अफ़सर-ए-आ’ला (रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)

अफ़सर-ए-आ’ला
(रविवार की चिट्ठी – सुशांत की कलम से)

तालाब, तिवारी और तामझाम पार्ट 2
पिछले कॉलम में हमने जिस तालाब की बात थी, अब उसके कागज़ सामने हैं और तस्वीर काफी हद तक साफ हो गई है। दस्तावेज़ बताते हैं कि जमीन तालाब/कृषि की है। नगर निगम ने नोटिस जारी किए थे, कार्रवाई के आदेश भी निकले, शिकायत कलेक्टर तक पहुँची। यह सब कागज़ों में दर्ज है। पर ज़मीन पर तस्वीर अलग है, उसी जगह भव्य होटल खड़ा है। जहाँ रात में रौनक रहती है, कारोबार चलता है,और तालाब कहीं दिखाई नहीं देता। अब किरायानामा एक और परत खोलता है। प्रथम पक्षकार के रूप में बेटी का नाम, नोटिस में पत्नी का नाम, और संचालन से जुड़ा वही नाम जनसंपर्क विभाग में पदस्थ तिवारी जी का। कागज़ अलग-अलग नाम दिखाते हैं, लेकिन नियंत्रण एक ही जगह है जैसे शतरंज की बिसात, जहाँ हर चाल सोची-समझी है और हर मोहरा सुरक्षित। जब नोटिस है, आदेश है, जांच है तो कार्रवाई क्यों नहीं है? यानी कागज़ों में तालाब है, और ज़मीन पर व्यवसाय चल रहा है। एक ओर जहाँ आम आदमी के अतिक्रमण पर बुलडोज़र तेजी से चलता है, वहीं यहाँ रफ्तार धीमी क्यो पड़ गई है। या यूँ कहें, रास्ता ही बदल गया है। कभी तालाब शहर की साँस थे, आज वही कारोबार बन चुके हैं। और सुशासन? वह कागज़ों में दर्ज है। ज़मीन पर उसकी मौजूदगी अभी भी सवालों में है।

तालाब के बाद नाला गायब –
ऊपर कॉलम में जिस तालाब पर रेस्टोरेंट का जिक्र है, उससे करीब 300 मीटर पहले नाला ही गायब कर दिया गया है। यह कोई अलग घटना नहीं, बल्कि उसी कहानी का अगला अध्याय लगता है। वर्षों पुराना वह नाला, जिसका बहाव सीधे छोकरा नाला में मिलता था, आज जमीन पर लगभग खत्म हो चुका है। नाले के किनारे की सरकारी जमीन को मुरुम डालकर पाट दिया गया है। और अब अंदर से रास्ता बनाते हुए उसे सीधे VIP रोड से जोड़ने की तैयारी चल रही है। यानी जहां पानी बहना था, वहां अब रास्ता बनाया जा रहा है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, यहां पहले एक डबरी थी। आसपास के लोग और पशुपालक इसका उपयोग करते थे। अब डबरी भी खत्म हो चुकी है और नाला भी बंद कर दिया गया है। कुछ दिन पहले तक यहां पानी नजर आता था। अब वहां मिट्टी, पाइप और लेवलिंग का काम साफ दिख रहा है। सबसे अहम बात कागजों में यह आज भी नाला दर्ज है। यानी रिकॉर्ड में पानी अब भी बह रहा है लेकिन जमीन पर रास्ता तैयार हो चुका है। सिर्फ 300 मीटर के दायरे में तालाब और नाला दोनों गायब हो चुके है। यह संयोग कम, एक पैटर्न ज्यादा लगता है। अब सवाल सीधा है नक्शा बदला है या नजरें? तालाब के बाद नाला गायब है और इस बार रास्ता सीधे VIP रोड तक निकाल दिया गया है।

