कही-अनकही बातें – गड्ढों में सरकार, सड़क पर बेटियां… और दिल्ली में ‘वक़ामे’ बलरामपुर से अंबिकापुर तक –

कही-अनकही बातें – गड्ढों में सरकार, सड़क पर बेटियां… और दिल्ली में ‘वक़ामे’ बलरामपुर से अंबिकापुर तक –
राजधानी – राजनीति में कुछ लोग इतने बड़े हो जाते हैं कि उनका नाम लेने की जरूरत नहीं पड़ती। एक इलाका बताइए, एक विभाग बताइए, एक पुरानी कुर्सी बताइए, एक मौजूदा जिम्मेदारी बताइए और फिर मुख्यमंत्री वाली फुसफुसाहट जोड़ दीजिए… बाकी समझदार लोग समझ जाते हैं। फिलहाल कहानी एक ऐसे बड़े साहब की है, जिनकी राजनीतिक यात्रा में गृह जैसी भारी-भरकम जिम्मेदारी का अध्याय भी दर्ज है। आज उनके कंधों पर खेती-किसानी की चिंता है और समर्थक भविष्य की राजनीति में उन्हें राज्य की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुंचता देखने का सपना भी देखते हैं। सपने बड़े होने चाहिए, इसमें कोई बुराई नहीं। लेकिन जमीन भी कभी-कभी देख लेना चाहिए। क्योंकि इन दिनों जमीन कुछ ज्यादा ही दिखाई दे रही है… कहीं सड़क पर गड्ढों के रूप में और कहीं उन्हीं गड्ढों के बीच सरकार के रूप में।
जब गड्ढे ने साहब को पहचाना –
इलाके की सड़क काफी दिनों से जनता को पहचानती थी। रोज पहचानती थी… मोटरसाइकिल वाले को झटका देकर, कार वाले को ब्रेक लगवाकर, मरीज को हिलाकर और स्कूल जाने वाले बच्चे को उछालकर। लेकिन सड़क की असली किस्मत उस दिन चमकी, जब उसने एक दिन साहब को भी पहचान लिया। फिर क्या था! गड्ढे अचानक मुद्दा बन गए, व्यवस्था सक्रिय हुई, फोन घूमे, निर्देश निकले और जिम्मेदारों की तलाश शुरू हो गई। जनता शायद मन ही मन सोच रही होगी वाह! इतने दिनों से हम इसी सड़क से गुजर रहे थे, लेकिन गड्ढे को सरकारी दर्जा तब मिला, जब उसमें सत्ता की गाड़ी भी हिचकोले खाने लगी। यह व्यवस्था भी अजीब है। जनता गड्ढे में गिरे तो इसे बारिश कहते हैं और साहब की गाड़ी हिले तो इसे प्रशासनिक लापरवाही।
सड़क पर गड्ढे थे, इधर सड़क पर बेटियां –
सड़क वाली कहानी अभी चल ही रही थी कि दूसरी तस्वीर सामने आ गई। इस बार गड्ढे नहीं थे, बेटियां थीं। आदिवासी अंचल की आदिवासी छात्राएं, जिनके हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, वे अपनी समस्या लेकर सड़क पर थीं। बात इतनी बढ़ गई कि कलेक्टर कार्यालय तक पहुंचने की नौबत आ गई। यहीं एसी ट्राइबल साहब वीडियो में बच्चियों के साथ-साथ चलते दिखाई दिए, उन्हें समझाते हुए, मनाते हुए और वापस लौटने के लिए राजी करते हुए। दृश्य अपने आप में पूरी कहानी कह रहा था। बच्चियां सड़क पर थीं और अधिकारी उनके साथ चल रहे थे। शायद समझा रहे होंगे बेटियों, जाइए मत, बात कर लेते हैं। लेकिन सवाल यह है कि बात पहले क्यों नहीं हुई? समस्या हॉस्टल में थी, लेकिन व्यवस्था की बातचीत सड़क पर शुरू हुई। जब तक शिकायत कमरे में रहती है, वह आवेदन होती है। सड़क पर आ जाए तो समस्या बनती है और फिर अधिकारी निकलते हैं… समझाने और हालात संभालने। बच्चियों का सवाल शायद उतना ही सीधा रहा होगा “साहब, हमें सड़क पर आने की जरूरत ही क्यों पड़ी?” यह सवाल उस पूरी व्यवस्था का है, जिसमें आदिवासी बच्चियों को बिजली जैसी बुनियादी जरूरत के लिए सड़क तक आना पड़ा। विडंबना देखिए… यह आदिवासी अंचल है और कहानी के केंद्र में बैठे साहब भी आदिवासी समाज से आने वाले बड़े और पुराने नेता हैं। एक तरफ आदिवासी अस्मिता की राजनीति और दूसरी तरफ आदिवासी बेटियां अंधेरे से निकलकर सड़क पर यह विरोधाभास किसी विपक्षी भाषण से ज्यादा तेज है।
विभाग है… या किसी और का ‘मैनेजमेंट’?
