सूरज की छाया, बगुले का खेल? जनसंपर्क विभाग पर करोड़ों के खर्च और पत्रकार विरोधी मुहिम के आरोप, तीसरी मंजिल में छपता है पर्चा –

सूरज की छाया, बगुले का खेल? जनसंपर्क विभाग पर करोड़ों के खर्च और पत्रकार विरोधी मुहिम के आरोप, तीसरी मंजिल में छपता है पर्चा –

रायपुर : – यह कहानी किसी एक आदेश, एक पोस्टर या एक वायरल वीडियो की नहीं है। यह कहानी उस सिस्टम की है, जिसे सरकार की छवि चमकानी थी, लेकिन आज उसी पर सवाल उठ रहे हैं कि कहीं वह खुद ही छवि धूमिल तो नहीं कर रहा है!

दरअसल राजधानी के एक दफ्तर की तीसरी मंज़िल इन दिनों फुसफुसाहटों का केंद्र बनी हुई है। कहा जा रहा है कि यहीं कहीं, फाइलों और नोटशीटों के बीच, कुछ और भी तैयार हो रहा है। ऐसी सामग्री, जो योजनाओं का प्रचार नहीं, बल्कि पत्रकारों के खिलाफ माहौल बनाती है। दावे हैं कि यह काम किसी अधिकृत प्रक्रिया से नहीं, बल्कि एक निजी व्यक्ति को बैठाकर कराया जा रहा है और फिर वही सामग्री व्हाट्सएप के रास्ते दूर-दूर तक फैल जाती है, ताकि एक खास नैरेटिव तैयार किया जा सके।

इसी बीच एक नाम बार-बार सुनाई देता है। सूरज , कहानी कहती है कि सूरज अब यहाँ नहीं है। वह राजधानी से निकलकर देश की राजधानी की ओर बढ़ चुका है। लेकिन उसकी छाया अब भी यहीं ठहरी हुई है। जो फाइलों में नहीं दिखती, पर फैसलों की दिशा में महसूस होती है।

इसी दौर से जुड़े कुछ दस्तावेज, जो सूचना के अधिकार के तहत सामने आए, एक और परत खोलते हैं। जिसमें करोड़ों के विज्ञापन, बाहरी राज्यों की मीडिया में फंडिंग, कई पोर्टलों को भारी भुगतान सब कुछ कागज़ों में दर्ज है।
लेकिन सवाल यहीं अटक जाता है कि इतना खर्च हुआ, फिर भी छवि क्यों नहीं सुधरी?

कहानी यहीं खत्म नहीं होती है। इसमें एक और किरदार है “बगुला भगत”। यह बगुला शांत दिखता है, लेकिन उसकी चोंच हर बार कहीं न कहीं पड़ती है। कहा जाता है कि यह “हाउस” का नाम लेकर जिलों तक आवाज़ पहुंचाता है, पुराने फाइलों की धूल झाड़ता है और माहौल में ऐसा दबाव बनाता है कि लोग बोलने से पहले सोचने लगें। इतना ही नहीं, सूत्र बताते हैं कि पत्रकारों के खिलाफ पर्चे छपवाने और माहौल बनाने की रणनीति में इसी बगुले की भूमिका अहम बताई जा रही है।

कहानी यह भी कहती है कि यह बगुला कोई नया चेहरा नहीं, बल्कि वही है जिसे एक दौर में नियम-कायदों को दरकिनार कर पहले पोस्टिंग दी गई, फिर पद सृजित कर जगह बनाई गई। तब का चहेता यह बगुला आज फिर से प्रभावशाली माना जा रहा है।

इधर, ज़मीन पर तस्वीर और भी उलझी हुई दिखती है। कुछ दिन पहले इसी दफ्तर के भीतर पत्रकारों के साथ कथित मारपीट का एक वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुआ था, जिसने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया। एक तरफ बाहरी पोर्टलों को विज्ञापन मिलने की चर्चा है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय पत्रकारों के खिलाफ पर्चों का प्रसार तो क्या यह वही विभाग है, जिसे सरकार की आवाज़ बनना था? या फिर यह किसी और ही खेल का हिस्सा बन चुका है? क्योंकि सवाल अब सिर्फ आरोपों का नहीं है, बल्कि प्राथमिकताओं का भी है। जिस विभाग का काम सरकार और उसके मुखिया की छवि को मजबूत करना है, वही अगर अपनी ऊर्जा पुराने दौर के एजेंडे और टकराव की राजनीति में खपा दे, तो सवाल उठना लाज़िमी है।

इधर, विभाग में नए आयुक्त की नियुक्ति हो चुकी है। जिम्मेदारियों का दायरा भी बड़ा है। लेकिन चर्चा यह भी है कि इतनी बड़ी मशीनरी के बीच उनके ही दफ्तर की तीसरी मंजिल पर क्या संपादित हो रहा है, कौन आ-जा रहा है, किसकी चहल-कदमी है। इसकी पूरी तस्वीर शायद उनके सामने नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ सिस्टम को ठहरकर देखना होगा क्योंकि अब वक्त “सूरज की छाया” का नहीं, “चांदी की चमक” दिखाने का है।

कहानी में एक और मोड़ आता है चेहरा बदला है, लेकिन क्या सिस्टम बदला है? या फिर सूरज की छाया और बगुले की चाल अब भी वैसी ही है? सबसे बड़ा सवाल अब भी हवा में तैर रहा है। क्या यह सब सरकार की छवि सुधारने के लिए हो रहा है या अनजाने में उसे नुकसान पहुंचा रहा है? क्योंकि इतिहास गवाह है। सरकारें बाहर से नहीं, अंदर से कमजोर होती हैं। और जब आईना दिखाने वालों पर ही सवाल उठने लगें, तो समझ लेना चाहिए कहीं न कहीं, रोशनी कम और परछाइयाँ ज्यादा हो गई हैं।

(अस्वीकरण)
इस खबर में उल्लेखित कुछ तथ्य, आरोप और चर्चाएं उपलब्ध दस्तावेजों, स्रोतों एवं सार्वजनिक स्तर पर चल रही सूचनाओं पर आधारित हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि शेष है।

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