कांग्रेस के प्यारे, सुशासन के दुलारे –
प्रदेश में सत्ता बदले ढाई साल हो चुके हैं। सत्ता बदली, लेकिन तंत्र अब भी वहीं का वहीं खड़ा है। काफी जद्दोजहद के बाद बदलाव हुआ। पहले चीफ सेक्रेटरी अमिताभ जैन को एक्सटेंशन देकर बनाए रखा गया। इसके बाद भी उनके एक्सटेंशन की चर्चा रही। फिर केंद्र से संकेत आए और बदलाव करना पड़ा, विकासशील को बुलाया गया कुर्सी बदली, लेकिन सिस्टम नहीं बदला। डीजीपी का हाल भी कुछ ऐसा ही रहा। अशोक जुनेजा को एक्सटेंशन मिला, और 5 फरवरी 2025 को अरुण देव गौतम प्रभारी डीजीपी बने। लेकिन व्यवस्था आज भी प्रभारी भरोसे चल रही है। वन विभाग में भी वही कहानी है। श्रीनिवासन राव कांग्रेस सरकार में सुपरसीट कर PCCF बनाया गया, और अब रिटायरमेंट से पहले एक्सटेंशन की चर्चाएँ भी जोरो पर है। पीडब्ल्यूडी, एनआरडीए, जनसंपर्क दशकों से जमे अधिकारी आज भी सिस्टम की धुरी हैं। यहाँ तक कि OSD, सचिव स्तर और महिला बाल विकास जैसे विभागों में भी बदलाव की खबरें महीनों से घूम रही हैं। आईएएस आईपीएस ट्रांसफर की चर्चाएँ हैं, लेकिन जमीन पर तस्वीर जस की तस है। और यहीं से सबसे बड़ा सवाल उठता है। इस पूरे सिस्टम का केंद्र बिंदु आखिर है कौन?गलियारों में चर्चा है एक नाम जो हाउस में बैठकर डोर खींचता है, और दूसरा कम कद का, लेकिन बड़े विवादों से जुड़ा चेहरा, जिसका असर फाइलों से आगे तक बताया जाता है। सवाल उठते हैं, जवाब नहीं आते। सरकार कहती है।भ्रष्टाचार खत्म होगा। लेकिन जब चेहरे वही हों, तो सिस्टम कैसे बदलेगा? नीतियाँ नई हैं, पर असर पुराना ही दिखता है। और अंत में वही सच सत्ता बदलती है, तंत्र नहीं।

लंबू साहेब का आखिरी ओवर – पार्ट 2
पिछले रविवार हमने आखिरी ओवर की कहानी लिखी थी। तब खेल भी चल रहा था। मैदान सजा था और स्कोर बढ़ रहा था। लेकिन जैसे ही अफसर-ए-आला की एंट्री हुई,खेल की दिशा बदल गई। कमिश्नरेट सिस्टम के साथ ही गलियारों में हलचल तेज हुई। और जो कान अब तक बंद थे, अचानक खड़े हो गए। फिर एक के बाद एक कार्रवाइयाँ , बड़े नाम , बड़े रैकेट , जो नेटवर्क अछूता माना जा रहा था, वह अचानक रडार पर आ गया। देर से ही सही खामोशी टूटी है। फाइलें खुली हैं। और मैदान पर रोशनी बढ़ गई है। पुराना प्रेम और पुराने भरोसेमंद चेहरे, जो बैकएंड संभाल रहे थे, अब खुद सवालों के घेरे में हैं। आखिरी ओवर खेला तो गया। लेकिन आखिरी सीटी से पहले ही पर्दा उठ गया। अब सवाल यह नहीं कि खेल कितना बड़ा था, सवाल यह है कि यह कब से चल रहा था और किसकी नजर के सामने चल रहा था। संदेश साफ है हर ओवर का हिसाब होगा। और लंबू साहेब…अब अगला जुगाड़ ढूंढने से पहले, इस स्कोरकार्ड का जवाब देते जाइयेगा।

