मंत्री का दरबार या ओएसडी का किला? सचिव संग रूह का राज, विभाग की डोर किसके हाथ!

मंत्री का दरबार या ओएसडी का किला? सचिव संग रूह का राज, विभाग की डोर किसके हाथ!

रायपुर : – महिला एवं बाल विकास विभाग इन दिनों किसी सरकारी दफ्तर से ज्यादा एक ऐसे किले में तब्दील होता नजर आ रहा है, जहाँ असली पहरेदार वो नहीं हैं जिनके नाम की तख्ती बाहर टंगी है… बल्कि वो हैं, जिनकी इजाजत के बिना परिंदा भी पर नहीं मार सकता है। कहानी शुरू होती है लक्ष्मी राजवाड़े से जो पहली बार चुनाव जीतकर आईं, अपनी सादगी और भरोसे के साथ। उन्हें एक संवेदनशील विभाग की जिम्मेदारी मिली, लेकिन धीरे-धीरे यह जिम्मेदारी एक ऐसे सिस्टम में तब्दील हो गई, जहाँ फैसले ऊपर से नहीं आसपास से तय होने लगे।

बताया जाता है कि मंत्री के इर्द-गिर्द एक मकड़जाल बुना गया है, जिसकी केंद्रबिंदु पर एक ओएसडी हैं। जो अब नाम से कम और “रूह” के नाम से ज्यादा पहचानी जाने लगी हैं। ढाई सालों से यह “रूह” सिर्फ मौजूद ही नहीं बल्कि पूरे विभाग की नसों में बहती हुई महसूस की जा रही है। हालात यह हैं कि बिना इस “रूह” की अनुमति के मंत्री तक न अधिकारी पहुँच पाते हैं, न आम लोग। और अगर कोई आम नागरिक गलती से इस घेरे तक पहुँच भी जाए तो उसे संवाद नहीं, सन्नाटा और कई बार फटकार ही नसीब होती है।

अब सवाल यह नहीं कि मंत्री कहाँ हैं। सवाल यह है कि मंत्री तक पहुँचता कौन है? कहा जाता है कि यह “रूह” सीधे मंत्री से नहीं, बल्कि सचिव के साथ एक ऐसे तालमेल में काम करती है, जहाँ विभाग की असली पटकथा तैयार होती है। और यही तालमेल धीरे-धीरे एक अदृश्य सत्ता में बदल गया है।जहाँ आदेश ऊपर से नहीं, फाइलों के बीच से निकलने लगे हैं। और इसका असर? सिर्फ फाइलों तक सीमित नहीं रहा बल्कि मंत्री की छवि तक पहुँच गया है।

लोग जब इस “रूह” के व्यवहार से टकराते हैं, तो उन्हें संवाद कम और दूरी ज्यादा दिखाई देती है। और यही दूरी, धीरे-धीरे मंत्री और जनता के बीच की दूरी बन जाती है। नतीजा… मंत्री की एक ऐसी छवि बन रही है, जो शायद उनकी असलियत नहीं, बल्कि उनके आसपास खड़े लोगों का प्रतिबिंब है।

सबसे दिलचस्प मोड़ आता है साड़ी वितरण मामले में। बताया जाता है कि गड़बड़ी की सूचना तक मंत्री को समय पर नहीं दी गई। जब मामला खुला, तब मंत्री ने तत्परता दिखाते हुए खादी ग्रामोद्योग को कार्रवाई के निर्देश दिए।
लेकिन उसके बाद क्या हुआ? यह भी मंत्री तक नहीं पहुँचा। यानी निर्णय उनका…लेकिन जानकारी किसी और के पास थी। यहीं से सवाल उठता है कि क्या मंत्री को सिर्फ “साइन” करने तक सीमित कर दिया गया है?

इधर अंदरखाने की फुसफुसाहटें और भी तीखी हैं। कहा जाता है कि सचिव और यह “रूह” मिलकर ऐसा घेरा बना चुके हैं, जिसमें विभाग की बागडोर पूरी तरह उनके हाथ में है। यहाँ तक कि यह भी सुनाई देता है कि “कौन मंत्री रहेगा और कौन किनारे होगा” इसकी पटकथा भी कहीं और लिखी जा रही है। और इस पूरे खेल में एक और किरदार है महत्वाकांक्षा।

सरकार के भीतर ही एक और महिला विधायक की मंत्री बनने की चाह, समय-समय पर “कैबिनेट विस्तार” की उड़ती खबरों को हवा देती रहती है। हर चार-छह महीने में यह चर्चा उठती है… और फिर ठहर जाती है। लेकिन इस बीच… कई चालें चल दी जाती हैं। चूंकि नियंत्रण कहीं और का है।

यह वही दृश्य है जब दरबार में राजा बैठा होता है, लेकिन असली फरमान किसी और के हाथ से निकलता है। यहाँ भी चेहरा सामने है और फैसले परछाइयों में लिखे जा रहे हैं।

अब सवाल मंत्री के सामने है क्या वे इस “रूह” के जाल को पहचानकर अपनी सत्ता खुद संभालेंगी? या फिर यूँ ही चलता रहेगा। जहाँ कुर्सी उनकी होगी… लेकिन हुकूमत किसी और की। क्योंकि सत्ता खाली कुर्सी नहीं होती अगर आप नहीं चलाते, तो कोई और चलाने लगता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *