सुप्रीम कोर्ट की ‘अयोग्य’ वाली फटकार के बाद अब नया झटका! उसी DGP के नाम दर्ज पुलिस वाहन से मौत, अदालत ने नहीं मानी पुलिस की दलील –
कस्टोडियल डेथ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जिस DGP को “Totally Incompetent” कहा था, अब उसी DGP के नाम पर पंजीकृत मिनी बस से हुई मौत के मामले में पुलिस का बचाव अदालत में नहीं टिका; मृतक को जिम्मेदार बताने की दलील खारिज, 26.09 लाख रुपये मुआवजे का आदेश

रायपुर/कोरबा – बिलासपुर की कस्टोडियल डेथ के मामले में सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद छत्तीसगढ़ पुलिस के शीर्ष नेतृत्व पर उठे सवाल अभी थमे भी नहीं हैं कि एक और अदालती फैसला जवाबदेही की नई परत खोल रहा है। जिस छत्तीसगढ़ DGP को कस्टोडियल डेथ मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह अयोग्य कहा था अब उसी DGP के नाम पर पंजीकृत पुलिस विभाग की मिनी बस से हुई सड़क दुर्घटना में मौत के मामले में पुलिस पक्ष की दलील अदालत में टिक नहीं सकी। मामले अलग हैं, कानून अलग है,लेकिन सवाल फिर पुलिस व्यवस्था की जवाबदेही पर आकर खड़ा हो गया है।
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27 सितंबर 2023 को सड़क दुर्घटना में बैजनाथ कंवर की मौत हुई। दुर्घटना में शामिल मिनी बस क्रमांक CG-03-5354 रिकॉर्ड के अनुसार Director General of Police, Chhattisgarh, Raipur के नाम पर पंजीकृत थी। मृतक के परिवार के मुआवजे के दावे के साथ अदालत के सामने पहला सवाल था दुर्घटना की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी? पुलिस की दलील गलती मृतक की थी।
मुआवजा प्रकरण में पुलिस/वाहन स्वामी पक्ष की ओर से कहा गया कि मृतक तेज और लापरवाहीपूर्वक मोटरसाइकिल चला रहा था और दुर्घटना उसकी अपनी गलती से हुई। यानी जिस युवक की जान गई, अदालत में दुर्घटना की जिम्मेदारी उसी पर डालने का बचाव किया गया। लेकिन मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने गवाहों और दस्तावेजी साक्ष्यों के परीक्षण के बाद इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अधिकरण ने माना कि दुर्घटना मिनी बस चालक की तेज और लापरवाहीपूर्ण ड्राइविंग से हुई और मृतक की लापरवाही का आरोप प्रमाणित नहीं हुआ। सवाल यह है कि पुलिस व्यवस्था से जुड़े वाहन की दुर्घटना में मौत के बाद जिम्मेदारी तय करने की पहली लड़ाई भी पीड़ित परिवार को अदालत में क्यों लड़नी पड़ी?