सुशासन में अजब-गजब कारनामे –
राजनांदगांव का एक गांव है। वहाँ एक गोठान हुआ करता था। कागज़ों में आज भी है। इतना जीवित कि फाइल खोलो तो रंभाने लगता है। जमीन पर गया तो पता चला गोठान अब संस्कारित हो चुका है। वहाँ देशी शराब दुकान खुल गई है। सरकार ने सोचा होगा गाय भूखी रहे तो दुखी होती है, आदमी दुखी रहे तो पीता है। दोनों समस्याओं का समाधान एक ही जगह क्यों न कर दिया जाए। अब दृश्य बड़ा संतुलित है। एक तरफ खूँटा, दूसरी तरफ काउंटर। एक तरफ चारा, दूसरी तरफ चढ़ावा। गोधन योजना का असली विस्तार यही है। गोबर से आय की बात पुरानी हो गई, अब बोतल से आय का युग है। कागज़ों में आज भी लिखा है। पशुओं की देखभाल। बस, पशु बदल गए हैं। सुशासन की यही खूबी है योजना मरती नहीं, रूप बदल लेती है। और अधिकारी इतने संवेदनशील हैं कि गोठान को अकेला नहीं छोड़ा उसे ठेके के सहारे खड़ा कर दिया। अब गाय भी देख लेगी, और गाँव भी देख लेगा कि विकास आखिर दिखता कैसा है।

हादसा… या कॉरपोरेट खेल –
छत्तीसगढ़ में वेदान्ता प्लांट हादसे में 23 मजदूरों की जान चली गई। आधिकारिक तौर पर इसे औद्योगिक दुर्घटना बताया जा रहा है। जांच जारी है, मुआवजा घोषित है और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया चल रही है। लेकिन घटनाओं की टाइमिंग कई सवाल खड़े करती है। इसी दौरान कॉरपोरेट जगत में जेपी ग्रुप की संपत्तियों को लेकर बड़ी दावेदारी चल रही थी। कई बड़ी कंपनियाँ मैदान में थीं और वेदान्ता की भूमिका भी इस कानूनी प्रक्रिया में चर्चा में रही, जो अदालत तक पहुँची। और इसी बीच यह हादसा हुआ। हादसे के बाद की तस्वीर भी पूरी तरह साफ नहीं दिखी। प्लांट को तत्काल सील किए जाने की खबर सामने नहीं आई, मीडिया अंदर तक पहुँची और कवरेज खुलकर हुई। फिर अचानक चेयरमैन अनिल अग्रवाल के खिलाफ एफआईआर की खबर आई और शेयर बाजार में गिरावट दर्ज हुई। क्या यह सिर्फ एक तकनीकी चूक थी, या घटनाओं की यह कड़ी महज संयोग है?कॉरपोरेट दुनिया में दांव छोटे नहीं होते। हजारों-करोड़ों की हिस्सेदारी, अधिग्रहण और नियंत्रण की इस दौड़ में हर खबर, हर कदम असर डालता है। लेकिन दूसरी तरफ एक सच्चाई और भी है औद्योगिक हादसे नए नहीं हैं। कई बार लापरवाही, कमजोर निगरानी और सुरक्षा की अनदेखी ऐसी घटनाओं को जन्म देती है। यानी तस्वीर के दो पहलू हैं सिस्टम की खामियाँ और घटनाओं की टाइमिंग। और सवाल वही है यह हादसा है… या किसी बड़े खेल की परछाईं? जवाब जांच में है। लेकिन इस बार जवाब साफ आना चाहिए क्योंकि यहाँ सिर्फ शेयर नहीं गिरे, ज़िंदगियाँ भी गई हैं।

यक्ष प्रश्न

1️⃣ किस OSD के पतिदेव की सहमति के बाद नोटिंग चीज मंज़िल तक पहुंचती है?

2️⃣ मंत्रिमंडल में किसका स्वागत और किसकी विदाई?

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