अब आइए उस चर्चा पर, जिसे लोग खुलकर कम और आंख मारकर ज्यादा कहते हैं। सरकारी विभाग में मंत्री होते हैं, अधिकारी होते हैं, फाइलें होती हैं और नियम होते हैं। लेकिन कुछ विभागों के बारे में राजनीतिक गलियारों में जिज्ञासा ज्यादा रहती है कि फाइल किसकी है और प्रभाव किसका? इन दिनों एक विभाग को लेकर ऐसा ही तंज खूब सुनाई देता है। विभाग सरकारी है जरूर… पर चला कौन रहा है? कोई इसे प्रभाव कहता है, कोई नेटवर्क और कोई मैनेजमेंट। कुछ ज्यादा जानकार लोग मुस्कुराकर बस इतना कहते हैं “सरकारी विभाग है या आउटसोर्स हो गया है?”
हम यह नहीं कह रहे, लोग कह रहे हैं। हम तो बस इतना देख रहे हैं कि एक तरफ सड़क की हालत ऐसी कि साहब को खुद गड्ढों की हकीकत से गुजरना पड़ा और दूसरी तरफ छात्रावास की व्यवस्था ऐसी कि बच्चियों को सड़क पर आना पड़ा। अब इनके बीच कोई विभाग की कार्यप्रणाली पूछ ले तो उसे भी दोष कैसे दिया जाए?
और दिल्ली में… वक़ामे –
अब कहानी में थोड़ा स्वाद भी डाल लेते हैं। आखिर यह सिर्फ सड़क, बिजली और विभाग की कहानी नहीं है। दिल्ली में ‘वक़ामे’ की भी चर्चा है। परिवार से जुड़ा रेस्तरां, अच्छा कारोबार, अपना संसार… सब ठीक। निजी कारोबार किसी का अपराध नहीं, लेकिन राजनीति में प्रतीक कभी-कभी खुद खबर बन जाते हैं। यहां भी विरोधाभास दिलचस्प है। एक तरफ आदिवासी अंचल, जहां छत्तीसगढ़ी थाली, कोदो-कुटकी और स्थानीय खान-पान की अपनी पहचान है। दूसरी तरफ दिल्ली और दिल्ली में वक़ामे अब कोई पूछ बैठे कि अपने अंचल के स्वाद को पहचान देने की कितनी फुर्सत मिली और दिल्ली में वक़ामे की मेज कितनी सज गई, तो इसे निजी जिंदगी में दखल मत समझिए। राजनीति में सड़क भी बयान देती है, बिजली भी और कभी-कभी मेन्यू भी।
इधर बेटियां अंधेरे में, उधर साहब का ‘फूड कंटेंट’ –
इस पूरी कहानी में एक और दृश्य है साहब, घर, डाइनिंग, खाना और साथ-साथ कैमरा। खाना खाना अपराध नहीं है और अच्छा खाना खाना भी बिल्कुल अपराध नहीं। लेकिन टाइमिंग कभी-कभी पूरी खबर लिख देती है। इधर आदिवासी बच्चियां बिजली के लिए सड़क पर हों और उधर साहब के इर्द-गिर्द खाने का स्वाद चलता रहे तो जनता तुलना नहीं करती, तस्वीरें खुद कर देती हैं। फिर सोशल मीडिया पूछ बैठता है “बेटियां बिजली मांग रही थीं… साहब डिश का रिव्यू कर रहे हैं?” यह व्यंग्य है, लेकिन व्यंग्य अक्सर वहीं पैदा होता है, जहां सच इतना अजीब हो जाए कि उसे सीधे कहने में मजा न आए।