96 लाख का दावा, 26.09 लाख का मुआवजा –
बैजनाथ कंवर के परिवार ने 96 लाख रुपये क्षतिपूर्ति की मांग की थी। परिवार का दावा था कि मृतक ड्राइवर था और करीब 18 हजार रुपये प्रतिमाह कमाता था। पर्याप्त आय दस्तावेज नहीं होने पर अधिकरण ने उसकी मासिक आय 11 हजार रुपये निर्धारित की। मृतक की उम्र, भविष्यगत आय वृद्धि, पांच आश्रितों और व्यक्तिगत खर्च की कटौती के आधार पर अदालत ने कुल 26 लाख 9 हजार 200 रुपये का मुआवजा तय किया। इसके साथ 30 जनवरी 2024 से अंतिम भुगतान तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश भी दिया गया।
DGP के नाम दर्ज वाहन, स्वामी पक्ष पर भी जिम्मेदारी –
मामले की महत्वपूर्ण कड़ी वाहन का पंजीयन है। दुर्घटना में शामिल मिनी बस Director General of Police, Chhattisgarh, Raipur के नाम पर दर्ज थी। अधिकरण ने चालक और वाहन स्वामी को संयुक्त एवं पृथक रूप से उत्तरदायी ठहराया तथा क्षतिपूर्ति के भुगतान की प्राथमिक जिम्मेदारी वाहन स्वामी पक्ष पर तय की। यानी मामला केवल चालक की व्यक्तिगत लापरवाही तक सीमित नहीं रहा। वाहन जिस शीर्ष कार्यालय के नाम पर पंजीकृत था, कानूनी जवाबदेही भी वाहन स्वामी पक्ष तक पहुंची। एक मामले में सुप्रीम कोर्ट की फटकार, दूसरे में नहीं टिका पुलिस का बचाव यहीं से दोनों मामलों के बीच जवाबदेही का बड़ा सवाल उठता है।
बिलासपुर कस्टोडियल डेथ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की थी। उसी सुनवाई में छत्तीसगढ़ के DGP को लेकर “Totally Incompetent” जैसी असाधारण टिप्पणी सामने आई। अब सड़क दुर्घटना के इस मामले में मृतक को जिम्मेदार ठहराने का पुलिस/वाहन स्वामी पक्ष का बचाव अधिकरण ने स्वीकार नहीं किया। दोनों मामलों को कानूनी रूप से एक जैसा नहीं कहा जा सकता, लेकिन दोनों रिकॉर्ड एक असहज सवाल जरूर छोड़ते हैं गलती सामने आने पर पुलिस व्यवस्था पहले जवाबदेही तय करती है या जिम्मेदारी की दिशा बदलने का प्रयास होता है?
एक मामले में सुप्रीम कोर्ट, दूसरे में पीड़ित परिवार को अदालत –
एक मामले में पुलिस हिरासत से जुड़े घटनाक्रम में मौत हुई और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। दूसरे में पुलिस विभाग से जुड़े वाहन की दुर्घटना में युवक की मौत के बाद परिवार को मुआवजे के लिए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण जाना पड़ा। एक तरफ शीर्ष पुलिस नेतृत्व की कार्यप्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी, दूसरी तरफ पुलिस पक्ष की दलील अदालत में स्वीकार नहीं हुई। क्या छत्तीसगढ़ पुलिस में जवाबदेही की शुरुआत विभाग के भीतर होती है या अदालत के दखल के बाद?
DGP के सामने दो रिकॉर्ड, सवाल एक –
एक रिकॉर्ड में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी “Totally Incompetent” दूसरे में उसी DGP के नाम पर पंजीकृत वाहन से हुई दुर्घटना का फैसला, जिसमें मृतक को दोषी ठहराने का बचाव स्वीकार नहीं हुआ और 26.09 लाख रुपये मुआवजा तय किया गया। दुर्घटना के लिए चालक की जिम्मेदारी तय हुई है और वाहन स्वामी के रूप में दर्ज शीर्ष कार्यालय पर कानूनी दायित्व आया है। लेकिन प्रशासनिक सवाल इससे बड़ा है। जिस पुलिस व्यवस्था पर सुप्रीम कोर्ट को इतनी कड़ी टिप्पणी करनी पड़ी, उसी व्यवस्था से जुड़े दूसरे मामले में अदालत को पुलिस पक्ष की दलील खारिज करनी पड़ी तो सवाल आखिर किससे पूछा जाए? अगर शीर्ष स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होगी, तो नीचे की व्यवस्था को जवाबदेह कौन बनाएगा?
कस्टोडियल डेथ हो या पुलिस वाहन से मौत… क्या छत्तीसगढ़ पुलिस में सच और जवाबदेही तभी सामने आएगी, जब किसी पीड़ित परिवार को अदालत की चौखट तक पहुंचना पड़े।










