तालाब से एटमोसफिरिया तक – छवि बनाने वाले विभाग के तिवारी तालाब और तामझाम की पूरी कहानी –

तालाब से एटमोसफिरिया तक – छवि बनाने वाले विभाग के तिवारी तालाब और तामझाम की पूरी कहानी –

रायपुर/विशेष रिपोर्ट : – यह सिर्फ एक जगह की कहानी नहीं, यह एक शहर की चुप्पी का आईना है। जहाँ कभी तालाब की सतह पर आसमान उतरता था। आज वहीं एटमोसफिरिया की रोशनी चमक रही है। जहाँ  गाड़ियाँ रुकती हैं, लोग आते हैं, म्यूज़िक बजता है, कारोबार चलता है… और इस पूरी रौनक के बीच जो गायब है, वह सवाल है जहाँ न तो तालाब है न पानी और न ही जवाबदेही।

रायपुर जैसे शहर में तालाब सिर्फ जमीन नहीं, यह शहर की सांस हैं। वही सांस इस कहानी में अब विलुप्त हो चुकी है। पहले मिट्टी आई, फिर भराव हुआ, सीमाएं बदलीं और देखते-देखते एक पूरा ढांचा खड़ा हो गया। यह सब किसी अंधेरे में नहीं हुआ। यह सब खुली आँखों के सामने हुआ, कदम-दर-कदम।

इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में एक नाम आता है। संजीव तिवारी (एस.के. तिवारी) का, जो जनसम्पर्क विभाग में लंबे समय से पदस्थ हैं। रेस्टोरेंट एटमोसफिरिया का संचालन उनकी पत्नी सरिता तिवारी के नाम से जुड़ा बताया जाता है, जबकि परिवार से श्रेष्टा तिवारी का नाम भी चर्चा में है। नाम सामने हैं, जगह सामने है और जो सबसे ज्यादा सामने है। वह है बदलाव, जिसे कोई नकार नहीं सकता।

यहीं से कहानी सवाल बन जाती है। अगर सब दिख रहा था, तो रोका क्यों नहीं गया? अगर जानकारी थी, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? कहा जाता है कि मामला ऊपर तक पहुँचा, कार्रवाई हेतु लिखा गया, लेकिन जमीन पर सब कुछ वैसा ही बना रहा , रोशनी भी, रौनक भी और कारोबार भी। तो क्या कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई?

अब इस कहानी का एक और पहलू सामने आता है। उपलब्ध दस्तावेज़ों के अनुसार, इस जगह का संचालन किराये पर दिया गया है, जिसमें हर महीने लगभग 1 लाख 67 हजार रुपये के भुगतान का उल्लेख बताया जाता है। साथ ही, यहाँ रेस्टोरेंट ही नही शराब भी परोसी जाती है। जिस जगह कभी तालाब हुआ करता था आज वहाँ शराब का झरना बह रहा है। और जिम्मेदार खुद वहाँ बैठकर इस झरने में नहा रहे है।

वही एटमोसफिरिया के मालिक जनसम्पर्क विभाग के तिवारी जी है। वही विभाग जिसका काम सरकार की छवि बनाना, नीतियों का प्रचार करना और जनहित के संदेशों को आगे बढ़ाना है। उसी विभाग से जुड़े तिवारी ऐसे मामले में घिरा हुआ दिखे, जहाँ एक प्राकृतिक तालाब खत्म होकर निजी कारोबार में बदल गया तो सवाल सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं, पूरी व्यवस्था पर उठते हैं।

क्या जनसम्पर्क सिर्फ कागज़ और विज्ञापनों तक सीमित है? या फिर जमीनी हकीकत भी उसकी जिम्मेदारी में आती है? अगर एक तरफ सरकार जल संरक्षण, पर्यावरण और विकास की बात करती है…और दूसरी तरफ उसी सिस्टम के भीतर से ऐसे दृश्य सामने आते हैं तो संदेश क्या जाता है? कानून कहता है किसी भी तालाब या जल स्रोत को खत्म करना गंभीर अपराध ही नही नियमो का उल्लंघन है। ऐसे मामलों में ध्वस्तीकरण, जुर्माना और आपराधिक कार्रवाई तक का प्रावधान है। लेकिन यहाँ सवाल कानून से ज्यादा उसके लागू होने पर खड़ा है।

इसी बीच शहर में एक तुलना लगातार गूंज रही है अगर यही मामला किसी आम नागरिक से जुड़ा होता, तो क्या कार्रवाई इतनी ही धीमी होती? या बुलडोजर पहले पहुँच चुका होता? इधर एटमोसफिरिया अपनी रफ्तार में चल रहा है जहाँ लाइटें, भीड़, कारोबार सब कुछ सामान्य है। उधर शहर यह समझने लगता है कि एक तालाब का खत्म होना सिर्फ एक जगह का नुकसान नहीं, बल्कि पूरे शहर के भविष्य पर असर है। और अब सबसे सीधा सवाल यही है। जब दस्तावेज है , व्यक्ति है , कारोबार है लेकिन तालाब गायब है तो फिर कार्रवाही क्यो रुकी हुई है।

बताया जाता है कि जिले के एक सबसे बड़े अधिकारी को भी मामला संज्ञान में लाया गया उन्होंने कार्रवाही का आश्वाशन दिया फिर उनकी बैठक हो गई इसी एटमोसफिरिया में अब जब सैया भये कोतवाल तो भी डर काहे का आज तालाब गायब है कल सारी नेचुरल चीजे तबाह हो जाएगी औए यह प्रशासन मुंह को सिलकर यह सब मंजर निहारता रहेगा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *