मल्टी इंटीग्रेटेड प्लांट पर मचेगा जल संकट? फास्टरपुर के 20 गांवों पर मंडराया सूखे का खतरा, जनसुनवाई पर भी उठे सवाल –

मल्टी इंटीग्रेटेड प्लांट पर मचेगा जल संकट? फास्टरपुर के 20 गांवों पर मंडराया सूखे का खतरा, जनसुनवाई पर भी उठे सवाल –

मुंगेली (फास्टरपुर) – जिले के फास्टरपुर क्षेत्र में प्रस्तावित मल्टी इंटीग्रेटेड प्लांट अब सिर्फ एक औद्योगिक परियोजना नहीं रह गया है, बल्कि पूरे इलाके के भविष्य पर खड़ा एक बड़ा सवाल बन गया है। स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि यह प्लांट आने वाले समय में 20 से अधिक गांवों को जल संकट की गहरी चपेट में धकेल सकता है, जहां पहले से ही पानी के लिए संघर्ष जारी है।

दरअसल कैथ नवागांव में प्रस्तावित आर.एस.एल.डी. बायोफ्यूल्स प्रा.लि. के इस प्रोजेक्ट में 600 KLD रेक्टिफाइड स्प्रिट डिस्टिलरी, एथेनॉल यूनिट और 12 मेगावाट का बिजली संयंत्र स्थापित किया जाना है, और इन तीनों इकाइयों को संचालित करने के लिए प्रतिदिन भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होगी, जिसे जमीन के हजारों मीटर नीचे से निकाला जाएगा। यही वह बिंदु है जिसने पूरे विवाद को जन्म दिया है,

क्योंकि स्थानीय हालात पहले से ही बेहद नाजुक हैं। फरवरी से जून के बीच अधिकांश बोरवेल सूख जाते हैं, इलाके में न तो कोई नदी है, न नहर और न ही कोई स्थायी जल स्रोत, जिससे भूजल का प्राकृतिक रीचार्ज हो सके। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़े पैमाने पर भूजल दोहन शुरू हुआ, तो यह पूरा इलाका धीरे-धीरे बंजर होने की कगार पर पहुंच जाएगा।

ग्रामीणों की चिंता सिर्फ पानी तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके सामने जनजीवन और स्वास्थ्य का भी गंभीर संकट खड़ा होता दिखाई दे रहा है। उनका कहना है कि इस प्लांट के शुरू होने के बाद पीने के पानी की किल्लत और बढ़ेगी, निस्तारी यानी घरेलू उपयोग के लिए पानी मिलना मुश्किल हो जाएगा और खेती पूरी तरह प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा डिस्टिलरी और एथेनॉल यूनिट से निकलने वाले अपशिष्ट जल के कारण जल प्रदूषण, मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट और त्वचा, सांस तथा जलजनित बीमारियों जैसी स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा विवाद 17 नवंबर 2025 को आयोजित पर्यावरणीय जनसुनवाई को लेकर खड़ा हुआ है, जिस पर आरोप है कि इसे गोपनीय तरीके से आयोजित किया गया, स्थानीय ग्रामीणों और कई जनप्रतिनिधियों को इसकी सूचना तक नहीं दी गई और प्रक्रिया में National Green Tribunal (NGT) की गाइडलाइन का पालन नहीं किया गया। इन आरोपों के बाद अब कलेक्टर की भूमिका पर भी सीधे सवाल उठने लगे हैं और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ बताते हुए अपनी नाराजगी जाहिर की है।

मामला अब यहीं नहीं रुकने वाला, क्योंकि स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओ ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि इस जनसुनवाई को National Green Tribunal (NGT) में चुनौती दी जाएगी और जरूरत पड़ने पर मामला Supreme Court of India तक ले जाया जाएगा। उनका कहना है कि किसी भी हालत में इस प्लांट को इस इलाके में स्थापित नहीं होने दिया जाएगा और इसके लिए जल्द ही व्यापक जनसंपर्क अभियान चलाकर विरोध को तेज किया जाएगा। दूसरी ओर, स्थानीय लोगों की मांग भी साफ है कि इस प्लांट को ऐसे क्षेत्र में शिफ्ट किया जाए जहां नदी, बड़े बांध या पर्याप्त जल स्रोत उपलब्ध हों, ताकि भूजल पर निर्भरता कम हो और क्षेत्र का प्राकृतिक संतुलन बना रहे।

फास्टरपुर का यह मामला अब सिर्फ एक औद्योगिक प्रोजेक्ट का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की एक बड़ी परीक्षा बन गया है। अगर लगाए जा रहे आरोप सही साबित होते हैं, तो सवाल सिर्फ पानी का नहीं रहेगा, बल्कि यह तय करेगा कि क्या विकास की कीमत पूरे इलाके के भविष्य और अस्तित्व से चुकाई जाएगी।

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