मुख्यमंत्री की कुर्सी का रास्ता… और अपने इलाके की सड़क –
अब आते हैं कहानी के सबसे दिलचस्प हिस्से पर। बड़े साहब को लेकर राजनीतिक गलियारों में एक पुरानी-सी फुसफुसाहट है कि कुर्सी बड़ी होनी चाहिए। आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, लेकिन कभी न कभी और कुर्सी भी कौन-सी? राज्य की सबसे बड़ी। महत्वाकांक्षा अच्छी बात है। मुख्यमंत्री बनने का सपना देखना भी अच्छी बात है। लेकिन जनता का सवाल थोड़ा व्यावहारिक है साहब, मुख्यमंत्री की सड़क पर निकलने से पहले अपने इलाके वाली सड़क का क्या करें? क्योंकि मुख्यमंत्री बनने का रास्ता राजधानी की ओर जरूर जाता है, लेकिन अपने इलाके की सड़क फिलहाल गड्ढों की ओर जाती दिखाई दे रही है। एक तरफ बड़े राजनीतिक सपनों की चर्चा है और दूसरी तरफ उसी इलाके में आदिवासी बेटियों को बिजली जैसी बुनियादी जरूरत के लिए सड़क पर उतरना पड़ रहा है।
साहब खुद उसी समाज से आते हैं, लंबे समय से उस इलाके की राजनीति का बड़ा चेहरा हैं और सत्ता में अहम जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। इसलिए सवाल भी उतना ही बड़ा हो जाता है कि अगर अपने प्रभाव वाले अंचल में बेटियों को अंधेरे से निकलकर सड़क तक आना पड़ रहा है तो फिर बड़े सपनों की रोशनी आखिर किसके लिए है?
इधर विभाग को लेकर राजनीतिक गलियारों में अपने ही किस्म की चर्चाएं हैं और दिल्ली में वक़ामे भी अपनी अलग कहानी लिख रहा है। परिवार का कारोबार अपनी जगह है और निजी व्यवसाय किसी का अपराध नहीं, लेकिन राजनीति में तस्वीरों और प्रतीकों का अपना हिसाब होता है। एक तरफ सड़कें सवाल कर रही हैं, दूसरी तरफ बच्चियां बिजली मांग रही हैं, तीसरी तरफ विभाग के मैनेजमेंट को लेकर फुसफुसाहट है और दिल्ली में वक़ामे की मेज सज रही है फिर भी अगर कोई पूछे कि सब ठीक है न, तो जवाब शायद यही होगा सब ठीक है साहब। बस सड़क खराब है, बच्चियों को बिजली नहीं मिली, उन्हें सड़क पर आना पड़ा, अधिकारी उन्हें मनाने निकले, विभाग को लेकर सवाल हैं और बाकी दिल्ली में वक़ामे चल रहा है। मुख्यमंत्री बनने का सपना भी चल रहा है।
बस अपने इलाके में व्यवस्था कब चलेगी, यही सवाल अभी सड़क पर खड़ा है।










