीं बदली। अब इसे सुशासन कहें या सत्ता के हिसाब से बदलती हुई याददाश्त?

सत्ता बदली तो लगा था कि सुशासन की सरकार में पुराने घोटालों और फर्जीवाड़ों पर कार्रवाई होगी। लेकिन कार्रवाई तो दूर, सुशासन बाबू ने सेवा विस्तार देकर मानो पुराने हिसाब पर ही पर्दा डाल दिया। अब वही अफसर वर्तमान स्पीकर साहब के बेहद प्रिय बताए जाते हैं, तो सुशांत राय मंत्री जी की छत्रछाया में फल-फूल रहे हैं। उधर जिन लोगों ने सुशासन पर भरोसा किया था, वे यह सब देखकर हैरान-परेशान हैं। सवाल बस इतना है,सत्ता बदली, सरकार बदली, चेहरे बदले… लेकिन भर्ती के उस पुराने खेल का हिसाब आखिर कब बदलेगा?

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